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हिंदी सिखाने में हिंदी फिल्मों की भूमिका — अशोक चक्रधर | Choun re Champoo - Ashok Chakradhar

अप्रैल 2, 2014
nakornpathom

चौं रे चम्पू 

बैंकाक क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन

—अशोक चक्रधर


—चौं रे चम्पू! बैंकाक के हिंदी सम्मेलन के बारे में चौं नायं बतावै?  

—आप जानना ही कहां चाहते थे? आपके सवाल तो बैंकाक के दूसरे पक्षों पर ज़्यादा केंद्रित थे। अब क्या बताऊं? तब से अब तक समय-गंगा के घाट से न जाने कितनी घटनाएं बह गईं। तुम्हारे चम्पू को तीन दिन पहले पद्मश्री मिली, उसकी क्यों नहीं पूछते?

—वाकी का पूछैं? बो तौ मिलि गई! सबन्नैं देखि लई, सबन्नैं पतौ चलि गयौ। जो नायं पतौ सो बता, बगीची के लोगन्नैं! बता सम्मेलन में का भयौ?

—आपकी बात भी ठीक है चचा! दरअसल, भारत में जिस तरह हम हिंदी पढ़ाते हैं, उस तरह से विश्व के अन्य हिस्सों में नहीं पढ़ा सकते। हर देश की अपनी अलग-अलग मिजाज़ की भाषा और संस्कृति हैं, जिनकी निजी-विशिष्ट आवश्यकताएं हैं। उनको ध्यान में रखते हुए हिंदी के पाठ्यक्रम और पाठ्य-सामग्री का निर्माण करना होगा और उनके अनुसार ही नई शिक्षण-पद्धतियां ईजाद करनी पड़ेंगी।

—काम कहां होयगौ? भारत में कै बिदेसन में?
दिल्ली में बैठकर निदेशालयों, संस्थानों में (हिंदी सिखाना) नहीं हो सकता। रचनात्मक क्षमता रखने वाले ऐसे विद्वान अध्यापकों को शिक्षण-सामग्री-निर्माण के लिए विदेशों में भेजा जाना चाहिए, जिनमें भाषाई संरचनाओं को समझने और सीखने का माद्दा हो।
—अगर हम भारत में रहकर कार्य नहीं करा सकते तो उन अध्यापकों की सहायता लें जो भारत से भेजे जाते हैं। हर भूखण्ड, उपमहाद्वीप या महाद्वीप के देशों की भाषाएं मिलती-जुलती होती हैं। क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलनों का लाभ यही है कि जिस देश में आयोजित किया जाए, उसके आसपास के देशों के हिंदीकर्मी जुटते हैं और समस्याओं को साझा करते हैं।

—कित्ते देसन के लोग आए हते लल्ला?

—दक्षिण पूर्व एशिया के म्यांमार, मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और फिलीपीन्स से लोग आए थे। इन सभी जगहों पर छोटे-बड़े स्तर पर हिंदी पढ़ाई जा रही है। मलेशिया से आए नर्तक श्रीगणेशन ने बताया कि पारम्परिक रूप से तो हिंदी पढ़ाई ही जाती है, लेकिन इधर के वर्षों में हिंदी सिखाने में हिंदी फिल्मों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारतीय फ़िल्मों के गीतों, संवादों की मदद से विद्यार्थी बड़ी तेज़ गति से हिंदी सीखते हैं। और यह बात सिर्फ़ उन्हीं की नहीं है चचा! न्यूयॉर्क में अंजना संधीर ने हिंदी फ़िल्मी गीतों के उपयोग से शिक्षण-सामग्री बनाई। वे तो एक ही गीत से तीन काल पढ़ाती थीं, भूत, वर्तमान और भविष्य, ‘सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा’। इसी तरह से कारक-विभक्तियां, संधि, समास, मुहावरे इन सबका शिक्षण प्रो. तोमिओ मिज़ोकामी ने जापान में किया, लोकप्रिय हिंदी गीतों और नाटकों के ज़रिए।  थाईलैंड के प्रो बमरुंग खामिक मुझे सात-आठ साल पहले जापान में मिले थे उन्होंने एक पावर-प्वाइंट प्रस्तुति से अपने हिंदी-शिक्षण के तरीक़े बताए। इधर उन्होंने थाईलैंड के अपने हिंदी अध्ययन-अध्यापन के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि वे यूनीकोड का व्यापक स्तर पर प्रयोग करना चाहते हैं, लेकिन सही प्रशिक्षण का अभाव है। म्यांमार में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का प्रकाशन फिर से होने लगा है, ऐसा डॉ. सुशील कुमार बाजौरिया ने बताया। एस. पी. सिंह का मानना था कि बौद्ध-धर्म से तो संस्कृत और पालि पल्लवित हुईं लेकिन आर्य समाज के आंदोलन ने हिंदी के विकास में बहुत बड़ी भूमिका अदा की। थाई भाषा में कितने ही शब्द हैं  जो संस्कृत या पालि से लिए हुए हैं और हमें लगते हैं हिंदी के निकट। ‘अ जर्नी फ्रॉम संस्कृत टु हिंदी’, सनित सिनाग का पर्चा भी अच्छा था। उनका मानना था कि भाषायी निकटता के सूत्रों को खोजकर अगर ज्ञात से अज्ञात की और चला जाए तो अच्छी शिक्षण-सामग्री बनेगी।

—ज्ञात से अज्ञात! का मतलब भयौ?

—मतलब यह कि जितनी जानकारी सीखने वालों के पास पहले से है, उसी को प्रस्थान-बिंदु बनाया जाए। बास्निन नाम का एक शोधछात्र मुझे नौकोर्न पौथोम पगोडा दिखाने ले गया। कहते हैं कि यह पगोडा थाईलैंड में बौद्ध-धर्म का प्रवेश-द्वार है। बास्निन ने बताया कि ‘नौकोर्न पौथोम’ बना है ‘नगर प्रथम’ से। हिंदी में कहते तो ‘प्रथम नगर’ कहते। यानी, ज्ञात से अज्ञात का एक शिक्षण-बिंदु यह बना कि हिंदी में विशेषण पहले लगाए जाते हैं, थाई भाषा में बाद में। चचा, काम सरल नहीं है। दिल्ली में बैठकर निदेशालयों, संस्थानों में नहीं हो सकता। रचनात्मक क्षमता रखने वाले ऐसे विद्वान अध्यापकों को शिक्षण-सामग्री-निर्माण के लिए विदेशों में भेजा जाना चाहिए, जिनमें भाषाई संरचनाओं को समझने और सीखने का माद्दा हो। डॉ. केदार नाथ शर्मा ऐसे ही विद्वान अध्यापक हैं बैंकाक में।

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