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गर्व से कहो हम लिबरल हैं! — #सागरिका_घोष @sagarikaghose

जून 6, 2017

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Illustration: Chad Crowe (TOI)

सिन्दूर, चमेली और गेंदाफूल, संस्कृति से सराबोर तुम्हारी आस्था जीवन का आनंद है

Sagarika Ghosh's TOI Blog : Translation - Bharat  Tiwari


आप के ऊपर न तो कभी किसी धार्मिक-पुलिस ने शासन किया है और न ही ख़ुद को हिन्दू जताने के लिए आपको किसी राजनैतिक पार्टी का सहारा लेना पड़ा। 





डियर लिबरल हिन्दुओं,

आप अपनी आवाज़ के दबा दिये जाने के बावजूद भी हैं । आप ये जानते हैं आज आपको कितनी बुरी तरह से गलत समझा जा रहा है। वो भयावह आवाज़ें जो आपकी बात कहने का दावा कर रही हैं, वो धार्मिक-युद्ध का आह्वान-सा करते लोग जिन्होंने “हिन्दू” पर कब्ज़ा किया हुआ है, आप इन सबसे ख़ुद को जोड़ नहीं पाते।

कभी सर नहीं चढ़ने वाला, ईश्वर के प्रति आपका विश्वास बहुत निजी, आत्मिक और हमेशा बना रहता है। आप भजन, कीर्तन, क़व्वाली और क्रिसमस कैरोल सब गाते रहे हैं और कबाब खाते समय आपको कुछ सोचना  नहीं पड़ा है। आप के ऊपर न तो कभी किसी धार्मिक-पुलिस ने शासन किया है और न ही ख़ुद को हिन्दू जताने के लिए आपको किसी राजनैतिक पार्टी का सहारा लेना पड़ा।

कृष्ण, गणपति, सरस्वती — क्या नफ़रत और रोष हैं ?

आपसे घृणा करने को कहा जा रहा है जबकि आपका धर्म प्यार करना सिखाता है

अचानक आपको शाकाहारी… मुसलमान-से-घृणा-रखने-वाले ‘सब एक जैसे कट्टर’ की तरह बना दिये जाने वाली मशीन में डाला जा रहा है। आपसे घृणा करने को कहा जा रहा है जबकि आपका धर्म प्यार करना सिखाता है। वाद, विवाद और संवाद की परम्परा से आये, आपको सवाल उठाने से मना किया जा रहा है। हमेशा क्रोधित रहने को कहा जा रहा है जबकि आपके भगवान प्रसन्नचित्त और सबसे प्रेम रखने वाले हैं। कृष्ण, गणपति, सरस्वती — क्या नफ़रत और रोष हैं ? महात्मा की तरह, एक सच्चे-हिन्दू की पहचान बाकी बातों को छोड़, दूसरों के प्रति उसकी उदारता है।

तरक्क़ीसमझ हिन्दुओं तुम्हारा धर्म तो हमेशा से एक ऐसा जिंदादिल-मिलनसार-धर्म रहा है, जिसमें रची-बसी पारिवारिक लोककथाओं के किस्से, भगवान का ऐसा रूप दिखाती हैं कि वे परिवार के सदस्य बन जाते हैं। हां, जाति और अंधविश्वास ने भीषण अन्याय किया लेकिन हिन्दू धर्म के भीतर से ही ऐसे महानतम समाज सुधारक भी आये हैं जिन्होंने इन बुराईयों से टक्कर ली है : फुले और राममोहन रॉय, विवेकानंद और टैगोर।



तरक्क़ीसमझ हिन्दुओं, आप इस नए, गुस्सैल धर्म को नहीं पहचानते। आप पहचानें भी तो कैसे? आप विरासत हैं —  कबीर और मीरा की,कृष्ण, चैतन्य और रामकृष्ण की और आप जानते हैं कि हिन्दूधर्मं ने सदैव विविधता और अनेकता का खुले दिल से स्वागत किया है।

कब आध्यात्मिकता का झरना न-ख़त्म होने वाली ऍफ़आईआरों का झरना बना

सिन्दूर, चमेली और गेंदाफूल, संस्कृति से सराबोर तुम्हारी आस्था जीवन का आनंद है : इन्द्रियों के लिए पर्व और आत्मा के लिए चन्दनलेप ! तो कब ये कलात्मक आनंदमय धर्म उस बलदल में बदला — जो अपमान, राजद्रोह, ईश निंदा, पुनः-धर्म-परिवर्तन, लव जिहाद पर रोष और गाय के नाम पर खून बहाने लगा? और कब भला आपकी आस्था वह सिद्धांत बना, जिसमें डराना शामिल है, जिसमें भीड़ को तबाही किये जाने की स्वीकृति मिलती हो? कब आध्यात्मिकता का झरना न-ख़त्म होने वाली ऍफ़आईआरों का झरना बना ?

आप विरासत हैं —  कबीर और मीरा की,कृष्ण, चैतन्य और रामकृष्ण की और आप जानते हैं कि हिन्दूधर्मं ने सदैव विविधता और अनेकता का खुले दिल से स्वागत किया है। 

तुम हैरान हो स्तंभित हो कि दुनिया हिन्दू धर्म के बारे में तब क्या सोचेगी जो अगर इसका चेहरा सिर्फ ये गौ-रक्षक ही रह जायेंगे

तरक्क़ीसमझ हिन्दुओं, आप इस नए, गुस्सैल धर्म को नहीं पहचानते। आप पहचानें भी तो कैसे? आप विरासत हैं —  कबीर और मीरा की,कृष्ण, चैतन्य और रामकृष्ण की और आप जानते हैं कि हिन्दूधर्मं ने सदैव विविधता और अनेकता का खुले दिल से स्वागत किया है। दादरी में मो० अखलाक़ या अलवर में पहलु खान की हत्या करने वाले... प्रेमियों, फिल्म निर्देशकों, मांस खाने वालों, कलाकारों या लेखकों या बुद्धिवादियों पर हमले करने वाले – क्या वो सच में उस धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो धर्म व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपनी आध्यात्मिकता के मूल में रखता है? नहीं लिबरल हिन्दुओं नहीं, तुम्हे उन्हें देख कर आघात पहुँचता है जो तुम्हारे नाम पर खून करते हैं। तुम हैरान हो स्तंभित हो कि दुनिया हिन्दू धर्म के बारे में तब क्या सोचेगी जो अगर इसका चेहरा सिर्फ ये गौ-रक्षक ही रह जायेंगे।

हिन्दू धर्म में ईश्वर तक पहुँचाने वाले हर रास्ते को जायज़ माना जाता है

हिन्दू धर्म मोक्ष के व्यक्तिगत-लक्ष्य होने की आस्था है : साधक निजी तप से अपना मार्ग तलाश करता है। हिन्दू धर्म को कभी धर्मांतरण की ज़रुरत क्यों नहीं हुई? क्योंकि हिन्दू धर्म में ईश्वर तक पहुँचाने वाले हर रास्ते को जायज़ माना जाता है, हिन्दू धर्म सब का सम्मान करता है। जैसे श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं : “जतो मत ततो पथ”...“जितने अधिक मत होंगे, उतने ही अधिक रास्ते होंगे”।



कुम्भ मेले में आपके और सूरज और नदी के सम्बन्ध के बीच कोई पुजारी नहीं होता।

उपनिषद भगवान की बात नहीं करते हैं

इसलिए ऐसा कोई कारण नहीं कि एक सच्चा हिन्दू भयभीत या धमकाया-गया महसूस करे। क्योंकि आप एक नास्तिक भी हो सकते हैं और साथ ही साथ एक हिंदू भी । उपनिषद भगवान की बात नहीं करते हैं। कुम्भ मेले में आपके और सूरज और नदी के सम्बन्ध के बीच कोई पुजारी नहीं होता। यह आश्चर्य की बात नहीं... कि हिंदू धर्म राजनीतिक सत्ता पर कब्जा नहीं करना चाहता था। ऐसे धर्म के लिए तलवार चलाने का कोई कारण ही नहीं... हिन्दूधर्म अपनी विशाल-अनिश्चितता और विविधता के कारण अजेय था। हिन्दू तलवार उठाएगा तो किसके लिए? शैव मार्गी के लिए ?  वैष्णव मार्गी के लिए ? तांत्रिक के लिए ? संसार पर शासन किसी का भी रहा हो, चाहे मुगलों का या अंग्रेजों का... हिन्दू धर्म हमेशा अविनाशी रहा है। ये बचा है और हमेशा रहेगा। इसे कभी डर लगा ही नहीं क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र तो भीतर है।

आज ये नए हिन्दुत्ववादी, भारत में उन्हीं विपत्तियों को दोहराना चाह रहे हैं — जो ईसाईयों और मुस्लिम समाजों पर पड़ीं

कट्टरपंथियों के हाथों हो रहा हिंदू धर्म का राजनीतिकरण, हिंदू धर्म की अनोखी अनूठी अनमोल शक्ति को ख़त्म कर रहा है

मगर आज हिंदुत्व के वकील राजनैतिक शक्ति की चाह रहे हैं और अपनी इस चाहत में वो हिन्दू धर्म की उस आन्तरिकता के रेशम को नष्ट कर रहे हैं जो उसका कवच रही है। ईसाईयों ने राज्य को चर्च अलग करने के लिए सदियों संघर्ष किया। इस्लाम की दुनिया उन धर्मगुरुओं से घिरी रही है जो हर बात की वैधता के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हैं। और आज ये नए हिन्दुत्ववादी, भारत में उन्हीं विपत्तियों को दोहराना चाह रहे हैं — जो ईसाईयों और मुस्लिम समाजों पर पड़ीं, जब उन्हें अपने ईश को राजनीतिक-सरदारों से मुक्ति दिलाने के लिए ख़ूनी युद्ध करने पड़े। विडंबना यह है कि इन कट्टरपंथियों के हाथों हो रहा हिंदू धर्म का राजनीतिकरण, हिंदू धर्म की अनोखी अनूठी अनमोल शक्ति को ख़त्म कर रहा है।

लिबरल हिन्दुओं को अपना घोषणापत्र बना कर उसे जीना होगा

लिबरल हिंदुओं यह समय है अपने धर्म को वापस पाने का है। यही वक़्त है जब लिबरल हिन्दुओं को अपना घोषणापत्र बना कर उसे जीना होगा।  यह समझे कि किसी खास जगह पर राममंदिर निर्माण से कहीं ज्यादा जरूरी हिंदू धर्म की विरासत को बचाना है। और क्यों नहीं? हिंदू धर्म में भगवान, हर हिंदू के घर में पूजा के कमरे में रहते हैं। गर्व से कहो हम लिबरल हैं...



देवताओं के एक समूह के प्रति सारे समाज की धार्मिक वफादारी बनाने का प्रयास, पूजा करने के खास तरीके पर जोर देना, एक जैसा खाना खाने की खिलाने की बात करना, एक अकेली नस्ल, एक अकेली भाषा, एक अकेला मंदिर यह सब आपके उन पूर्वजों के विश्वास का तिरस्कार है जो अनेक विविधताओं के बीच एक साथ आनंद से रहते थे। तरक्क़ीसमझ हिंदुओं अब समय आ गया है कि आप दिखाएं —  कि हिंदू धर्म में मारपीट, पुलिस कम्प्लेंट और सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा के अलावा भी —  बहुत कुछ है। क्या यह बात गलत है कि हिंदू पीढ़ियों से अजान की आवाज सुनते आ रहे हैं और वह इससे उन्हें कभी डर नहीं महसूस हुआ। अब खड़े होइए और बताइए कि आप उस धर्म का हिस्सा है जिससे कभी सारा संसार... बड़े-बड़े विद्वानों से लेकर हिप्पी और बीटल्स प्यार करते रहे हैं ! और बताइए कि आप इस तरह, ओछी राजनीति के हाथों इसे नष्ट होने नहीं देंगे! लिबरल हिंदुओं आपका समय शुरू होता है ... अब !

(सागरिका घोष के ब्लॉग "Manifesto for a liberal Hindu – It’s time for secular Hindus to say: Garv se kaho hum liberal hain" का हिंदी अनुवाद - भरत तिवारी)
सागरिका घोष के  इस अनुवाद का कॉपीराइट www.shabdankan.com के पास है।  कृपया बिना अनुमति किसी भी प्रकार का प्रकाशन अथवा प्रसारण न करें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस अनुवाद में व्यक्त किए गए विचार सागरिका घोष के निजी विचार हैं. इस अनुवाद में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति अनुवादक उत्तरदायी नहीं है. इस अनुवाद में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस अनुवाद में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार अनुवादक के नहीं हैं, तथा अनुवादक उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००

टिप्पणियां

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (08-06-2017) को
    "सच के साथ परेशानी है" (चर्चा अंक-2642)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    जवाब देंहटाएं

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