ठेस - कहानी: प्राण शर्मा | Hindi Kahani 'Thes' - Pran Sharma

ठेस

- प्राण शर्मा



दस-ग्यारह साल का भारतीय मूल का लड़का बस से उतरा ही था कि लगभग उसीकी उम्र के दो आयरिश लड़के उससे भिड़ गये। आँखें तरेर कर बोले -”निकाल अपनी जेबों से सब कुछ।"


    The Luncheon on the Grass
    French: Le déjeuner sur l'herbe
    Artist Édouard Manet
    Year 1862–1863
    Type Oil on canvas
    Dimensions 208 cm × 265.5 cm
    Location Musée d'Orsay, Paris
           "मेरी जेबों में कुछ भी नहीं है।” भारतीय लड़के ने सहमते हुए जवाब दिया।
           "तुम लोगों की जेबों में सब कुछ होता है, सोना-चांदी सब कुछ। हरामी कहीं का। निकाल सब कुछ, नहीं तो -"

           “कहा न, मेरी जेबों में कुछ भी नहीं है।"

           “दिखा अपनी जेबें।” एक ने उसकी कमीज़ का कॉलर पकड़ कर गरजना की।

           भारतीय लड़के ने कमीज़ और पैंट की सभी जेबें दिखा दीं। केवल बस पास निकला।

           “हरामी के पास कुछ भी नहीं है। कंगाल कहीं का।"

           दूसरा साथी सुनते ही लाल-पीला हो गया। उसने भारतीय लड़के को ज़ोर से धकेल दिया।

           वह गिरते-गिरते संभला ही था कि दोनों ने उसके गालों पर थप्पड़ों की बौछार शुरू कर दी।

           वह कराह उठा। रक्षा के लिए गुहार लगायी उसने।

           पास से एक ग्यारह-बारह साल का ही वेस्ट-इंडियन लड़का गुज़र रहा था। उससे भारतीय लड़के को पिटते हुए नहीं देखा गया। बचाव के लिए वह बढ़ा।

           दोनों आयरिश लड़के उसके मुक्कों के प्रहार के आगे टिक नहीं पाये।

           “अरे , भाग यहाँ से , ये मोहम्मद अली कहाँ से आ गया है ?”

           एक भागा तो दूसरा भी भाग गया।

           देखते ही देखते वे ऐसे भागे जैसे अकेले शेर को देख कर कई गीदड़ भाग जाते हैं।

           भारतीय लड़के ने सुख का सांस लिया। उसके चेहरे पर धन्यवाद के भाव जाग उठे। बड़ी नम्रता से बोला -”समय पर तुम मेरा बचाव नहीं करते तो वे मुझे मार ही डालते।"

           “क्या तुम उन्हें जानते हो ?”

           “नहीं , आज पहली बार ही उन्हें देखा है।"

           “वे लुटेरे हैं , तुम जैसों को लूटना उनका धंधा है। भविष्य में अपना ख्याल रखना।"

           भारतीय लड़के को उसमें दोस्त का रूप नज़र आया। वह शिष्ठता से पूछ बैठा -”क्या तुम मेरे दोस्त बन सकते हो ?”

           “क्यों नहीं बन सकता , मिलाओ अपना हाथ मेरे हाथ से।”

           वेस्ट-इंडियन ने अपना हाथ झट से आगे कर दिया।

           भारतीय लड़का खिल उठा।

           दोनों के हाथ मिले।

           दोनों एक दूसरे के गले लगे ऐसे जैसे-कि मुददतों बाद मिले हों।

           “खूब दोस्ती निभेगी।”वेस्ट-इंडियन लड़के ने भारतीय लड़के के गाल को पुचकारते हुए कहा।

           “सच।"

           “बिलकुल सच।"

           दोनों के चेहरे झूम उठे , बसन्ती हवा में फूलों की तरह।

           “नयी दोस्ती की खुशी में क्या तुम अपना नाम नहीं बताओगे ?” वेस्ट-इंडियन लड़के ने जिज्ञासा में पूछा।

           “मेरा नाम अशोक है।“

           “मेरा नाम मैक है। कहाँ रहते हो ?”

           “बिनले वुड में।”

           “अरे , वहाँ तो धनी लोग रहते हैं। सही कहा है न मैंने ?”

           “हाँ , सही कहा है तुमने। क्या तुम वहाँ कभी गये हो ?”

           “अपने दोस्तों के साथ एक बार वहाँ गया था। सुंदर इलाक़ा है।”

           “तुम कहाँ रहते हो ?”

           “हिल फील्ड में। कोंसिल हाउस के किराए के फ़्लैट में।

           “घर में कौन-कौन है ?”

           “मम्मी है।”

           “और तुम्हारे डैडी ?”

           “वह हमारे साथ नहीं रहते हैं। किसी गोरी के साथ रहते हैं।”

           “तुम्हारे डैडी ने अच्छा नहीं किया है।

           “क्या अच्छा नहीं किया है ?”

           “उन्हें तुम और तुम्हारी मम्मी को छोड़ना नहीं चाहिए था।”

           “हम सबको गोरा रंग बहुत अच्छा लगता है। उन्हें भी गोरा रंग अच्छा लगा और हमें छोड़ गये।”

           कहते-कहते मैक की आँखें आँसुओं की बूंदों से भर गईं।

           “खैर , तुम बताओ कि तुम्हारे घर में कौन-कौन है ?”

           “मम्मी है,  डैडी है और एक छोटा भाई है।”

           “मम्मी और डैडी क्या काम करते हैं ?”

           “मम्मी और डैडी दोनों वकील हैं।”

           “तुम्हारी मम्मी क्या काम करती है ?”

           “मेरी मम्मी एक भारतीय की कपड़ों की फैकटरी में सिलाई का काम करती है।”

           मैक और अशोक बातें करते-करते पूल मेडो बस स्टेशन आ गये थे। अशोक को घर जाने के लिए यहाँ से दूसरी बस पकड़नी थी।

           “अच्छा दोस्त , कल इसी समय तुमसे फिर मिलूँगा। अपनी मम्मी को तुम्हारे बारे में बताऊँगा। वह बहुत खुश होगी। उससे कह कर मैं भी तुम्हारे स्कूल में आ जाऊँगा।”

           “तुम वहाँ नहीं पढ़ सकते हो।”

           “क्यों ?”

           “मैं किंग हेनरी स्कूल में पढता हूँ।”

           “तो क्या हुआ ?”

           “तुम्हारी मम्मी क्या पैसे वाली है ?

           “नहीं।”

           “पैसे वाले लोग ही वहाँ अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं।”

           “उफ़ , मैं तो ये भूल ही गया था।”

           मैक इतना ही कह कर चुप हो गया। उसकी ज़बान को ताला लग गया। उदासी उसके पूरे चेहरे पर छा गयी। वह अशोक से हाथ मिलाये बगैर दुखी मन से अपने घर की ओर चल पड़ा।

          


          
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9 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय प्राण जी, बहुत ही मार्मिक काहानी | बच्चे का मासूम /उदास चेहरा आँखों के सामने आ गया |

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  2. सहज दोस्ती फिर सामाजिकता की फाँस।

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  3. प्रिय भाई प्राण शर्मा जी ने इस कहानी के द्वारा बहुत गहरी बात कह दी जो मन को अन्दर तक छू गयी.बधाई.

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  4. मार्मिक .. सच कितना कडुआ होता है कई बार ... पर झेलना पढता है फिर भी ...
    बहुत सुन्दर भाव पूर्ण कहानी है प्राण साहब की ...

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  5. A sensitive contemporary short story which has volume of a novel . Congratulations Pran ji.

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  6. A contemporary but sensitive (Samvedansheel) story which has volume of a novel. Short and crisp sentences not only make it readable but give depth to the style of writing 'laghu katha.' Congratulations Pran ji.

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  7. आदरणीय प्राण जी ,
    देरी के लिए माफ़ी . कथा ने मन को झकझोर दिया है . काश सारी दुनिया में कोई अमीरी या गरीबी का किस्सा नहीं रहता .
    आपकी लेखनी को फिर से सलाम .
    प्रणाम
    आपका
    विजय

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