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लौटना है फिलवक्त जहाँ हूँ — अनिरुद्ध उमट

जून 12, 2016

कविता संग्रह- ‘जहाँ होना लिखा है तुम्हारा’ लेखक- पारुल पुखराज प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर वर्ष- २०१५ मूल्य – १५० रुपये

लौटना है फिलवक्त जहाँ हूँ

— अनिरुद्ध उमट

"कोई कवि यशः प्रार्थी कवि है या नहीं, इसे जाँचने की मेरे पास एक ही कसौटी है। यदि वह मुझ से कहता है कि मेरे पास कुछ महत्व की बातें है जिन्हें कहने के लिए मैं कविता करता हूँ, तो मुझे उसके कवित्व पर सन्देह हो जाता है। किन्तु यदि वह कहता है कि मैं तो शब्द का पीछा करता हूँ-- शब्द पर कान लगाकर उसकी बात सुनने की कोशिश करता हूँ, तो मुझे यकीन हो जाता है कि हाँ, यह आदमी जरूर कवि बन सकता है। "

-ऑडेन

अनिरुद्ध उमट

माजी सा की बाड़ी,
राजकीय मुद्रणालय के समीप,
बीकानेर ३३४००१
anirudhumat1964@gmail.com


       किसी भी कला में आग्रह का अतिरेक अक्सर उस की सहज प्रकृति को भंग कर देता है. यह प्रकृति उस कला माध्यम के साथ के हमारे रिश्ते हमारी संलग्नता को प्रकट करती है. सृजन के क्षणों में अपनी बात को व्यक्त करने की तीव्रता के दबाव के चलते यह भी संयम आवश्यक होता है कि हम खुद उस माध्यम की ग्रहणशीलता और स्वायत्तता के प्रति भी विवेकवान रहें, उसके प्रति आवश्यक रूप से हम में सहज उदारता रहनी चाहिए. यह संतुलन ही कला और कलाकार के आपसी सम्बन्ध को वांछित रूप ग्रहण कर पाने में सबसे आवश्यक होता है. किसी कलाकार के सृजन में यह संतुलन कितना सध पाता है यह उसकी कृति से रूबरू होने पर प्रकट हो जाता है. अपने माध्यम के प्रति यह निष्ठा, धैर्य ही उस कलाकार को वयस्कता प्रदान करता है. ऐसी कला किसी भी समय में हमेशा अपनी अर्जित भूमि पर फलती रहती है. उसे किसी भी समय के बाहरी दबाव तब अपनी तात्कालिकता से प्रभावित नहीं कर सकते.

       कोई भी कलाकार कला के इस आंतरिक, सहजावस्था के प्रस्फुटन के क्षणों में अपनी अनुभूति को कितना स्थगित रख पाता है, कितना किसी अव्यक्त को व्यक्त हो पाने का अवकाश अपनी कला में उपलब्ध करा पाता है, उसका यह बोध ही उसकी रचना में समग्रता से भिन्न-भिन्न रूपों में छवि पाता है. जितनी ही यह छवि नैसर्गिक होती है उतनी ही आत्मीय उसकी अनुभूति भी. जो ह्मारे संवेदन को उसकी गहराई में अपनी प्राकृतिक अवस्था में अंगीकार करती है.

       पारुल पुखराज के पहले कविता संग्रह ‘जहाँ होना लिखा है तुम्हारा’ को पढ़ते हुए उस अव्यक्त को भाषा में रूपायित होते हुए देखा जा सकता है. इसे पढ़ते हुए हमारे मन में मौन की लय और लय का मौन व्यापने लगता है. शब्द यहाँ वाहक भी है वहन भी. वे कभी खुद कुछ कहते हैं कभी कहने को सुनने में लीन हो जाते हैं.  

       भाषा को पारुल की कविताओं में अपनी तरह से व्यापने का अवकाश मिलता है जो इस मंशा का अपनी नैसर्गिकता में स्वीकार है कि कहने से अधिक कहने को सुनना है. दिखाने से अधिक दृश्य को खुद दृश्य होते रहने की आकांक्षा में घटित होने देना है.

       अपनी सृजनात्मकता में ये कविताएँ चीजों को उनकी स्थिति से उनके मूल से विछिन्न नहीं करती बल्कि जैसी वे हैं उसी में कुछ और हो जाने की संभावना की प्रतीक्षा करती है. वे इसमें अपनी ओर से जाहिर होता-सा कोई हस्तक्षेप नहीं करती बल्कि अपने हर तरह के जतन को वे संकोच में अप्रकट होते देने में अधिक सहज रहती है.

      यह उनकी काव्य प्रतिभा का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि उनके यहाँ बाहर को भीतर पर और भीतर को बाहर के अतिरेक में हावी नहीं होने दिया गया है. उनका स्वर अपनी रचना में पृथक से नहीं बल्कि उसके होने में ही खुद को घुला देता है. ऐसा करने के लिए निश्चय ही कवि में अपनी अनुभूति, संवेदना और माध्यम के प्रति गहरी निष्ठा का भाव आवश्यक होता है जो पारुल के काव्य कर्म में बेहद संजीदगी से निभाया जाता है.

       ‘प्रतीक्षा’ एक शब्द है जो इन कविताओं में अदृश्य रहते हुए कई-कई रंगों, रूपों, ध्वनियों में प्रकट होता है. हर क्षण की स्वायत्तता में वह अपनी हर बार पृथक ही छटा में, नियति, विडंबना, कामना, स्वप्न, मौन में प्रवेश करता है. उस क्षण के उस बसाव में वह नितांत अछूता, प्रथम प्रस्फुटन में खुद को होने देता है. जीवन के इस नितांत भीतरी अनुभव को उसके अपने ही अँधेरे में सीढ़ी दर सीढ़ी उतरने का आश्वासन इस कवि के यहाँ मिलता है. इसलिए वह अपनी आदिम नैसर्गिकता में उन्मुक्त हो शब्दों में व शब्दों के आसपास के मौन और राग में घुलने लगता है. जहाँ वह नहीं भी दिखता प्रतीत होता है वहां भी वह सांस थामे, अपलक मंद धडकनों के आवागमन में बैठा होता है. यह इस संग्रह की काया का मुख्य गान है, स्वर है- जो गहराती शाम में उठते धुंए सा आकाश में विलीन होने लगता है. कोई है जो अज्ञात है मगर उसका होना इस  भाषा के अदीखे किसी  स्थल में इस गान के विलम्बन में  किसी कनात सा तनता जाता है. इस गान के उठते-बहते प्रवाह में अजाने से स्थल पलके खोलने लगते हैं.

किसके हाथ उठाते हैं कौर  

कौन जीमता है 
थाल से 
अदृश्य 
रसोई में 


उमगती कंठ में 
हिचकी 
काँपता जल पात्र 
   
      वह अज्ञात है, अदृश्य है मगर वह है- प्रतीक्षा की देह लिए भिन्न-भिन्न रूपों, आवाजों में. प्रतीक्षा और अज्ञात एक जगह किसी एक क्षण में एक-दूजे में घुल जाते हैं और पृथक न रह एक देह में सांस लेने लगते हैं. यह देह में इस तरह एकल हो जीवन में उसका विचरना, रूप लेना, स्पर्श करना, सुनना, स्पन्दित होना, स्वप्न हो जाना, हिचकी में घुट जाना, बेसुध हो हर कुछ का अतिक्रमण कर जाना कला के ताल पर किसी बिसरे वृक्ष की छाया सा अपने सूने में भीगता-काँपता हमारे भीतर हमें पुकारता है. इस पुकार को खुद में महसूस करते हम देखते हैं कि उस एक क्षण में ही हम अपने स्व से कुछ संवाद कर पाए हैं. ऐसे संवाद को जो अक्सर पूरे जीवन में हमें अपने स्मरण में ही नहीं आता, न अपनी उपस्थिति में, न अपनी अनुपस्थिति में.


जाना है 
जहाँ
हो रही मेरी प्रतीक्षा 

लौटना है 
फिलवक्त जहाँ हूँ 


मुक्त होना
मुक्त करना है 



उस अज्ञात की सुध में 
वह बावड़ी का अँधेरा भी थी कहीं 

       ‘अवकाश’ और ‘मौन’ वे दो और शब्द हैं जो पारुल की कविताओं में बसने पर हमें अपने जगत में उतरने का अवसर देते हैं. एक-दूजे में अपनी सम्पूर्ण सत्ता में स्थिर रहते ये दो शब्द एक-दूजे में प्रविष्ट होते हैं और काव्य में उनका वह प्रकट रूप नितांत प्रथम घटित के अनुभव में हमारे भीतर उतरने लगता है. भीतर के उस समस्त जाने-पहचाने भूगोल पर उसकी छाया पसरने लगती है और इसी दरमियान उसकी आवाज वह नहीं रह जाती जो ऐन इस क्षण से पूर्व थी.

       विरह जो है वह विरह ही नहीं. कुछ और भी है. क्या है वह, इसे कविता किसी सरलीकृत सुविधा में नहीं देखती, न ही सुझाती है बल्कि उसकी समस्त भीतरी संश्लिष्टता में खुद गुंथती, उलझती है. कंटीली झाड़ी में किसी परछाई सी. पारुल के काव्य में जो है वह वह नहीं है वह कुछ और होने की संभावना में, असमंजस में, ठिठकता-झिझकता, संशय में लिथड़ा अपने से बाहर कभी-कभी झाँकने का उपक्रम करता है. और कभी इस उपक्रम के विपरीत अतल में यूँ धंसने लगता है कि जो नहीं है वह नहीं ही नही कुछ और भी हो सकता है, संभावनाओ की चट्टानों को दरकाता खुद को विस्फोट होने देता सा.

निषिद्ध 
हैं कुछ शब्द 
जीवन में 
जैसे कुछ 
जगहें 

अंधी कोई 
बावड़ी

जैसे 
सिसकी अधूरी 
सूना आकाश 

व्यक्त हो जिनमें तुम 

जहाँ होना लिखा है तुम्हारा 

       कवि आलोचक रमेशचन्द्र शाह के शब्दों में, ‘जीने का आस्वाद ही नहीं जीने का सबब ढूँढने की बेकली से प्रेरित पारुल की कविताओं के बारे में कहना कठिन है, कि यहाँ राग की खींच ज्यादा प्रबल है, या कि विराग की? राग और विराग दोनों के मेल-अनमेल से ही अपना रूपाकार रचती और पाती हैं ये कविताएँ.’ अपने उपलब्ध अति आग्रही यथार्थ और समय के मध्य स्थित कवि के भीतर कोई गहरी सांस्कृतिक समृद्धि की ठोस भूमि है जो उसे तुमुल कोलाहल या अतिरेक से बचाए मन की बात में अवस्थित रहने देती है. अपनी भाषा के वैविध्यपूर्ण अतीत और उसके गहरे संस्कार उसे विचलित होने से बचाए रखते हैं. किसी भी तरह की चकाचौंध से अविचलित यह काव्य अपनी जड़ों की गहराई और वहाँ से ग्रहण किए जाते जीवन रस से विकसित होता है. उसके यहाँ जीवन अपनी सघनता और सतत नैरन्तर्य में सूक्ष्मता से अनुभव की प्रगाढ़ता को ग्रहण करता है. उसके संशय, उसके आश्चर्य, उसकी स्तब्धता उसके काव्य की प्राण शक्ति है. यह हर दृश्य से तादात्म्य हो जाने की बजाय दृष्टा भाव में प्रतिष्ठित  होते जाना किसी योगी की चरम सिद्धि से पृथक नहीं.


प्रीत करेगा 

छुएगा नहीं
उदासी 

निःशब्द 
गुजर जाएगा 
एकांत से 

बिना फेंके 
अपनी आवाज का 
कंकर 

मौन में 
तुम्हारे 


खिलाता है परिचय 
अपने ही अपरिचित मन से 

मौन 

कहीं जोग है 
कहीं तप 

कहीं 
रास साधक का 

रचा कुछ भी जा सकता है 

आत्माओं के मौन में 

       अनुभव को उसकी शाब्दिक देह से बाहर ले आ उसे उसकी निरावरण दैहिकता में कुछ क्षणों के लिए अवाक होने देना और खुद ही की देह को स्पर्श कर पाने का निसंकोच धरातल दे पाना किसी भी रचनाकर्म की दीर्घ यात्रा के बाद का ही पड़ाव या विराम स्थल होता है. एक ऐसी यात्रा जिसमें आप यात्री नहीं खुद यात्रा होने में घटित होने लगें. वहाँ सब कुछ होता है, किन्तु सब कुछ न होने की भी नियति में खुद को विलीन होते स्वीकारता वह अपनी मंथरता में प्रगाढ़ प्रवाह की देह लिए किसी चरम बिंदु में अंततः समाहित हो जाता है.

       जीवन के हाहाकार में आवाज के बियाबान में पारुल की कविता में कोई दाना दाना पाप चुगता है.जहाँ ‘पुकार’ अपने होने बल खाती देखती है कि-

खोजना 
याद करना है 

याद करने पर 
याद करने की आवाज 
नही होती 

       एक ऐसी बंजर नींद इन कविताओं अपनी जाग में विकल है जिसमें कोई एक भी ऐसा स्वप्न नहीं जिस पर जीवन का दाँव खेला जा सके, जहाँ ‘दुःख/क्षण भर भी/ हरा रहता नहीं’. पारुल की कविताओं में शब्द आते हैं पर ऐन किसी क्षण अपने आने को स्थगित करते लगभग विस्मृत हो चुके स्थल की चुप्पी को अपने स्वर में उभरने का अवसर देते हैं. इन कविताओं में ‘कोरी रह गई दूब’ का अहसास अपने घने एकांत में हरा होने लगता है. उनकी कविता बुदबुदाती है कि, ‘ढांप पलकें / सदियों की जाग पर / हरा एकांत / मेरा / और हरे.’ जिसमें ‘खुलते संकोच के धागों में / आहिस्ता-आहिस्ता / आवाज की गिरह भी ढीली पड़ती है’. उनकी कविता के व्योम में ये पंक्तियाँ गूंजने लगती है-


नदी की धार पर विशाल बजरा 
तन उसका 
मध्य रात्रि
जिसके पाल खुल कर हवा में सरगोशी कर रहे थे 

उस 
बेला 

.......
.......
उस अज्ञात की सुध में 
वह बावड़ी का अँधेरा भी थी कहीं 

       अपने होने की विकलता और उसका अवगुंठन कला में किसी आजीवन प्रतीक्षित क्षण में अपना स्वर, रूप ग्रहण करने की तरलता महसूस करने लगता है. ‘उस बेला वह कुछ भी हो सकती थी’ सरीखी पंक्ति लिखने में, न लिखने में अपना आप खुद लिखती है. इन कविताओं में जहाँ, जिसका, ‘होना’ लिखा है की नियति को अपने निर्जन और अतल में विकसने का अवकाश उपलब्ध है. वे प्रार्थना करती हैं कि, ‘हे प्रभु / विचरने दो इच्छा के देवालय में / निर्भय उसे.’ कामना, स्वप्न, राग, स्मृति के छोर यहाँ एक बिंदु पर उस देह का भेद मिटाते एक दूजे में घुल जाते हैं.

पीठ पर लिए कब से चल रहा कोई 
अथक
किसी का स्वप्न

समापन बिंदु किए अदेखा निरंतर


गतिमान 

पृथ्वी के अंतिम छोर तक 
सुर साधे 
शिथिल पाँव 
निश्चित है उसकी अनूठी यात्रा 

पीठ पर जिसकी किसी अन्य के स्वप्न का भार 

       यह ‘पीठ’ किसी और की नही खुद कला ही वह रूप है. जो कलाकार के सुर साधने पर वांछित रूप में रूपायित हो जाती है. हिंदी कविता में ऐसा बहुत कम देखने में आता है जहाँ खुद कवि के पास कहने, जताने के अपने आग्रह के आधिक्य में यह स्मरण कहीं पीछे छूट जाता है कि खुद भाषा के समीप मौन बैठना भी स्वयं में एक पूर्ण अनुभव होता है. ऐसे ही अनुभव के क्षण हेतु कवि-आलोचक नन्दकिशोर आचार्य का कथन याद आता है कि. ‘कविता मूलतः संवेदनात्मक या अनुभूत्यात्मक अन्वेषण होती है...कविता की सार्थकता किसी विचार में घटा दिए जाने में नहीं, बल्कि अपने ग्रहीता को चेतना की उस भूमि पर लाने में है, जिसमें कोई भी अनुभूति स्वयं ही अपना अर्थ होती है.’

कविता संग्रह- ‘जहाँ होना लिखा है तुम्हारा’
लेखक- पारुल पुखराज
प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
वर्ष- २०१५
मूल्य – १५० रुपये

       पारुल पुखराज का यह संग्रह अत्यंत वाचाल, राजनीतिक आग्रहों के घटाटोप में रचनात्मकता के प्रति स्वयं के होने को समर्पित होने में सार्थकता तलाशता एक संकोची कदम है. जोसेफ ब्रोड्स्की ने कभी कहा था कि ‘स्मृति विस्मृति की संगिनी है’. ये कविताएँ उस संगीनी के संग छाया-सी चलती हैं और किसी मध्य के सेतु को तलाशती है जिस पर से गुजरते उसे सदियों से जब्त रूदन का बे-आवाज फूटना दिखता है. अक्सर कला में कहने का आग्रह अपने निराग्रही रूप से अपरिचित रह जाता है. इन कविताओं का ‘कहना’ अगर कुछ ‘कहता-सा दिखता है’ तो पाठ के समय व उसके पश्चात के दीर्घ स्मरण में वह दिखना भी रचनाकार की विवशता जान पड़ता है, शब्दों और कवि के साथ ये अजीब नियति-यातना होती है कि वे कहने के लिए बने होते हैं पर अक्सर वे अपने इस होने का भार त्यागना चाहते हैं. पारुल की कविताओं में यह महसूस होता है कि जैसे कहना भी कोई विवशता है, यदि कवि के राग में ऐसा कोई ईश्वरीय क्षण संभव होता हो जहाँ इसे भी न कहा जा सके तो वे उतना भी न प्रकट करें.
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