ये कहाँ जा रहे हो साहित्य ? Literature ! Where are you going?

राकेश बिहारी की ईमेल अभी-अभी मिली, पढ़ कर सकते में हूँ...
तय नहीं कर पा रहा कि क्या कहूँ; बहरहाल मुझसे जो हो पाया किया... आगे आप-सब ही कहें या .......................

भरत तिवारी

(नोट:  मेल में लिखी भाषा के कारण उसका स्क्रीन-शॉट दे रहा हूँ, नहीं चाहता कि सर्च-इंजन ऐसी भाषा के लिए 'शब्दांकन' को दिखाए !!!)




नया ज्ञानोदय में प्रकाशित राकेश बिहारी का लेख

आबादियों के विस्थापन में हुई बर्बादियों की दास्तान

(संदर्भ: चन्दन पाण्डेय की कहानी 'नकार' और संजीव की कहानी 'ज्वार')

- राकेश बिहारी 


कुछ घटनाएं बीत कर भी नहीं गुजरतीं। बल्कि उनके घटित होने का सच एक कालातीत सघनता के साथ समय और सभ्यता के इतिहास का स्थाई हिस्सा हो जाता है।  भारत के इतिहास में किसी दु:स्वप्न की तरह टाँक दिया गया शब्द- 'विभाजन' एक ऐसी ही घटना है। विभाजन और उससे उत्पन्न त्रासदी पर हर पीढ़ी के कथाकारों ने लिखा है। फिलहाल मेरे सामने है भूमंडलोत्तर कथा पीढ़ी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर चन्दन पांडेय की कहानी 'नकार' जो नया ज्ञानोदय के नवंबर 2006 अंक में प्रकाशित हुई थी और भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनके पहले कहानी-संग्रह 'भूलना' में संकलित है। 

          आज़ादी की स्वर्ण जयंती के उत्सवधर्मी माहौल में भारत और पाकिस्तान की सरहद के आर-पार जाने को लेकर दी गई नई सरकारी छूटों की पृष्ठभूमि में लिखी गई इस कहानी के केंद्र में वर्षों पूर्व गुम हो गई अपनी माँ को खोजने हेतु की गई एक छप्पन वर्षीय भारतीय हिन्दू स्त्री की पाकिस्तान यात्रा है। विभाजन के फलस्वरूप हुये सीमा पार के विस्थापन की संवेदनात्मक त्रासदियों को यह कहानी जिस बारीकी से रेखांकित करती है, वह महत्वपूर्ण है।  अपनी भावनात्मक तरलता और सम्बन्धों के स्पर्शी पड़ताल के कारण लगभग सात वर्ष पूर्व पढ़ी गई यह कहानी आज भी मेरे जेहन में ताज़ा है।  कहानी बस इतनी-सी है कि एक स्त्री जिसका नाम रागिनी है, अपनी मां को खोजने पाकिस्तान जाती है, सरकारी प्रयासों से उसे जुबैदा नामक पाँच ऐसी स्त्रियॉं का पता मिलता है जिनमें से किसी एक के उसकी माँ होने की संभावना है। उन पाँच संभावित माँओं में से एक, जिसकी उम्र रागिनी से कम है, को छोडकर वह अन्य चारों औरतों से मिलती है। हर बार अपनी माँ को खोज लेने या उन तक पहुँच जाने की सारी संभावनाएं जिस तरह उसके भीतर हिलकोरें लेती हैं, लगता है जैसे वह अपनी मंजिल पर पहुँच ही गई है, लेकिन अंतत: वह एक संवेदनात्मक त्रासदी का शिकार होकर खाली हाथ भारत लौट जाती है। इस खोज-यात्रा के हर पड़ाव पर यह कहानी जिस तरह  रागिनी और उसकी संभावित माँओं के बीच हुये संवादों के माध्यम से रिश्तों के छूटने, दरकने और छीजने की हकीकत से दो-चार होते हुये संबंधियों के विलग हो जाने से उत्पन्न भावनात्मक शून्य के बीहड़ को रेखांकित करती है, वह उल्लेखनीय है। रागिनी और पहली जुबैदा के बीच हुये संवाद की कुछ कतरनें आप भी देखिये – 

          मैंने कहा- "माँ तुम्हें रागिनी नाम अबतक नहीं भूला?"

          "अबतक नहीं भूला का क्या मतलब, बेटी मुझे याद ही कब था?" ये काफिरों के नाम मेरे समझ में नहीं आते।"  माँ बूढ़े की गर्दन पर ढुलक आए पेय को पोंछते हुये कहती जा रही थी। मुझे यह शिद्दत से लगने लगा था कि कोई चूक हो चुकी है।

          "मैं तुम्हारी बेटी हूँ मां। तुम्हें रागिनी याद नहीं? छह साल की थी रागिनी जब तुम्हें लोग घर से उठा लाये थे? सब भूल गयी? तुम्हें हुआ क्या है आखिर? अवधेश सिंह तुम्हारे पति थे, अभी जीवित हैं, मेरे पिता हैं। तुम्हारे हाथ का लिखा यह पोस्टकार्ड..." 


          रागिनी और जुबैदा के इस स्पर्शी संवाद तक आते-आते मेरे भीतर कुछ कौंधता है, रागिनी और जुबैदा से जैसे कोई पुराना नाता है मेरा... आखिर कब मिला इनसे पहले? स्मृतियों पर बल देता हूँ... वागर्थ का कोई पुराना पन्ना फड़फड़ाता है, शायद 2002 या 03 का… पहल सम्मान 2004 के मौके पर 'ज्वार' कहानी का पाठ करते संजीव की स्मृतियाँ ताज़ा हो जाती हैं और रागिनी तथा जुबैदा की शक्लें धीरे-धीरे शिखा और अंजुमन बूड़ी की आवाज़ों में बदलने लगती है..

          मैंने अणिमा दी को बाँहों में भरकर खींच लिया। "दीदी! दीदी! मेरी दीदी! कितने दिन बाद देख रही हूँ अपनी अणिमा दी को। पहचाना मुझे, मैं तुम्हारी शिखा हूँ – गुड्डी।"

          "छोड़ो मुझे। मैं किसी शिखा, किसी गुड्डी को नहीं जानती।" 

          मुझे गहरा धक्का लगा तो क्या मैं किसी मुर्दे को पकड़े हुये थी? हाथों के बंद ढीले पड़े। काफी औरतें जमा हो गई थीं। मेरी स्थिति हास्यास्पद होती जा रही है। मैं सफाई पर उतर आई। "याद है दीदी, जब आप बर्द्धमान आई थीं, मैं इत्ती-सी थी।" मैंने हाथ से पाँच साल के बच्चे का कद बताया, "मैं पाँच साल की थी, आप सात साल की। मुझे गोद में लेकर घूमा करती थी। उठा नहीं पाती थीं पूरी तरह। एक बार लेकर गिर पड़ी थी, इसके चलते आपको मार भी खानी पड़ी थी। यह रहा वह दाग भौंहों पर।"

          रागिनी और शिखा के गहरे आत्मविश्वास से भरे शब्द, जुबैदा और अंजुमन के इंकार की भंगिमा और इन इंकारों के बाद रागिनी और शिखा के शब्दों में उतर आया सफाई देने का भाव.. सब एक जैसे ही तो हैं। इतना ही नहीं, अपनी माँ और मौसेरी बहन को खोजने निकली रागिनी और शिखा ने ख़ास तौर पर इस यात्रा में साड़ियाँ भी पहन रखी हैं। और हाँ, विस्थापन की इस त्रासदी के बाद कुसुम का जुबैदा और अणिमा का अंजुमन हो जाना भी तो लगभग एक जैसी ही बातें हैं। इतनी समानताओं के बाद 'नकार' की बात करते हुये 'ज्वार' का याद आना स्वाभाविक है। लेकिन इन दो कहानियों में इस तरह की समानताओं को रेखांकित करने का मेरा उद्देश्य न तो 'नकार' पर 'ज्वार' के प्रभाव का अध्ययन करना है न हीं नकल करने जैसे किसी चलताऊ निष्कर्ष पर पहुँचना ही। पर इतनी समानताओं के बावजूद कैसे दो लेखकों की कहानियाँ एक दूसरे से नितांत भिन्न हो जाती हैं, इस पर गौर करना खासा दिलचस्प है। विषय की एकरूपता और कहन की समानता के बावजूद दो तरह की लेखकीय युक्तियाँ और रचना प्रविधियाँ एक-सी लगती दो कहानियों के बीच कितना बड़ा फासला खड़ा कर देती हैं, यह जानना कुछ अर्थों में कथालेखन पर किसी प्रभावशाली कार्यशाला में शामिल होने जैसा भी है। 

          उल्लेखनीय है कि संबंधों की इस संवेदनात्मक तलाश-यात्रा को कहानी का रूप देने में संजीव जहां भावनाओं और परिवेशगत विशेषताओं के सघन अंतर्गुंफन की लेखकीय युक्ति का सहारा लेते हैं वहीं चन्दन पाण्डेय झूठे-सच्चे विषयगत जानकारियों के घालमेल से कथानक को आगे बढाते हैं। रेल मार्ग से सरहद पार जाने की अनुमति प्राप्त करने के लिए अभ्यर्थी का हाई स्कूल, इंटरमीडियट और स्नातक परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी से पास होना तथा उसके बाद किसी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों वाली लिखित परीक्षा में उतीर्ण होने की अनिवार्यता जैसी बातें न सिर्फ कोरी कल्पना हैं, बल्कि भ्रामक यथार्थ की रचना करते हुये कहानी के पाठ में बाधा भी उत्पन्न करती हैं। अविश्वसनीय तथ्यों की ऐसी कल्पना को न तो किसी कथा-प्रविधि का नाम दिया जा सकता है न ही इसे फंतासी की तकनीक से ही जोड़ कर देखा जा सकता है। कथा-प्रसंगों की इन्हीं कृत्रिमताओं के कारण रागिनी और जुबैदाओं की बातचीत की स्पर्शी कोमलता, जो निश्चित तौर पर कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है, के अतिरिक्त कहानी को आगे बढ़ाने के लगभग सभी उपकरण अनुभव जगत की परिसीमा से बाहर के और पूरी तरह काल्पनिक जान पड़ते है। 

          बेबुनियादी कल्पना के सहारे गढ़ी हुई संवेदना का ही नतीजा है कि ‘नकार’ के प्रभावशाली अंश भी ‘ज्वार’ के सामने हल्के और आभाहीन लगने लगते हैं।  या यूं कहें कि कथानक की यही अविश्वसनीयता ‘नकार’ और ‘ज्वार’ के बीच एक बड़ी विभाजक रेखा खींच देती है। कथा-दृश्यों के अंकन पर बारीकी से विचार करते हुये यह महसूस होता है कि ‘ज्वार’ कहानी में संजीव सिर्फ भाषा नहीं रचते, बल्कि भाषा के भीतर स्थान विशेष का सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश निचोड़कर रख देते हैं... एक उदाहरण देखिये – 
" इस पार आ जाने के बाद भी काफी दिनों तक उनकी जड़ें तड़पती रहीं, वहाँ के खाद पानी के लिए।  वे लहलहाते धान के खेत, नारियल के लंबे-ऊंचे पेड़, आम-जामुन के स्वाद, चौड़ी-चौड़ी हिलकोरें लेती नदियां, नदियों के पालने में  झूलती नावें, रात में नावों की लालटेनों से लहरों पर दूर तक फैली ललाई, संवलाई-संवलाई रातों में उड़-उड़कर आते भटियाली गीत..."

          नदियों में नाव का दृश्य हो या लहरों पर फैली रोशनी की बात... प्रकृति चित्रण के पारंपरिक चश्मे से देखें तो यहाँ कुछ भी तो नया नहीं है,  लेकिन नदी और नाव के बीच ‘पालने’ के  बिम्ब संयोजन के बहाने संजीव जिस तरह नाव और नदी के बीच मां-बेटे का रिश्ता स्थापित कर देते हैं वह अपने कथा-परिवेश की आर्थिक-सांस्कृतिक विशेषताएँ को पूरी जीवंतता के साथ उपस्थित कर देता है।  लहरों पर फैली रोशनी की ललाई का स्रोत लालटेन को बताते हुये रचे गए रंग-विधान को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सरहद के आर-पार बंट चुके या कि बंटने को मजबूर कर दिये गए रिश्तों की भावनात्मक त्रासदी की पड़ताल करती यह कहानी जिस बारीकी से विभाजन के बाद उत्पन्न आर्थिक और सामाजिक संकटों की बात भी करती है वह इसे विशिष्ट बना देता है। मतलब यह कि विभाजन सिर्फ मन ही नहीं तोड़ता बल्कि अपने साथ आर्थिक विपन्नता और सामाजिक मजबूरियों का एक अत्यंत ही जटिल और बहुरेखीय आर्थिक-सामाजिक संजाल भी साथ लिए चलता है, जिसके घेरे में जाने कितनी तरह की विवशताएँ छटपटाती-कसमसाती रहती हैं। 

          ज़िंदगी की जंग में धर्म बदलकर सरवाइव करनेवाली स्त्रियॉं के मन की नैसर्गिक नमी को दबाते हुये किसी नये तरह के संकट के उपस्थित हो जाने की आशंका में पुराने रिश्तों को नकारने की मजबूरी और उससे उत्पन्न छटपटाहट को जिस तरह ये कहानियाँ दर्ज करती हैं, वह विभाजन पर लिखी अन्य कहानियों के बीच इनके भिन्न आस्वाद को रेखांकित कर जाती है। हाँ, इस क्रम में ‘ज्वार’ की तीव्र संवेदनात्मक सघनता परिवेशगत विशिष्टताओं और परिपक्व कलात्मक समझदारी के साथ मिलकर संपूर्णता के जिस एहसास से हमें भर देती है वह विरल है। सरहद के बहाने दिलों के बिलगाव की खीच दी गई गहरी रेखा को ‘नकार’ और ‘ज्वार’ के दरम्यान फैले फासले के रचनात्मक भूगोल पर भी महसूस किया जा सकता है। 

राकेश बिहारी
एन. एच. 3 / सी 76, एन टी पी सी विंध्याचल, पो. विंध्यनगर, जि. सिंगरौली 486 885(म.प्र.) 
मोबाईल – 09425823033
ईमेल : brakesh1110@gmail.com

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