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सदानंद शाही की पंद्रह कवितायेँ

अप्रैल 12, 2018

'शब्दों का अर्थ बदलने का समय' व अन्य कवितायेँ

— प्रो० सदानंद शाही

यह शब्दों के अर्थ बदलने का समय है
यह शब्दों के सिकुड़ने का समय है
यह शब्दों के बिगड़ने का समय है
यह शब्दों के कुण्ठित होते जाने   का समय है

यह असभ्य को भक्त कहे जाने का समय है
यह कुटिल को भगवान कहे जाने का समय है।



क्या करे कोई 

उन आदतों का क्या करे कोई
जो बिना सोचे समझे
महज
किसी दोपहर
या शाम की गवाही पर
पड़ जाती हैं
और कभी नहीं जातीं।



मैं सोचना चाहता हूं

मैं सोचना चाहता हूं
पर
सोचने से डरता हूं

कहीं सोचना मुश्किल में न डाल दे
यही सोचता रहता  हूँ
मेरे चिकित्सक ने भी कहा है
सोचना मुनासिब नहीं है
स्वास्थ्य के लिए

अब मुश्किल यह है कि
जिस बात की मनाही हो जाती है
वही करने का जी होता है
चीनी मना हो
तो मिठाई खाने का दिल करे
नमक मना हो तो
नमकीन
बीबी बच्चों की नजर बचाकर
थोड़ा बहुत हाथ साफ कर ही देता है आदमी

आज मेरा मन सोचने का कर रहा है
तो भाई डॉक्टर जी
रोक सकें
तो रोक लीजिए
मैं आज सोच  रहा हूँ।



अभाव की आदत

आदत कोई ऐसी शै नहीं
जो फकत एक दो मुलाकातों में पड़ जाये
या
एक दो बिगडैल शामों में उतर आये

  जैसे उर्दू जुबां
  आते आते आती है
  वैसे ही आदतें
  पड़ते पड़ते पड़ती हैं

फिर
कैसे कोई  दोपहर
या कि शाम
टिक जाती है तमाम उम्र

और बाकी की दुपहरिया
और शामें
  लिख दी जाती हैं
  महज किसी अनुपस्थिति के नाम


धीरे धीरे
  अभाव की आदत पड़ जाती है।



एक शिवरात्रि इस तरह भी मनाएं

शिवरात्रि
शिव और पार्वती के विवाह की वर्षगाँठ

उसी महादेव की
  जिसने बिना आगा-पीछा सोचे
  महागरल का पान कर लिया था
  हालाहल की ज्वाला से
  मानवता की रक्षा की
तब से हम
महादेव की आराधना करते हैं
अपनी कामनाओं का जल चढाते रहते हैं रातदिन
दूध से नहलाने
और आशीर्वाद पाने के लिए लाइन में लगे रहते हैं
चढाते रहते हैं
  बिल्वपत्र
  भांग और धतूर
  चंदन और अक्षत
  और भी बहुत कुछ

भोला भण्डारी
भी
हमारी भक्ति पर रीझ कर
करते रहते हैं हमारा मंगल
  वे इसीलिए शिव हैं कि
  शिवत्व की रक्षा करते हैं
  और करते रहते हैं शिवेतर की क्षति

देवों के देव महादेव के
विवाह की वर्षगांठ
पर
हम उन्हें बधाई दें
हर्षोल्लास मनाएं
पर एक दिन उन्हें निश्चिंत छोड़ दे

  माना कि उन्हें गंगाजल प्रिय है
  माना कि उन्हें दूध में नहाना प्रिय है
  माना कि उन्हें भांग की मस्ती जँचती है
  माना कि धतूरे के फल उनकी मस्ती को बढा देते हैं
  माना कि मंदार के फूल उन्हें सोहते हैं

पर मेरे भाई
इन अति प्रिय वस्तुओं का
आनन्द उठाने के लिए भी
  थोडी फुरसत चाहिए

कम से कम आज उन्हें फुरसत दे दें
  गंगा से ही गंगा जल
  मन्दार
  धतूर
  बिल्वपत्र
  जहां के तहां रहें
  वहीं के वहीं
  समर्पित कर दें
  महादेव को

अपने स्वार्थों का हालाहल विष
संभाल लें अपने पास
कर लेने दें अपने देवाधिदेव को विश्राम
सिर्फ एक दिन।



गॉधी की हँसी

वह तीन  अक्टूबर की सुबह थी
अभी सैर के लिए
निकले ही थे
कि मिल गये  गॉंधी जी
बीकानेर के नगर निगम पार्क में

मैं गॉंधी से नजरें चुराकर
निकल जाना चाहता था
कि कहीं पूछ न बैठें-
  ‘गोड्से की प्रतिमा क्यों लगवायी
     ऐन दो अक्टूबर के दिन’
फिर मैं क्या जवाब दूंगा ?

बचते-बचाते  मैं निकल ही रहा था
कि गॉंधी की हँसी सुनाई पड़ी
  अरे ,भाई सदानन्द !
  आओ!
  कहो कैसे हो?
    आनन्द तो है !
पूछते हुए गॉंधी मुस्कराये

'नमस्ते  बापू  ! कैसे हैं आप?'
  कहकर उनका मन टटोलना चाहा

'ठीक हूँ यार'
  कहते हुए  वे  फिर हँसे

गाँधी की हँसी सुनकर
जैसे मन का बोझ उतर गया
   दोबारा नमस्ते कर
   मैं आगे बढ गया।




कविता से माफी

हे मेरी कविता!
मुझे माफ कर देना

मैं तुम्हें बस कागज की नाव पर बैठा कर
छोड़ आया हूँ महासागर में
बिल्कुल निहत्था

कि
ज़रा अरब सागर की लहरों का हालचाल ले लेना
वहां इतना हाहाकार
क्यों है

कि
देख लेना प्रशान्त महासागर का मादक संगीत
कैसे
थम सा गया है

हिन्द महासागर में गिरने वाली नदियों का
चीत्कार भी सुन लेना

थोड़ा  समय निकालकर
मिल लेना गंगा से
सुना है
आजकल आस्थमा से परीशान है

यमुना से मिलना
तो पूछ लेना
उसके टायफायड का हाल

और जब यह सब कर लेना
तो एक उपकार और करना
मेरे घर की ओर बहने वाली नदी
सदानीरा की उदासी का सबब भी
जान  लेना

इस तरह
दुनिया भर की समस्याएं
देश के भीतर की उठापटक
यहां तक कि दफ्तर की फंसाहटें
गाँव जवार की झंझटें
सब तुम्हें सौंप कर
निश्चिन्त हो गया हूँ

जब देखो तब
तुमहीन से करने लगता हूँ
समय का रोना गाना

हे मेरी कविता!
मुझे माफ कर देना

मैं तुम्हें कागज की नाव पर बैठा कर
छोड़ आया हूँ
महासागर में
बिल्कुल निहत्था।




आँय बाँय साँय 

आवाजें आवाजें आवाजें
गूँज रही हैं
आवाजें

आँय बाँय साँय
साँय बाँय आँय
बाँय आँय साँय
साँय  आँय बाँय
बाँय साँय आँय
आँय साँय बाँय

आवाजें आवाजें आवाजें
गूँज रही हैं
आवाजें

बाँय बाँय बाँय
बाँय बाँय बाँय
बाँय बाँय बाँय

भाँय भाँय भाँय
भाँय भाँय भाँय
भाँय भाँय भाँय

आवाजें आवाजें आवाजें
गूँज रही हैं
आवाजें


साँय साँय साँय
साँय साँय साँय
साँय साँय साँय

आवाजें आवाजें आवाजें
गूँज रही हैं
आवाजें

आँय आँय आँय
आँय आँय आँय
आँय आँय आँय
आँ आँ आँ आँ य य य ...........!



दाल में तिनका 

चौंकिए नहीं
मुहावरे शीर्षासन सीख रहे हैं

मुहाविरे नये अवतार में
प्रकट हो रहे हैं


दाल में कुछ काला है!
दाल में काला क्या है?
दाल में काला क्यों है?

अरे! दाल पीली होगी
तो
उसमें काला होगा ही
जैसे दाढी होगी
तो
उसमें तिनका होगा ही।

दाढी और तिनके का सम्बन्ध
चोली और दामन का है
दाढी किसी की हो
तिनके फँसेंगे ही
दाढी अपना काम करेगी
तिनके  अपना काम करेंगे

दाढी में फँसे तिनके
अचानक दाल  में आ गिरेंगे
वे  दाल को स्वास्थ्य के लिए
और  बुध्दि को मनुष्य के लिए
हानिकारक बताएँगे

दाल में काला नहीं
तिनका  है
तिनके में दाढी है

चिन्ता केवल दाल की न करें
दाढी भी चिन्ता का विषय हो सकती है !



भाई जगन्नाथ

जमाने भर से होड़
लगी  रहती है
भाई जगन्नाथ की
अपने जाने
दुनिया के सबसे समझदार आदमी हैं
भाई जगन्नाथ !

मौका बे मौका हुरपेटते रहते हैं
भाई जगन्नाथ !
हर इस उस को
हर कोई मूर्ख है
हर कोई जाहिल है
हर कोई गावदू है
हर कोई काहिल  है

"फलाने जी मास्टर हो गइले
जोगाड़ रहे हो गइलें
कलट्टर हो गइलें  त का भइल
कलट्टर भइले से दिमाग ना नू हो जाई"
जैसे जुमले उछालते
रहते हैं
भाई जगन्नाथ!

जिन्दगी से रातदिन
ठनी रहती है
भाई जगन्नाथ की

लगे रहते हैं जुगाड़ में
कि लग जाय गांव के घर पर पल्ला
कि कस जाय एक मोटरसाइकिल
कि एक फेरा घूम आएँ
सभी रिश्तेदारों नातेदारों  के घर
साले सब जान जाय
कि भाई जगन्नाथ भी
क्या चीज हैं?

कोठी है, अटारी है
नोकरी है, चाकरी है
बीबी है बच्चे हैं
होय सालों के
लेकिन
असल बात है
कि भाई जगन्नाथ ही सच्चे हैं
बाकी सब कच्चे हैं

सच बात यह  है कि
सांझ  को
मछरी हो
कलिया हो
मुर्गा हो
ह्विस्की हो
रम हो
ठर्रा हो
सूरजलाल उदित हों
भा
अस्त हों
भाई जगन्नाथ मस्त हों

मस्ती है तो हस्ती है
बाकी चिरकुटई है

चवन्नी हो, अठन्नी हो
दसटकिया
सौटकिया हो
असल चीज मस्ती है
बाकी सब बोगस है।

आँख की रोशनी गई
भले से
विकलांग सर्टिफिटिक
तो बन गया
बस है, ट्रेन है
दिल्ली है
बम्मई है
गोवा है
कानपुर, बनारस, मोतिहारी है

फैजाबाद में अखिलेश
बनारस मे शाही हैं
तिनसुकिया में बीबी का भाई है
उसकी अकसरूवा भौजाई है

तो भाई जगन्नाथ
यहां से वहां
अउर
वहां से यहाँ को आते हैं
जाते हैं
चहक कर मिलते है
मिलकर चहकते हैं
दू चार गो बोटी
दू चार चुरूवा दारू
भर बहकते हैं
कुल मिलाकर
मस्त रहते हैं
भाई जगन्नाथ

अबकी
बहुत दिनों पर मिले हैं
भाई जगन्नाथ

ठन गई है
कैन्सर से
पहिले तो लगा कि भारी है
दूर की तैयारी है
लेकिन अब ठीक है
कहते हैं भाई जगन्नाथ!

पीजीआई है
हर दो दिन पर सेकाई है
दुबई में बेटा है
कानपुर में जमीन है
किराये का घर है
छत है, दुआर है
ऑगन है
अभी-अभी
मोटरसाइकिल कसाई है
मोतिहारी छपरा सब घूम आए हैं
भाई जगन्नाथ!

एक बार फिर से  जाने की तैयारी है
बताते हुए चहकते  हैं
भाई जगन्नाथ!

'अइलS त बड़ा  नीक लागल
मुर्गा कटवाई
कि
मछरी मँगवाईं

नाही त पकौडिए बनि रहल बा
खालS त जा'
कह कर चहकते हैं
भाई जगन्नाथ!

तबीयत कैसी है
पूछने पर पते  की बात
धीरे से कान में कहते हैं
भाई जगन्नाथ!

'है मरदे हमके कैन्सर न इखे भइल
हमही हो गइल बानी कैन्सर के'
कहकर ठहकते हैं
भाई जगन्नाथ!



पत्थर  का दुख 

दलदल से बचने के लिए
मेरे ऊपर आ खड़े होते हैं
लोग
और  सूखते ही
चहकते हुये चले जाते हैं

न दुआ, न सलाम
न शुक्रिया, न खुदा हाफ़िज़

जैसे कि
मैं  निरा पत्थर होऊँ।



हासिल  


समय का पहिया चलता रहता है
मुट्ठियों से रेत सरकती जाती है
बुलबुले उठकर विलीन हो जाते हैं
लमहा दर लमहा बीत जाता है

पल
पल भर में बदल जाता है
फिर भी
कुछ लमहे कुछ पल
आते हैं
और ठहर जाते हैं

आखिर में जब हम करते हैं
हिसाब-किताब
तब
यही कुछ पल
यही कुछ लमहे
हासिल निकलते हैं ।



मिलना राजेश उपाध्याय का 


कहाँ गुमान था कि       
लखनऊ में मिल जाएंगे राजेश उपाध्याय
इस तरह अचानक
बिना किसी योजना के

खबर तो कल रात ही मिल गई थी
कि लखनऊ में ही हैं राजेश उपाध्याय
लेकिन भेंट हो पाई सुबह
थोडी देर रहे साथ-साथ।

कभी हमने
देखा था दुनिया बदलने का सपना
साथ-साथ
हम होंगे कामयाब एक दिन
गाया था साथ -साथ
इस रौ में कितनी यात्राएं कीं
कितने पोस्टर लगाये
कितने नारों को
जीवन में उतारने की कोशिश की
साथ-साथ
कितनी कहानियाँ साझा की
कितनी कहानियों के बन गए पात्र
कितनी बार  हम घायल हुए
और जीवित बचे
साथ-साथ

कितनी पत्रिकाएँ निकाली
कितनी किताबों के स्टाल लगाए
कितनी तकरीरें दी
साथ-साथ
दुनिया बदली जरूर
पर
वैसे  नहीं बदली
जैसा  हमने चाहा था

अलबत्ता हम ही कुछ कुछ बदल गये
छिटक गये यहाँ वहाँ
कोई दिल्ली
कोई बनारस
कोई बाराबंकी
कोई इलाहाबाद चला गया
कोई कोई बस गया गोरखपुर में

अलग अलग दुनिया में रहते हैं सबलोग
अलग अलग कमाते हैं
खाते हैं
बच्चों को खिलाते हैं
जिलाते हैं

ऐसे ही कभी कभी
अकस्मात
मिल जाते हैं
पुराने दिनों को बतियाते हैं
दुनिया को बदलने का  सपना फिर से
फन काढने लगता है
कुछ योजनाएं बनाते हैं
साथ-साथ

इसी तरह हम मिले  इस बार भी
काफी पी
कुछ राजनीति बतियाए
कुछ सपने गुनगुनाए
कुछ अधूरी हसरतों की मर्सिया लिखी
फिर मुलाकात के
इस पल को
यादगार बनाने के लिए
धूमधाम से
सेल्फी खींची
और निकल गये
अलग दिशाओं में
अनबदली दुनिया से
तालमेल बिठाने
साथ-साथ ।



झुलसा देने वाली इस दुपहरिया में 


मुझे मालूम था
कि कोई नहीं आने वाला
इलाहाबाद की इस  झुलसा देने वाली दुपहरिया में

फिर भी करता रहा इन्तजार
अकेले बैठा
काफी पीता रहा

काफी हाऊस  भी
काफी हाऊस जैसा नहीं  था
वैसे इलाहाबाद ही कहाँ इलाहाबाद जैसा था

मुश्किल था
सिविल लाइन में
सिविल लाइन को खोज पाना
वैसे ही जैसे  संगम में
सरस्वती को खोज पाना

वैसे तो
सरस्वती को खोज पाना ही
मुश्किल है

बहरहाल
मैं यहाँ सरस्वती की खोज में नहीं आया
मै तो इलाहाबाद के एक रेस्टोरेंट में बैठा
किसी के आने का  इन्तजार कर रहा हूँ

यह जानते हुए भी कि
इस झुलसा देने वाली दोपहरी में
कोई  नही आने वाला

फिर भी
मन के कोने में उम्मीद बची है
कि कहीं कोई हिलोर उठे
और बस यों ही
कोई चला आये
इस झुलसा देने वाली  दुपहरिया में।



कितना अद्भुत है 


कितना अद्भुत है
कितना विस्मयकारी
कि
सारी दुनिया जीत लेने के बाद भी
आप अपने जूते
औेर दिमाग के नाप  से
बाहर
नहीं निकल सकते।


प्रोफेसर सदानन्द शाही 

       हिन्दी के शैक्षणिक एवं साहित्यिक जगत् में प्रो० सदानन्द शाही का नाम अपनी मौलिक प्रतिभा की रचनात्मकता एवं क्रियाशीलता के लिए जाना जाता है। उन्होंने एक प्रोफेसर-शिक्षक, लेखक, संपादक, चिंतक एवं प्रशासक के रूप में जो कीर्ति अर्जित की है, वह उनकी निरंतर जागरूकता एवं अभ्युदयशील कर्मठता तथा बहुमुखी प्रतिभा का प्रतिफल है।
       कविता और समीक्षा के लिए पहले से ही विख्यात प्रो० शाही ने ‘कर्मभूमि’, ‘साखी’ एवं ‘भोजपुरी जनपद’ का संपादन करके हिन्दी और भोजपुरी की समकालीन साहित्यिक-वैचारिकी में प्रभावशाली योगदान किया है। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक हिन्दी-विभाग की गौरवशाली आचार्य परंपरा को अपने शोध, अध्यापन एवं शोध निर्देशन के द्वारा और समृद्ध किया है।
       भारतीय समाज की बहुभाषिकता को परिप्रेक्ष्य में रखकर हिंदी की विशिष्टता को समझने-समझाने की ईमानदार कोशिश प्रो० शाही ने हमेशा की है और इसी का परिणाम हुआ कि उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने भोजपुरी अध्ययन केन्द्र का संस्थापक-संयोजक नियुक्त किया। 
       काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन केन्द्र के सह समन्वयक पद पर रहते हुए (2008-2010) उन्होंने स्त्री अध्ययन के विषेष पाठ्यक्रम का विकास किया। प्रो० शाही के शैक्षणिक विचारों का उत्स महामना मदन मोहन मालवीय और स्वामी विवेकानन्द का शैक्षिक चिंतन है। इसे आधार बनाकर उन्होंने स्त्री शिक्षा के प्रसार हेतु कुशीनगर जैसे पिछडे़ जनपद में एक महिला महाविद्यालय की स्थापना भी की है।
       डॉ० शाही ने जर्मनी के हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के ‘साउथ एशियन इंस्टिट्यूट में’ डाड फेलो के रूप में अपनी शैक्षणिक गतिविधियों को अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार दिया। तूरिनो विश्वविद्यालय (इटली) के छात्रों-छात्राओें के बीच हिन्दी-शिक्षण का कार्य उल्लेखनीय है।  भोजपुरी भाषा और साहित्य की अप्रतिम सेवा के लिए मारीशस सरकार की ओर से वहाँ के राष्ट्रपति ने प्रो० शाही को विश्व भोजपुरी सम्मान 2014 से सम्मानित किया। भोजपुरी और हिन्दी कविता मेँ योगदान के लिए प्रो शाही को शब्दम 2017 से सम्मानित किया गया। 
       आधुनिक दौर में जब हिन्दी के पारदेशीय प्रसार के एक नये क्षितिज का उन्मेष हुआ है, प्रो० शाही ने हिन्दी की अन्तरराष्ट्रीय पटकथा में अपनी ओर से कुछ महत्वपूर्ण पन्ने जोड़ने का साहस किया है।

संपर्क:
प्रोफेसर ,हिन्दी विभाग 
काशी हिन्दू विश्व विद्यालय 
वाराणसी -221005

फोन: 0542-2322498
09616393771 / 09450091420

ईमेल: sadanandshahi@gmail.com



(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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