असग़र वजाहत : दोनों सांप्रदायिक शक्तियां मुखर रूप में सामने आ चुकी हैं


असग़र वजाहत : दोनों सांप्रदायिक शक्तियां मुखर रूप में सामने आ चुकी हैं #शब्दांकन

आज हिन्दूवादी संगठनों के पास जितनी ताकत है उतनी बाबरी मस्जिद तोड़ते समय भी नहीं थी।

यदि राम मंदिर सरलता से बन जाता है। दंगे नहीं होते तो हिन्दू मतों का वैसा ध्रुवीकरण नहीं हो पाएगा जैसा भाजपा चाहती है। लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है कि कट्टरपंथी मुस्लिम दल अयोध्या में राम मंदिर के बनने का विरोध नहीं करेंगे। वे अपनी राजनीति चलाने के लिए उसे एक अच्छा अवसर मानकर सांप्रदायिकता बढ़ाएंगे  ... असग़र वजाहत


पिछले आम चुनाव में भाजपा ने राम मंदिर को प्रमुख मुद्दा नहीं बनाया था क्योंकि उस समय भाजपा के यही रणनीति थी कि कांग्रेस शासन की विफलताओं और विकास के प्रति जनता अधिक आकर्षित होगी । यह फार्मूला कामयाब सिद्ध हुआ था। बिहार में इस फार्मूले को फिर अपनाया गया था। लेकिन यह मुद्दा असफल हो गया था। इसलिए आगामी चुनाव को सामने रखकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा बहुत आक्रामकता से पेश किया जा रहा है । कहीं कहीं यह आभास दिया जाता है कि राम मंदिर निर्माण में सबसे बड़ी बाधा मुसलमान हैं और कहीं यह ललकार सुनाई पड़ती है कि संघर्ष और जोखिम उठाये बिना राम मंदिर का निर्माण नहीं हो सकता। कहीं ढके शब्दों में चुनौती दी जाती है कि राम मंदिर के निर्माण जैसा कठिन काम तो हो कर ही रहेगा ।



मेरे विचार से राम मंदिर के निर्माण में कोई बाधा नहीं है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है लेकिन जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट को वचन देने के बाद भी बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था उसी तरह सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होते हुए भी अयोध्या में राम मंदिर बनाया जा सकता है। जिस प्रकार बाबरी मस्जिद को तोड़ देने वाले नेताओं को बड़े पद प्राप्त हुए हैं उसी तरह राम मंदिर बनाने वालों को संभवतः उससे उच्च पद प्राप्त होंगे । आज हिन्दूवादी संगठनों के पास जितनी ताकत है उतनी बाबरी मस्जिद तोड़ते समय भी नहीं थी। मुसलमानों की तो बात ही छोड़ दीजिए आज कोई राजनीतिक दल इस स्थिति में नहीं है कि हिन्दूवादी शक्तियों से टक्कर ले सके । कांग्रेस तक बहुत सतर्क हो गयी है। इस स्थिति में सवाल यह उठता है कि बीजेपी या आरएसएस मंदिर निर्माण को इतना कठिन क्यों बता रहे हैं । इसके दो कारण समझ में आते हैं पहला यह है कि इतने महान धार्मिक कार्य को कठिन बता कर लोगों की भावनाओं को भड़कना और उन्हें उत्तेजित करना। दूसरा कारण यह है कि केन्द्र में सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद भी भाजपा और  आरएसएस पूरी तरह से हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण नहीं कर पाये हैं जिसे बिहार चुनाव ने साबित कर दिया है। इसलिए उद्देश्य केवल राम मंदिर बनाना नहीं बल्कि समाज को धर्म के आधार पर विभाजित करना और हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण करना है। इसका आजमाया हुआ तरीका दंगे ही हैं।

राजनेताओं ने सत्ता के सामने किसकी परवाह की है - असग़र वजाहत #शब्दांकन
राजेन्द्र यादव , असग़र वजाहत 


मुसलमानों के साम्प्रदायिक संगठनों के लिए यह हिन्दू कट्टरपंथी नीति लाभकारी होगी क्योंकि मुसलमानों में असुरक्षा की भावना बढ़ेगी, धर्मांधता और अधिक होगी। उनके मतों का भी ध्रुवीकरण होगा और आतंकवाद के लिए बड़ा रास्ता खुलेगा। जैसा कि होता आया है एक सांप्रदायिकता दूसरी सांप्रदायिकता को बल देती है । हाल में पश्चिम बंगाल की घटनाएं हिंदू सांप्रदायिक शक्तियों को ताकत दे रही हैं। ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो रही है ।

मेरे विचार से अयोध्या में राम मंदिर बना दिए जाने का विरोध कम से कम मुसलमानों और मुस्लिम नेताओं को नहीं करना चाहिए क्योंकि उसका विरोध भाजपा और दूसरी हिन्दूवादी शक्तियों को बल देगा। परंतु यदि राम मंदिर सरलता से बन जाता है। दंगे नहीं होते तो हिन्दू मतों का वैसा ध्रुवीकरण नहीं हो पाएगा जैसा भाजपा चाहती है। लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है कि कट्टरपंथी मुस्लिम दल अयोध्या में राम मंदिर के बनने का विरोध नहीं करेंगे। वे अपनी राजनीति चलाने के लिए उसे एक अच्छा अवसर मानकर सांप्रदायिकता बढ़ाएंगे ।
जैसा की लग रहा है दोनों सांप्रदायिक शक्तियां मुखर रूप में सामने आ चुकी हैं जिसका नतीजा दंगों में दिखाई देगा। दंगों में नेताओं की जान जाने का डर तो नहीं लेकिन साधारण लोगों का जनजीवन तबाह हो जाएगा। लेकिन सांप्रदायिक शक्तियों ने देश की चिंता कब की है जो आज करेंगे ? वैसे भी राजनेताओं ने सत्ता के सामने किसकी परवाह की है।

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