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कहानी: अशोक गुप्ता - गिनीपिग्स | Minor Girl Raped ! Kahani

दिस॰ 29, 2015
हर मामले में एक नाबालिग कच्ची उमर की अबोध बच्ची और पका हुआ खेला खाया नौजवान मर्द. आखिर कहीं तो कोई सिरा मिले जहाँ से सोचना शुरू किया जाय... 



समाज का किसी ऐसी चीज़ के प्रति आदी हो जाना जो समाज को नष्ट किये जा रही हो उस समाज की मृत्यु का धोतक है. कथाकार अशोक गुप्ता अपनी कहानियों के माध्यम से समाज की उन बेहद खतरनाक प्रवृत्तियों को पाठक तक पहुंचाते हैं, जिनकी पुनरावृत्ति इतनी तीव्र गति से बढ़ रही हैं कि हम ऐसी घटनाओं को सुनने के तक़रीबन आदी होते जा रहे हैं . छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार किये जाने के पीछे कैसी मानसिकता हो सकती है ??? यह सवाल, इसका जवाब और इसे रोकना ये सब ज़रूरी है ... समाज अगर ऐसी बातों को सुनने का अभ्यस्त हो गया... तो ... ?

भरत तिवारी

गिनीपिग्स...

अशोक गुप्ता 



कॉफी के कप से उठती भाप ने नगेन के चश्मे के शीशों को ढक लिया था और देखते देखते उसे बाहर का सब कुछ धुंधला नज़र आने लगा था.

बिना हिले डुले, कप को हाथ में थामे नगेन बैठा रहा.

‘ वैसे भी सब कुछ धुंधला ही नज़र आ रहा है. कुछ भी साफ़ नहीं सूझता... कुछ भी दूर तक देखना संभव ही नहीं रह गया है.’

कॉफी का कप हाथ में थामे, गहरी चिंतन मुद्रा में बैठा रहा नगेन. कॉफी ठंढी होती रही.

‘सब कुछ समय के साथ अपने आप ठंढा होता रहता है. तब भीतर दूर तक साफ़ देखने की अकुलाहट भी ठंढी हो जाती है. दिखता है धुंधला, तो दिखता रहे...’

अरे, कॉफी पियो न...लिये बैठे हो...

पीछे से अरुणा ने आ कर टोका. नगेन के चेहरे की ओर देख कर उसका वाक्य वहीँ ठहर गया. आज तीसरा दिन है. नगेन थक कर चूर बैठा है, लेकिन सोच का नतीजा कुछ निकल नहीं रहा है.

ज्यादा मत सोचो नगेन, तवियत खराब कर लोगे.

सोच पर मेरा बस नहीं है अरुणा... लेकिन सोचने से कुछ तो साफ़ हो... पहले जब दिसंबर में दामिनी कांड हुआ था तब हमने यौनशुचिता के दुराग्रह को पकड़ा था. स्त्री के खिलाफ पितृसत्तात्मक व्यवस्था...औरत को केवल यौन तृप्ति की वस्तु मानने का भाव... इस सोच के साथ हमने बहुत आग उगली थी. एक संकल्प सामने आया था कि स्त्री को उस जड़ता के अँधेरे से बाहर लाना एक कारगर उपाय हो सकता है. लेकिन इस बार...?

समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस ‘देवी’ कांड को किस आवेग से जोड़ कर देखा जाय. बस पांच साल की बच्ची... उसे तो मादा जैसा देखा भी नहीं जा सकता. उससे तो रसिक संवाद भी नहीं हो सकता, यौनिकता की बात तो दूर का प्रसंग है. तो फिर क्या मानसिकता है इसके पीछे...? और उसके बाद की अबूझ हिंसा..! क्या यह कुछ हासिल न होने की खीझ का परिणाम है...? लेकिन हासिल ? हासिल का क्या मतलब है... क्या तीस बरस के शादीशुदा जवान आदमी के लिये यह जानना बाकी रह जाता है कि हासिल होने की शर्त क्या है.? यह पहेली कठिन है अरुणा... और उसके बाद तो हर रोज एक नया कांड उजागर हो रहा है... हर मामले में एक नाबालिग कच्ची उमर की अबोध बच्ची और पका हुआ खेला खाया नौजवान मर्द. आखिर कहीं तो कोई सिरा मिले जहाँ से सोचना शुरू किया जाय.

नगेन छटपटा कर उठ बैठा. उसने दो लंबे घूँट में ठंढी हो चली कॉफी को गले उतारा और बेचैन नज़रों से अरुणा को देखने लगा. अरुणा नगेन के ऐसे देखने से डर गयी. आज तीन दिन हुए... नगेन की दाढ़ी बढ़ गयी है. वह नहाया तो है लेकिन न साफ़ हुआ दीखता है न शीतल... जस का तस बासी, उफनता हुआ सा धरा है. क्या करे अरुणा...? कैसे उसे समेटे..? उसका अमोघ अस्त्र तो निश्चित रूप से इस समय नकारा हो जाने वाला है. फिर भी, अलग ढंग से कोशिश करती है अरुणा.

अच्छा ठीक है, उठो. वीरेश जी के घर चलते हैं. कुछ माहौल बदलेगा. शायद कुछ नया सोच हो उनके पास... उठो.

नहीं अरुणा. आज सुबह ही मेरी उनसे बात हुई है. उनके पास न कोई सोच है न फुर्सत. उनके बैंक में अप्रैल भर नये वित्तीय वर्ष की योजना पर काम चलता रहेगा. हर रोज रात को ग्यारह बजे घर पहुँचते हैं जनाब. उन्हें तो सत्रह अप्रैल का भी पता अगले दिन चला.

बात खत्म हो गयी. अरुणा की कोशिश नाकाम रही. नगेन कमरे के बीचोबीच कमर पर हाथ रखे खड़ा रहा अरुणा उसे बेबस देखती रही. एक मंथन तो उसके भीतर भी था, लेकिन उतना उग्र नहीं जितना नगेन झेल रहा था. दामिनी कांड के समय भी वह बौखला उठा था लेकिन तब वह भीतर से भरा हुआ था, बहुत कुछ ठोस उफ़न रहा था उसके अंदर.. लेकिन इस बार तो वह बस सिर पकड़ कर बैठ गया है. भीतर सन्नाटा है और बाहर गहरी बेचैनी.

माहौल की बेचैनी का असर मौसम पर भी था जैसे. शाम होते होते दरवाज़े फटफटाने लगे. धूल भरी आंधी तो थी ही, बौछार की भी आशंका थी. अरुणा बाल्कनी में फैले कपडे उठाने दौड़ पड़ी. बौछार शुरू हो गयी तो सारे कपड़े मटमैले दागों से रंग जाएंगे. वह कपडे समेट ही रही थी कि देखती है नीचे भास्कर की कार आ कर रुकी है. वह खुश हो गयी कि चलो नगेन का कुछ तो मूड बदलेगा. उसने वहीँ से आवाज़ लगा कर नगेन को बताया,

सनी आ रहा है.“ भास्कर को उसकी मित्र मंडली सनी ही कहती है.

अकेला है ?

नहीं.. सुजाता भी साथ है. एक बैग है हाथ में. कुछ खास मूड में लग रहा है.

अरुणा ने भूमिका बनाई कि सनी के आने की घटना से कुछ ताज़ा संचार जुटाया जाय.

मैं बैठाती हूँ उनको. तुम भी फ्रेश हो लो. जल्दी नहीं है. आंधी पानी में आया है लेकिन ऐसे मौसम में जाएगा थोड़ी..

नगेन उठ तो गया लेकिन भास्कर और सुजाता के आने ने उसे उतावला कर दिया. सनी जब बौखलाया हुआ खाली हाथ आता है तो उसकी चाल ही कुछ और होती है. आज वह ज़रूर कुछ ताज़ा मुद्दा लाया होगा.

पांच मिनट में ही मुंह पर छींटे मार कर और टी शर्ट बदल कर नगेन कमरे में आ गया. तब तक उनके साथ अरुणा भी बैठ चुकी थी. सनी चाहे जिस मूड में आया हो, अरुणा की रूचि इस ओर थी कि बात उसी मुद्दे पर शुरू हो जिस पर नगेन अटक गया है. इसके लिये पहल अरुणा ने ही की.

सनी, ये तुम्हारे दोस्त नगेन पिछले तीन दिन से बहुत तनाव में चल रहे हैं. इन्हें ‘देवी’ कांड ने बहुत अपसेट कर दिया है और उन्हें यह नहीं समझ मे आ रहा है कि इन नन्हीं अबोध बच्चियों पर तथाकथित यौन आक्रमण की वजह क्या है... और जब तक कारण न सूझे तब तक किसी समाधान की राह कैसे बनाई जाय.

अरुणा ने अपना वाक्य पूरा किया और सनी के चेहरे पर नज़र जमा दी,

... इसका कोई सोच है तुम्हारे पास...?

बिल्कुल है, बल्कि एकदम साफ़ तस्वीर है मेरे सामने.

तो बताओ...“ अरुणा उतावली हो गयी. नगेन भी बाकायदा सचेत हुआ. उसे पता है कि भास्कर कुछ भी हो, फालतू हांकता नहीं है.

भास्कर ने भी देर नहीं की और शुरू हो गया, मानो वह इसी काम के लिये आया था...

***

भास्कर शुरू हो गया.

बताओ, आज की तारीख में हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा कमाऊ धंधा कौन सा है ?

पहेलियाँ मत बुझाओ, बात समझाओ. हम सुनेंगे और जहाँ ज़रूरत होगी सवाल करेंगे.

उतावला बैठा नगेन जैसे उखड गया,

ओ. के. मैं जरा पीछे से शुरू करता हूँ. कोई भी धंधा सबसे ज्यादा कमाऊ तभी हो सकता है जब उसके उपभोक्ता पैसे वाले हों. मांग ज्यादा हो और उत्पाद कम. तभी बेचने वाला खरीददार को अपनी कीमत पर झुका पाएगा. ठीक है?

ठीक है

ऐसा धंधा कौन सा होगा ? अभी कुछ दिन पहले तक फिल्मों में काम ऐसा ही धंधा था. लता के एक गाने की कीमत लाखों में होती थी. शाहरुख खां और अमिताभ बच्चन जरा से काम के करोड़ों पीट लेते हैं. आई पी एल के उद्घाटन कार्यक्रम में एक घंटे से कम के शो का शाहरुख ने करीब एक करोड़ रूपया लिया. इसी तरह क्रिकेट के खिलाड़ी बेतहाशा कमाई करते हैं, क्योंकि उनको खरीदने वाले लोग उनके काम से ओर भी ज्यादा रोकड उठाते हैं. बट, सब कोई न तो लता हो सकता है न सचिन, हां सब कुछ गवां कर इनकी चकाचौंध में फंस कर लुट ज़रूर सकता है. देखिये, बम्बई नगरी कितने स्ट्रगलर लोगों से भरी पड़ी है.

ऐसे ही एक और धंधा है जिसकी ज़रूरत ऐसे बहुतों को है जो भारी कीमत दे कर धंधेबाजों का हुनर खरीद सकते हैं और फिर उससे कई कई गुना रकम कमा सकते हैं. मालूम है वह धंधा कौन सा है ?


नहीं, बताओ.

वह है, जरायम पेशा, यानी जुर्म का धंधा... क्राइम. इतने बड़े देश में वोट की राजनीति क्या बिना खून-खराबे के चल सकती है ? बताओ कौन सी राजनैतिक पार्टी ऐसी है जिसके पास अपनी निजी सेना नहीं है. सन चौरासी में सरदारों को खुलेआम, सरे चौराहे पेट्रोल छिड़क कर जलाया गया. लूट-पाट की गई, क्या यह काम कोई नौसिखिया निभा सकता है...? तुम अपने बाथ रूम में दीवार पर एक छिपकली मार कर दिखा दो नगेन तो जानूँ. देश भर में सैकड़ों राजनैतिक पार्टियां हैं. कोयला, ड्रग्स, जिस्म, नकली दवाएं, ज़मीन जायदाद, इन सब के अपने अपने माफिये चल रहे हैं. अपने ही शहर में देखो, हर सड़क पर बस स्टॉप बने हैं लेकिन बसें हमारे शहर में नहीं चलतीं. यह कमाल ऑटो और टेम्पो वाले मॉफिया का है. हर माफिया की पीठ पर किसी न किसी राजनैतिक हस्ती का हाथ है. हर निजी सेना और माफिया को बहादुरों की ज़रूरत है. इसलिए बहादुरों की कीमत है. सोचो, अगर एक हत्या की सुपारी कोई बहादुर पांच करोड़ लेता है तो वह क्या शाहरुख खान से कम हुआ ?

अब बताता हूँ कि इस धंधे में आ सकने की अपनी मांग क्या हैं..इतना कमाऊ बहादुर बनने के लिये सबसे ज़रूरी है कि बंदा अपने भीतर से जुर्म का डर, झिझक, शर्म, और इंसानी दया माया, सब जड़ से खत्म कर ले. आप हत्या करने की बहादुरी तो रखते हैं लेकिन खून और अपने शिकार के आंसू देख कर आपकी हिम्मत जवाब दे जाती है तो सब बेकार है. आप हत्या करें. बहता खून देख कर सहज रहें. बाहर आ कर बिना परेशान दिखे, सामने की दूकान से एक सिगरेट लें, वहीँ खड़े खड़े धुंआ निकालें, किसी नई फिल्म पर बेतकल्लुफ हो कर बात करें और फिर पास से गुजरते एक हाथ रिक्शा को रोक कर उस पर बैठें और चल दें, तब बहादुरी है.

दोस्त, यह बहादुरी बिना किसी स्कूल के नहीं आती. राजनीति से लेकर सारे माफिया लोगों को बहादुरों की डिमांड तो है लेकिन यह बहादुरी पैदा खुद करनी पड़ती है. ज़ाहिर है, इच्छुक लोग खुद को इस हुनर में ढालने की कवायद करते रहते हैं.

नगेन, यह नन्हीं बच्चियां इन नये उभरते बहादुरों की प्रयोगशालाएं हैं. बंद कमरों में यह बहादुर इन नन्हीं बच्चियों के आगे अपनी हिम्मत, अपनी निर्ममता, क्रूरता और सहनशीलता की परख करते हैं. सीखने के लिये यह बच्चियां बहुत अनुकूल है. यह बयान नहीं दे सकतीं, बकौल पंकज बिष्ट, गवाह नहीं बन सकतीं, विरोध नहीं कर सकतीं, इनके प्राण जल्दी निकल जाते हैं. इनका रोना बर्दाश्त कर लेना एक समूचा इम्तेहान है. सोचो ज़रा, बलात्कार तो जबरदस्ती किया गया प्राकृतिक काम है, लेकिन देवी के पेट ( ? ) में शीशी और मोमबत्ती...? इसके लिये ज़बरदस्त जीवट चाहिए, और वह भी गुनाह बे-लज्ज़त.

यह् बहादुर एक दिन माफिया के सचिन बनेंगे यह इनका अरमान है, और माफिया भी यही चाहता है. माफिया इनके इस्तेमाल से उन सब से माल खींचता है जिनके लिये वह काम करता है. वह राजनैतिक लोग भी हैं और उनके संस्थान भी. पुलिस इन दोनों के बीच की एक लाचार कड़ी है, पुलिस ताकवर है, अक्लमंद है लेकिन पुलिस के आका लोगों ने इनको भी वैसी ही मानसिकता और ट्रेनिंग दी है जैसी बहादुरों के लिये वांछित है, सो बहादुर और पुलिस एक सिक्के के दो पहलु हैं. कमज़ोर मौके पर दोनो की ही बलि चढ जाती है.

अब ‘देवी’ के मामले में ही देखो. मीडिया ने दोनों आरोपियों को मशहूर कर दिया है. अब अगर यह बेदाग़ छूट गये तो इन्हें काम के लिये सुपारी देने वालों की लाइन लग जाएगी. और इनके बच जाने की संभावना कम नहीं है. कोई भी काबिल वकील यह साबित कर सकता है कि वारदात के समय तो यह दोनों टिम्बकटूं में थे. तो बात बन गयी. यह भी साबित किया जा सकता है कि ‘देवी’ इस सब की अभ्यस्त थी. नगेन, यह सचमुच किया जा सकता है, दिस इज इण्डिया, क्योंकि इनकी पीठ पर उन्हीं का मजबूत हाथ है जिनके लिये यह बहादुरों की पौध तैयार हो रही है... वही इन के उपभोक्ता हैं.



ज़रा सी बानगी लो,

सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह जी से कहा, कि मत दो इस्तीफा, वह कहते हैं तो कहते रहे. मनमोहन जी शिंदे जी से कहेंगे, मत दो इस्तीफा, कहो, ज्यादा शोर होगा तो इमरजेंसी लगा देंगे. शिंदे जी नीरज जी से कहेंगे, मत दो इस्तीफा. बस मीसा कार्ड दिखाओ, सब सही हो जाएंगे. नीरज साहब अहलावत जी से कहेंगे, मत दो इस्तीफा, अरे उनके पास से ड्रग बरामद कराओ न, इतना काफ़ी है. अहलावत जी...

सनी बोलते बोलते हांफने लगा.

बहुत धीमी और आहत सी आवाज़ में नगेन ने भौचक अपना सवाल किया,

तो क्या भास्कर, यह सब एक संगठित व्यापार है...?

और क्या नगेन. पूरे देश में इस फील्ड में उतरने के लिये एक बड़ा तबका तैयार किया जा रहा है. तुमने गौर नहीं किया क्या, कि जबसे दामिनी कांड में मुख्य अभियुक्त नाबालिग करार दिया गया और फिर वह सजा की मुख्यधारा से अलग रख दिया गया, तब से ऐसे मामलों में नाबालिग बहादुरों की गिनती बढ़ गयी है. देखो, उनका सोच कितना संगीन हैं... जितनी कम उम्र में भीतर की इंसानियत को मार दिया जाय, उतने लंबे समय तक बहादुर अपने काम आएगा. एक तरह से इन नन्हीं बच्चियों की तरह यह नौजवान और नाबालिग लड़के भी उनके गिनीपिग ही हैं. एक कहानी पढ़ी थी कभी, जिसमें एक गैंग लीडर अपने एक नये ‘किलर’ से सुबह सैर करते आदमी पर गोली सिर्फ इसलिए चलवाता है ताकि नया हत्यारा दिल से पक्का हो सके. ठीक यही सच यहाँ भी लागू है. ये बहादुर कसौटी पर खरे उतरे तो किसी माफिया का हिस्सा बन जाएंगे. इनकी पीठ पर तो मजबूत हाथ है ही, और जब पकडे गये तो बरसों चलने वाला केस बनेगा, और कौन जाने तब तक ऊंट किस करवट बैठता है. तो यह है नये कमाऊ धंधे का सच. इसमें रिस्क तो है लेकिन बिना रिस्क कौन सा धंधा हैं भला, बताओ...?

भास्कर छटपटा कर उठा और अकारण खड़ा हो गया. . अरुणा भर आई आँखें लेकर भीतर चली गयी. नगेन के लिये सुनी हुई बातों ने जमने में समय लिया.

अरुणा चाय ले कर लौटी. चाय के दौरान सुजाता ने बात का छोर सम्हाला.

एक और बात बताइए नगेन ‘दा. इस ‘देवी’ कांड के पीछे आंदोलन फान्दोलन तो ठीक है, लेकिन इसमें शामिल कितने लोगों के मन में नन्हीं बच्चियों से ले कर बूढ़ी नानी दादियों के लिये इज्ज़त मान है ? घरों के भीतर भी कायर से कायर मर्द, औरतों को बस एक ही नज़र से देखता है. जो माता-पिता गर्भ में ही बेटियों को मार देते है, उन्हें तो मैं कहूँगी बहादुर है, लेकिन, जिनकी दो या पांच बरस की बेटियां, इस रास्ते विदा हो गयीं, उनमें से कितने लोगों ने शोक परंपरा के उपक्रम के बाद अब राहत नहीं महसूस की होगी. एक बेहूदा सवाल पूछती हूँ, अगर ‘देवी’ के माता पिता को दो हज़ार की रिश्वत की बजाय दो लाख की रिश्वत पेश की गयी होती, तब भी क्या यही दृश्य होता ? बहादुरों को बचाने वाले उपभोक्ता तो उन पर बीस लाख का भी दावं खेल सकते थे. बस यहीं चूक हो गयी, वर्ना दोनों आरोपी तो अपने काम में सफल हो ही गये थे.

बोलो क्या मैं गलत हूँ...?

नहीं, लेकिन ऐसे में किया क्या जा सकता है...?“ यह अरुणा का बेबस सवाल था.

बहुत कुछ, लेकिन आज नगेन की शंका बस यहीं तक थी. इस पर ज़रूर हम बात करेंगे, लेकिन आज नहीं. ठीक है न नगेन..?

बिल्कुल ठीक है.“ नगेन के चेहरे पर उसका प्रभात लौटने लगा था, हालांकि सूरज बहुत तपते हुए उगना शुरू कर रहा था.
००००००००००००००००

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