एक से पांच कविता: दोपहर तीन बजे - प्रकाश के रे


Hindi Poems

- Prakash K Ray





एक:

आँखों से बही थी कविता 
सर्वप्रथम 
क़स्बे के अख़बार के आख़िरी अंक में 
बतौर संपादकीय छपी थी  
अंतिम कविता
शास्त्रों ने उस दिन से सतयुग का आरंभ माना है 






दो:

गर्म होती धरा 
और परिवर्तित होते जलवायु के 
इस घोर कलयुग में 
दस्तावेज़ बने कार्बन फूटप्रिंट्स के 
खेती से लेकर उद्योग तक 
सिगरेट से शराब तक 
सबसे उत्सर्जित होते कार्बन का हिसाब लगाया गया 
किसी ने दर्ज़ नहीं किया 
कविताई से पैदा हुए कार्बन का 
तब भी नहीं जब कवितायें रह गयीं 
महज कार्बन कॉपियाँ 
आह! अवहेलने! 










तीन:

छपती रहीं कवितायें 
जमती रहीं गोष्ठियाँ 
पढ़ा किसने 
सुना किसने 
इसकी सूचना हालिया जनगणना के आँकड़ों में नहीं है 
नेशनल सैंपल सर्वे में भी यह नहीं बताया गया
कि एक दशक में रचित कविताओं की कुल संख्या क्या है 
ऐसे में बजट में कवियों के लिए आवंटन कर पाना 
वित्त मंत्री के लिए बहुत कठिन था 





चार:

बेचारे कवि 
सदैव की भाँति पुनः 
निशाने पर
कोई नहीं टोकता 
ज्ञान व व्याख्यान के ड्रोनीय हमलों को
टिप्पणीकारों के टिड्डी-दल को
गद्य के गदाधारियों को

कवि, तू रच
कर भच भच
झूठ या सच
नच नच नच 
लच लच लच 
पच अपच सुपच







पाँच:

किसी ने नहीं कहा 
कि यह पेंटिंग इस या उस भाषा की है 
भाषा के आधार पर चिन्हित नहीं किया गया 
संगीत की स्वर-लहरियों को भी 
हिंदी कविता को भी नोबेल पुरस्कार मिल सकता था 
अगर वह हिंदी में नहीं होती 
तरुण से अनंत तक विजय की लालसा हद में दम तोड़ देती है


- प्रकाश के रे


सभी फोटोग्राफ्स: भरत तिवारी

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