काल के कपाल पर धमाल ~ रघुवंश मणि


नेटवर्क फेल हो जायेगा, विश करोगे कब

~ रघुवंश मणि 

इस गैरलेखक और गैरविचारक दौर में सोचिये तो बहुत से भय लगे रहते हैं, जिनकी चर्चा में लग जाने पर अनागत वर्ष भी पुराना पड़ जायेगा. इतना पुराना कि यह लेख भी अप्रासंगिक हो जाए. फिर भी एक भय की चर्चा कर लेना अनुचित नहीं लगता. वह भय है नेटवर्क के फ़ेल हो जाने का. 

समय के बारे में बहुत से चिंतकों ने गंभीरतापूर्वक विचार किया है और पाया है कि इसका कोई आदि, मध्य या अवसान नहीं होता. मगर हम इसे अपनी ख़ुशफ़हमी में नापते चलते हैं. ये बीता, वो बीता. ये साल गया, वो साल आया. अब तो हम इस बात पर झगड़ने भी लगे हैं कि हमारा नपना कैसा होना चाहिए. हिन्दू नपना, या क्रिस्तान नपना, या फिर मुसलमान नपना. हुआ कुछ ऐसा है कि हमारी हर बात का नपना धार्मिक होने लगा है. राजनीति, संस्कृति, इतिहास सब नपने धार्मिक ही धार्मिक. हिन्दू साल या क्रिस्तान साल. फिर नापने के सवाल पर पूरब-पश्चिम का भी नजरिया है. ये पूर्वी है, वो पश्चिमी है. मजे की बात यह है कि ये सारी लंगूरी उछल-कूद उन लोगों ने ज्यादा मचा रखी है जो वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा में अटल विश्वास रखते हैं. फिलहाल जब समय को काल्पनिक नपने से ही नापना है, तो फिर कोई भी नपना हो, फर्क क्या पड़ता है?

रघुवंश मणि raghuvanshmani@yahoo.co.in



लेकिन हमारा दौर कुछ बदल गया है और अब वह पहले जैसी बात नहीं रही. यह भावनाओं के आहत होने का समय है. कुछ लोगों का दावा है कि इस तरह की नपने वाली बातों से उनकी भावनाएँ आहत होती हैं, और अपनी भावनाओं की सुरक्षा के लिए वे दूसरे के जान-माल का खतरा हो सकते हैं. तो अब इसका क्या किया जा सकता है? भावनाएं हैं तो आहत भी होंगी. भावनाओं का गुण है आहत होना. उदाहरण के लिए हमारे एक मुदर्रिस मित्र ने बड़ी कठिनाई और शौक से एक कार खरीदी, तो उससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हो गयीं और उन्होंने उसका शीशा तोड़ डाला. मुझे लगता है कि हमारे समाज में बहुत से लोगों की भावनाएं ऐसी शीशे जैसी कमजोर होती हैं कि उसे जरा सा भी खरोंच लगे तो वे दूसरे का सिर फोड़ देते हैं. इसलिए यह नया वर्ष २०१८ भय और खतरों से परिपूर्ण है. हमारे समझदार और सम्मान्य पाठकों को यह बताना जरूरी नहीं कि इस तरह के भय लिखते समय सबसे ज्यादा सताते हैं. यह लेखकों और विचारकों का दौर नहीं है. “जिसके हाथ में होगी लाठी...”.

इस गैरलेखक और गैरविचारक दौर में सोचिये तो बहुत से भय लगे रहते हैं, जिनकी चर्चा में लग जाने पर अनागत वर्ष भी पुराना पड़ जायेगा. इतना पुराना कि यह लेख भी अप्रासंगिक हो जाए. फिर भी एक भय की चर्चा कर लेना अनुचित नहीं लगता. वह भय है नेटवर्क के फ़ेल हो जाने का. नए वर्ष पर यह भय बहुत सताता है. हमारा समय तकनीक का है और हमारा सारा काम इसी पर निर्भर होता है. हमारी नित्य-क्रियाएँ भी आज के दौर में तकनीकी हो गयी हैं. अब अगर नए साल जैसे इम्पोर्टेन्ट वक्त पर नेटवर्क असफल हो जाए, तो आप ही बताइए कि क्या होगा? आप अपने किसी भी मित्र को न तो फेसबुक पर बधाई दे पाएंगे और न व्हाट्सएप पर. फिर जनता और मित्रों के लिए पहुँचने वाला नववर्ष सन्देश भी समय से नहीं पहुँच सकेगा. ऐसी स्थिति में आपको अपने, अपने मोबाइल और कंप्यूटर के निरर्थक होने का बोध हो सकता है, और यह बोध जीवन के निरर्थक हो जाने जैसा है.



मेरे मित्र चिंतानिधान जी अक्सर इस विषय पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए विचार करते रहते हैं. एक बार उन्होंने कोहरे के बीच बड़ी ही विपरीत परिस्थितियों में दुकान पर चाय पीते हुए अपने मित्र मिस्टर विलबी से अपने विचार व्यक्त किये थे. उनका यह मानना था कि हमारे देश की टेलीफोन कम्पनियाँ जान बूझ कर अंग्रेजी साल के अंत में ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देती है जिससे लोग घोर निराशा का शिकार हो जाते है. लेकिन उनके मित्र मिस्टर विलबी ने उनकी बात काटते हुए इसे एक व्यापारिक और व्यावसायिक चालाकी बताया था. हो सकता है कि बात इतनी टेढ़ी न हो और मामला सिर्फ और सिर्फ महाजाल पर अधिक आवाजाही के चलते पैदा हुए जाम का परिणाम हो. कुछ भी हो यह समस्या है तो बहुत बड़ी.

लेकिन कहते हैं कि जहाँ चाह है, वहां राह भी है. महाजाल मित्रों ने इस बड़ी समस्या के लिए रास्ता निकाल ही लिया है. अब मित्रगण हफ़्तों पहले आसन्न नये साल की शुभकामनायें भेज देते हैं. मेरे एक मित्र ने हिंदी के एक प्रसिद्ध दोहे को सुधारते हुए अपने सन्देश को मुझ तक प्रक्षेपित किया है. सम्मान्य पाठकों से इसे शेयर करने में मुझे कोई बुराई नहीं लगती :

काल करे सो आज कर आज करे सो अब.
नेटवर्क फेल हो जायेगा, विश करोगे कब..

यह वक्त ही है जो हमें दूरन्देश बनता है और हम अपनी छोटी-मोटी समस्याओं का हल निकल ही लेते हैं. जो समस्याएँ हमें कठिन लगती है, उन पर हम कुछ न कर पायें तो खिस्स से हँस देते हैं. इसी तरह से हम अपनी ज़िन्दगी से धीरे-धीरे निपटते जाते हैं और ज़िन्दगी भी हमसे निपटती रहती है. या बेहतर होगा कि हम यूँ कहें कि वह हमें धीरे-धीरे निपटाती जाती है. और एक दिन सब कुछ निपट ही जाता है. फिर हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत के सारे वर्ष यहीं छूट जाते है. हिन्दू, मुसलमान और क्रिस्तान का मामला भी सन्नाटे में बदल जाता है. हम आने वाली पीढ़ियों के हवाले यह लड़ाई छोड़ जाते हैं कि भैय्या अब तुम लड़ो. हम तो मरे खपे अब तुम भी जारी रक्खो. गंभीरतापूर्वक विचार करें तो यह मामला मनुष्य के मिटटी में और इतिहास के दर्शन में परिवर्तित हो जाने का विषय है. शायद समय को समझने का एक तरीका यह भी है.

अरे भाई! मैं भी कहाँ फंस गया. ये फिलासफी है ही ऐसी चीज़. ये शुरू कहीं से भी हो, मौत पर ही जाकर ख़त्म होती है. अभी तो हम जिंदा हैं तो मौत के बारे में क्यों सोचें? अभी तो काफी कुछ बाकी है. अभी तो हम काफी सरफुटौवल कर सकते हैं. गालीगलौज और मारामारी के लिए काफी समय है. आगजनी, हत्याएं, लूटपाट, नोच-खसोट और क्या-क्या कुछ बाकी है? यह सब न होगा तो अखबार वाले क्या छापेंगे, समाचार चैनलों का धंधा कैसे चलेगा? इस बेचारी ज़िन्दगी का क्या होगा? यह तो एकदम बेरंग हो जाएगी. अभी से मौत के बारे में क्या सोचना?

तो मित्रों!!!! नया साल सभी को बहुत-बहुत मुबारक हो! शुभकामनाएँ! हम ऐसे ही साथ-साथ धकियाते-मुकियते चलते रहें! बहुत-बहुत बधाइयाँ!





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(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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