संदीप कुमार की कवितायेँ | Poetry by Sandeep Kumar - #Shabdankan
#Shabdankan

साहित्यिक, सामाजिक ई-पत्रिका Shabdankan


osr 1625

संदीप कुमार की कवितायेँ | Poetry by Sandeep Kumar

Share This
संदीप  कुमार  की  इन  उम्दा  भावों  वाली  कविताओं  को  पढ़  कर,  ना  सिर्फ़  कविता  को  पसंद  करने  वाले  प्रसन्न  होंगे  बल्कि  जिन्हें  कविताओं  में  किन्ही कारणों  से  रूचि  नहीं  है,  उन्हें  भी  पसंद  आने  की  ताक़त  इन  रचनाओ  में  है .

आप  सब  की  तरफ  से  'शब्दांकन'  पर  संदीप  का  हार्दिक  स्वागत  करते  हुए,  आपके  लिए  पेश  हैं  उनकी  कवितायेँ .

संदीप कुमार की कवितायेँ


                          प्रेम के लिए दो मिनट का मौन   
  
फागुन के पागल महीने में
हम चाह ही रहे थे गाना बसन्ती गीत की आ गया
नए सांस्कृतिक रथ पर सवार वैलेंटाइन डे

अकेले नही आया है
प्रेम का ये त्यौहार
इसके ऑफर पैक में मिले हैं
रोज डे ,फ्रेंडशिप डे और जाने क्या क्या ??

अब तो लगता है
की जैसे इसके आने से पहले
बिना प्रेम के रह लिए हम हजारों साल
वसंतोत्सव ?
जैसे वैलेंटाइन डे का कोई उपनिवेश
पीले वस्त्रों में लिपटा सौंदर्य
मानुस प्रेम
सरसों के खेत
जैसे बीते युग की कोई बात

इन्हे तो भुलाना ही था हमें
क्यूंकि वसंतोत्सव को
सेलिब्रेट नही कर सकते
कोक और पिज्जा के साथ
ठीक नही लगता ना

सुना तुमने
वैलेंटाइन डे आ रहा है
टीवी चॅनल पढेंगे
उसकी शान में कसीदे
और कहेंगे
देश के लोगों खरीदो
मंहगे उपहार
क्यूंकि वही होंगे तुम्हारे प्रेम के यकीन
भावनाएं तो शुरुआत भर होती हैं
ओछी और सारहीन

१४ फरवरी को अचानक याद आयेगा प्रेम
और हम नोच डालेंगे बगिया के सारे फूल
घूमेंगे सडकों, बाजारों, परिसरों में
जहाँ भी दिखें प्रेमिकाएँ
जो थीं १३ तारिख तक महज लडकियां

मुर्दा संगठनों में नयी जान फून्केगा
वैलेंटाइन डे
निकल पड़ेंगे सडकों पर उनके लोग
लाठी डंडों और राखियों से लैस
जब उन्हें दिखाई देंगे
अपने ही भाई -बहन
दूसरों की गाड़ियों पर चिपके हुए
तो वे निपोरेंगे खीस
और दिल ही दिल में स्वीकारेंगे
परिवर्तन की बात
सोचता हूँ की अगर ये है प्रेम का प्रतीक
तो क्यों लाता है आँगन में बाजार
जीना सिखाता है सामानों के साथ

डरता हूँ
इस अंधी दौड़ में बसंतोत्सव
की तरह
हम मांग ना लायें होली और दीवाली के भी विकल्प

इस कठिन समय में जब प्रेम
आत्महंता तेजी से उतर रहा है
भावना से शरीर पर

आइये करें थोडी सी प्रार्थना
ताकि प्रेम बचा रहे
हमारे भीतर की गहराइयों में
ताकि हमें रखना न पड़े
प्रेम के लिए दो मिनट का मौन

                                                जानलेवा खेल 
  

रात एक बजे

जाने किस मूड में भेजे गए उस इमेल को
सुबह संभलने के बाद उसने ख़ारिज कर दिया है

ये जिन्दगी है
लव आज कल नहीं
वह कहती है
मैं कहना चाहता हूँ कि जिन्दगी
राजश्री बैनर का सिनेमा भी तो नहीं

प्यार चाहे मुख़्तसर सा हो या लम्बा
उससे अपरिचित हो पाना बस का नहीं
चाहे वो शाहिद करीना हों या मैं और वो

तुम शादी कर लो
उसने प्रक्टिकल सलाह दी थी
उंहू...
पहले तुम मैंने कहा था

हमारा क्या होगा
ये सवाल हमारे प्यार करने की ताकत छीन रहा था
हमने अपनी आंखों में आशंकाओं के कांटे उगा लिए थे
आकाश में उड़ती चील की तरह कोई हम पर निगाहें गडाए था
मेरे लिए अब उसे प्यार करने से ज्यादा जरूरी
उस चील के पंख नोच देना हो गया था
लेकिन मैं कुछ भी साबित नहीं करना चाहता था
न अपने लिए न उसके लिए

मुझे अब इंतज़ार था
शायद किसी दिन वो वह सब कह देगी
मैं शीशे के सामने खड़ा होकर अभिनय करता
की कैसे चौकना होगा उस क्षण
ताकि उसे ये न लगे की
अप्रत्याशित नहीं ये सब मेरे लिए

हर रोज जब वो मुझसे मिलती
मेरी आँखों में एक उम्मीद होती
लेकिन वह चुप रही
जैसे की उसे पता चल गया था सारा खेल

ये जानलेवा खेल
बर्दाश्त के बाहर हो रहा है
उम्मीद भी अँधा कर सकती है
ये जान लेने के बाद मेरी घबराहट बढ़ गयी है...

                                                 अंतिम इच्छा 
  
यह कविता मैंने ३० दिसंबर २००६ को लिखी थी जिस दिन सद्दाम हुसैन को फांसी दी गयी थी 

टीवी पर खबर है 

की सद्दाम हुसैन को 
फांसी पर लटका दिया गया 

ठीक उस वक्त 
जब सद्दाम को 
फांसी दी जा रही थी 
शांति का मसीहा जार्ज बुश 
खर्राटे भर रहा था अपनी आरामगाह में 
सारी दुनिया में 
अमन और चैन 
सुनिश्चित करने के बाद 

वो डूबा हुआ था 
हसीं सपनों में 
जहाँ मौजूद होंगी 
दजला और फरात 
जलक्रीडा के अनेक साधनों में 
उसकी नवीनतम पहुँच 

या की वो खुद बग़दाद के बाजारों में 
अपने हथियारों के साथ 

संसार के सबसे शक्तिशाली 
लोकतान्त्रिक राजा की ओर से
शेष विश्व को ये था 
बकरीद और नववर्ष का तोहफा ...
उसकी वैश्विक चिंताओं और करुणा का नमूना 

जोर्ज डब्लू बुश 
इस धरती का सबसे नया भगवान
पूछ रहा है ...
हमारी अंतिम इच्छा 

                              मुझे पता था तुम्हारा जवाब 
  
उन दिनों 
जब मैं तुम्हें टूटकर प्यार करना चाहता था 
लिखता रहा प्रेम कविताएं 
ऐसे में चूंकि मुझे पता था तुम्हारा जवाब, 
मुझे कवितायेँ तुमसे संवाद का बेहतर जरिया लगीं 
मैं बेहद खुश होता तुम्हारे जवाबों से
वह मेरी आजाद दुनिया थी 
जहां किसी का दखल नहीं था 
किसी का भी नहीं 
मेरा दिल एक कमरा था 
उस कमरे में एक ही खिड़की थी
खिड़की के बाहर तुम थीं
यूं तो कमरे में हमेशा दो लोगों के लिए पर्याप्त जगह मौजूद थी 
लेकिन तुमने खिड़की पर खड़े होकर
उस पार से बतियाना ही ठीक समझा 
किसी का होकर भी उसका न हो पाना 
ये दर्द कोई मुझसे पूछे 
ठीक अभी अभी इस उदास रात में 
आसमान में कोई तारा चमका है 

शायद तुम खिड़की के बाहर खिलखिलाकर हंसी हो 

            एक अजनबी शहर में मर जाने का ख्याल 
  
एक नए शहर में
जिससे अभी आप की जान पहचान भी ठीक से ना हुई हो
मर जाने का ख्याल बहुत अजीब लगता है
ये मौत किसी भी तरह हो सकती है
शायद ऐ बी रोड पर किसी गाड़ी के नीचे आकर
या फिर अपने कमरे में ही करेंट से
ऐसा भी हो सकता है की बीमारी से लड़ता हुआ चल बसे कोई
हो सकता है संयोग ऐसा हो की अगले कुछ दिनों तक कोई संपर्क भी ना करे
माँ के मोबाइल में बैलेंस ना हो और वो करती रहे फ़ोन का इंतज़ार
दूर देश में बैठी प्रेमिका / पत्नी मशरूफ हो किसी जरूरी काम में
या फिर वो फ़ोन और मेसेज करे और उसे जवाब ही ना मिले
दफ्तर में अचानक लोगों को ख़याल आयेगा की उनके बीच
एक आदमी कम है इन दिनों
ऐसा भी हो सकता है की लोग आपको ढूंढना चाहें

लेकिन उनके पास आपका पता ही ना हो .... 

                         तुम्हारा होना... 
  ▂▂
तुम नहीं हो 
तुम्हारी सीट खाली है
दराज में रखा तुम्हारा कप 
सोच रहा है कि तुम आओगी
वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है
तुम्हारी सीट पर कोई और बैठेगा 
तो कप को बहुत खराब लगेगा
शायद वो मना भी करे
या फिर गिरकर टूट ही जाए
अगर कप टूट गया 

तो यहां और भी बहुत कुछ टूटेगा...

                                                   असफलताएं 
  
असफलताएं सिर्फ़ तोड़ती नही हैं 
बल्कि वो देती हैं 

बहुत कुछ जोड़े रखने का साहस 

हर बार हम असफल प्रेम से सीख पाते हैं 

कि गहन दुःख के क्षणों में मुस्कराया कैसे जाता है 
इसी तरह हमारे भीतर का अवसाद 
निकल कर बिखर जाता है अचानक 
जब हम बीच सड़क पर फिसल जाते हैं 
अनायास 

ठीक ऐसे ही हम कह सकते हैं की 

सबसे गहरे और अभिन्न मित्रों के बीच

सबसे मजबूत सेतु की तरह होती हैं 


उनकी एक सी असफलताएं 

                              विचारधाराओं का टकराव...  
  
उसने कहा, हमारे बीच विचारधाराओं का टकराव है
मैंने कहा, लेकिन मेरे पास तो विचार है ही नही
उसने कहा, झूठ बोलते शर्म नही आती
मैंने कहा, मैं सच कह रहा हूँ
उसने कहा, तुम तो बड़े विचारक बनते हो. तो क्या वो सब ढोंग है
मैंने कहा हाँ लेकिन हमारी दोस्ती तो ढोंग नही है न ?
उसने कहा नही ये कैसे होगा हमारी दोस्ती तो मिसाल है औरों के लिए...
उसके होठों पे मुस्कराहट थी
उसने मुझे गले लगा लिया और धीरे से कान में कहा

तुम कुछ भी कहो यार हिंदू आतंकवादी नही हो सकते...

                                          औसत होने का डर
  
बहुत भयावह होता है

औसत होने का अहसास तक
अंदाजा भी नहीं कि क्या कुछ छिन गया
इस जिद में कि औसत न दिखूं मैं
कुछ कविताएं फाड़ कर फेंक दीं
क्योंकि वे मुझे औसत लगती थीं
मुझे औसत लगी खबरों ने 
दोस्तों को पुरस्कारों से नवाजा
इस तरह मुझे चिढ़ाया और 
बदला लिया नकारे जाने का 
कुछ औसत लगते किस्से 
दफन हो गए जेहन में
और मैं पढ़ता रहा किताबों में 
उनसे घटिया कहानियां और उनकी समीक्षाएं
औसत बेटा होने के गम में 
मां-बाप के लिए वह भी नहीं कर पाया 
जो करते रहे वे साथी जिन्हें
मैं समझता था औसत से भी कम
हालांकि टूटकर किया प्रेम 
लेकिन आखिर में यही सुना 
कि बहुत औसत आदमी हूं मैं
जिंदगी जीने के सलीके के हिसाब से
क्योंकि जिंदगी के लिए प्यार के
अलावा भी चीजों की जरूरत होती है
जो औसत आदमी की जेब से 
बाहर होती हैं अक्सर
इस तरह अपनी औसत जिंदगी जीते हुए  
देखता हूं विज्ञापन किंग साइज लाइफ का
और असंतोष से भर जाता हूं

                                               आखिरी जुगनू
  
एक एक कर सारे जुगनू
कर रहे हैं आत्महत्या
कुछ नाचकर गिर रहे हैं
अधबुझे चूल्हे में तो कुछ और
अंधी गली के आखिरी
किनारे पर खड़े लैंप के भीतर

वह स्त्री आखिरी रोटी पकाने
के बाद मैले आंचल से
पोंछ रही है पसीना
उस आखिरी फूली हुई रोटी
की लोई में एक हिस्सा
उस पसीने का भी है

उधर टूटी माच पर
जो आदमी करवट बदल रहा है
मारे उमस के
और तंग होती हवा में
मुंह खोलकर सांस ले रहा है...
एक आखिरी जुगनू जा गिरा है
उसके मुंह के भीतर

▂    

 संदीप कुमार मध्य प्रदेश के एक छोटे से जिले रीवा से ताल्लुक. स्नातक व एलएलबी तक की शिक्षा वहीं से. वर्षों तक शौकिया तौर पर आकाशवाणी में कंपियरिंग व उदघोषणा की. भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद पिछले 6 साल से पत्रकारिता की दुनिया में. वर्तमान में बिजनेस स्टैंडर्ड, नई दिल्ली में कार्यरत. प्रगतिशील वसुधा, नई दुनिया, नवभारत टाइम्स समेत देश की तमाम पत्र पत्रिकाआें में लेख एवं कविताएं प्रकाशित. दिल ए नादां नाम से ब्लाग dilenadan.blogspot.com
ईमेल - aboutsandeep123@gmail.com

No comments:

Post a Comment

#Shabdankan

↑ Grab this Headline Animator