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अपुष्ट तुष्टीकरण और बकवास - संजय सहाय | Unconfirmed appeasement and nonsense - Sanjay Sahay (Editor Hans)

जून 5, 2014

अपुष्ट तुष्टीकरण और बकवास 

संजय सहाय  


अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण एक ऐसा संवेदनशील मिथक है जिसपर अधिकांश बहुसंख्यक असहज रूप से भावुक हो उठते हैं...
यह मुल्क है कि 1984 के सिखों के संहार के उपरांत कांग्रेस पार्टी अब तक का रिकॉर्ड 414 सांसद जिता लाई थी। उसके बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि कोई भी दल पूर्ण बहुमत प्राप्त कर पाया है। कुछ लोगों को इस बात का मलाल अवश्य होगा कि नरेन्द्र मोदी को 2004 में ही प्रधानमंत्राी पद का उम्मीदवार घोषित कर डालना चाहिए था, तो संभवतः वह रिकॉर्ड भी टूट जाता। आसमान छूती महँगाई के बीच यूपीए के दिशाहीन, रीढ़विहीन, घोटालाग्रस्त और आरामतलब कुशासन से जनता त्रास्त हो चुकी थी। रही-सही कसर अफवाहों ने पूरी कर दी और लोगों ने निर्णय ले लिया वामपंथियों का जुझारू राजनीति से हटते जाना, उनके काडर का विघटन और उनके जंग खाए नेताओं का असुरक्षाबोध और संगठन पर वर्चस्व बनाए रखने का लालच उनको हाशिए के भी बाहर धकेल गया। हिंदी पट्टी के समाजवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय के मंथन से उपजे लोग जिस तरह अपनी अराजकताओं, महत्त्वाकांक्षाओं, लोभों और दर्पों के तहत छोटे-छोटे गिरोहों में तब्दील हो गए हैं, शायद यह सौभाग्य ही था कि वे कोई विकल्प बनने में पूरी तरह से विफल रहे। इन सबके लिए अब अपनी राजनैतिक सोच और कार्यप्रणाली पर गंभीरता से विचार करने का उपयुक्त अवसर होगा। ‘आप’ का अपरिपक्व व्यवहार और दिल्ली सरकार से भाग जाना उनके लिए घातक सिद्ध हुआ। आजम खान, इमरान मसूद, अमित शाह, प्रवीण तोगड़िया, गिरिराज और रामदास कदम के विषवमन के बीच सुनहरे विकास का वादा विस्मयकारी ढंग से वोटरों के लिए लुभावना साबित हुआ बहरहाल, जनादेश का सम्मान करते हुए और यह उम्मीद पालते हुए कि पूर्वप्रेतों से घिरे माननीय नरेन्द्र मोदी एक समावेशी, और मानवीय व्यवस्था के तहत अच्छे दिन पकड़कर ले ही आएँगे। हम राजनीति को सुरूपों, कुरूपों, विरूपों के हवाले करते हैं 

 पिछले संपादकीय पर एक तल्ख प्रतिक्रिया देखने को मिली, जिसका सार था कि यह चुनाव विकास के मुद्दे पर न होकर मुसलमानों के तुष्टीकरण और उन्हें वोट बैंक में बदलने के विरोध में है और कि ‘तथाकथित’ धर्मनिरपेक्ष लोग जो भी बकवास लिखते रहें जनता अपना मन बना चुकी है 

 अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण एक ऐसा संवेदनशील मिथक है जिसपर अधिकांश बहुसंख्यक असहज रूप से भावुक हो उठते हैं। क्या हमने कभी यह देखने की कोशिश भी की है कि ...

बहुसंख्यकों के किन अधिकारों की बलि चढ़ाकर ऐसा तुष्टीकरण किया जाता रहा है? 
क्या उनके मोहल्ले, गली-कूचे या झोपड़ पट्टियाँ बाकियों से ज्यादा अच्छी हालत में हैं? 
क्या उनका आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक या उनकी आधुनिक सोच का विकास औरों से बेहतर हुआ है? 
क्या सरकारी/गैरसरकारी नौकरियों में उनका गैरआनुपातिक इजाफा हो गया है? 
क्या राजनीति पर वे बड़ी संख्या में हावी हो गए हैं? 
याकि कारपोरेट जगत पर उनका सिक्का चल रहा है? 

...यदि उनके कुछेक मोहल्लों में थोड़ी-सी भी संपन्नता आई है तो वह खाड़ी मुल्कों में उनकी जीतोड़ मेहनत का नतीजा है, न कि किसी तुष्टीकरण का। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर की अगुवाई में गठित सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ही इस तुष्टीकरण के मिथक को ध्वस्त करने के लिए काफी है। यह रिपोर्ट कहती है कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जातियों और जनजातियों से भी बदतर है, और 14 फीसदी आबादी वाले समूह की सरकारी नौकरियों में सिर्फ ढाई प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इस तथ्य से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि समय-समय पर चुटकी भर प्रसाद बाँट उन्हें वोट बैंक में बदलने का प्रयास बहुतों ने किया है, किंतु यह घिसी-पिटी तरकीब पिछले कुछ चुनावों से विफल होती दिख रही है। साथ ही पूर्वाग्रहों से हटकर पूरी ईमानदारी से देखें तो हम पाएँगे कि प्रसाद बाँटने का यह ‘पुनीत’ कार्य तो सभी दल बहुसंख्यकों के लिए भी कहीं अधिक उत्साह से करते रहे हैं और धार्मिकता, जातिवादिता और क्षेत्रीयता का उन्माद फैला उन्हें वोट बैंकों में बदलते रहे हैं। इस आलोक में समझ में नहीं आता कि बहुसंख्यक समुदाय का एक हिस्सा अल्पसंख्यकों के इस मुद्दे पर इतना संवेदनशील क्यों हो उठता है? कहीं यह हमारी कोई पुरानी हीन ग्रंथि और टीस मारती गाँठ तो नहीं! 

 हंस के प्रेमचंद जयंती समारोह और कथा-कार्यशाला की तैयारियाँ शुरू हो गई हैं। दो दिवसीय इस कार्यशाला के लिए आवेदन मिलने लगे हैं। उम्मीद है कि इसमें अच्छी संख्या में भागीदारी रहेगी। पहली बार ऐसा होगा कि हंस की वार्षिक गोष्ठी राजेन्द्र जी के बिना होगी राजेन्द्र जी ने इस कार्यक्रम को साहित्यिक, सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों की बहसों में तब्दील कर इसे जीवंत और हिंदी समाज के लिए आवश्यक बना दिया था। प्रगतिशील विचारधारा के लोग बेसब्री से इस दिन का इंतजार करते थे। उनकी परंपरा का निर्वाह करते हुए हंस ने इस बार का विषय रखा है- वैकल्पिक राजनीति की तलाश। स्थान वही है- ऐवाने गालिब।

संजय सहाय

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