रवीन्द्र कालिया सुनहरे स्पर्श वाले कथाकार संपादक - राजेन्द्र राव


रवीन्द्र कालिया सुनहरे स्पर्श वाले कथाकार संपादक - राजेन्द्र राव #शब्दांकन

सुनहरे स्पर्श वाले कथाकार संपादक

- राजेंद्र राव


स्मृति शेष



बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब ऎसा लगने लगा कि अब हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं का स्वर्ण काल कभी नहीं आएगा और उनकी लोकप्रियता और पाठक संख्या दिनों दिन घटती जाएगी तब एक वरिष्ठ कथाकार और पूर्व संपादक रवींद्र कालिया ने कोलकाता की एक हिचखोले खाती और लगभग नीरस समझी जाने वाली गंभीर पत्रिका का संपादन संभाला और बिना किसी प्रचार मुहिम के लटकों झटकों के उसे कुछ ही महीनों में युवाओं के दिल के नजदीक की पत्रिका बना दिया। कई नए सृजनोन्मुखी स्तंभ शुरू किए, साहसिक साक्षात्कार और कहानियों के जरिए वागर्थ का कायाकल्प कर दिया। युवा कथा लेखन विशेषांकों की एक वार्षिक श्रंखला के माध्यम से हिंदी कहानी की नवस्पंदनयुक्त एक एकदम नई पीढ़ी का रचना पथ प्रशस्त किया। मो.आरिफ़, चंदन पाण्डेय, कुणाल सिंह जैसे दर्जनों कथाकारों को सशक्त मंच प्रदान किया।यह कोई वन टाइम वंडर नहीं था।वहां से नया ज्ञानोदय में आए तो नवाचार और विशेष आयोजनों  की ऎसी धूम मचाई कि लंबे समय से विमुख चल रहे हिंदी कहानी के पाठक लौट आए। नया ज्ञानोदय के प्रेम विशेषांकों को पाठकों की मांग पर कई कई बार पुनर्मुद्रित करना पड़ा। निदेशक की हैसियत से उन्होंने बंद द्वार खोल दिए। साहित्य के इतिहास में यह एक अपूर्व घटना थी। आश्चर्यजनक यह भी था कि एकदम लोगों की यह पुस्तकें बिकीं और कईयों के नए संस्करण प्रकाशित हुए। इससे पहले शायद ही किसी संपादक ने कभी रूढ़ियों, घिसी पिटी परंपराओं और  पूर्वाग्रहों का ऎसा ध्वंस किया हो। उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी, कटु आलोचना, भर्त्सना और लांछनों का सामना करके।

रवीन्द्र कालिया सुनहरे स्पर्श वाले कथाकार संपादक - राजेन्द्र राव #शब्दांकन

राजेन्द्र राव

साहित्‍य संपादक
दैनिक जागरण पुनर्नवा

संपर्क: 374 ए-2, तिवारीपुर, जे के रेयन गेट के सामने, जाजमऊ, कानपुर-208010 (उ.प्र.)
मोबाईल: 09935266693
ईमेल: rajendraraoknp@gmail.com

1 अप्रैल 1939 को पंजाब में जन्मे रवींद्र कालिया के जीवन का पूर्वार्ध जालंधर में बीता। छात्र जीवन में ही उन्हें डा.इंद्रनाथ मदान और मोहन राकेश जैसे शिक्षकों का सानिंध्य और गजल गायक जगजीत सिंह, शायर सुदर्शन फ़ाकिर, कथाकार मोहन चोपड़ा और सुरेश सेठ आदि का साहचर्य मिला। कुछ बरस शिक्षण फिर भाषा विभाग में नौकरी के बाद उस समय की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग में उप संपादक रहे। लंबे रोमांस के बाद जानी मानी लेखिका ममता (अग्रवाल) कालिया से विवाह हुआ। अपनी अख्खड़ तबीयत के चलते नौकरी छोड़ कर इलाहाबाद आकर बसे और प्रिंटिंग प्रेस और प्रकाशन चलाया। एक साप्ताहिक अखबार गंगा जमुना निकाला और वर्तमान साहित्य के कहानी महाविशेषांकों का संपादन किया।इन दिनों भी वे वर्तमान साहित्य के सलाहकार संपादक थे।



रवीन्द्र कालिया की कृतियों की सूची में 6 कथा संकलन, 3 उपन्यास, 4 संस्मरण ,2 व्यंग्य संकलन और अनेक संपादित ग्रंथ हैं। 'गालिब छुटी शराब' उनके अनोखे संस्मरणों की अत्यंत चर्चित और लोकप्रिय पुस्तक है। यह संस्मरण धारावाहिक रूप से कथा पत्रिका हंस में छपे थे। धर्मयुग के अपने दिनों की पृष्ठभूमि पर लिखी गई कहानी 'काला रजिस्टर' भी हिंदी की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है। एक अच्छे कथाकार, जादुई स्पर्श वाले सफल संपादक के अलावा वे एक निहायत जिंदादिल और दोस्ती निभाने वाले प्रगतिगामी इंसान थे। हिंदी साहित्य की उनकी सेवाएं और उनका योगदान चिर स्मरणीय है। उनके महाप्रयाण से साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है।

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