'विवेक’ और ‘अंतःकरण’ चालाकीपूर्ण शब्द बन गए हैं — प्रो. राजेंद्र कुमार - #Shabdankan

'विवेक’ और ‘अंतःकरण’ चालाकीपूर्ण शब्द बन गए हैं — प्रो. राजेंद्र कुमार

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अमिताभ राय को उनकी आलोचना पुस्तक ‘सभ्यता की यात्रा : अंधेरे में’ के लिए तेईसवां देवीशंकर अवस्थी सम्मान-2017 

— पुखराज जाँगिड़





युवा आलोचक अमिताभ राय को उनकी आलोचना पुस्तक ‘सभ्यता की यात्रा : अंधेरे में’ के लिए तेईसवें देवीशंकर अवस्थी सम्मान-2017 से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान 5 अप्रैल 2018 को साहित्य अकादेमी सभागार (नयी दिल्ली) में आयोजित तेईसवें देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य द्वारा प्रदान किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें प्रतीक चिह्न, प्रशस्ति पत्र व ग्यारह हजार रुपये की राशि प्रदान की गयी।

 क्योंकर ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुता’ के विचार को लेकर आगे बढ़ने वाला यूरोपीय समाज अंततः दुनिया का सबसे बड़ा शोषक, आततायी, साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी समाज निकला? — अच्युतानंद मिश्र

प्रसिद्ध आलोचक देवीशंकर अवस्थी (5 अप्रैल 1930 से 13 जनवरी 1966) की स्मृति में उनके जन्मदिवस पर सन् 1995 से प्रतिवर्ष दिया जाने वाला यह प्रतिष्ठित सम्मान हिंदी में साहित्यिक आलोचना की संस्कृति के विकास के लिए किसी एक युवा आलोचक उसकी श्रेष्ठतम आलोचना कृति के लिए दिया जाता है। इस बार की निर्णायक मंडली के सदस्य सर्वश्री अशोक वाजपेयी, नंदकिशोर आचार्य, राजेंद्र कुमारकमलेश अवस्थी थे। निर्णायकों के प्रशस्ति वाचन में प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि आलोचनात्मक विवेक से पूर्ण अमिताभ राय की पुस्तक की हिंदी में एक ही कविता के पाठ पर केंद्रित आलोचना का श्रेष्ठ उदाहरण है, जो मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता को सभ्यता मूलक दस्तावेज के रूप में देखने-समझने की कोशिश करती है।



देवीशंकर अवस्थी सम्मान की संस्थापक व नियामिका डॉ. कमलेश अवस्थी ने बताया कि अब तक यह सम्मान क्रमश: सर्वश्री मदन सोनी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, विजय कुमार, सुरेश शर्मा, शंभुनाथ, वीरेन्द्र यादव, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी, अरविन्द त्रिपाठी, कृष्णमोहन, अनिल त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, प्रणयकृष्ण, प्रमिला के.पी., संजीव कुमार, जितेन्द्र श्रीवास्तव, प्रियम अंकित, विनोद तिवारी, जीतेन्द्र गुप्ता, वैभव सिंह और पंकज पाराशर को मिल चुका है।



कार्यक्रम की शुरूआत रेखा अवस्थी द्वारा संपादित और वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘देवीशंकर अवस्थी रचनावली’ के लोकार्पण से हुई। लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी और अशोक वाजपेयी ने किया। इस अवसर विश्वनाथ त्रिपाठी ने देवीशंकर अवस्थी से संबद्ध संस्मरण साझा करते हुए कहा कि वे बहुत तैयारी में थे, लेकिन सारे काम अधर में छोड़ गए, जिन्हें कमलेश अवस्थी ने सहेजा और आज वो एक समृद्ध रचनावली के रूप में हमारे सामने हैं। अशोक वाजपेयी ने कहा कि देवीशंकर अवस्थी के आलोचकीय आलोक का सबसे बड़ा देय हिंदी प्रदेश में नागरिक आलोचना समाज के निर्माण की कोशिश है। रचनावली-संपादक रेखा अवस्थी ने ‘क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!’ के रूपक में संस्मरणात्मक ढंग से रचनावली की रूपरेखा पर अपनी बात रखी और वाणी प्रकाशन के स्वत्वाधिकारी अरुण माहेश्वरी ने रचनावली के प्रकाशन संबंधी अपने अनुभव साझे किए तथा संपादकों और अवस्थी परिवार को धन्यवाद ज्ञापित किया।




पुरस्कार-अर्पण के बाद ‘आलोचना का अंतरःकरण’ विषयक विचारगोष्ठी आरंभ हुई, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य ने की व वक्ताओं के रूप में युवा साहित्यकार अच्युतानंद मिश्र व वरिष्ठ आलोचक प्रो. राजेंद्र यादव ने शिरकत की। विचारगोष्ठी की शुरुआत पुरस्कृत आलोचक अमिताभ राय के वक्तव्य से हुई, जिसमें उन्होंने आलोचना को नैतिकता बोध से जोड़ते हुए उसे इंसान की बुनियादी प्रवृत्ति के रूप में चिह्नित किया, जो आज खतरे हैं। जिस तरह हर बड़ी रचना अपने समय की सबसे बड़ी आलोचना होती है उसी तरह आलोचना भी।



मौजूदा समाज में लगातार क्षीण होते आलोचनात्मक विवेक पर दुख प्रकट करते हुए युवा साहित्यकार अच्युतानंद मिश्र ने कि पश्चिमी समाज द्वारा आरोपित तकनीकी तार्किकता के कारण हमारा सामाजिक संस्पर्श और मानवीय विवेक तक खतरे में है और हम उसे समझा पाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं और बचाव में खुद ही पर निगरानी किए जा रहे हैं। भोथरे होते आलोचनात्मक अंतःकरण के ही कारण हम अपने नवजागरण तक को सही से मूल्यांकित नहीं कर पा रहे हैं कि क्योंकर ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुता’ के विचार को लेकर आगे बढ़ने वाला यूरोपीय समाज अंततः दुनिया का सबसे बड़ा शोषक, आततायी, साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी समाज निकला?



विचार गोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि ‘विवेक’ और ‘अंतःकरण’ चालाकीपूर्ण शब्द बन गए हैं। अगर दोनों को सकारात्मक अर्थ में लिया जाए तो इनके संगत निर्वाह से ही बेहतर आलोचना सामने आती है। आलोचना के अंतःकरण की पहचान के लिए उन्होंने रचना के अंतःकरण, रचनाकार के अंतःकरण व आलोचक के अंतःकरण की पहचान के तीन स्तरों की बात कही। इसके अभाव में आज की आलोचना हमें यह नहीं समझा पाती कि रचना हमें क्या सौंपना चाहती है?


विचारगोष्ठी के अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य ने देवीशंकर अवस्थी रचनावली के लिए हिंदी समाज को बधाई देते हुए कहा कि ‘आलोचना का अंतःकरण’ मूलतः नैतिक संवेदन है, जो साहित्य अंतर्मन की समझ व पहचान निर्मित करता है। उन्होंने ‘रामायण’ के अहल्या-प्रसंग व ‘महाभारत’ के द्रोपदी-प्रसंग, ‘त्यागपत्र’ के मृणाल-प्रसंग व कई अन्य पश्चिमी रचनाओं के प्रसंग के माध्यम से ‘शास्त्रगत नैतिकता’ व ‘लोकाचारगत नैतिकता’ में तमाम रचनाकारों ने अपने ‘आलोचनात्मक अंतःकरण’ के ही कारण ‘लोकाचारगत नैतिकता’ को तरजीह दी। इसलिए आलोचना अपने अंतःकरण को विस्मृत करने की कोशिशों से बचते हुए जीवन की अनुभूति से पैदा होने वाले साहित्य के भीतर प्रवेश करके उसके नजरिए को सामने रखना चाहिए। आज की आलोचना ऐसा करने से बच रही है, इसलिए उन्होंने आलोचना की ज्ञान-मीमांसा को फिर से निर्मित और व्याख्यायित करने पर जोर दिया।



समारोह में देश भर से समारोह में पधारे साहित्यानुरागी अतिथियों और साहित्यकारों का स्वागत अवस्थी परिवार ने किया और कार्यक्रम का संचालन देवीशंकर अवस्थी सम्मान से सम्मानित युवा आलोचक डॉ. संजीव कुमार ने किया।


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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (09-04-2018) को ) "अस्तित्व बचाना है" (चर्चा अंक-2935) पर होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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