advt

हिंदीभाषी समाज अपने लेखकों को भूलता जा रहा है - अशोक मिश्र Hindi-speaking society is forgetting their writers - Ashok Mishra

मई 29, 2014

पुस्तक मेला के निहितार्थ

अशोक मिश्र (संपादक बहुवचन)

पुस्तक मेले में अशोक मिश्र

एक और नजारा यह देखने को मिला कि मेला आयोजक संस्था नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा संचालित लेखक मंच का अधिकांश समय फेसबुक पर सक्रिय हल्के–फुल्के किस्म का लेखन करने वाले कलमकारों ने अपनी पुस्तकों के लोकार्पण या चर्चा के लिए आबंटित करा लिया जबकि कई खांटी साहित्यकार इधर–उधर घूमते रहे । 
फरवरी 2014 में नेशनल बुक ट्रस्ट के सौजन्य से नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रकाशन विभाग के स्टाल का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला । पिछले दो दशकों से इस मेले को नजदीक से देखने और समझने का मौका राजधानी में रहने के चलते मिलता रहा है । इन दिनों दिल्ली छोड़कर वर्धा रहने के बावजूद विश्व पुस्तक मेला के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ है । मेले की एक बड़ी सफलता तो यह है कि यह कम से कम साल में एक बार हिंदी भाषा और साहित्य के पाठकों को अपनी पसंद की किताबें मुहैया कराने और हिंदी साहित्य के समकालीन सृजन परिदृश्य को विस्तार देने की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप करता रहा है । वैसे भी ऐसे समय में जब इलेक्ट्रानिक माध्यमों की जगर–मगर में विचारों की आंच धीमी पड़ रही हो तो इस विश्व पुस्तक मेला का महत्व और अधिक बढ़ जाता है । पिछले कुछ बरसों से मेला हिंदी के लेखकों को लगातार पाठकों के एक बड़े बाजार के बीच खड़े होकर अपनी किताबों के बारे में बोलने और जुड़ने का मौका देता है । ।काशीनाथ सिंह के साथ भगवानदास मोरवाल मेले में आम पाठकों के बीच इस बात पर भी चर्चा रही कि लेखक को लिखने के साथ मेले में चाक–चैबंद दिखना भी जरूरी है इसीलिए हिंदी के कई साहित्यकार लगातार इस या उस स्टाल पर हो रहे अनवरत लोकार्पणों में अपनी उपस्थिति बनाए रहे । एक और नजारा यह देखने को मिला कि मेला आयोजक संस्था नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा संचालित लेखक मंच का अधिकांश समय फेसबुक पर सक्रिय हल्के–फुल्के किस्म का लेखन करने वाले कलमकारों ने अपनी पुस्तकों के लोकार्पण या चर्चा के लिए आबंटित करा लिया जबकि कई खांटी साहित्यकार इधर–उधर घूमते रहे । साहित्य के लिए प्रतिबद्ध नामचीन साहित्यकारों को लेखक मंच पर कार्यक्रमों के लिए समय ही नहीं मिल सका जबकि मंच कई अज्ञात कुलशील वाले लेखकों द्वारा कब्जा लिया गया भविष्य में लेखक मंच का दुरुपयोग न किया जा सके और अगले पुस्तक मेले में यह मंच विमर्श का केंद्र बने इसका ध्यान नेशनल बुक ट्रस्ट के आयोजकों को रखना चाहिए ।

हमारा खाया–पिया अघाया मध्यवर्ग पिकनिक मनाने के जिस अंदाज में सपरिवार मेला घूमने आता है तो क्या उसके एजेंडे में किताब खरीदना शामिल होता है ? सौ–डेढ़ सौ रुपए का एक प्लेट पिज्जा तो यह वर्ग आसानी से आर्डर दे देता है लेकिन सौ रुपए की एक किताब उसे मंहगी लगती है । उनकी प्राथमिकता में कार और मंहगे सेलफोन, आईपैड खरीदना तो है लेकिन किताब खरीदना नहीं । 
पुस्तक मेला में लगभग सात दिनों तक लगातार लेखकों से बहुवचन के लिए रचना संबंधी याचना, मिलने–जुलने और गपियाने का भी मौका रहा । पुस्तक मेले में आए कुछ युवा साथियों का कहना था कि आज ऐसा साहित्य नहीं लिखा जा रहा है जो हमारे मन और समाज पर कोई खास असर छोड़ सके । एक और बड़ा सवाल है कि हमारा खाया–पिया अघाया मध्यवर्ग पिकनिक मनाने के जिस अंदाज में सपरिवार मेला घूमने आता है तो क्या उसके एजेंडे में किताब खरीदना शामिल होता है ? सौ–डेढ़ सौ रुपए का एक प्लेट पिज्जा तो यह वर्ग आसानी से आर्डर दे देता है लेकिन सौ रुपए की एक किताब उसे मंहगी लगती है । उनकी प्राथमिकता में कार और मंहगे सेलफोन, आईपैड खरीदना तो है लेकिन किताब खरीदना नहीं । जाहिर है कि जब तक इस मानसिकता में परिवर्तन नहीं आता तब तक किताबों की बिक्री सामान्य ही रहेगी । पाठकों की एक सामान्य शिकायत यह भी है कि हिंदी के अधिकांश प्रकाशकों द्वारा किताबें सिर्फ सरकारी खरीद के लिए छापी जाती हैं । खरीद में खपने के बाद ये किताबें पुस्तकालय की शोभा बढ़ाती हैं या फिर कभी–कभार शोधार्थी इन्हें उलटते पलटते नजर आते हैं । मेले में पाठकों की रुझान साहित्येतर किताबों की ओर ही अधिक रही या ऐसी किताबें जो उन्हें रोजी–रोजगार की तलाश में मददगार हो सकें । हिंदी के एक बड़े प्रकाशक ने बातचीत के दौरान यह भी कहा कि हम नई पुस्तकें छाप जरूर रहे हैं लेकिन कटु सच्चाई तो यह है कि हिंदी में स्तरीय लेखन बहुत कम हो रहा है जो पाठकों को खींचकर किताबों तक ला सके । पुस्तक मेला में बहुतेरी मुलाकातें और खट्टे मीठे अनुभव हुए लेकिन उन पर फिर कभी ।

पुस्तक मेला के दौरान ही फैजाबाद से कवि मित्र अनिल सिंह के एसएमएस से पता चला कि हिंदी के लोकप्रिय कथाकार अमरकांत नहीं रहे । हिंदी कथा साहित्य की दुनिया को अपनी कहानियों से समृद्ध करने में उनका अप्रतिम योगदान रहा । पूरे नौ दिन के विश्व पुस्तक मेला के दौरान किसी भी कार्यक्रम में उनको श्रद्धांजलि न दिया जाना मुझे दुखद लगा । ऐसा लगता है कि हिंदीभाषी समाज अपने लेखकों को भूलता जा रहा है । साहित्य की दुनिया लगातार सिकुड़ रही है या उसे मूल्यपरक बनाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए इस पर विचार किए जाने की जरूरत है ।

पिछले तीन बरसों से लगातार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल खासी लोकप्रियता अर्जित कर रहा है । मेरा मानना है कि इस पूरे आयोजन पर अंग्रेजी की छाप अधिक हिंदी की कम दिखती है । इस आयोजन की देखादेखी लखनऊ और पटना में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है । क्या आने वाले दिनों में साहित्यिक आयोजन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा प्रायोजित किए जाएंगे और देशी अंदाज में होने वाली हमारी संगोष्ठियों को ये पंचसितारा आयोजन बेदखल करेंगे । हिंदी साहित्य के दिग्गज साहित्यकारों को इन सवालों पर गौर करना होगा ।

बहुवचन के इस अंक में आलोचना की जातीय स्वाधीनता पर वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ का लेख है । रवीन्द्रनाथ टैगोर पर हिंदी में कितना काम हुआ है इसकी पड़ताल करता है बांग्ला साहित्य के अध्येता रामशंकर द्विवेदी का आलेख । सिनेमा में हुए हो रहे बदलाव पर के– हरिहरन और 1857 की 157वीं वर्षगांठ पर परिमल प्रियदर्शी के आलेख हैं । स्मृति में प्रख्यात कथा शिल्पी अमरकांत को याद किया है प्रतुल जोशी ने वहीं मराठी कविता को एक नया तेवर देने वाले नामदेव ढसाल की कविताओं पर मूल्यांकन लेख है । विदेश नीति विशेषज्ञ मुचकुंद दुबे का विश्लेषणपरक महत्वपूर्ण व्याख्यान, दीपक मलिक का तुर्की पर केंद्रित पठनीय यात्रा वृतांत, संस्मरण, कहानियां हैं । कविता खंड में भारतीय कविता के साथ–साथ भाषांतर में पांच अलग–अलग भाषाओं के कवियों की एक–एक कविता है । स्त्री विमर्श के अंतर्गत कथाकार जयनंदन का लेख है, जो कि आज के स्त्री लेखन की विशेषताओं पर केंद्रित है । मीडिया में जनसरोकारों की अनदेखी पर वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी का लेख विचार के कई बिंदु उठाता है । पूर्व की भांति वरिष्ठ कथाकार संजीव का कालम बात बोलेगी भी है । इस बार बहुवचन का बहुविध सामग्री से युक्त यह अंक कैसा लगा यह जिज्ञासा रहेगी ।

Download Bahuvachan Subscription Form
यह विश्वविद्यालय के लिए हर्ष का विषय है कि प्रो– गिरीश्वर मिश्र ने पिछले दिनों विश्वविद्यालय के कुलपति पद का कार्यभार संभाल लिया है । वे दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विषय के प्रोफेसर रहे हैं और पिछले चार दशकों से इसी क्षेत्र में लगातार अपनी सक्रिय उपस्थिति बनाए हुए हैं । कार्यभार ग्रहण करने के साथ ही साथ श्री मिश्र ने विश्वविद्यालय में लगातार आयोजित दो–तीन सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान शैक्षिक वातावरण को बेहतर बनाने और शोध का स्तर सुधारने के प्रति अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दी हैं । बहुवचन परिवार को यह घोषित करते हुए हर्ष है कि वे पत्रिका के संरक्षक संपादक के रूप में हमारा मार्गदर्शन करेंगे । विश्वविद्यालय परिवार में उनका हार्दिक स्वागत है कि वे अपने और कर्मचारियों के सामूहिक प्रयत्नों से विश्वविद्यालय को नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर करें । 

टिप्पणियां

ये पढ़े क्या?

{{posts[0].title}}

{{posts[0].date}} {{posts[0].commentsNum}} {{messages_comments}}

{{posts[1].title}}

{{posts[1].date}} {{posts[1].commentsNum}} {{messages_comments}}

{{posts[2].title}}

{{posts[2].date}} {{posts[2].commentsNum}} {{messages_comments}}

{{posts[3].title}}

{{posts[3].date}} {{posts[3].commentsNum}} {{messages_comments}}

ये कुछ आल टाइम चर्चित

कहानी: दोपहर की धूप - दीप्ति दुबे | Kahani : Dopahar ki dhoop - Dipti Dubey

अरे! देखिए वो यहाँ तक कैसे पहुंच गई... उसने जल्दबाज़ी में बाथरूम का नल बंद कि…

जनता ने चरस पी हुई है – अभिसार शर्मा | Abhisar Sharma Blog #Natstitute

क्या लगता है आपको ? कि देश की जनता चरस पीए हुए है ? कि आप जो कहें वो सर्व…

मुसलमान - मीडिया का नया बकरा ― अभिसार शर्मा #AbhisarSharma

अभिसार शर्मा का व्यंग्य मुसलमान - मीडिया का नया बकरा …

गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvellous Poems

गुलज़ार की 10 बेहतरीन कविताएं! जन्मदिन मनाइए: पढ़िए नज़्म छनकती है...  गीतका…

मन्नू भंडारी: कहानी - अकेली Manu Bhandari - Hindi Kahani - Akeli

अकेली (कहानी) ~ मन्नू भंडारी सोमा बुआ बुढ़िया है।  …

कहानी "आवारा कुत्ते" - सुमन सारस्वत

रेवती ने जबरदस्ती आंखें खोलीं। वह और सोना चाहती थी। परंतु वॉर्ड के बाहर…

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं! — गीताश्री आखिर बाईजी का नाच शुर…

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

premchand ki kahani  प्रेमचंद के फटे जूते premchand ki kahani — …

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika …

कायरता मेरी बिरादरी के कुछ पत्रकारों की — अभिसार @abhisar_sharma

मैं सोचता हूँ के मोदीजी जब 5, 10 या 15 साल बाद देश के प्रधानमंत्री नहीं …

साल दर साल

एक साल से पढ़ी जाती हैं

कहानी "आवारा कुत्ते" - सुमन सारस्वत

रेवती ने जबरदस्ती आंखें खोलीं। वह और सोना चाहती थी। परंतु वॉर्ड के बाहर…

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं! — गीताश्री आखिर बाईजी का नाच शुर…

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

premchand ki kahani  प्रेमचंद के फटे जूते premchand ki kahani — …

हिंदी कहानी : उदय प्रकाश — तिरिछ | uday prakash poetry and stories

उदय प्रकाश की कहानी  तिरिछ  तिरिछ में उदय प्रकाश अपने नायक से कहल…

मन्नू भंडारी: कहानी - अकेली Manu Bhandari - Hindi Kahani - Akeli

अकेली (कहानी) ~ मन्नू भंडारी सोमा बुआ बुढ़िया है।  …

गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvellous Poems

गुलज़ार की 10 बेहतरीन कविताएं! जन्मदिन मनाइए: पढ़िए नज़्म छनकती है...  गीतका…

हिन्दी सिनेमा की भाषा - सुनील मिश्र

आलोचनात्मक ढंग से चर्चा में आयी अनुराग कश्यप की दो भागों में पूरी हुई फिल…

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika …

महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi Verma Stories list in Hindi BIBIYA

बिबिया —  महादेवी वर्मा की कहानी  mahadevi verma stories list in hind…