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नामवर सिंह, मेरे आत्मविश्वास का आधार है यह कोफ्त (जीवन क्या जिया : 3 )

जुल॰ 17, 2016

नामवर सिंह, मेरे आत्मविश्वास का आधार है यह कोफ्त (जीवन क्या जिया : 3 )

Jeevan kya Jiya - 3

Namvar Singh

जीवन क्या जिया! 

(आत्मकथा नामवर सिंह बक़लम ख़ुद का अंश)

अजीब बात है कि लोगों को दुख की बातें, अपमान की बातें नहीं भूलतीं। बाद में उन्हें याद करने पर एक प्रकार का सुख मिलता है। कहते हैं कि वन से लौट कर जब राम अयोध्या आ गये तो चित्रशाला में गये। वहां लोगों ने वनवास के जीवन के चित्र बना कर रखे थे। वे दुख के चित्र थे। कालिदास ने लिखा हैः

प्राप्तानि दुःखान्यपि दंडकेषु संचिन्त्यमानानि सुखान्यभूवन्।

यानि कि दंडक वन में उन्होंने जो दुख प्राप्त किये थे आज उन्हीं को देख कर सुख की अनुभूति हो रही है। आज ऐसे ही कुछ प्रसंग याद आ रहे हैं...

मैं चार पांच साल का रहा हूंगा। हल्की सी याद है। मैं घनघोर बीमार पड़ा था। बचने की आशा न थी। बायीं जांघ में अंदर ही अंदर एक फोड़ा हो गया था जो बाहर से दिखायी नहीं देता था। वह पक गया था। मेरा खाना पीना छूट गया। बहुत दर्द। गांव में क्या इलाज होता। जोंकें लगायी गयीं, उस छुपे हुए फोड़े से खून निकालने के लिए। फिर जर्रा को बुलाया गया। उसने फोड़ा काटा। आज भी बहुत लम्बे चीरे का निशान बना हुआ है और जोंकों के निशान भी हैं।

डूबने से जीवन में एक लाभ हुआ कि मैं तैरना सीख गया

दूसरी घटना तब की है जब मैं थोड़ा बड़ा हो गया था। हमारे गांव में एक तालाब था जिसे हम महदेवा कहते थे। एक बार मैं कुछ लोगों के साथ नहाने गया। नहाते नहाते अचानक ऐसा हुआ कि मैं डूबने लगा। जीवन में पहली बार हुआ था वह डूबने का अनुभव...। संयोग से किसी ने चोटी पकड़ कर मुझे खींच लिया था। वह हमारे साथ तैर रहे थे। उन्होंने देखा कि मैं दिखायी नहीं पड़ रहा हूं। मैं कई गोते खा चुका था तब तक, जब उन्होंने मुझे देखा और बाहर खींचा। डूबने से जीवन में एक लाभ हुआ कि मैं तैरना सीख गया। मेरे तैरने का प्रमाण त्रिलोचन जी हैं। हुआ यह था कि त्रिलोचन जी एक दिन बनारस में अपनी तैराकी की डींग हांक रहे थे। उसी रौ में उन्होंने कहा, ”मैंने तो बनारस की बाढ़ आयी गंगा तैर कर पार की है, चलो फिर पार करते हैं।“ जब हम दोनों तैरने लगे, तब पता चला कि त्रिलोचन जी कितने पानी में हैं। थोड़ी दूर तैरने के बाद वह लौटने लगे। मुझसे बोले, छोड़ो लौट चलो। पर मैं आगे बढ़ गया। आधी नदी पार करने के बाद पाया कि कहीं किनारा नहीं दिख रहा है। मेरी बाहें भरी और थकी हुई थीं। आगे बढ़ने की हिम्मत जवाब दे रही थी। उस समय मुझे लगा था कि बचपन में तो एक बार डूबने से बच गया था लेकिन आज सच में डूब जाऊंगा। कोई बचाने वाला नहीं होगा। दूर दूर तक कोई नाव भी नहीं दिखायी दे रही थी। लेकिन मैंने फिर हिम्मत जुटायी और न केवल अपने को बचाया, बल्कि गंगा पार की। शायद यह इसलिए कर सका कि मैं बी.ए. में पढ़ाई के दौरान नित्य गंगा स्नान करने जाता था और खूब तैरता था।

हमारी आर्थिक दशा

बचपन की एक घटना से हमारी आर्थिक दशा का अंदाजा लगेगा। रामलीला का मेला लगता था। हम सब लोग वहां पहुंचते थे। बहुत दिनों से मेरी इच्छा थी कि हनुमान चालीसा खरीदूं। शायद दो पैसे का मिलता रहा होगा उस जमाने में। पर वह भी नहीं था मेरे पास और मैं नहीं खरीद सका। पर मेरे चचेरे भाई जो उम्र में मुझसे बड़े थे, उन्होंने खरीद लिया था। वह भी प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। उनके कई साल फेल हो जाने के कारण वह और मैं एक ही क्लास में आ गये थे।

मैं और वह चचेरे भाई, और भी कई छात्र शाम को जब स्कूल से घर के लिए चलते तो रास्ते में एक बागीचा पड़ता था। ऐसी धारणा थी कि उस बागीचे में भूत प्रेत का डर था। लोक विश्वास था कि ‘भूत पिशाच निकट नहीं आवैं महावीर जब नाम सुनावैं।’ तो सब लोग भूत पिशाच से बचने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए चलते थे। मैं भी सात आठ लोगों की पूरी टीम में पीछे पीछे रहता था। मैं सबसे छोटा था। वे लोग जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर हनुमान चालीसा पढ़ते हुए चलते थे। इस प्रकरण से मुझे एक फायदा हुआ कि मुझे वह पूरा का पूरा याद हो गया। आज भी कोई कहे तो सुना सकता हूं।

संयोग था कि मैं बच गया

सन् 42 की एक घटना याद आ रही है। संयोग था कि मैं बच गया वर्ना गोली मुझे भी लग सकती थी। गांव से हम लोग तिरंगा झंडा फहराने गये थे। मेरे मिडिल स्कूल के सहपाठी मंहगू सिंह भी साथ थे जो पास के गांव के रहने वाले थे। वह बड़े उत्साही थे और आगे आगे चल रहे थे। आगे रघुनाथ सिंह थे जो पिता जी के मित्र विद्यार्थी जी के यहां कर्मचारी थे। तभी गोली चली। इसे क्या कहा जायेगा कि गोली मुझे नहीं लगी न विद्यार्थी जी को। झंडा फहराने वाले नेता विद्यार्थी जी छलांग मार कर उस पार चले गये और मैं गिर गया नीचे। गोली मंहगू को लग गयी। यह 16 अगस्त 1942 की बात है।


मृत्यु के निकट का क्षण

मृत्यु के क्षणों की स्मृति के सिलसिले में मुझे याद आता है कि मेरे अपेन्डिक्स के आपरेशन को छोड़ दिया जाय तो दिल्ली में दो बार बीमार पड़ा। एक बार तो डाक्टरों का कहना था कि यदि एक दिन की और देर होती तो न बचता। मस्तिष्क का मलेरिया हो गया था। काशी दिल्ली आये हुए थे, वही मुझे ले गये। डाक्टर ने बताया कि यह रोग एक खास तरह के मच्छरों के काटने से होता है। दिल्ली में तो ये होते नहीं, लाखों में एक आध पाये जाते हैं। कैसे हो गया आपको? सचमुच यह मेरे लिए मृत्यु के निकट का क्षण था। उसी तरह की अनुभूति मुझको 1997 में हुई। मुझे पहले बुरी तरह से तेज बुखार चढ़ा था। टी.बी. की बीमारी थी। गनीमत है कि यह तब हुई जब उसका इलाज सम्भव हो गया था। फिर भी लगभग साल भर के उतार चढ़ाव के बाद मैं ठीक हो सका। मुझे खुशी है कि इस बीमारी की सही सही जांच बनारस में ही हुई। बनारस मैं स्वास्थ्य लाभ के लिए गया था, इलाज के लिए नहीं। वहां काशी ने मुझे डाक्टर श्रीवास्तव को दिखलाया जो अब अवकाशप्राप्त हैं और अच्छे डाक्टर होने के साथ ही दार्शनिक भी हैं। दूसरे डाक्टर हैं एस.के. सिंह और मधुकर राय। इन तमाम डाक्टरों ने काशी की वजह से व्यक्तिगत रुचि ली। सुंदरलाल अस्पताल में भर्ती करा कर पूरी जांच करने के बाद दवा देनी शुरू की। दिल्ली में चिरंजीव विजय को चिन्ता हुई और वह मुझे बनारस से दिल्ली ले आये और मैं आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में भर्ती हुआ। यहां के डाक्टरों ने कहा कि बनारस में निदान सही हुआ है और दवा भी सही दी गयी है।

उपर्युक्त प्रसंगों का जिक्र मैंने इसलिए नहीं किया कि मैं सहानुभूति पाना चाहता हूं। ऐसा भी नहीं कि बीमारियों को लेकर मुझमें कोई अंधविश्वास है। मैं जन्मकुंडली, हस्तरेखा, ज्योतिष किसी में विश्वास नहीं करता और न मृत्युबोध का विलास पालने की कामना है मेरी। दरअसल बीमारियां मेरे लिए इसलिए ज्यादा दुखद हैं कि वे परनिर्भर बनाती हैं। और मुझे इस चीज से बड़ी कोफ्त होती है। यह मैं प्रसंगवश कह रहा हूं। दम्भ नहीं, कोई गर्व नहीं, कि मेरे आत्मविश्वास का आधार है यह कोफ्त।
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