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मैं कभी किसी गुटबाजी का हिस्सा नहीं बनी - मैत्रेयी पुष्पा | I Never Did Groupism - Maitreyi Pushpa

जून 13, 2015

सेक्स सिर्फ एक पहलू-भर है, संपूर्ण स्त्री विमर्श नहीं। पर आजकल लगता है कि स्त्री-विमर्श का मतलब सिर्फ सेक्स-भर ही है...


मैं कभी किसी गुटबाजी का हिस्सा नहीं बनी

- मैत्रेयी पुष्पा

अपने लेखन में स्त्री-स्वर को मुखरता से उठाती रहीं वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा हाल ही में हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर चयनित हुई हैं। प्रस्तुत है, नवभारत टाइम्स के लिए दामिनी की उनसे हुई लंबी बातचीत  - 

दामिनी : अकादमी के अब तक के कामकाज के तौर-तरीकों के बारे में आप क्या राय रखती हैं?

मैत्रेयी पुष्पा: जब मैं अब से पहले समिति की नीतियों में शामिल ही नहीं रही हूं तो क्या कहूं। अभी तो मैं अकादमी एक ही बार गई हूं। पिछले कुछ अरसे से तो यहां कोई उपाध्यक्ष रहा भी नहीं। इस वजह से काफी उदासीनता का माहौल रहा। अभी अकादमी के और सदस्यों की समिति बन रही है। जहां तक पहले के लोगों की बात है तो दूसरे लोगों के बारे में सुनती रही। जनार्दन द्विवेदी के बारे में सुनती थी और लोगों के बारे में भी सुना। अच्छा रहा पिछला कामकाज भी। अकादमी जो कार्यक्रम कराती रही, जो पुरस्कार दिए जाते रहे हैं, उन से भी मैं वाकिफ हूं। फिलहाल बस इतना ही कहूंगी कि जब तक अकादमी काम नहीं करेगी, लोगों तक नहीं पहुंचेगी, उन्हें जोड़ेगी नही तो लोग भी इसके बारे में कैसे जान पाएंगे। अभी बहुत काम किया जाना बाकी है।


दामिनी : अकादमी की किन नीतियों से सहमति नहीं रखतीं?

मैत्रेयी पुष्पा: ये पूछना अभी थोड़ा जल्दबाजी हो जाएगा। मैं थोड़ा अंदर का काम देखूं तो जानूं। अभी जो मुझ से कह रहे हैं, बधाई। आप से बहुत उम्मीदें हैं तो मैं उन से जानना चाहूंगी कि नाउम्मीदी किन बातों से है उनकी। ये मैं लोगों का कहा ही कह रही हूं। लोग चाहते हैं कि पुराना ढर्रा बदले। सब मानते हैं कि हिन्दी के लिए कुछ होना चाहिए, जैसे किसी कमजोर के लिए कुछ हो मानो। अभी तो जैसे एक दिन महिला दिवस मनाया जाता है, एक दिन बाल दिवस मनाया जाता है, वैसे ही एक दिन हिन्दी दिवस भी मना लिया जाता है। बताइए कौन सा टॉनिक पिलाएं हिन्दी को। फिर भी कोई नयापन बताना हो तो अभी बहुत काम करने की जरूरत है यहां। जैसे अकादमी की पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ को ही ले लीजिए, जो कि सुप्तावस्था में पड़ी हुई है, जबकि इसमें हिन्दी का मुख-पत्र बनने की क्षमता है। ये बेहतर कर सकती है, जैसे ‘हंस’ करती रही है। कई दूसरी पत्रिकाएं कर रही हैं। यहां मैं सरकार से भी कहना चाहूंगी कि अगर गंभीरता से काम करना है तो उसके लिए पर्याप्त संसाधन भी होने चाहिए। अब अकादमी की बिल्डिंग को ही ले लीजिए यह जिस जगह है, वहां साहित्यकारों का आना ही मुश्किल है। स्टाफ की अपनी समस्याएं हैं। और भी बहुत सारे विषय हैं, जिन पर काम होना है।


दामिनी : हिन्दी अकादमी आरंभ से ही नए रचनाकारों को सामने लाने का कार्य करती रही है। आप इस सिलसिले को कैसे आगे ले जाएंगी?


मैत्रेयी पुष्पा: उसमें कई चीजें हैं। नए लेखकों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह आती है कि कोई प्रकाशक उन्हें छापने को तैयार नहीं होता, इसीलिए किसी अच्छे रचनाकार की पहली किताब सामने लाने के लिए अकादमी ने अनुदान रखा है। अब यहां याद रखने की जरूरत है कि जहां पैसा होता है, वहां गड़बड़ी की पूरी संभावना रहती है। संबंधों के चलते कई बार कोई कुपात्र सफल हो जाता है और पात्र रह जाता है। उसे बचाना है। मैं सोचती हूं कि कोई हकमारी न हो। रचना का चयन खुलेआम हो और सब-कुछ एक ईमानदारी, पारदर्शिता पर निर्भर हो। साहित्य के नाम पर लाइब्रेरियों में क्या भरा जा रहा है, वह भी स्पष्ट हो।



दामिनी : स्त्री-अधिकारों को आपने अपने साहित्य में बखूबी उठाया है। वर्तमान में जो स्त्री-लेखन हो रहा है, उसे आप कैसे देखती हैं?


मैत्रेयी पुष्पा: हमारी पांच कर्मेद्रियां हैं और पांच ज्ञानेंद्रियां। इनका संतुलन हमारे पूरे अस्तित्व को कसावट देता है। जब हम स्त्री-अधिकारों पर लेखन की बात करते हैं तो उसमें बहुत गहराई, बहुत विस्तार में जाने की जरूरत है। हम क्या सुनें, क्या देखें, क्या बोलें, कहां जाएं, यह सब हमेशा से पिता, भाई, पुत्र के रूप में पुरुष ही तय करते आए हैं। यहां आवाज उठाने की जरूरत है। जहां परंपरा, रिवाज हमारे मनमाफिक नहीं हैं, वहां हस्तक्षेप की जरूरत है। उसकी बात नहीं होती। सारी बात आकर स्त्री-पुरुष की अंतरंगता पर आकर ठहर जाती है। अब देखिए, राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श चलाया। उसमें उन्होंने संपूर्ण स्वतंत्रता की बात कही, मगर सारी की सारी बात को सिर्फ सेक्स से जोड़कर देखा गया। सेक्स सिर्फ एक पहलू-भर है, संपूर्ण स्त्री विमर्श नहीं। पर आजकल लगता है कि स्त्री-विमर्श का मतलब सिर्फ सेक्स-भर ही है।



दामिनी : लेखन को अनेक वर्गों में विभक्त किए जाने को आप किस प्रकार से देखती हैं? जैसे-महिला लेखन, दलित लेखन वगैरह।


मैत्रेयी पुष्पा: ये विभक्तियां बना नहीं दी गईं, ये हैं। कुछ लोग इसको सिरे से खारिज करते हैं कि लेखक की कोई जाति, रंग, लिंग नहीं होता, लेकिन ये विभक्तियां उभरकर खुद अपना पक्ष रखती हैं, क्योंकि पहले जो लेखन होता था, वह अनुमानजनित होता था और अब इन्हीं विभक्तियों के द्वारा जो लेखन सामने आता है, वह अनुभवजनित होता है। स्त्री ने कलम क्यों उठाई? पहले अपने नाम से खुलकर लिखना दहशत की बात थी, डर काम करता था कि बदनामी न हो जाए। कुदरती भाव सभी के अंदर होता था, मगर युगों तक स्त्रियां इसको दबाकर रखती रहीं। सब सीता-सावित्री बनकर लिखती रहीं। कोई कैकयी-सूपर्णखा बनकर नहीं लिखना चाहती थी। उन पर जो अनुमान से लिखा गया, वह पढ़िए और जो अनुभव से लिखा गया, वह पढ़िए। देखिए कि जो गोदान लिखा गया, उसमें धनिया अपने हक के लिए नहीं लड़ी, अपने बच्चे के हक के लिए लड़ी। मेरी धनिया वह हो ही नहीं सकती, जो प्रेमचंद की है। यह कोई तुलना नहीं है, केवल एक पक्ष है, जो अनुभव की उपज है। यही बात दलित लेखन पर भी लागू होती है।



दामिनी : वर्तमान राजनीति काफी उठा-पटक के दौर से गुजर रही है। इसका आप साहित्यिक संस्थाओं पर क्या प्रभाव देखती हैं?


मैत्रेयी पुष्पा: कई खाने बने हुए हैं और राजनीतिक पार्टियां, मीडिया, साहित्य सब-कुछ इन खानों में बंटा हुआ है। अपने अनुभव से बताती हूं। मैं फेसबुक पर हूं। अगर मैं किसी अच्छे काम का किसी को श्रेय देती हूं या किसी न्यायसंगत बात पर किसी का पक्ष लेती हूं, वह भी बिना किसी पार्टी, किसी नेता का नाम लिए, तब भी लोग उसे किसी न किसी दल के साथ जोड़कर देखने-दिखाने लगते हैं। लोगों ने तो यहां तक कहा कि मुझे यह पद भी किसी नेता-विशेष का पक्ष लेने के प्रसाद स्वरूप मिला है, जबकि मैंने अब तक की अपनी जिंदगी में ना तो कभी किसी से कुछ मांग कर लिया, ना ही गुटबाजियां कीं।



दामिनी : अब तक यही देखा जाता रहा है कि जब तक पद नहीं होता, तब तक योजनाओं की बात की जाती है, क्रांति की, नएपन की बात की जाती है, मगर पद मिलते ही लोग गुटबाजियों के इतिहास को दोहराते नजर आते हैं।


मैत्रेयी पुष्पा: मुझे राजेन्द्र यादव के गुट से जोड़कर देखा जाता रहा है। अगर आज वे होते तो यही कहा जाता कि यह पद उन्होंने ही दिलाया है। जो कहते थे कि मैं राजेन्द्र यादव के बाद खत्म हो जाऊंगी तो आज वे बताएं कि क्या मैं हुई? ना तो मुझे इस पद का लालच है, न मैं कभी किसी गुटबाजी का हिस्सा बनी। कोई मुझे अपने अनुरूप या अपनी इच्छा से चलाए, यह हो नहीं सकता। हां, सामंजस्य बिठाने में, सबको साथ लेकर चलने में मैं विश्वास रखती हूं। यहां भी पच्चीस व्यक्तियों की समिति है। मैं यहां भी सामंजस्य बिठाऊंगी, पर अपना पक्ष छोड़ूंगी हरगिज नहीं।



दामिनी : इन दिनों आपकी लेखकीय व्यस्तताएं क्या हैं?


मैत्रेयी पुष्पा: अभी मैंने थोड़ा विराम दिया हुआ है। 2014 में एक उपन्यास आया था। फिलहाल मैंने सोचा कि खुद भी थोड़ा सांस लूं और पाठकों को भी लेने दूं। हो रहे बदलावों को देखूं, भांपूं। ‘वनिता’ पत्रिका में एक कॉलम चल रहा है। किसी भी पत्रिका में अगर स्त्रियों के नाम पर सोचकर एक पन्ना दिया जाता है तो मैं उससे चूकना नहीं चाहती। दस साल हो गए इस कॉलम को। ये रोजमर्रा का लेखन कहानी, उपन्यास से ज्यादा प्रभावी होता है।

साभार नवभारत टाइम्स 
१३ जून २०१५
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