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आततायी की प्रतीक्षा - अशोक वाजपेयी | Awaiting felon - Ashok Vajpeyi

आततायी की प्रतीक्षा

    - अशोक वाजपेयी

एक

सभी कहते हैं कि वह आ रहा है
उद्धारक, मसीहा, हाथ में जादू की अदृश्य छड़ी लिए हुए
इस बार रथ पर नहीं, अश्वारूढ़ भी नहीं,
लोगों के कंधों पर चढ़ कर वह आ रहा है :
यह कहना मुश्किल है कि वह खुद आ रहा है
या कि लोग उसे ला रहे हैं।

हम जो कीचड़ से सने हैं,
हम जो खून में लथपथ हैं,
हम जो रास्ता भूल गए हैं,
हम जो अंधेरे में भटक रहे हैं,
हम जो डर रहे हैं,
हम जो ऊब रहे हैं,
हम जो थक-हार रहे हैं,

हमें शक है पर हम कह नहीं पा रहे,
हमें डर है पर हम उसे छुपा रहे हैं,
हमें आशंका है पर हम उसे बता नहीं रहे हैं!
हम जो सब जिम्मेदारी दूसरों पर डाल रहे हैं,
हम जो अपने पड़ोस से अब घबराते हैं,
हम जो आंखें बंद किए हैं भय में या प्रार्थना में;
हम सबसे कहा जा रहा है कि
उसकी प्रतीक्षा करो :
वह सबका उद्धार करने, सब कुछ ठीक करने आ रहा है।

हमें शक है पर हम कह नहीं पा रहे,
हमें डर है पर हम उसे छुपा रहे हैं,
हमें आशंका है पर हम उसे बता नहीं रहे हैं!
हम भी अब अनचाहे
विवश कर्तव्य की तरह
प्रतीक्षा कर रहे हैं!

दो

हम किसी और की नहीं
अपनी प्रतीक्षा कर रहे हैं :
हमें अपने से दूर गए अरसा हो गया
और हम अब लौटना चाहते हैं :
वहीं जहां चाहत और हिम्मत दोनों साथ हैं,
जहां अकेले पड़ जाने से डर नहीं लगता,
जहां आततायी की चकाचौंध और धूमधड़ाके से घबराहट नहीं होती,
जहां अब भी भरोसा है कि ईमानदार शब्द व्यर्थ नहीं जाते,
जहां सब के छोड़ देने के बाद भी कविता साथ रहेगी,
वहीं जहां अपनी जगह पर जमे रहने की जिद बनी रहेगी,
जहां अपनी आवाज और अंत:करण पर भरोसा छीजा नहीं होगा,
जहां दुस्साहस की बिरादरी में और भी होंगे,
जहां लौटने पर हमें लगेगा कि हम अपनी घर-परछी, पुरा-पड़ोस में
वापस आ गए हैं !

आततायी आएगा अपने सिपहसालारों के साथ,
अपने खूंखार इरादों और लुभावने वायदों के साथ,
अश्लील हंसी और असह्य रौब के साथ..
हो सकता है वह हम जैसे हाशियेवालों को नजरअंदाज करे,
हो सकता है हमें तंग करने के छुपे फरमान जारी करे,
हो सकता है उसके दलाल उस तक हमारी कारगुजारियों की खबर पहुंचाएं,
हो सकता है हमें तंग करने के छुपे फरमान जारी करे,
हो सकता है उसके दलाल उस तक हमारी कारगुजारियों की खबर पहुंचाएं,
हो सकता है उसे हमें मसलने की फुरसत ही न मिले,
हो सकता है उसकी दिग्विजय का जुलूस हमारी सड़कों से गुजरे ही न,
हो सकता है उसकी दिलचस्पी बड़े जानवरों में हो, मक्खी-मच्छर में नहीं।
पर हमें अपनी ही प्रतीक्षा है,
उसकी नहीं।
अगर आएगा तो देखा जाएगा !


अब समय पास है

अब समय पास है
जब हमें सिर झुकाना पड़ेगा,
अभिवादन में नहीं, न प्रार्थना में -
शर्म से :
भले हमारे बोलने से शायद ही फर्क पड़ता,
पर हम चुप रहें यह चतुराई है।
हमें कोशिश तो करनी थी
कि हमारे शोर से चैन की नींद न सो सके आततायी
और उसे गोलियां खानी पड़ें।
हमारे पास जो अंत:करण था
उसे किसी लोककथा की घटना की तरह
हम किसी पिछले मुकाम पर भूल आए हैं
और हमें अब उसकी कोई जरूरत नहीं लगती।
वह पास होता तो हम व्यर्थ ही असहज अनुभव करते!
हम कह भले न रहे हों,
मन ही मन मना रहे हैं
कि वह आततायी बहुत क्रूर न हो ;
हमारी उपेक्षा करे और हमसे बदला लेने की बात भूल जाए ;
हमारी उस तक पहुंच तो कभी नहीं हो पाएगी-
पर दूर से हमारे अभिवादन को वह अनदेखा न करे
अपने विरुद के लोकार्पण के समय;
ऐसी अभिलाषा बनी रहेगी।

तब शायद हमें याद आएगा कि हमारे पास
शब्दों का नहीं आत्मविश्वास का अभाव था,
साधनों की नहीं साहस की कमी थी,
 हम ऐसे मुकाम पर पहुंचेंगे
जब कविता में पछतावे की जगह तक न बचेगी :
बची होगी सिर्फ शर्म,
जिसमें हम कैद होंगे पर जिसमें
कोई अर्थ या मर्म न होगा।
शर्मसार लोग अकसर कविता नहीं लिख पाते।

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