गजब की सियासत का दौर है यह - पुण्य प्रसून बाजपेयी | Its a Period of Amazing Politics - Punya Prasoon Vajpayee

विदेशी पूंजी की आहट 
  राष्ट्रीयता को इतना मजबूर कर दें 
    कि जुंबा पर हिन्दु राष्ट्रवाद गूंजे जरुर 
      लेकिन देश बाजार और व्यापार में बदलता दिखे.

सपने का टूटना या लोकतंत्र की जीत की उम्मीद

पुण्य प्रसून बाजपेयी


चाहे वह रोजगार पा जाने का सपना हो। चाहे वह पाकिस्तान और चीन से दो दो हाथ करने का सुकुन हो। चाहे बिचौलियों और कालाबाजारियों पर नकेल कसने की उम्मीद हो। चाहे कांग्रेस के गैर सरोकार वाले रईस कांग्रेसियों या कहें लूटने वालो को कटघरे में खड़ा करने की हनक हो। सबकुछ नरेन्द्र मोदी ने जगाया - पुण्य प्रसून बाजपेयी 

Love Jehad, Minority, BJP, Mayawati, Rajasthan, Gujrat, Anandiben, Mandal, FDI, Congress, UP, Saifai, Rajnath, Adityanath, Amit Shah, RSS, Majdoor, Envirnoment, Manmohan

प्रधानमंत्री मोदी का जादू चल जायेगा। लेकिन नहीं चला। संघ परिवार की सक्रियता के बगैर जीत जायेंगे। लेकिन नहीं जीते। लव जेहाद और सांप्रदायिक बोल हिन्दु वोट को एकजुट रखेंगे। लेकिन नहीं रख पाये।

अल्पसंख्यक असुरक्षित होकर बीजेपी की छांव में ही आयेगा या फिर उसकी एकजुटता हिन्दुओं में जातीय समीकरण को भुला देगी। लेकिन यह भी नहीं हुआ। मायावती की गैरहाजरी में दलित वोट विकास की चकाचौंध में खोयेगा। लेकिन वह भी नहीं खोया। वसुंधरा की बिसात और मोदी की चमक राजस्थान में बीजेपी से इतर किसी को कुछ सोचने नहीं देगी। लेकिन यह भी नहीं हुआ। छह करोड़ गुजराती मोदी के पीएम बनने की खुमारी में डूबा रहेगा और आनंदीबेन मोदी को जीत का बर्थ-डे गिफ्ट दे देगी। लेकिन बर्थ-डे गिफ्ट भी धरा का धरा रह गया। तो फिर उपचुनाव के परिणाम के संकेत ने क्या लोकसभा चुनाव के फैसले को ही पलटने की तैयारी कर ली है। या फिर राजनीतिक शून्यता के ऐसे पायदान पर देश की संसदीय राजनीति जा खड़ी हुई है जहां बार-बार आगे बढ़कर पीछे लौटने के अलावे कोई विकल्प देश की जनता के सामने है नहीं। 

मंडल की धार से 25 बरस पहले कमंडल टकरायी। लेकिन 25 बरस बाद मोदी के विकास मंत्र ने मंडल की धार को भोथरा बना दिया और कमंडल को हिन्दु राष्ट्रवाद के आइने में उतार कर एक नयी लकीर खिंचने की नायाब पहल की। लगा यही कि मंडल के दौर में क्षत्रपों की सियासत ने देश का बंटाधार ही किया तो फिर मोदी के विकास के घोड़े की सवारी कुछ सकून तो देगी। लेकिन हकीकत से कहां कैसे वोटर भागे। उसे तो हर दिन रसोई में आंसू बहाने है। विकास का ताना बाना चाहे विदेशी पूंजी की आस जगाता हो। चाहे इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर क्रक्रीट का जंगल खडा करने की बैचैनी दिखाता हो। चाहे डिजिटल इंडिया के सपने तले हर हाथ में तकनालाजी की उम्मीद जागती हो। चाहे कॉरपोरेट के धुरंधरों और औघोगिक घरानो के एफडीआई के समझौते के नये रास्ते खुलते नजर आते हो। चाहे मोदी सरकार की इस चकाचौंध को बेहद बारिकी से मीडिया लगातार परोसता हो। और इस भागमभाग में चाहे हर कोई हर उस मुद्दे से ही दूर होता चला गया हो जो लोकसभा चुनाव के वक्त देश के आम जन की आंखों में जगाये गये हों। चाहे वह रोजगार पा जाने का सपना हो। चाहे वह पाकिस्तान और चीन से दो दो हाथ करने का सुकुन हो। चाहे बिचौलियों और कालाबाजारियों पर नकेल कसने की उम्मीद हो। चाहे कांग्रेस के गैर सरोकार वाले रईस कांग्रेसियों या कहें लूटने वालो को कटघरे में खड़ा करने की हनक हो। सबकुछ नरेन्द्र मोदी ने जगाया। और इन्हीं सबकुछ पर कुंडली मार कर देश को भुलाने और सुलाने का तरीका भी मोदी सरकार ने ही निकाला। तो क्या विकल्प की बात ख्वाब थी या विकल्प या विकास का ताना बाना सत्ता पाने का सियासी स्वाद बन चुका है । इसलिये सौ दिन की सरकार की हार ने मंडल प्रयोग से आगे मंडल का ट्रैक टू शुरु करने का संकेत दे दिये। जहां मायावती की खामोशी मुलायम को जीता कर आने वाले वक्त में गेस्टहाउस कांड को भुलाने की दिशा में जाना चाहती हैं। ठीक उसी तरह जैसे सुशासन बाबू जंगल राज के नायक के साथ खड़े हो गये। पहले तमगा दिया फिर दिल दे दिया । 

गजब की सियासत का दौर है यह । क्योंकि इस बिसात पर संभल कर चलने के लिये चुनावी जीत की तिकडमें ही हर दल के लिये महत्वपूर्ण हो चली हैं। और तिकडमों से निकलने वाली चुनावी जीत संविधान से बड़ी लगने लगी है। यूपी के सांप्रदायिक दंगे। मुजफ्फरनगर की त्रासदी के बीच सैफई का नाचगान। अब कोई मायने नहीं रखता। गहलोत के दौर के घोटाले सचिन पायलट की अगुवाई में काग्रेस की जीत तले छुप जाते हैं। मोदी के दरबार में वसुंधरा राजे के प्यादा से भी कम हैसियत पाना। यूपी की बिसात पर राजनाथ को प्यादा और योगी आदित्यनाथ का वजीर बनाने की चाहत वाले अमित शाह की चाल भी जीत के दायरे में मापी जाती है। और अमित शाह को हर राज्य में जीत का सेहरा पहनाने की हैसियत वाला मान कर आरएसएस झटके में प्यादे से वजीर बनाकर सुकुन पाती है। तो फिर चुनावी दौड़ का यह रास्ता थमता किधर है। शायद कहीं नहीं। क्योंकि यह दौड़ ही सत्ता की मलाई खाने के लिये जातीय और धर्म के आधार पर उचकाती है। या फिर विकास का अनूठा मंत्र देकर ऐसे भ्रष्टाचार की ऐसी लकीर खिंचती है, जिसके तले मजदूर के हक के कानून बदल जाये। पर्यावरण से खुला खिलवाड विकास के नाम पर दौड़ने लगे। जन-धन योजना तले देश की लाइफ इंशोरेंस कंपनी एलआईसी का नहीं बल्कि विदेशी बैंक एचडीएफसी के लाइफ इंशोरेंस का कल्याण हो। विदेशी पूंजी की आहट राष्ट्रीयता को इतना मजबूर कर दें कि जुंबा पर हिन्दु राष्ट्रवाद गूंजे जरुर लेकिन देश बाजार और व्यापार में बदलता दिखे। जिसमें चुनी हुई सरकार ही बिचौलिये या कमीशनखोर हो जाये। ध्यान दीजिये तो मनमोहन का दौर हो या मोदी का दौर पटरी वही है इसलिये बार-बार देश उन्हीं क्षत्रपों की गोद में लौटता है, जहां मलाई खाने के लिये सत्ता के दरवाज़े तो खुले मिलते है चाहें लूट खुली क्यों ना हो। इसलिये उपचुनाव के परिणाम निराशा और सपनों की टूटने के अनकही कहानी भी है और लोकतंत्र की जीत की उम्मीद भी।
Love Jehad, Minority, BJP, Mayawati, Rajasthan, Gujrat, Anandiben, Mandal, FDI, Congress, UP, Saifai, Rajnath, Adityanath, Amit Shah, RSS, Majdoor, Envirnoment, Manmohan
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
Hindi Story: कोई रिश्ता ना होगा तब — नीलिमा शर्मा की कहानी
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
मन्नू भंडारी की कहानी — 'रानी माँ का चबूतरा' | Manu Bhandari Short Story in Hindi - 'Rani Maa ka Chabutra'
कहानी ... प्लीज मम्मी, किल मी ! - प्रेम भारद्वाज
फ्रैंक हुजूर की इरोटिका 'सोहो: जिस्‍म से रूह का सफर' ⋙ऑनलाइन बुकिंग⋘