अब क्या होगा - रवीश की रपट | Ravish on Current Political Situation of Delhi

अब क्या होगा

रवीश कुमार

दिल्ली के नतीजे आ गए हैं । कोई नहीं जीता है यहाँ ।  मगर कोई साहस नहीं कर पा रहा है कि राजनीति की व्यावहारिकताओं के नाम पर विचारधारा को पीछे कर न्यूनतम ज़रूरतों का कोई प्लान बने और सरकार चलाये । जोड़-तोड़ की बात तो दूर ।
तीनों दलों के नेता अपने विधायकों के प्रति आश्वस्त हैं कि कोई न तोड़ेगा और न हम किसी का तोड़ेंगे । यह अरविंद केजरीवाल की राजनीति की सबसे बड़ी कामयाबी है । 
वर्ना तोड़ने की सात्विकता का इतिहास पता करने के लिए गूगल सर्च कर सकते हैं ।

       कल इनकी राजनीति बीएसपी, एसपी या बीजेपी या कांग्रेस की तरह समझौतावादी या सत्तावादी हो ही जाएगी, इस अनिवार्य सत्य और तथ्य के सहारे राजनीति का मूल्याँकन नहीं हो सकता । जो खुद को व्यावहारिक कहते हैं वे भी आदर्श की बात करते ही हैं । लेकिन आप को लेकर आशंकायें सही होते हुए भी दुर्भावनाओं से ग्रस्त लगती हैं । कई बार तो ऐसा लगता है कि जल्दी इनके बीच से कोई चोर निकल आए ताकि राहत की साँस ली जा सके । ये आम आदमी पार्टी को देखना होगा । आप ने ज़रूरत से ज़्यादा ऊँची दीवार खड़ी कर दी है । मुझे उस विधायक की बात याद आ रही है कि इतनी ईमानदारी चलती नहीं । अरविंद अपनी ऊँची ईमानदारी से बाक़ियों की बेइज़्ज़ती कर रहे हैं । उनकी आशंका ग़लत साबित हुई ।

       लेकिन दिल्ली ने आम आदमी पार्टी के ज़रिये जो दिखाया है कि वोट सबको देना होगा । यही कि लाख दो लाख ख़र्च कर सादगी से लोगों के बीच जाएं तो दिल्ली की पढ़ी लिखी और वर्ग विलास के अहं में लिप्त रहने वाली जनता किसी को भी अपना प्रतिनिधि चुन सकती हैं । अमीर होते हुए भी वो किसी ग़रीब, बिना फिटिंग के पतलून पहनने वालों को वोट दे सकती है । सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाले राज्य में बिना आय वाले भी जीते हैं तो ग़रीबों और सबकी राजनीति करने वालों की जगह ख़त्म नहीं हुई है । दिल्ली के तमाम कुलीन इलाक़ों में  आप को वोट पड़े हैं तब जब आप ने कांग्रेस बीजेपी की तरह अवैध कालोनियों को नियमित करने और विकसित करने का वादा किया । तमाम वर्गों के लोग आप के साथ आए । इस प्रक्रिया को गहराई से देखा जाना चाहिए तब भी जब यह अस्थायी भी हो ।

       आम आदमी पार्टी की विदेश नीति क्या है और अन्य सामाजिक मुद्दों पर क्या राय है जिन पर वोटों का ध्रुवीकरण होता है इस पर जवाब देना होगा । दिल्ली की तीस प्रतिशत जनता ने बिना ये सवाल पूछे वोट दे दिया तो उम्मीद करनी चाहिए कि बाकी देश में ऐसा नहीं होगा । फ़िलहाल दिल्ली में आप के टिकट से जीतने वाली मुज़फ़्फ़रपुर की कोई लड़की अपने ज़िले में चमत्कार की कथा में बदल चुकी है । वहाँ लोग हैरान हैं कि इतने कम पैसे में बिना गोली बंदूक और भोज भात कराए उनकी बेटी विधायक बन गई है । बहुत अच्छा है कि आप से सख़्त सवाल हो रहे हैं । आख़िर अतीत की नई पार्टियोें से लोगों का दिल टूटा है तो लोग उन अनुभवों से क्यों न सवाल करेंगे । करना भी चाहिए ।

       अब आते हैं उस सवाल पर कि दिल्ली में क्या होगा । मेरी राय में अब होगा दिलचस्प मुक़ाबला । फिर चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच सीधा मुक़ाबला होगा । पहले चुनाव में दोनों के निशाने पर शीला थीं मगर अगले चुनाव में मोदी और केजरीवाल आमने सामने होंगे । बीच में होगा वो वोटर जो कथित रूप से आप को भी चाहता है और मोदी को भी । दोनों के बीच अब खुलकर आरोप प्रत्यारोप होंगे । हाई वोल्तेज युद्ध होगा । तब पता चलेगा कि दिल्ली का मध्यम वर्ग, कुलीन और आम जन किसे चाहते हैं । मोदी को, जो उस राजनीतिक दल से आते हैं जिसकी राजनीति के ख़िलाफ़ आप संघर्ष करती है या केजरीवाल को, जो जीत कर मोदी का चांस बिगाड़ सकते हैं । बीजेपी के नेता अभी से परेशान हैं कि मीडिया स्पेस में मोदी को टक्कर देने वाला कोई आ गया है । इसलिए वे बोलने लगे हैं कि जीत बीजेपी की शानदार हुई है मगर चर्चा अरविंद की हो रही है । अगर एक साल का टीवी फ़ुटेज निकाल कर अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा कि मीडिया में किसे स्पेस मिला । अरविंद केजरीवाल के कारण बीजेपी की मीडिया रणनीति बदलने वाली है । ये मेरा गेस है । 

       लेकिन मुझे लगता है कि यह भी मिथक बन चला है कि आप के समर्थक मोदी को भी चाहते हैं । ऐसे समर्थक ज़रूर होंगे मगर यह आप का बुनियादी आधार नहीं हो सकता है । आप का मतदाता अगर सिर्फ कांग्रेस विरोधी है तो बीजेपी को वोट दे देता । उसने बीजेपी को नहीं दिया । आप को बड़ी संख्या में दलितों के वोट मिले हैं । मुस्लिम सीटों के आँकड़े देखिये । हर जगह आप के उम्मीदवार को पंद्रह हज़ार और उन्नीस हज़ार तक मत मिले हैं । जबकि आप का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता है । आप के मतदाताओं ने दो साल तक अरविंद को देखा है परखा है । अरविंद पर हुए हमले को देखा है । रोहिणी और अंबेडकरनगर में जहाँ मोदी की कामयाब सभा हुई वहाँ बीजेपी नहीं जीती । लेकिन जब अरविंद, नरेंद्र मोदी का नाम लेकर सामने से हमले करेंगे तो बीजेपी भी आक्रामक होगी । बीजेपी अपने संगठन की ताक़त और सोशल मीडिया की सेना से जो जंग छेड़ेगी दिलचस्प होगा । क्या मोदी केजरीवाल का नाम लेकर हमले करेंगे । खुद से नहीं कभी मोदी जी से पूछियेगा । मोदी जी प्रेस से ज़्यादा बात भी करते हैं, राहुल से भी ज़्यादा तो शायद पूछने का मौक़ा भी मिल जाये ! वर्ना एक ही शहरी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले मोदी और केजरीवाल के बीच की टक्कर का इंतज़ार कौन नहीं करना चाहेगा । अगर शहरी आकांक्षाएँ इस हद तक समानार्थी हैं तब । राजनीति और प्यार में मोहब्बत एक से ही की जा सकती है । अगर वोटर के दिल में मोदी और अरविंद हैं तो इस दोहरे इश्क़ का भी अंजाम देख लिया जाए । एक और इम्तहान हो जाने दिया जाए !

रवीश के ब्लॉग 'कस्‍बा' http://naisadak.blogspot.in/ से

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