स्पेक्टर चुंबन रहित भारतीय फ़िल्म - रवीश कुमार | Ravish Kumar Spectre


रवीश का रिव्यू

वाहियात बांड के भरोसे दुनिया का लोकतंत्र ! 

  हिन्दी फ़िल्मों ने ग्लोबल लेवल पर कहानी का बेड़ा गर्क़ कर दिया  




एक झटके में लगा कि कहीं ये सीन हमारे राजनीतिक दलों के आई टी सेल से तो प्रभावित नहीं है 
बालीवुड की फ़िल्मों में जब कहानी थक जाती है तब चालाक निर्देशक ड्रीम सिक्वेंस के बहाने हीरो को लिस्बन या लंदन पहुँचा देता है । यूरोप के शहरों में शूट की गई ज्यादातर हिन्दी फ़िल्मों का यही हाल है । जैसे ही हीरोइन अँगड़ाई लेती है निर्देशक झट से बैकग्राउंड में ‘लंदन आई’ दिखा देता है । हीरो जब घाटे में चल रहे एयर इंडिया के फ्लाइट से हीथ्रो उतरता है तो कानपुर में बने लेदर का ओवर कोट लिए बाहर आता है जैसे अरमानी हरदोई का ब्रांड हो । कहानी कुछ भी हो दर्शक यूरोप की सड़कों , इमारतों को देख गदगद हो जाता है।

Daniel Craig and Monica Bellucci in Rome
to promote 'Spectre' Photo: EPA/CLAUDIO ONORATI
कल जब ग़ाज़ियाबाद के सिनेमा हाल में जेम्स बांड परंपरा की नई फ़िल्म स्पेक्टर देखने गया तो पता चला कि हालीवुड वाले भी यही करते हैं। वो भी रोम, पेरिस, मैक्सिको और लंदन का इस्तमाल कहानी की जगह करते हैं । ऐसा लगा कि इस फ़िल्म की योजना लोकेशन देखने के बाद बनी होगी । स्पेक्टर देखने के दौरान ही मैंने बीस साल पहले तूफान, जादूगर और हातिमताई जैसी फ़िल्मों के निर्देशकों को जो गालियाँ दी थीं उन्हें बिना शर्त वापस ले ली ।

स्पेक्टर मतलब भूत होता है मगर बांड की फ़िल्म का भूत हिन्दी चैनलों वाला पिशाच मार्का नहीं लगा । बल्कि ये भूत हैलोवीन के बचे हुए मास्क लगाकर दुनिया में लोकतंत्र को समाप्त करना चाहता है । इसके लिए भूत ने दक्षिण अफ़्रीका के रेगिस्तान में कंट्रोल रूम बनाया है । बांड और उसकी नायिका जब रेगिस्तान के आख़िरी स्टेशन पर उतरते हैं तो मुझे लगा कि कहीं ये जे पी दत्ता की फ़िल्म ग़ुलामी का स्टेशन तो नहीं है जहाँ जवान होकर धर्मेंद्र उतरते हैं । लाँग शाट में रेल गाड़ी का सिक्वेंस देखते हुए मुझे रूप की रानी चोरों का राजा की याद आने लगी । जब बर्फ़ीली पहाड़ी पर हवाई जहाज़ नीचे गिर कर स्कार्पियो बोलेरो टाइप की जीप का पीछा करता है तब मुझे पक्का यक़ीन हो गया कि बालीवुड की कापी होने लगी है ।

सोचा नहीं था कि बिहार चुनाव से लौट कर पहली फ़िल्म ऐसी देखूँगा जिसका प्लाट लोकतंत्र को बचाने को लेकर रचा गया हो । निहायत ही वाहियात फ़िल्म लगी । स्पेक्टर में जेम्स बांड लोकतंत्र को बचाने का लोड ले लेता है । ब्राउन जैकेट में जेम्स बांड सिंघम और वांटेड का मिश्रण बनता हुआ जब अंग्रजी बोलता है तो यक़ीन होने लगता है कि हमारी हिन्दी फ़िल्मों ने भले कई बार आस्कर न जीता हो लेकिन उन्होंने ग्लोबल लेवल पर कहानी का बेड़ा गर्क़ तो कर ही दिया है । जैसे ही फ़िल्म में जार्ज ओरवेल का ज़िक्र आया मुझे अपने गृह ज़िले मोतिहारी में उनके घर की बहुत याद आई । ज़माने बाद अंग्रेजी फ़िल्म देखने गया था लेकिन हिन्दी फ़िल्मों के वशीकरण से मुक्त होकर अंग्रेजी फ़िल्म के भूत के चक्कर में नहीं आ सका । स्पेक्टर भारतीय न्यूज चैनलों की अदभुत अकल्पनीय और रहस्य मार्का प्रोग्राम से अलग नहीं लगी ।


स्पेक्टर में दिखाया जा रहा है कि सूचना क्रांति ने लोकतंत्र को समाप्त करना आसान कर दिया है । रेगिस्तान में बने कंट्रोल रूम में कंप्यूटर पर बैठे नौजवान हर तरह की सूचना को ट्रैक कर रहे हैं । एक झटके में लगा कि कहीं ये सीन हमारे राजनीतिक दलों के आई टी सेल से तो प्रभावित नहीं है । मैं कर्मा के डाक्टर डैंग की बात नहीं कर रहा लेकिन क्रिस फ़िल्म का साइंस लैब तो याद होगा ही । जो भी हो जेम्स बांड लोकतंत्र को बचा लेता है । भूत ज़िंदा पकड़ा जाता है । एक ही कमी थी । इस फ़िल्म में विकीलिक्स की गुज़ाइश होनी चाहिए थी ! जो भी है स्पेक्टर ‘चुंबन रहित’ पूरी तरह से भारतीय फ़िल्म है ।
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