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राजेन्द्र यादव की कवितायेँ Poems of Rajendra Yadav

अग॰ 28, 2014

राजेन्द्र यादव की कवितायेँ


न-बोले क्षण


न,
कुछ न बोलो
मौन पीने दो मुझे
    अपनी हथेली से तुम्हारी उँगलियों का कम्प...
    उँह, गुज़रते सैलानियों की दृष्टि
    अँधेरे को भेद
    रह-रह रीढ़ पर से रेंगती थी-अब नहीं है।
        नहीं,
       कुछ भी तो नहीं,
ऊपर का पखेरू सपन में शायद चिंहुक कर डगमगाया है...
        डैने तोलता है।
        तट की भुजाओं के ढाल
       अ-देखे ज्वार की अँगड़ाइयों में टूटते हैं...
       पार जलती रोशनी के साँप
       लहरों पर हुमस कर
       इस किनारे तक लपकते हैं...लौटते हैं...

सुनो,
     बोलना क्या चाहिये ही?
     मौन क्या गहराइयों को स्वर नहीं देता?
    शब्द तो हैं वस्त्र,
       भावों के-अभावों के!
       इस समय अनुभव करें चुप
       परस्पर को हम नक़ाबों में ही नहीं हैं...
    हम निरावृत, अनावरण हैं...
        क्या चरम-आत्मीय क्षण यों अ-बोले होते नहीं हैं?


प्रतीक्षा


एक पत्र आयेगा
रोज़ सुबह लगता है।
रोज़ सुबह लगता है
     आज कोई मिलेगा-एकदम अपरिचित
    लेकिन वह परिचय की गहरी तरल परतों के
         आने वाले दिनों में
             चन्दन की गन्ध-सा समाता चला जायेगा
             -रोज़ सुबह लगता है।
   रोज़ सुबह लगता है
      सहसा मिलेगा आज, कोई एक परिचित
      जो गुज़रेगा कारवानों की
      डूबती घण्टियों औ' मिटती पग-छापों-सा
      जाने कहाँ छूटा था...
   रोज़ सुबह लगता है
      कुछ होगा,
      अप्रत्याशित
      जिसकी मुझे आशा है!

एक पत्र आयेगा
         और रुँधे पानी की मख़मली काई
                       'डुबक्‌'-से फट जायेगी
                        लहरें कमल-नालों को सहलायेंगी
                        तारों की छायाएँ जुगनूँ-सी चमकेंगी
                        फैलते बर्तुल का रिकॉर्ड, अनजाने बज उठेगा...

एक पत्र आयेगा
         और मछली के गले में फँसी अन-खिंची डोरी
                     'खट्'-से टूट जायेगी
                      न-मरी मछली मौत की तलाश में
                      धारा की गति को चीर-चीर डालेगी
                       लहरों के थपकते हाथों को झटक-झटक फेंकेगी
                           भीतर की तिलमिलाहट
                       सतल के माथे पर लकीरें खींच जायेगी...
एक पत्र आयेगा
रोज़ सुबह लगता है।


नयी पीढ़ी का गीत


और दो...और दो...
देखो, हमें कभी कुछ नहीं मिला...
हमारा असन्तोष, हमारा गिला
हमारे सपने सब
समय ने कुचल दिये...

“भगवान उसे समझेगा!”
हम उन बौनों के बेटे हैं
       जिन्होंने बस,
       तन ही दिया था हमें
      और फिर चल बसे
अध-नंगे, भूखे हम
      तुम्हारे मुहताज हैं:
     अवसर दो,
     अर्थ दो,
    आसन दो,
        क्षमा दो,-”हमने तुम्हें बुरा कहा”
        आत्मा दो,
        दृष्टि दो,
        दर्शन दो,

हमारे पास कुछ नहीं
         और दो...और दो...


अक्षर

हम सब अक्षर हैं
अक्षर हरे कागज़ पर हों या सफ़ेद पर
खुरदरे में हो या चिकने में
टोपी पहने हों या नंगे सिर
अँग्रेज़ हों या हब्शी
उन्हें लिखने वाला क़लम पार्कर हो या नरसल
लिखने वाली उँगलियों में क्यूटैक्स लगा हो या मेंहदी
                  अक्षर, अक्षर ही है
शब्द वह नहीं है
अमर होते हुए भी अपने आप में वह सूना है...

अक्षर अर्थ वहन करने का एक प्रतीक है, माध्यम है
अक्षर अक्षर का ढेर, टाइप-केस में भरा सीसा मात्र है
शब्द बनाता है अक्षर-अक्षर का सम्बन्ध
वही देता है उसे गौरव, गरिमा और गाम्भीर्य
क्योंकि शब्द ब्रह्म है
और सभी मिलकर एक सामाजिक-सत्य को अभिव्यक्ति देते हैं

सत्य जड़ नहीं, चेतन है।
सामाजिक सत्य एक गतिमान नदी है
वह अपनी बाढ़ में कभी हमें बहा देती है, बिखरा देती है।
कभी नदी बह जाती है
तो घोंघे की तरह हम किनारों से लगे झूलते रहते हैं।
इधर-उधर हाथ-पाँव मारते हैं...
लेकिन फिर मिलते हैं
शब्द बनते हैं-वाक्य बनते हैं
और फिर नये सामाजिक सत्य को वाणी देते हैं
क्योंकि करते हम नहीं हैं
हम अक्षर जो हैं

शब्द बनकर सत्य को समोना हमारी सार्थकता है
वाक्य बनना हमारी सफलता!

हमें पढ़ो,
हमारा एक व्याकरण है।


मैं अकेला...


'कब तक और अकेले?-कह दो, हे, मेरे जीवन बोलो!'
-प्रसाद
मैं अकेला
जीर्ण जर्जर एक छप्पर
और उसकी झूलती-सी तीलियों पर, सरकती हैं-
बूँद की माला ढुलक कर!
बरुनियों से आर्द्र तारे टूटते हैं-

मैं अकेला!
यह अँधेरी रात सूनी
अमा के अन्तर्पटों में बन्द सोती स्तब्ध नीरव!
आज
एकाकी हृदय से उठ रहा उच्छ्वास शीतल
विजनता एकान्त की यह काटती-सी लग रही है
उठ रही है साँस मन में
काश! कोई साथ होता!
किन्तु अन्धी रात केवल, बधिर सूनापन भयावह
और मेरी अधमुँही-सी दृष्टि-जाकर टिक गई है सामने
लटकी हुई उस हिल रही लालटेन पर!
-है मन्द कितनी!
एक हल्का वृत्त ठिठुरी ज्योति का है साथ हिलता!
कुछ पतंगे फड़फड़ाकर शीश अपना पीट लेते
किन्तु वह दुर्भेद्य चिमनी
बीच का व्यवधान बनकर हँस रही है!
शलभ जलने का नहीं अधिकार तुमको!
औ' अन्धेरा झूलता, परछाइयाँ चुप नाचती हैं!
झूलने-सी खाट
गीली रात के नीचे पड़ा हूँ
मौन चुप अन्तर्मुखी मैं!
पास धारासार वर्षा की फुहारें पड़ रही हैं
वायु की उन्मुक्त लहरें
भीगकर बोझिल द्रवित हो
थपेड़े-से मार-उलटी लौट जातीं!
सनसनाते वायु-सागर की हिलोरों पर
विवश हो, भीत कम्पित मैं
कि मेरी झोपड़ी का आज डाँवाडोल बेड़ा!
त्रस्त ज्योतिर्वृत्त हिलता!
अन्धेरा दुर्भेद्य बन दीवार-सा आगे खड़ा है!
उफ़! न पड़ता दीख कुछ भी!
मात्र वर्षा की झड़ी यह लग रही
मैं सो रहा हूँ...
एक नियमित ताल झम-झम की निरन्तर-व्याप्त मन्थर
और वर्षा की झड़ी का एक आयत भाग

हल्की रोशनी से हो प्रकाशित
ज्योति चिलमन बन लहरता!
श्रवण की सब चेतनाएँ सजग होकर पी रही हैं-
नाचती उन्मादिनी-सी व्यस्त वर्षा की कुमारी!
नूपुरों का स्वर कभी आ पास जाता
कभी जैसे घाटियों में
दूर झाँई गूँजती हैं!
एक लम्बी अन्तहीना मूर्च्छना-सी साथ चलती
झनझनाहट झिल्लियों की,
दादुरों के शब्द नियमित
कभी सबको चीर ऊँची काकली
धरती-गगन को हिलाती-सी गूँज जाती!
और वातावरण झंकृति से उमड़कर थरथराता!
मौन फिर नीरव दिशाएँ!
एक लम्बी शान्ति...ती...खी...!
मन उमड़ता आ रहा है
व्यग्र सूनापन हृदय का पूछता है-
अन्त इस एकान्त की ऊँची निशा का!
भावनाएँ जड़ित मेरी
कल्पना कुंठित हुई है
मैं न लगकर सोच पाता
कर न मैं पाता तुम्हें चित्रित हृदय के मीत मेरे!
शून्य का यह 'सर्प पीना'
साँस-सी इस चेतना की पी रहा है
मार कुंडल जम गया है क्रूर
मेरी पसलियों पर!
आह! मैं असमर्थ मूर्च्छित!
मैं थकित तन सो रहा हूँ,
पर कहीं अवचेतना के धुन्ध में
है सजग संज्ञा चिरन्तन!
चौंक उठता कौन भीतर
सुन घमण्डी मेघ का घनघोर गर्जन!
साथ ऊँची मोर की गम्भीर बोली
औंघती-सी लहरियों-की प्रतिध्वनि बन डूब जाती!
आह! सब सुनसान कितना!
मैं अकेला सो रहा हूँ-
एक मीठी बात मन में कसमसा कर डूब जाती!
एक मादक स्वप्न आँखों में उतर कर ढुलक जाता!
एक सुरभित साँस अधरों से अकेली फूट पड़ती!
काश, मैं हिमखण्ड-सा गल कर भिगो देता किसी को!
काश, मेरी पुतलियों में
किसी की मद-होश वंशी गूँज, सो जाती भले ही!
जुगनुओं से स्वप्न
मन में व्यर्थ क्यों जल बुझ रहे हों?
यहाँ जलती भूख केवल,
तनी धमनी का मचलता रक्त अब जलने लगा है।
कशमकश-सी द्वंद्व निर्मम
चल रहा तूफ़ान भीतर-
सुन रहा मैं
दाह, क्रन्दन, चीख, भय, चीत्कार!
जैसे लग रहा है आज
उठता एक उफ़नाती नदी का ज्वार
सीमा बन्धनों को तोड़
सारे विघ्न करता चूर
दुर्दमनीय कोलाहल उठाता
तीव्र भीषण अन्ध-गति से कुचल मुझको दौड़ता है
आह! मैं असहाय-अक्षम!
अन्धेरा दुर्भेद्य बन दीवार-सा आगे खड़ा है!
कभी बिजली दमकती है
एक रेखा
नभ-हृदय पर चित्र ज्योतिर्मय बनाकर
साँप जैसी लोट, खो जाती तिमिर में!
और बूँदों की झड़ी
जो तरल तिरछी हो बरसती-
चमक कर फिर लुप्त होती!
एक ती...खी शा...न्ति
ऊबी-सी विजनता
घुटन कोलाहल दबा-सा, झिल्लियों की मूक झंकृति
आज मेरा डूबता मन
एक गहरी प्यास
मन्थर धार
तपती ज्ञान की सारी शिराएँ सुप्त होती जा रही हैं!

यह अँधेरी रात सूनी
तीलियों पर सरकती है
बूँद की माला ढुलककर
बरुनियों से आर्द्र तारे टूटते हैं
मैं अकेला...


फिर आऊँगा...


पीछे रह जायेंगे?
क्या वे सब, सचमुच पीछे रह जायेंगे?
ओ, जीवन की अविजेय अन्ध-गति,
बोल,
मुझे उत्तर दे, कसकन का
प्रश्नों का
क्या वे सचमुच पीछे रह जायेंगे?

वे जो मेरे मन को अक्सर दोपहरी की अमराई में
बेलों लदे कुंज में
तट से उझक-उझक सिसकारी भरते नरसल की छायाओं में
चन्दा पर तिरती धुनी-रुई-से बादल-गोड़े नभ की विस्तृति में,
विस्मृति में
बहकाया, भटकाया करते थे
क्या सचमुच पीछे रह जायेंगे?

वे जो मेरे अभिशापित निर्वासन के अज्ञात क्षणों में
पत्थर के घर,
आवाज़ तेरी है
लोहे के ढाँचों की नगरी में
अलग-अलग वेशों में बहुरूपी-से खोये-खोये, मेरे बिखरे
व्यक्तित्वों को
अपनी छवियों के
सुधियों के बीच-बीच में रखकर
अनुक्षण साथ दिये आये हैं
बिछलन में
उलझन में
टूटन के पल में अपना हाथ दिये आये हैं।
शायद आज बिना उन सबके
अपनी आकृति को मैं ख़ुद भी पहचानूँगा...शंका है।
'वे हैं' तो 'हूँ'
वर्ना 'था' कोई...अब याद नहीं है।
वे मेरे सब 'मैं' के निर्माता
सचमुच, पीछे रह जायेंगे?

ओ रे,
अरे, ओ सुनो,
इन अनजान पथों के मोड़ों से
फैलावों से
झुँझलाकर-घबरानेवालों, सुनो,
“मेरी रुँधी हुई वाणी यदि अब तक तुमको छू पाती हो-”
चुक जाने, थक जाने वालो, सुनो,
किन अनजान क़ब्र की डगरों पर मुझे ठेल कर
लेकर गहरी साँस
झुकाये शीश-डालकर कन्धे
घिसटे-घिसटे-से लौटे जाते हो?-सुनो।
ये सिर पर क्रॉस उठाये
जीभों पर ढोये शब्द
“जो औरों ने अपनी इच्छाओं को इन पर थोप लिख दिये थे”
छाती पर रक्खे शिला
उसे नक्क़ाशी से, फूलों से ढाँपे
...ये बेजाने बिजूके
मुझको जाने कैसी-कैसी पथराई आँखों से तोल रहे हैं!
ओ, मुड़कर पीछे जाने वालो
मुझे अकेले डर लगता है!

इस घिरते गहराते अंधियारे के वन में
बस्ती से बाहर,
इस ठिठुरी चोटी पर
रोज़ रात को अपना भोजन लेने आने वाला दैत्य,
मुझे ले जायेगा-ले जाने दो,
तुम सबने चुक लिया-अस्तु, पारी मेरी है।
कम-से-कम कल दिन-भर को तो टल जाये।

सच मानो,
उन बाहों की अजगरी लपेटों में
चटख़-चटख़ कर पिस जाने तक

उन दाँतों के अपनी पसली को छूने-गड़ जाने तक,
कुछ भी बोलूँ
तो मेरे जीवन की यह सीधी रेखा, शून्य बन उठे
कट-कट कर बस बिन्दु हो रहे,
उस पर तुम-या कोई भी-
जो चाहो लिख लेना,
मैं प्रश्न-चिन्ह बन कभी नहीं व्याख्या मागूँगा!
पर...
पर फिर भी दूर, अनागत के उक़ाब के लम्बे डैनों जैसे
इस दिगन्त से उस दिगन्त तक फैले-फैले
पास सरकते-आते क्षण में
बार-बार मन में उठता है
रो लेने दो,
आज मुझे फिर उस कन्धे पर शीश टिकाकर रो लेने दो...

अरे ओ,
आँसू भीगे रूमालों को हिला-हिलाकर
तूफ़ानी सागर की शमन-कामना से सहमे-सहमे
मेरी भेंट चढ़ाने वालो,
तट के पीछे-पीछे हटते धब्बो
रुको नमन लो।

शायद सिन्दबाद के बजरे का कोई तख़्ता,
फिर से धरती के तट तक पहुँचा दे,...
होश रहा तो तुम्हें खोजने फिर आऊँगा
शा...य...द...
फि...र...आ...ऊँ...गा...
पहचानोगे?
मेरी उस टूटी-फूटी क्षत-विक्षत आत्मा को
जाने कैसे कपड़ों में बह आये
पहचानोगे?


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