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पंखुरी सिन्हा की कवितायेँ Hindi Poems : Pankhuri Sinha

सित॰ 6, 2014

पंखुरी 

सिन्हा 

की 

कवितायेँ


माल रोड का अंतर राष्ट्रीय छात्रावास

मुझतक आएँगी
  बातें ये
  चलकर आहिस्ता आहिस्ता
     फिरंगी शहरों के किस्से लेकर
     सोचा नहीं था
मेरा तो इस शहर का बचपन था
   लेकिन शहर यह किस्सों का
           था और है
           रहा है
           रहता भी आया
           बनते
              बनाए जाते
              उड़ते आते
              किसी के कहे
              किसी के बारे
    शहर यह नामी और बदनामो का
    फिरंगी कदमों से आते हैं सब किस्से मेरे
        वो जो ज़्यादा आज़ाद हैं
       और जिनका इतिहास है
                ग़ुलाम बनाने का
       उन्हीं फिरंगी कदमों से
      आते हैं सब किस्से मेरे
                   बचपन के भी
बचपन ही था मेरा
   मैं स्कूली बस के स्टॉप पर थी
   वह खुले बदन दौड़ गया था
  वह एक गोरा लड़का
  दिल्ली की माल रोड स्थित
  अंतरराष्ट्रीय छात्रावास से निकल कर
  झंडे से भी ज़्यादा आज़ाद करता मुझे
यह अतिशयोक्ति थी
पर मैं आज़ादी के बहुत बाद पैदा हुई थी
      और जबकि पसंद था मुझे
      किस्सों वाले इस शहर में लौटना
      मैं जानती थी कि विदेशी घुसपैठ
      बिना मिलावट संभव नहीं................




पंखुरी सिन्हा
संपर्क: A-204, प्रकृति अपार्टमेन्ट, सेक्टर 6, प्लाट 26, द्वारका, नई दिल्ली 110 075
ईमेल: nilirag18@gmail.com
शिक्षा:
- एम ए, इतिहास, सनी बफैलो, 2008
- पी जी डिप्लोमा, पत्रकारिता, S.I.J.C. पुणे, 1998
- बी ए, हानर्स, इतिहास, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1996
अध्यवसाय:
- BITV, और ‘The Pioneer’ में इंटर्नशिप, 1997-98
- FTII में समाचार वाचन की ट्रेनिंग, 1997-98
- राष्ट्रीय सहारा टीवी में पत्रकारिता, 1998—2000
प्रकाशन: हंस, वागर्थ, पहल, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, वसुधा, साक्षात्कार, अभिव्यक्ति, जनज्वार, अक्षरौटी, युग ज़माना, बेला, समयमान, अनुनाद, सिताब दियारा, पहली बार, पुरवाई, लन्दन, पुरवाई भारत, लोकतंत्र दर्पण, सृजनगाथा, विचार मीमांसा, रविवार, सादर ब्लोगस्ते, हस्तक्षेप, दिव्य नर्मदा, शिक्षा व धरम संस्कृति, उत्तर केसरी, इनफार्मेशन2 मीडिया, रंगकृति, हमज़बान, अपनी माटी, लिखो यहाँ वहां, बाबूजी का भारत मित्र, जयकृष्णराय तुषार. ब्लागस्पाट. कॉम, चिंगारी ग्रामीण विकास केंद्र, हिंदी चेतना, नई इबारत, सारा सच, साहित्य रागिनी, साहित्य दर्पण आदि पत्र पत्रिकाओं में, रचनायें प्रकाशित
हिंदिनी, हाशिये पर, हहाकार, कलम की शान, समास, गुफ्तगू, पत्रिका आदि ब्लौग्स व वेब पत्रिकाओं में, कवितायेँ तथा कहानियां, प्रतीक्षित
किताबें:
- 'कोई भी दिन' , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006
- 'क़िस्सा-ए-कोहिनूर', कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008
- कविता संग्रह 'ककहरा', शीघ्र प्रकाश्य
- 'प्रिजन टॉकीज़', अंग्रेज़ी में पहला कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2013
- ‘डिअर सुज़ाना’ अंग्रेज़ी में दूसरा कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य
- श्री पवन जैन द्वारा सम्पादित शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह ‘काव्य शाला’ में कवितायेँ सम्मिलित
- श्री हिमांशु जोशी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘प्रतिनिधि आप्रवासी कहानियाँ’, संकलन में कहानी सम्मिलित
पुरस्कार:
- राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013
- पहले कहानी संग्रह, 'कोई भी दिन' , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान
- 'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला
- 'एक नया मौन, एक नया उद्घोष', कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार,
- 1993 में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान
अनुवाद:
- कवितायेँ मराठी में अनूदित,
- कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ,
- उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद,
सम्प्रति:
पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़’,
एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम, और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’, आगमन ग्रुप की वेब पत्रिका आगमन इंटरनेशनल का संपादन

केम्ब्रिज में उससे दुबारा मिलना 

मुझपर भी दिखेगा कुछ
उनका कहा हुआ
    वह जो कुछ कमतर लोगों के लिए
    कहा जाता था
    कुछ कम रुतबेदार मुहल्लों में
    रहने वालों के लिए
एक ऐसी सभ्यता में
    जहाँ बहुत ज़्यादा कही जाती थीं
    कही जानी थीं
    कही जाने वाली बातें
कम थी छूट
       ज़िन्दगी जीने के ढर्रों की
           साधनों की भी
वहाँ भी
उन देशों में भी
जहाँ बहुत सारी जीवन शैलियाँ थीं
और लड़कियाँ कुछ कम बदनाम
जहाँ शहरों में स्कूली
कॉलेज की छात्राओं
काम पर जाने वाली महिलाओं के
ऐसे किस्से नहीं होते
     सबके इतने किस्से होते हैं
    कि किसी के नहीं होते
       पर हमारी तुम्हारी बाशिंदगी
       इस शहर में भी फरक है......................


वाजिब शिकायतों की थिरकन

ये बहुत बुरा हुआ
कि ठीक कलाकृतियों की पेशी से पहले
उसकी उँगलियों में
विदेशी लाटसाहब से
ढेरों वाजिब शिकायतों की थिरकन आ गयी
   वो पहले भी करवा रहे थे
   अपने लोगों से ख़ात्मा उसका
   अब और करवाने लगे
   उस थिरकन ने आसान बना दी हत्या उसकी............



साहब से शिकायत

कि गेस्टापो सरीखी पुलिस से
इतर भी
    की जा सकती थी शिकायत
पढ़े लिखे साहब से
जिसने इम्तहान भी पास किए थे
   और जिसे जनता ने भी चुना था




बेगुनाही का सबूत

अपने देश वासिओं के आगे साबित करना
अपनी बेगुनाही
     जबकि सोचा था उनका साथ मिलेगा
     कुछ उस सैनिक की तरह
     जिसकी विदेशी गिरफ्तारी का दोष
     कभी नहीं दिया जाता था क्रूर दुश्मनों को
या तेल कम्पनी में काम करने वाले इंजीनियर की तरह
    जिसकी ड्यूटी में हुए हों
    इतने ऑयल स्पिल्स
    कि नष्ट हो गया हो
       जन जीवन
       और पर्यावरण भी
उसी की तरह
सबूत देना
बेगुनाही का अपनी
एक ऐसे प्रेतात्मा से संवाद करना था
   जिससे ख़ौफ़ भी हो
     और घिन भी आए....................




राक्षस पूजा

मेरे अपने ही देश के लोग
   इस तरह करेंगे हिमायत
      मेरे अधिकार कम करने की
          नहीं सोचा था
जबकि ये जागरुक
और बौद्धिक लोग थे
क्यों बना रहे थे ये एक मंदिर
उस आदमी के नाम का
जिसने मौत के घाट उतारा था मुझे?



आदम भक्षण

वो जब भी
माँगती थी अपना हक़
वो उसके अपने लोगों से बतवाते थे
उसका हाल
और चूँकि वह नहीं होती थी
उनके कहने से
वह सबकुछ
जो निकट दूर से वो उसे कहते थे
उसे ये सबकुछ कहने का खेल
उन्हें उनका ग़ुलाम भी बना रहा था
रखैल भी
उसे उन का कुछ  नहीं...............



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