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देश के अधिकतर लेखकों ने दिल्ली के बारे में बहुत अच्छा नहीं लिखा है - प्रेम भारद्वाज most of the writers of this country have not written good about Delhi - Prem Bhardwaj

अप्रैल 15, 2014

उनका आना जैसे बाघ का आना - प्रेम भारद्वाज

हम सब एक पिंजड़े में बंद हैं या होने जा रहे हैं उसमें एक शेर (बाघ) भी है, अगर हम बचेंगे तो बाघ की रहमो- करम की बदौलत। अगर हम डरे तो लोगों का मनोरंजन होगा, वर्ना ज्यादा सच तो यह है कि हम बाघ की रियाया भी हैं और उसका आहार भी। यही जनतंत्र में बाघ का आना है।


                       और अगले दिन शहर में
                       फिर आ गया बाघ
                       एक बार दिन-दहाड़े
                       एक सुंदर
                       आग की तरह लपलपाता बाघ...
                       प्रार्थना में बाघ था
                       बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे बाघ
                       लोग आराम से बाघ खा रहे थे
                       बाघ पी रहे थे
                       माचिस के अंदर
                       चाय के प्याले में
                       टी.वी. स्क्रीन पर चल रहा था बाघ

                                                 केदारनाथ सिंह


          जम्हूरियत के जश्न के मौके पर बाघ-कथा। यह बाघ ‘पंचतंत्र’ का नहीं, जनतंत्र का है। यह वह बाघ भी नहीं है जिसके बारे में कवि केदारनाथ सिंह ने लिखा है। अरविंद अडिगा का ‘दि व्हाइट टाइगर’ तो कतई नहीं। और भी दुनिया की जिन भाषाओं में ‘बाघ’ की चर्चा है। सर्कस और चिड़ियाघरों में बंद बाघों के साथ भी इसका
उनका आना जैसे भेड़ की भीड़ में किसी भेड़िए का आना। दशकों बाद इतिहास की कब्र से हिटलर का लौटना... फिजा का फासिस्ट हो जाना। रक्त-स्नान के बाद किसी का कमल-सा खिल जाना... 
साम्य नहीं बैठाया जा सकता। यह अलग किस्म का बाघ है, अद्भुत। बाघ है, मगर बाघ जैसा नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे वह मनुष्य है, मगर मनुष्य जैसा नहीं है। मनुष्य से वह महत्वाकांक्षा का प्रतीक बन गया है। वह बाघ बन गया है। रेणु के उपन्यास, ‘परती परिकथा’ में एक ग्रामीण पात्र नारा लगाता है, ‘इंकलाब जिंदाबाघ।’ उसकी याद आ रही है। लेकिन मैं कुमार विश्वास के अंदाज में यह कतई नहीं कहूंगा, ‘तू समझे तो मोती है, न समझे तो पानी है।’

          उनका आना बाघ का आना है। उनका आना दहशत है। वहशत है। जज्बात है, क्या बात है? इस देश का हर तबका उनके आने को तरह-तरह से ले रहा है। उसमें अपना हित-अहित खोज रहा है। जरा समझा जाए आखिर क्या है उनका आना।
हमारे समय में प्रतिरोध की संस्कृति का क्षय होते-होते आज की तारीख में लोप हो गया है। 
          उनका आना जैसे भेड़ की भीड़ में किसी भेड़िए का आना। दशकों बाद इतिहास की कब्र से हिटलर का लौटना... फिजा का फासिस्ट हो जाना। रक्त-स्नान के बाद किसी का कमल-सा खिल जाना... फूल का पत्थर हो जाना। वज्र बन जाना। उनका आना मायने वसंत का इंतजार कर रहे उपवन में पतझड़ का आना। पल दर पल बच्चे का ख्वाब बुन रही एक स्त्री का गर्भपात हो जाना। कुछ ऐसा ही है उनका आना।

          ऐसा पहली बार देख रहा हूं कि भय को रेडियो और टेलीविजन पर विज्ञापित किया जा रहा है। सब भाग रहे हैं, भाग पाएंगे क्या, मारे भय के सर्वत्र त्राहि-त्राहि है, क्योंकि वे आ रहे हैं। उनके आने से महंगाई भाग रही है। भ्रष्टाचार भाग रहा है। उनका आना, बहुतों का जाना है। भय का लौटना है। उनका आना बहुत कुछ का पलायन है। उनके आने का अर्थ है एक व्यक्ति का दिल्ली बन जाना, राजधानी हो जाना। मतलब उनके स्वागत में बिछे कालीन-काॅर्पोरेट को थोड़ा और फैलाना। उनके आने का आशय दल का व्यक्ति हो जाना है। परंपरा को बनारसी पान की तरह चबाकर लाल-लाल थूक देना है। वह पीक भी हो सकती है और बेगुनाहों का लहू भी जिन्हें वह नापसंद करते हैं। इसका सबूत उन्होंने दल के बुजुर्गों को दर-ब-दर, औकात बता, अपमानित कर दे दिया है। इसे प्रचंड प्रारंभ माना जाए या खतरनाक भविष्य के संकेत, यह आप पर है।

          आगमन और विरोध के बीच गहरा संबंध है। उनका आना यह भी प्रमाणित करता है कि हमारे समय में प्रतिरोध की संस्कृति का क्षय होते-होते आज की तारीख में लोप हो गया है। कोई भी खाली जगह बहुत देर तक खाली नहीं रहती- सियासत, समाज और जीवन कहीं भी। सही ढंग से कहा जाए तो एक उदार व्यक्तित्व के बाद खाली स्थान को अब उस शख्स के जरिए भरा जा रहा है जो ‘राजधर्म’ नहीं निभा पाया। क्या यह हमारे समय का उदार से बाघ हो जाना है। क्या यह बदलाव हमारे समय, पार्टी, सियासत के बदलने का है। एक लोकप्रिय थे, एक को आज लोकप्रिय बनाया जा रहा है- करोड़ों की मार्केटिंग के जरिए, एक बाजारू रणनीति के तहत। भवभूति ने ‘उत्तर रामचरित’ में लिखा है कि राजा को लोकप्रिय होना ही चाहिए, क्योंकि सत्ता को पाने और उसे बनाए रखने के लिए राजा का लोकप्रिय होना बहुत जरूरी है।

          वह इसलिए लोकप्रिय हो जाना चाहते हैं कि उन्हें सत्ता चाहिए, दिल्ली चाहिए। वह दिल्ली जो सत्ता है, बेदिली का हसीन नमूना है। जहां इस देश के सबसे ज्यादा कब्रगाह हैं और हर नामी शख्स की हसरत है कि यहां एक और कब्र उसकी हो। दिल्ली को लेकर लोगों में ललक है, मगर न जाने क्यों देश के अधिकतर लेखकों ने दिल्ली के बारे में बहुत अच्छा नहीं लिखा है। दिनकर से लेकर भगवत रावत, पंकज राग तक ने।

          हाल ही में दुनिया से कूच करने वाले खुशवंत सिंह ने अपने उपन्यास ‘दिल्ली’ में लिखा है, ‘विदेशी वेश्याओं के साथ खाक छानने के बाद मैं अपनी प्रेयसी भागमती के साथ दिल्ली लौट आया। दिल्ली और भागमती में बड़ी समानता है। दोनों ने ही अशिष्ट लोगों से लगातार शोषित होने के कारण अपने ऊपरी आकर्षण को घृणास्वरूप-कुरूपता के आवरण में छिपाए रखना सीख लिया है। दिल्ली में सारी दुनिया के बाकी मुल्कों से ज्यादा भूत बसते हैं। इसलिए यहां जीना एक लंबे दुःस्वप्न से गुजरना है।’

          दिल्ली महज एक महानगर,
          राजधानी, सत्ता या
          जीने का तरीका है।
          महत्वकांक्षाओं का कुतुबमीनार।
          हसरतों का लालकिला।
          उम्मीदों का इंडिया गेट।
          हमेशा तो नहीं मगर
          अक्सर दिलों को रौंदकर ही दिल्ली तक पहुंचा जाता है।
          दिल्ली बाघ का भी प्रतीक है।
          बाघ तो बाघ है।

लैटिन अमेरिका के लेखक एदुआर्दो गालेआनोमेमोरी आॅफ फायर’ के दूसरे खंड ‘फेसेड एंड मास्क्स’ का प्रारंभ कुछ इस तरीके से करते हैं :

          ‘नीला बाघ दुनिया को कुचल देगा। बिना शैतान और बिना मौत वाली दूसरी दुनिया इस दुनिया के विनाश से पैदा होगी। यह दुनिया यही चाहती है। यह पुरानी और नाखुश दुनिया मर जाना चाहती है, यह जन्म लेना चाहती है। बंद आंखों के पीछे रोते रहने से थक चुकी और अंधी हो चुकी यह दुनिया। मरने के करीब पहुंच चुकी यह दुनिया जल्दी-जल्दी दिनों को पार करती है। इसे सितारों की हमदर्दी हासिल है। जल्दी ही आदि पिता सुनेंगे कि दुनिया कुछ दूसरा होना चाहती है और तब निजात मिलेगी, अपने झूले में सो रहा नीला बाघ कूदेगा।

          यहां दुनिया को ‘देश’ पढ़ा जाए और नीला बाघ को...।

          ‘मेरा नाम जोकर’ का वह दृश्य याद कीजिए जिसमें बेरोजगार राजू जोकर बनने की चाहत में सर्कस कंपनी के भीतर जाता है और ऐसी स्थिति बनती है कि वह पिंजड़े में शेर के साथ बंद हो जाता है। वह डरता है, मगर डर को प्रकट नहीं करता। पापी पेट का सवाल है। वह विभिन्न किस्म की भाव-भंगिमाएं बनाता है। कुल मिलाकर हास्य पैदा होता है। जिसेे देखकर करुणा का भाव जन्मना चाहिए उसे देखकर हास्य जन्मता है। हम सब एक पिंजड़े में बंद हैं या होने जा रहे हैं उसमें एक शेर (बाघ) भी है, अगर हम बचेंगे तो बाघ की रहमो- करम की बदौलत। अगर हम डरे तो लोगों का मनोरंजन होगा, वर्ना ज्यादा सच तो यह है कि हम बाघ की रियाया भी हैं और उसका आहार भी। यही जनतंत्र में बाघ का आना है।
यह मानने में हमें कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि उत्तरमुखी बाघ जब भी बोलता है। आस-पास की सारी आवाज अपनी जगहों को या तो बाघ की आवाज को समर्पित कर देती है या फिर अपने होने में, होने के सच को स्वीकार कर चुप हो जाती है। पूर्व की प्रेरणा से जन्मे उत्तरमुखी बाघ के सामने कोई शक टिक नहीं सकता है, क्योंकि शक से सवाल पैदा होते हैं और उत्तरमुखी बाघ को सवाल कतई पसंद नहीं। - श्रीकांत वर्मा
          बाघ राष्ट्रीय पशु है। अब राष्ट्र ही बाघ के हवाले होने जा रहा है जैसा कि शोर है। बाघ शिवसेना के झंडे पर अंकित है, शिवसेना के कारनामों और उनके उच्च और उदात्त विचारों से हम सब वाकिफ हैं। जहां बाघ है, वहां बर्बरता है। बाघ बर्बरता है। मनुष्यविरोधी  है, संवेदना को नोच-नोचकर खाने वाला। बाघ हर जगह है। जंगल में है। पिंजड़े में। समाज में। सियासत, संबंध और जीवन में। सिनेमा में पहले से है। सिनेमा में बाघ का इस्तेमाल नायक के नायकत्व को निखारने के लिए होता आया है। नायक बाघ से लड़ता है और उसे पछाड़ देता है। नायक के लिए यह जरूरी है कि वह शक्तिशाली को पराजित कर दे। धीरोदात्त नायक की अवधारणा पुराने काव्यशास्त्रों में व्याप्त है। सिनेमा सच नहीं होता, सच का आभास देता है और कई दफा वह सच से पलायन कर एक फैंटेसी की दुनिया में ले जाता है जहां सब कुछ रंगीन और हमारे मनोनुकूल होता है। वहां टिके रहना हमें अच्छा लगता है। यह अच्छा लगना हमें खुश करता है, और कमजोर भी। सिनेमा का सच जीवन का भी सच हो यह जरूरी तो नहीं। जीवन में बाघ खतरनाक है। वह आदमी को मारता है, उनका आहार  करता है। चूंकि बाघ रक्तपिपासु होता है, हिंसक होता है... इसलिए प्रकृति ने उसके लिए जंगलों में ही रहने की व्यवस्था की है, लेकिन बाघ अब जंगल से निकलकर शहरों की ओर कूच कर गया है। गुजरात के गिरनार वन जीव अभ्यारण से निकलकर उसने वाया गांधीनगर अब हस्तिनापुर यानी दिल्ली की ओर रुख किया है। अब यह आलम है कि हम जो भी बोल रहे हैं, बाघ ही बोल रहा है। श्रीकांत वर्मा के शब्दों में ‘यह मानने में हमें कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि उत्तरमुखी बाघ जब भी बोलता है। आस-पास की सारी आवाज अपनी जगहों को या तो बाघ की आवाज को समर्पित कर देती है या फिर अपने होने में, होने के सच को स्वीकार कर चुप हो जाती है। पूर्व की प्रेरणा से जन्मे उत्तरमुखी बाघ के सामने कोई शक टिक नहीं सकता है, क्योंकि शक से सवाल पैदा होते हैं और उत्तरमुखी बाघ को सवाल कतई पसंद नहीं।’

          दिल्ली की ओर बढ़ रहे बाघ को न सवाल पसंद हैं, न किसी का उसके सामने खड़ा होना। उसे रेंगते हुए लोगों, रिरियाती हुई जनता अच्छी लगती है। उसके लिए रियाया का मतलब रिरियाहट है। उसके और दिल्ली के बीच भेड़ों के समर्थन की दरकार है। वह हर-हर महादेव की तरह हर-हर का उच्चारण कर आगे अपना नाम जुड़वाना चाहता है। अजीब बाघ है। वह भेड़ों को सपना दिखा रहा है कि उसके राजा बनते ही बकरी और बाघ एक ही घाट पर पानी पिएंगे। रामराज आ जाएगा। एक रुपए में तो दूध, सवा रुपए में घी मिलेगा। विकास की नहर बहेगी, दुःख-दलिद्दर दूर होगा। हम अमेरिका-चीन से भी ताकतवर हो जाएंगे। समृद्धि के हिमालय बन जाएंगे। महंगाई मर जाएगी, भ्रष्टाचार लकवाग्रस्त हो जेल में सड़ता रहेगा। एक खास कौम को व्यंजना वह में कहता है, ‘गब्बर के कोप से एक ही आदमी बच सकता है, खुद गब्बर।’ यानी अगर सलामती चाहिए तो साथ दो, शरणागत रहो। ज्यादा दाएं-बाएं मत करो वर्ना...

          बाघ के आतंकी एहसास को केवल वे ही नहीं जानते जिनका वह शिकार करता है। अलबत्ता वह घास भी समझती है जिन्हें अपने खूंनी पंजों से कुचलकर वह शिकार की ओर बढ़ता है। सितम यह है कि घास शुरू से चुप, शिकार भयभीत रहे हैं। बाघ का अर्थ किसी महत्वाकांक्षा का कुंठा में तब्दील होना और कुंठा का हिंसक रूप अख्तियार करना भी है। बाघ बहुत ताकतवर होता है, सक्षम भी। जंगल के राजा बनने की तमाम योग्यताएं अहर्ताएं पूरी करता है, मगर वह राजा नहीं है। हर बाघ का ख्वाब राजा बनने का होता है। उसका यह सुनहरा और सनकी ख्वाब आज तक पूरा नहीं हो पाया, इसलिए बाघ कुंठित है। राजा न बन पाने की कुंठा ने उसे शेर से भी ज्यादा हिंसक बना दिया है। एक बार फिर एक बाघ ने राजा बनने की ठानी है और वह हिंसक भाव को छिपाकर साम-दाम-दंड भेद नीति को अपनाते हुए सिहांसन की ओर बढ़ रहा है।

          यह अजीब इत्तफाक है कि लेखकों का प्रिय विषय शेर नहीं, बाघ रहा है। बोर्हेस की प्रसिद्ध कविता ‘बंगाल टाइगर’ के बिंब अद्भुत हैं। ‘लाइफ आॅफ पाई’ के लिए बुकर जीतने वाले यान माॅर्टेल के उपन्यास में भी सुंदरवन का बाघ आता है। बाघ मिथकों और इतिहास में भी है। यह वही बाघ है जिसने पाणिनी को खा लिया था क्योंकि उसके आने पर वह उसकी गर्जना की ध्वनि का व्याकरण समझने में लगे रहे।

          समझ नहीं पाता हूं कि बाघ को बचाना क्यों जरूरी है? यह भी नहीं जानता कि राष्ट्रीय पशु के लिए अपनी किन खूबियों की बदौलत बाघ का चुनाव हुआ। और अब चुनाव में बाघ है, चुनाव में बाघ को चुनने के लिए भयभीत और स्वप्निल दोनों माहौल एक साथ हैं। कुछ दहशत में तो कुछ ख्वाब में। गलत दोनों हैं। सच तो यह है कि हम सबके भीतर भी मन के किसी न किसी कोने में बाघ दुबका है। वही है जो हिंसा करवाता है, किसी चांद को घायल करता है। सनम को सलाखों में कसता है। संवेदना की सौदेबाजी करता है और मोहब्बत में महाभारत। वह हमारे भीतर का बाघ ही है जो हम कभी अशोक हो जाते हैं, कभी तैमूर लंग, कभी हिटलर, कभी गोडसे। वह हमें बाघ के आने का खैरमकदम भी करवाता है, करवा सकता है। हमें सचेत हो जाना चाहिए ताकि बाघ दिल्ली-सिंहासन तक न पहुंचे, राजा न बने।

          अंत में खास बात यह कि बाघ के आने के जिम्मेदार हम खुद भी हैं। बाघ इसलिए नहीं आ रहा है कि हमने जंगलों को खत्म कर दिया। अलबत्ता वह इसलिए भी आ रहा है कि हमने बस्तियों और जंगलों का भेद मिटा दिया है। हम जंगल में रहते हैं सभ्यता के मुखौटे के पीछे हम जंगली ही तो हैं।

                                                         भूल-सुधार

इस संपादकीय में मैंने बाघ का नाम नहीं लिखा है। इसे आप मेरी भूल ही मानें और जहां-जहां बाघ लिखा है वहां-वहां उस व्यक्ति नाम ही पढ़ें, जिसे आप ‘बाघ’ समझ रहे हैं।

'पाखी' अप्रैल २०१४ से साभार
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