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गर्दनें कटती रहें और क़ुरआन का अक्षर-अक्षर तड़पता रहा — शकील हसन शम्सी

जुल॰ 4, 2016

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गर्दनें कटती रहें और क़ुरआन का अक्षर-अक्षर तड़पता रहा

— शकील हसन शम्सी

Shakeel Hasan Shamsi Editor The Inquilab Urdu daily on Terror attack in Bangladesh 
शकील हसन शम्सी संपादक उर्दू दैनिक इंक़लाब   के संपादकीय का तहसीन मुनव्वर ने हिंदी अनुवाद किया है... आपके लिए ज़रूरी लगा इसलिए यहाँ शब्दांकन पर प्रकाशित कर रहा हूँ !

यह क़ुरआन पर हमला — मोज़ु-ए-गुफ़्तुगू — शकील हसन शम्सी

Photo released by Islamic State’s news agency Amaq showing the massacre inside Gulshan restaurant
हाथों में तलवारें, वातावरण में गूंजती बम की आवाज़ें, घायलों की कराहें, महिलाओं की आहें, फर्श पर पड़ी लाशें और आतंकवादियों की घृणित शक्लें । इन सबके बीच किसी से कहा जाए कि वह क़ुरआन की आयतें सुनाए तो जिसे क़ुरआन याद हो शायद यह भी भूल जाएं और खाली-खाली आंखों से आकाश को तकता रहे। ऐसा ही कुछ हुआ बांग्लादेश में इशरत अखोंड (Ishrat Akhond, fondly called "Nila") नाम की महिला फैशन डिजाइनर के साथ, वह ढाका के रेस्तरां पर हमला करने वाले आतंकवादियों के सामने क़ुरआन की एक आयत की तिलावत नहीं कर सकी तो बेरहमी से उसकी गर्दन काट दी गई। जब एक मुस्लिम लड़की आतंकवादियों को क़ुरआन न सुना सकी तो वहां मौजूद गैर मुस्लिम भला कैसे क़ुरआन सुना सकते थे ? इसलिए गर्दनें कटती रहें और क़ुरआन का अक्षर-अक्षर तड़पता रहा। क़ुरआन का एक एक शब्द बुलंद आवाज़ में कहता रहा है कि अल्लाह ने मुझे बनी मानव जाती के कल्याण के लिए जमीन पर उतारा है। मैं मनुष्य के लिए मौत नहीं जीवन का संदेश लाया हूं, मगर तथाकथित इस्लामी खिलाफत का सिंहासन इंसानों की लाशों पर रखकर दुनिया पर राज करने की इच्छा करने वाले दरिंदों को क़ुरआन की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी। अगर सुनाई पड़तीं तो आज इस दुनिया का भला यह हाल होता? यदि आतंकवादियों ने क़ुरआन की ही बात सुनी होती तो क्या आज मुस्लिम देश खंडहर में तब्दील होते? यदि तथाकथित इस्लामी खिलाफत की स्थापना के लिए निकलने वाले आतंकियों ने क़ुरआन को समझ कर पढ़ा होता तो क्या आज करोड़ों मुसलमान शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर होते?

Shakeel Hasan Shamsi Editor The Inquilab
शकील हसन शम्सी
बांग्लादेश की घटना का विवरण देखा तो पता चला कि हत्यारों के इस गिरोह ने रेस्तरां में नारा ए तकबीर (अल्लाह हो अकबर ) लगा कर प्रवेश किया और उस के बाद विदेशियों तथा ऐसे लोगों की धारदार हथियारों से हत्या करना शुरू दी जो क़ुरआन की कोई आयत सुना नहीं सके। इस हरकत से पता चलता है कि इस बार दहशतगरदों के निशाने मुसलमानों की पवित्र किताब थी। वह किताब जिस के शब्द-शब्द में मानवता का दर्द भरा है, वह महान किताब जिस ने एक इंसान की हत्या को पूरी मानवता की हत्या के बराबर ठहराया है। मगर आज जिन्होंने इस्लाम को बदनाम करने का ठेका लिया है वह दुनिया को यही बताना चाहते हैं कि इस्लाम जल्लादों, हत्यारों, राक्षसों और आतंकवादियों का धर्म है। समझ में नहीं आता कि बांग्लादेश में मज़लूमों और मजबूर बंधकों को क़ुरआन की आयतों की तिलावत करने पर बाध्य क्यों किया गया? जब मस्जिदों में यही आतंकवादी विस्फोट करते हैं तो क्या वहाँ क़ुरआन पढ़ने का परीक्षण लेते हैं? जब बगदाद, इस्तांबुल, दमिश्क, काबुल और कराची में आतंकवादी मुसलमानों को निशाना बनाते हैं तो वहाँ क्यों नहीं यह लोगों से कहते कि क़ुरआन का कोई अंश सुनाओ तो तुम्हें छोड़ देंगे? मस्जिदों में जो लोग शहीद किए जाते हैं उनका अपराध तो यही होता है कि वह क़ुरआन की तिलावत (पाठ) करते हैं । इसलिए मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि यह हमला निहत्थे इंसानों पर नहीं क़ुरआन की शिक्षाओं पर है। आतंकवादी अपने इस उद्देश्य में सफल हो गए कि सारी दुनिया के अखबारों में कुरान पढ़वा कर हत्या करने की खबर छपे और क़ुरआन बदनाम हो।

तहसीन मुनव्वर , Tehseen Munawer
ध्यान रहे कि पिछले कई महीनों से बांग्लादेश को एक बड़ी कत्ल गाह में बदलने की कोशिश चल रही है। धर्मनिरपेक्ष मुसलमानों, ब्लॉगर्स , उग्रवाद का विरोध करने वाले पत्रकारों और हिंदू पुजारियों को मारने की घटनाएं वहां लगातार हो रही हैं। इन हमलों की जिम्मेदारी आई एस आई एस की ओर से ली रही थी लेकिन बांग्लादेश के अधिकारी अपने देश में आईएस की मौजूदगी से इनकार करते आ रहे हैं। शुक्रवार और गुरुवार मध्य रात्रि में होने वाली घटना का जिम्मेदार उन्होंने स्थानीय आतंकवादी दल जमाअत उल मुजाहिदीन को करार दिया है। हालाँकि इस हमले के चार घंटे के अंदर ही आई एस आई एस की समाचार एजेंसी अमक ने हमले में मारे गए लोगों और आतंकवादियों की तस्वीरों के साथ इस घटना की जिम्मेदारी ली थी। हमारा मानना है की आई एस आई एस इस घटना में लिप्त हो या न हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आई एस आई एस एक संगठन नहीं एक विचारधारा का नाम है और जितने भी आतंकवादी संगठन हैं वह उग्र विचार धारा के मामले में एक डाल के आम हैं। चिंता की बात यह है कि बांग्लादेश जो अब तक टारगेट किलिंग के मामलों को रोकने की कोशिश में लगा था अब बड़े आतंक वादी हमलों की चपेट में आ गया है। इस बड़े हमले के बाद इस बात की संभावना बढ़ गई है कि आतंकवादी बांग्लादेश का वही हाल करेंगे जो पाकिस्तान का तालिबान, जैश मोहम्मद, सिपाहे सहाबा, लश्करे झंगवी और लश्कर तैयबा ने किया है।

उर्दू से हिंदी अनुवाद तहसीन मुनव्वर
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