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अनुकृति की कहानी "मीरा"

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जावेद मुस्कुराए। “ठीक है। चलो तुम्हें खाना खिलाता हूँ। साथ में जी भर कर तुम मुझे ताने खिला देना। ” मीरा हिचकिचाई। शायद मनु फ़ोन करे। उसे बाल भी धोने हैं, सुबह धोने-सुखाने का समय नहीं मिलता। जावेद तब तक एक छोटे से रेस्तराँ के सामने रुक गए। “ ‘साइज’ पर मत जाओ, ग्यूसिप्पी’ का रेस्त्रां है, ऐसा लज़ीज़ खाना बनाते हैं मियाँ-बीवी। ‘रोमानो’ टमाटर और ‘इटालियन बेज़िल’ इटली के अपने गाँव से मँगवाते हैं। ” उन्होंने द्वार पर आए कैप्टेन को दो अँगुलियाँ दिखाईं। छोटे, नीची छत वाले कमरे के एक कोने में उन्हें बिठाकर कैप्टेन ‘मैन्यू’ ले आया। “तुम तो शायद शाकाहारी हो?” मीरा ने सर हिलाया। “ ‘पास्ता’ ? यहाँ का ‘एरेबियाटा बहुत स्वाद होता है। या तुम ‘पेस्तो’ पसंद करोगी? और ‘एंटीपास्तो’?’

सोचने पर ही अहसास हो जाता है कि भाषा हिंदी को कैसा लगता होगा जब उसमे स्नातकोत्तर, विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान और स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले इंसान का, एम.बी.ए करने के बाद जब वित्त जगत् में प्रवेश हो और वह उसे भूल जाए... 

और फ़िर एक रोज़ वापस आये...  

अनुकृति, वह हैं जिनकी गुज़ारिश हिंदी को रहती है. और वह वापस आयी हैं तो, कितनी अच्छी बात है कि हिंदी के लिए कहानी साथ लिखकर लायीं हैं और एक अच्छी बात यह है कि कहानी भी अच्छी है... बधाई!

भरत तिवारी




मीरा

— अनुकृति 


मीरा ने कमरे के द्वार पर आ दोनों ओर झाँका। गलियारे में कोई नहीं था। घर-बाहर के सब लोग जहाँ-तहाँ सो रहे थे। मीरा ने ‘टैम्पून’ की नन्ही ‘ट्यूब’ को हथेली में छुपाया और हाथ को साड़ी के पल्ले से ढाँप लिया। मन-ही-मन ‘टैम्पून’ के आविष्कारक को धन्यवाद देती वह धीरे से गलियारे में निकल आई और दूसरे छोर पर बने गुसलखाने की ओर बढ़ी। यदि यह छोटी-सी कपास और कृत्रिम ‘फाइबर’ की बनी, घनी सोखने वाली नली नहीं होती तो मेहमानों से भरे घर में यह छुपाना मुश्किल होता कि वह महावारी से है। फिर छूत-अछूत का झमेला, रसोई और पूजा घर से बाहर और अपनी अकर्मण्यता के कारण पर कनफुसकियाँ, शादी के दो सालों में भी दो ही रहने पर टिप्पणियाँ। ताई जी और मौसी जी ने तो उसके लौटने के अगले दिन ही कहा था, दोनों इतनी दूर रहोगे तो कैसे चलेगा? परिवार बढ़ाओ, बहू, घर में ख़ुशी आए, सबके आँसू रुकें।

जब मीरा ने इंजीनियरिंग में पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया था तो घर के लोग ही नहीं, नाते रिश्तेदार, दूर पार के सगोती तक बधाई देने आए थे। लेकिन साथ ही दबी ज़ुबान में सलाह दे गए थे, ब्याह करो छोरी का, हाथ से न निकल जाए। कॉलिज में चयन के लिए कंपनियों में से सबसे अग्रगामी तकनीकी कंपनी ने उसे चुना तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ था। लेकिन जब उसने न्यूयॉर्क के बजाए कंपनी के छोटे-से दिल्ली वाले दफ़्तर में काम करना चुना तो उसके सहपाठी कुलमुलाए थे। “ ‘वॉट क्रेज़ीनैस’ मीरा”, कॉलेज के ‘प्लेसमेंट’ निदेशक गुस्साए “क्या बेवकूफ़ी कर रही हो। न्यूयॉर्क में ‘टैक डिवेलपमेंट’ के बजाए दिल्ली में फुटकर किस्म का काम। इससे अच्छा होता कि तुम इस कंपनी के ‘इंटरव्यू’ में जाती ही नहीं, किसी और को मौक़ा मिलता। ” मीरा ने चुपचाप सुन लिया था, नहीं कहा था कि कानपुर से दिल्ली जाने के लिए ही उसे कितनी दलीलें देनी पड़ी थीं। दिल्ली में अकेली कैसे रहेगी छोरी, आए दिन दुर्घटनाएँ होती हैं, जवान लड़की के सौ दुश्मन। परिवार में सबकी कुछ-न-कुछ राय थी। मम्मी-पापा ने अलबत्ता उसका पक्ष लिया था, दिल्ली ही जा रही है विदेश नहीं, कानपुर से दिल्ली कौन दूर है, आती-जाती रहेगी, कोई-न-कोई बना रहेगा उसके पास। लेकिन उसके लिए रिश्ता खोजने की सरगर्मी उन्होंने बढ़ा दी थी। मनु का रिश्ता आने पर उनकी ख़ुशी बेहिसाब थी। आगरा का परिवार, पढ़ा-लिखा सुलझा हुआ लड़का दिल्ली में बैंक में, एतराज़ का सवाल ही कहाँ उठता था। उन्हें नौकरी वाली ही चाहिए, पापा ने कहा था, आज-कल दो जनें कमाएँ तभी बरकत है, बहनें थोड़ी तेज़ हैं लेकिन लड़का समझदार है, पढाई-लिखाई की कद्र समझेगा। यह कि मीरा को नौकरी करते पूरा साल भी नहीं हुआ, कि एक-दो मुलाक़ातों में अपरिचय दूर नहीं होता, कि अभी वह कुछ और जानना चाहती है, समझना चाहती है, ये सब बेकार के चोंचले थे और इन व्यर्थ की बातों से जिंदगी नहीं चलती थी।

शादी के बाद मीरा मनु के वसंत कुंज वाले फ़्लैट में आ गई थी। गुड़गाँव का उसका मकान जो उसने नौकरी के शुरूआती दिनों में चाव में सजाया था, छोड़ना पड़ा था। दफ़्तर से दूरी बढ़ गई थी। सप्ताह भर की भाग-दौड़ के बाद सप्ताहांत पर अक्सर आगरा जाना होता। भरे-पूरे परिवार में ऐसा ही होता है, मम्मी थकान से निढाल मीरा को कहतीं, कुछ न कुछ लगा रहता है तो मन अच्छा रहता है। गाड़ी से आते-जाते हैं, दो-तीन घंटे का तो रास्ता है, मनु कहता, लोग तो इतना अप-डाउन रोज़ करते हैं। दोनों जनें अकेले करोगे भी क्या, मीरा के ससुर कहते, अभी तुम लोग आ जाओ, हमारा पोता आ जाएगा तब हम आ जाएँगे। इस सब के बीच उसने काम पर ध्यान केंद्रित कैसे रखा वह ही जानती है । एक दिन उसके बॉस ने बुलाया था। "छ महीनों का ‘स्पेशल प्रोजेक्ट’ है न्यूयोर्क में। ‘ टैक डिवेलपमेंट’। ‘वैरी एक्साएटिंग’। तुम्हारा नाम दे दिया है। ‘यूल फाइंड इट रिवार्डिंग’। " कई दिन तक मीरा ने मनु को नहीं बताया। जब बताया तो मनु की भौंहें चढ़ गईं थीं। “छः महीनों के लिए कैसे जाओगी, मीरा? यहाँ ‘जॉब’ एक बात है, ‘यू.एस.’ जाना दूसरी। ‘वी हैव फ़ैमिली टू प्लान’। ”

“जुलाई से सितंबर तुम्हारा ‘बिज़ी सीज़न’ होता है, ‘बिजनेस ट्रिप्स’ बहुत होते हैं, छः महीने ऐसे ही निकल जाएँगे। ”

“उस समय साल भर के ‘टार्गेट्स’ ‘मीट’ करने का दबाव रहता है और उसी समय खाली घर में आओ और अकेले खाना गर्म करके खाओ... ‘एनी वे’ दो नावों में सवारी नहीं कर सकती तुम। ”

मीरा ने अपने बॉस से बात की थी। “ ‘वन ऑफ़ अ काइंड’ है ये मौका, मीरा। मुझे तो अपनी टीम से तुम्हें ‘स्पेयर’ करने में मुश्किल ही होगी लेकिन मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा हूँ। एक बार जावेद से बात करो, वह ‘लीड’ कर रहा है यह प्रोजेक्ट। ” जावेद कंपनी भर में सबसे अग्रगामी तकनीकों और नवीनतर समाधानों पर अपने काम के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी ‘इनोवेशन टीम’ में चुने हुए तकनीकज्ञ थे। “देखो मीरा, यह ‘स्ट्रैच प्रोजेक्ट’ है। जटिल और बेहद दिलचस्प। मैं अपनी ‘इन टीम’ के बाहर से सिर्फ तीन लोगों को इस पर काम करने के लिए आमंत्रित कर रहा हूँ। ‘सिक्स मंथ्स ऑफ़ कमिटमेंट, कन्विक्शन एंड क्रिएटिविटी’ । सोच लो। ” मीरा ने दिन भर सोचा था।

“आज ‘प्रोजेक्ट लीडर’ से ‘कॉल’ था। पूरी ‘इंडस्ट्री’ में ‘फ़ेमस’ हैं अपने काम के लिए। " शाम को खाने की मेज़ पर मनु की थाली में गर्म रोटी परोसते हुए उसने बात उठाई थी। "बहुत जबरदस्त ‘थीम’ है, घरेलू ‘गैजेट्स’ में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ का ‘इन्टेन्सिव’ प्रयोग। ” मनु का मुँह बन गया। ”सुनो तो सही, एकदम ‘साइंस फ़िक्शन’ है, घर के उपकरण अपनी 'प्रोग्रामिंग' को खुद-ब-खुद ‘मोडिफ़ाए’ करें, समय, मौसम, वातावरण और दूसरे ‘पैरामीटर्स’ के अनुसार। बहुत ‘एक्साइटिंग’ है। ”

“इन बातों का क्या फ़ायदा मीरा? हम इस बारे में बात कर चुके हैं। आधे साल के लिए यू.एस. जाना संभव नहीं है तुम्हारा। ”

“लेकिन आधे साल के लिए नहीं जाना है, सिर्फ तीन महीने के ‘इनीसिएशन वर्क’ के लिए। फिर यहीं दिल्ली से काम कर सकती हूँ। ‘प्रोजेक्ट लीड’ मान गए हैं। ” मीरा ने जल्दी से कहा।

“खाना खाओ। सोचते हैं। ” मनु ने पानी का घूँट लिया।

रात बिस्तर में मनु ने मीरा का नज़दीक खींचा था। मनु की छाती पर हथेलियाँ रख कर मीरा उठंग हो गई थी। “ ‘इट मीन्स ए लॉट टू मी’ मनु। बड़ा मौका है मेरे लिए। ”

“तीन महीने तीन महीने होते हैं मीरा। ”

“ज्यादा नहीं हैं, और हो सकता है पिछले साल की तरह तुम्हारी ‘मार्केटिंग ट्रिप’ हो यू.एस. में। हम छुट्टी ले सकते हैं। प्रोजेक्ट के बाद...”

“अंहs..” मनु की उँगलियाँ मीरा की नाइटी के बटनों से उलझने लगीं थीं।

“मैं कल हाँ कह दूँ? सचमुच समय का पता नहीं चलेगा...”

“ठीक है। मूड मत बिगाड़ो, मीरा। ‘कम हियर’। ” मनु ने भारी गले से कहा था। उसके हाथ मीरा की देह को मसलने लगे और उसका शरीर एक परिचित लय में डोलने लगा था। मीरा मन-ही-मन स्वीकार की ‘ईमेल’ का प्रारूप बनाने लगी। एक बार प्रोजेक्ट पर काम करने लगे, तीन महीने के बाद का तब देखा जाएगा। क्या पता जावेद वाक़ई उसे दिल्ली से काम करने देने के लिए राज़ी हो जाएँ या मनु ही एतराज़ ना करे...

मैनहैटन में एक पुराने ‘ब्राउनस्टोन’ में मीरा और फिलीपीन्स के दफ़्तर से आई नीना के लिए फ़्लैट का प्रबंध किया गया था। नीना, मीरा और टिम वैंग को छोड़ कर प्रोजेक्ट दल के बाक़ी सभी सदस्य जावेद की ‘इनोवेशन टीम’ से थे, लेकिन टिम न्यूयॉर्क का ही बाशिंदा था और नीना के साथ उसका ‘बॉय-फ्रैंड’ आया था टूरिस्ट वीजा पर। मीरा ने ज़रूरत भर का न्यूयॉर्क अकेले ही संधाना । पहले ही दिन उसने घर से दफ़्तर और सुपर मार्केट का रास्ता फ़ोन के जी। पी। एस। में दर्ज़ कर दिया। एवन्यू और स्ट्रीट के ज्यामीतीय सुनियोजन से वह प्रभावित हुई और हडसन के चौड़े, नील प्रवाह और सैंट्रल पार्क के हरे विस्तारों से भी। जुलाई के धूप-करारे नीले दिनों में, असंख्य काँच-खिडकियों में चिलकता और नियोन बत्तियों में रात जगाता न्यूयॉर्क उसे भाया, शोर, गुंजार और चमत्कृत करने वाली रंग-बिरंगी भीड़ समेत। वह अक्सर दफ़्तर पैदल आती-जाती। नीना और उसका मँगेतर दफ़्तर के बाद इकट्ठे बाहर जाते, कभी बार तो कभी कोई रेस्तरां या सिनेमा। एकाध बार उन्होंने और दफ़्तर के दूसरे सहकर्मियों ने साथ बाहर जाने का प्रस्ताव रखा किंतु मीरा को अकेले घर में लौटना, टी। वी। पर कोई हिंदी या अंग्रेज़ी पिक्चर देखते या किताब पढ़ते हुए दूध-कार्नफ्लेक्स या सैंडविच खाना ज़्यादा आरामदेह लगता। उसे अच्छा लगता कि देर तक ऑफ़िस में काम करने के बाद जब लौटती तब से लेकर सुबह तक के सारे घंटे उसके अपने होते। मनु दिल्ली में दफ़्तर जाते समय गाड़ी में से फोन करता, बीते दिन के ब्यौरे, परिवार, दोस्तों के हालचाल, नौकरानियों के निकम्मेपन के बारे में बताता। टी। वी। पार आँखें गड़ाए मीरा सुनती रहती और बीच-बीच में हुंकारा भर देती। “चलो, दफ़्तर पहुँच गया। कल फ़ोन करूँगा। ‘मिस यू’। ” मनु कहता। मीरा दुहरा देती। फिर फ़ोन रख, झटपट दाँत साफ़ कर बिस्तर में घुस जाती। सोने से पहले वह अपने सहज, एकल जीवन पर एक आश्चर्य भरी दृष्टि डालती। अक्सर नीना और उसके मँगेतर के प्यार करने की आवाजें उसकी नींद में छेद करती मगर वह करवट बदल, कान पर तकिया रख सो रहती। कमरे की खिड़कियों पर लगे ‘ब्लैक आउट’ परदों के पहरे में अँधेरा गहरा होता और उसी अनुपात में उसकी नींद भी।

जब तीन हफ़्ते पहले आधी रात फ़ोन की घंटी बजी तो मीरा कुँए-सी नींद से यत्न से उबरी। “मीरा... मम्मी बीमार हैं... बहुत ज़्यादा बीमार, समझ नहीं आ रहा क्या करूँ...” मनु के शब्द अंत में एक लम्बी साँस में बदल गए। मीरा पलँग के सिरहाने की टेक लगा कर बैठ गई। लैंप की रोशनी से निंदासी आँखों को बचाते हुए घड़ी देखी। रात का एक बज रहा था। “तुम सुन रही हो, मीरा?”

“हाँ मनु। क्या हुआ अचानक? मम्मी से कुछ दिन पहले ही तो बात हुई थी। ” मम्मी ने हाजमे के पुराने मर्ज़ का ज़िक्र किया था, उसके लौटने की तारीख़ के बारे में पूछा था, पापा के डॉक्टर का कहा न मानने की शिकायत की थी। फिर गैस पर पकते आँवले नरम पड़ गए थे और उन्होंने मीरा को सदा सुहागिन रहने का निर्देश दे कर फ़ोन रख दिया था। “मम्मी अभी कहाँ हैं?”

“यहीं गवर्नमेंट हॉस्पिटल में। मैं दो घंटे पहले पहुँचा हूँ। सुबह पापा ने फ़ोन करके बताया था कि मम्मी को साँस लेने में तकलीफ़ है”

“हॉस्पिटल में? डॉक्टर से बात हुई? क्या बताया?”

“मीरा... डॉक्टर कह रहे हैं कैंसर है...”

“कैंसर? बायोप्सी के बिना कैसे कह सकते हैं?”

“ओफ्फ़ोह, मीरा दो दिन से ‘एडमिट’ हैं, मुझे आज ही बताया। बायोप्सी हुई है शायद, मुझे पूरा पता नहीं, यहाँ उथल-पुथल मची हुई है। डॉक्टर्स कह रहे हैं उम्मीद कम है...” मनु का गला भर आया। बगल के कमरे में पलँग जोर से हिला और नीना ने एक ऊँची सिसकी ली जो अंत को दबी हँसी में बदल गई... “तुम वापस आ जाओ। वैसे भी तीन महीने करीब-करीब पूरे हो गए हैं। कैसी आवाज़ है ये?”

“कहाँ?” मीरा ने आँखें हाथ से ढांप लीं। “यहाँ कुछ नहीं शायद ‘कनेक्शन’ गड़बड़ है। ”

“तुम टिकट बुक कराओ जल्दी। बड़ी जीजी तो दो दिनों से अपने घर एक बार भी नहीं गई हैं। ” मनु की बड़ी बहन आगरा में ही रहती थीं, मनु से पंद्रह साल बड़ी थीं। “कल कावेरी जीजी आ रही हैं कानपुर से और ताई जी वगैरह भी एकाध दिन में आ जाएंगे फ़रीदाबाद से। तुम भी कल परसों में आ जाओ। ”

“सोलह घंटो की तो फ्लाइट ही है, मनु, फिर काम भी एकदम ‘पीक’ पर है। ”

“काम? काम ‘इंपोर्टेंट’ नहीं है इस समय। सब तुम्हारे बारे में पूछ रहे हैं। तुम ऑफ़िस में बोल दो, और अमित भाई को कहो टिकट ढूँढ दें। ”

“मैं कल बात करती हूँ बॉस से। तुम डॉक्टर से बात करो, अगर दिल्ली या बॉम्बे में दिखाने से कुछ हो सके। ”

“उन्हें बहुत तकलीफ़ है मीरा... मुझसे देखा नहीं जाता... तुम आ जाओ बस। ”

“ठीक है। इतना घबराओ मत मनु। अपना ध्यान रखो। ” फ़ोन रख कर मीरा ने अपना लैंप बुझा दिया और करवट बदल ली।

प्रोजेक्ट का काम तेज़ी से चल रहा था, मीरा तो शनिवार, रविवार भी दफ़्तर जा रही थी। अगले हफ़्ते बोर्ड की एक कमिटी के सामने महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी और प्रस्तुति के बाद पूरी टीम फिलाडेल्फिया जा रही थी दो दिनों के लिए। जावेद की योजना थी। “तुम लोग इस क़दर मेहनत कर रहे हो, देखें पार्टी करना भूल तो नहीं गए। ‘लेट्स ऑल गो टू फ़िली आफ़्टर द प्रेजेंटेशन’। ”

“बहुत मँहगा है फ़िली। आपके लिए ही ठीक है, बॉस, हमारी औक़ात नहीं है। ” दल के सदस्य ने पेंच कसा था।

“ ‘गाइज़, इट्स ऑन मी’, तुम कंजूसों से मुझे कोई उम्मीद ही नहीं है !” मीरा ने।

अगले दिन दफ़्तर में मीरा की आँखें भारी थीं। कॉफ़ी का तीसरा कप लेने ऑफ़िस के दूसरे छोर पर धरी कॉफ़ी-मशीन तक गई थी। न्यूयॉर्क की चित्र-विचित्र इमारतों के नज़ारे वाला, चालीसवीं मंज़िल पर का यह दफ़्तर इतने दिनों बाद भी उसे चमत्कृत करता। जहाँ तहाँ, गुच्छों में या एकाकी रखीं मेंज़-कुर्सियाँ, काम करते वक्त बैठने के लिए ‘पॉस्चार बॉल्स’, पारदर्शी प्लास्टिक के ज्यामितिक आकारों के ‘मीटिंग पॉड्स’, ‘लेज़र’ और ‘होलोग्राफ़’ के ज़रिए प्रस्तुति करने के लिए बड़े-बड़े पटल, मनोरंजन-कक्ष में मनुष्य जैसे रोबोट के साथ ‘पूल’ या शतरंज के खेल। कॉफ़ी मशीन भी किसी भविष्य-विज्ञान वाले सिनेमा से निकली हुई लगती, ‘रॉबोटिक’ हाथ कॉफ़ी का कप पेश करते और एक मधुर स्वर समय और तापमान बता कर हाल-चाल पूछता। “साढ़े नौ भी नहीं बजे और तीसरी कॉफ़ी?” कॉफ़ी मशीन के पास खड़े जावेद ने टिप्पणी की।

“अच्छा? इतनी कॉफ़ी आपकी सेहत के लिए अच्छी नहीं। ” मीरा ने ईषत मुस्कान के साथ कहा।

“मैं अपनी नहीं तुम्हारी कह रहा हूँ , ‘मिस स्मार्ट –एलैक’ ! ‘बाइ द वे’ ‘कोड’ तुम्हारा लाजवाब निकला। ‘वर्क्ड लाइक ए ड्रीम इन येसटरडे'ज़ ट्रायल । ” मीरा सारी थकान भूल गई। दो हफ़्तों की दिन-रात की मेहनत सफल हुई। “और तुमने इतनी आसानी से लिख डाला सो अगला ‘रिगर असाइनमेंट’ भी तुम्हारा !”

“ठीक है। फिर कॉफ़ी की संख्या पर ‘कमेंट’ मत कीजिएगा !”

जावेद हँस पड़े। “न्यूयॉर्क का हवा-पानी अच्छा है तुम्हारे लिए। ‘परमानेंटली’ रहना चाहिए तुम्हें यहाँ। ”

मीरा के कानों में मनु का स्वर तैर गया “तुम आ जाओ...जल्दी...”

दफ़्तर से निकलते-निकलते दस बज गए। लिफ्ट में नीना, मीरा और टीम के दूसरे सदस्यों के साथ जावेद भी घुसे। “क्या बात है? ‘इन टीम’ जल्दी जा रही है आज? ‘टाइम-लाइन्स’ कसनी पड़ेगी!” जावेद ने फुलझड़ी छोड़ी। लिफ्ट में नकली कराहों का कोरस गूँजा। “बॉस स्लीपिंग-बैग्स मँगवा दीजिए। घर तो बस कुछ घंटे सोने ही जाते हैं !” “अच्छा? मुझे ‘एच। आर। से कोई ‘मेमो’ नहीं आया इस बारे में। ” जावेद नकली गंभीरता से बोले। लिफ्ट भूमितल पर आ रुकी। “बॉस, ऐसी बात कहने के बाद ड्रिंक्स बनती है !” “ओ। के। , ओ। के। ” जावेद ने हाथ खड़े किए, “तुम लोग मुझे बहुत ‘बुली’ करते हो! परसों ‘फ्राइडे’ को चलेंगे!” हँसते हुए और विदा पुकारते हुए सब तितर-बितर हो गए। मीरा ट्रैफ़िक-जंक्शन की ओर चल पड़ी।

“तुम अकेली जा रही हो?” जावेद ने उसके साथ कदम मिलाए। “नीना और तुम साथ रहते हो ना?”

“ हाँ, लेकिन उसका मँगेतर आया है। दोनों दफ़्तर के बाद बाहर जाते हैं, न्यूयॉर्क की नाइट-लाइफ ‘एंजॉय’ कर रहे हैं। ” मीरा मुस्कुराई।

“अच्छा। मुझे ये मालूम नहीं था। ” जावेद कुछ विचार करने लगे। क्रासिंग पर पद-यात्रियों वाली बत्ती लाल थी। गाड़ियाँ रवानी से निकल रही थीं। “मुझे बिल्कुल पता नहीं था...” बत्ती का रंग बदला और वे सड़क पार करने लगे। “तुम्हारे लिए न्यूयॉर्क नया है, हमने तुम्हारे रहने का इंतज़ाम यही सोच कर किया था कि नीना और तुम्हें कंपनी रहेगी एक-दूसरे की। ”

मीरा ने जावेद की ओर आश्चर्य से देखा। वे सामने देख रहे थे।

“मुझे कोई परेशानी नहीं है, जावेद। बहुत समय यों भी होता नहीं। आठ से पहले ऑफ़िस पहुँच जाती हूँ और लौटने में देर हो जाती है। ”

“ये तुम मुझसे ‘शेयर’ कर रही हो या बॉस के नाते ताना दे रही हो?”

“दोनों। ”

जावेद मुस्कुराए। “ठीक है। चलो तुम्हें खाना खिलाता हूँ। साथ में जी भर कर तुम मुझे ताने खिला देना। ” मीरा हिचकिचाई। शायद मनु फ़ोन करे। उसे बाल भी धोने हैं, सुबह धोने-सुखाने का समय नहीं मिलता। जावेद तब तक एक छोटे से रेस्तराँ के सामने रुक गए। “ ‘साइज’ पर मत जाओ, ग्यूसिप्पी’ का रेस्त्रां है, ऐसा लज़ीज़ खाना बनाते हैं मियाँ-बीवी। ‘रोमानो’ टमाटर और ‘इटालियन बेज़िल’ इटली के अपने गाँव से मँगवाते हैं। ” उन्होंने द्वार पर आए कैप्टेन को दो अँगुलियाँ दिखाईं। छोटे, नीची छत वाले कमरे के एक कोने में उन्हें बिठाकर कैप्टेन ‘मैन्यू’ ले आया। “तुम तो शायद शाकाहारी हो?” मीरा ने सर हिलाया। “ ‘पास्ता’ ? यहाँ का ‘एरेबियाटा बहुत स्वाद होता है। या तुम ‘पेस्तो’ पसंद करोगी? और ‘एंटीपास्तो’?’

“जो भी आपको ठीक लगे... आप यहाँ से परिचित हैं...”

“लेकिन तुम अपनी पसंद से तो परिचित हो ! बताओ, क्या अच्छा लगता है?” उन्होंने ‘मैन्यू कार्ड’ मीरा के सामने सरका दिया।

“मुझे वाकई पता नहीं क्या पसंद है...”

जावेद ने उसके चहरे पर एक निगाह डाली। “अच्छा, तो आज मेरी पसंद का ही सही। ” वेटर के जाने के बाद जावेद कुर्सी की पीठ से लग आराम से बैठ गए। “तो बताओ। यहाँ ठीक लग रहा है? थोड़ा ‘ओवर वैहल्मिंग’ है ये शहर लेकिन है ख़ूब। ”

“अच्छा शहर है, जितना देख पाई हूँ। ”

“माने? ‘मैनहैटन’ में रह कर न्यूयॉर्क न देख पाने के लिए कोई बहाना नहीं हो सकता। ”

“घर और ऑफ़िस के अलावा कहीं गई नहीं हूँ, मुझे अकेले जाने-आने की बहुत आदत नहीं है, लेकिन देखूँगी, धीरे-धीरे। ”

“बड़ी भारी गलती हुई मुझसे, मैं इसी गफ़लत में रहा कि नीना और तुम साथ में हो। तुम मुझे कोसती होंगी इस ‘प्रोजेक्ट’ पर काम के लिए राज़ी करने पर। ”

“कैसी बात करते हैं …मैं तो बहुत ‘ग्रेटफुल’ हूँ, इतना ‘कटिंग एज’ काम करने का मौक़ा मिल रहा है। ” खाना आ गया। जावेद ने ‘ब्रुशैटा’ और ताज़ा हरा सलाद मीरा की प्लेट में परोसा। "भई खाकर देखो। अच्छा न लगे तो कुछ और मँगाए...”

“बिना खाए ही कह सकती हूँ कि अच्छा है। रोज़-रोज़ दूध-सीरियल खा कर मन उकता गया है”

“दूध-सीरियल? या अल्लाह। ” जावेद ने काँटा फिरकी की तरह घुमाकर ‘स्पग्हैटी’ उस पर लपेटी। “ये अकेला रहने के कारण है। ”

“अकेला रहना बुरा नहीं लग रहा। मेरे लिए नया अनुभव है। हमेशा कोई न कोई साथ रहा है। काम के बाद जो मन आए करना अच्छा लग रहा है। ”

जावेद ने भवें उठाईं और उसकी ओर गौर से देखा... “बाहर कहीं जाती नहीं, डिनर में सीरियल खाती हो, जाने क्या मन का करती हो ऐसा?”

“ये भी तो मन का हो सकता है। ” मीरा मुस्कुराई।

रेस्तराँ के बाहर मीरा ने जावेद को धन्यवाद दिया। “खाना वाक़ई अच्छा था। थैंक्स!” “

‘थैंक्स’ कैसा? मैं घर जा कर अकेला खाता। यहाँ साथ में बढ़िया ‘पास्ता’ खाया। ”

“आपका परिवार यहाँ नहीं रहता?” वे सड़क के किनारे आ पहुँचे थे।

“तुम कैसे जाओगी? मैं ‘सब वे’ से ट्रेन लूँगा। ”

“पैदल। नज़दीक ही है। ”

जावेद ने इशारे से एक ख़ाली टैक्सी रोकी। “चलो, तुम्हें छोड़ देता हूँ। देर हो गई है पैदल जाने के लिए। ”

“मैं कई बार जा चुकी हूँ, जावेद आप ‘प्लीज़’ परेशानी न लें...”

“बैठो बैठो कोई परेशानी नहीं। इसी टैक्सी से स्टेशन चला जाऊँगा। ”

मीरा ने ड्राइवर को पता बताया। “आपको मेरी वज़ह से बहुत देर हो गई है...”

“कोई बात नहीं” जावेद ने रेडियो पर बजते गीत पर पैर से ताल दी। “मेरा परिवार लंदन में रहता है। दो साल पहले डाइवोर्स के बाद मेरी ‘एक्स’ बच्चों को लेकर लंदन चली गई, वहां उसके माता-पिता रहते हैं और बाकी परिवार। ”

“ओह...सॉरी...”

“नहीं, सॉरी की कोई बात नहीं, रिश्ता टूटा नहीं है, बदल गया है। अपने बच्चों के माता-पिता हम हमेशा रहेंगे। ” टैक्सी मीरा के घर के सामने रुकी। “ ‘बाय’। कल मुलाक़ात होती है। ”


दरवाज़े के ताले में चाभी लगाते हुए मीरा के फ़ोन की घंटी बजी।

“मीरा? सो गई थीं क्या?”

मीरा ने घडी पर निगाह डाली। पौने बारह। उसे याद आया कि उसने टिकट के लिए एजेंट को फ़ोन नहीं किया, जावेद से छुट्टी की बात भी नहीं की। “अंह...नहीं... मम्मी कैसी हैं?”

“वैसी ही। बल्कि पहले से कुछ ख़राब ही। शरीर में पानी भर गया है, बहुत कमज़ोर हो गई हैं। चम्मच भी नहीं उठा पातीं। तुम्हारे टिकट का क्या हुआ?”

मीरा ने हाथ का ‘बैग’ कुर्सी पर रखा और पलँग पर बैठ गई। “अमित भाई देखेंगे। मम्मी की ‘बायोप्सी’ की रिपोर्ट का क्या हुआ?”

“मृदुल जीजा जी ने डॉक्टर से बात की है। कैंसर है, जीजा जी कह रहे थे बहुत ‘अग्रेसिव’ है ‘ट्यूमर...”

“जीजा जी आगरा में हैं?”

“नहीं कानपुर में। वो कैसे आएँगे? सारे ‘हॉस्पिटल’ की जिमेदारी है उन पर। अपने ‘फ़ादर’ की ‘डैथ’ के बाद अकेले डॉक्टर रह गए हैं परिवार में। अभी नई सी। टी। स्कैन की मशीन खरीदी है, कावेरी जीजी कह रही थीं। फ़ोन पर बात की उन्होंने। कह रहे थे हर बात के लिए तैयार रहना चाहिए... तुम्हारा टिकट किस तारीख़ का है?”

“कल बताती हूँ। जल्दबाज़ी में महँगा मिलेगा। ‘सीज़न’ भी है अभी। ”

“अमित भाई को कहो ठीक प्राइज़ में देख दें, जल्दी से जल्दी का। ”

“ठीक है। वापसी का कब कहूँ? मेरा प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ है, मनु। ”

“अभी कह नहीं सकते। तुम आओ, फिर सोचते हैं। शायद लम्बी छुट्टी लेनी पड़े तुम्हें। डॉक्टर्स कह रहे हैं महीनों भी खिंच सकते है। तुम ‘सबैटिकल’ के बारे में पूछ लो। ”

“ ‘सबैटिकल’? बीच प्रोजेक्ट में? ये ‘रियलिस्टिक’ नहीं है, नौकरी है...”

“तो नौकरी छोड़ देना। ” मनु ने गला भींच कर कहा। “मम्मी से ज़रूरी नहीं है तुम्हारी नौकरी। ” फ़ोन कट गया। मीरा ने गुसलखाने में जाकर मुँह धोया, क्रीम लगाई, पलँग पर आ लेटी।

“ ‘यू लुक टायर्ड’ ” सुबह किचन में दूध गर्म करती हुई मीरा को नीना ने कहा। “ ‘वी वर क्वायट लास्ट नाइट’। ” वह शरारत से मुस्कुराई। मीरा ने हल्के से हँस दिया। दिन भर काम के दौरान उसका सिर भारी रहा। जावेद उसकी मेज़ के पास से गुज़रे तो वह उठ खड़ी हुई। “जावेद आपसे बात कर सकती हूँ पांच मिनट? थोड़ा पर्सनल है। ”

“ ‘ऑफ़ कोर्स’। सब ठीक-ठाक तो है?”

“जी... दरअसल... नहीं, ठीक नहीं है”

“चलो कोने के बरिस्ता पर इंसानों की बनाई कॉफ़ी पीते हैं। बात भी हो जाएगी और मशीन की बदमजा कॉफ़ी से भी बच जाएँगे। ” बाहर बेहद रंगारंग सूर्यास्त हो रहा था। हवा में शिशिर की ठंडक थी। मीरा ने अपनी ‘जैकेट’ के बटन लगाए।

“ ‘फ़ाल’ जल्दी आएगा अब की बार। अगली टीम-ट्रिप ‘पेंसिलवेनिया’ की रखेंगे, ‘नेक्स्ट माइलस्टोन प्रेजेंटेशन’ के बाद। ‘ऑटम’ के रंग इस कदर ख़ूबसूरत होते हैं वहाँ। ”

“फ़ाल तो दूर है अभी...”

“इतनी दूर नहीं। ‘मिड’ या ‘एंड सेप्टेंबर’ में रखेंगे, बहुत ‘इंटेंस’ है ये ‘प्रोजेक्ट’ बीच में ‘ब्रेक’ नहीं लिया तो सब पागल हो जाएँगे। ‘टू कैपूचिनोज़ प्लीज़’। ” ऊँची स्कर्ट में लंबी चौड़ी, मैक्सिकन लड़की मेज़ पर लकड़ी के दो टोकन रख कर चली गई।

“मेरी ‘मदर-इन-लॉ’ की तबीयत बहुत ख़राब है, जावेद। मुझे वापस आने को कह रहे हैं...” मीरा ने बिना भूमिका के कहा।

“ओह... मुझे दुःख हुआ सुनकर। ज़रूर जाओ। मुझे आशा है जल्दी ही अच्छी हो जाएँगी। ”

“कैंसर ‘डाइगनोस’ हुआ है... हॉस्पिटल में हैं...” मीरा की आँखों में जैसे कुछ करकने लगा, “कुछ कह नहीं सकते कि क्या होगा...”

जावेद ने मीरा की बाँह थपथपाई। “ज़िंदगी और मौत खुदा के हाथ है। न अफ़सोस करना चाहिए, न शिक़ायत। कैंसर डरावना शब्द है लेकिन सभी कैंसर ‘फ़ेटल’ नहीं होते। जैसा होना चाहिए, वैसा ही होगा। कब जाना चाहोगी?”

“जल्दी आने को कहा है...”

“अगले हफ्ते पहला ‘माइलस्टोन प्रेज़ेन्टेशन’ है। मैनेजमेंट और बोर्ड के सामने आने का मौक़ा है। तब तक रुक सको तो अच्छा है। ”

अनचाहे ही मीरा की आँखें भर आईं, आँसू तिरमिराने लगे। उसने पलकें झपकाईं और सर दूसरी ओर घुमा लिया। वही मैक्सिकन युवती उनकी कॉफ़ी ले आई। चीनी-मिट्टी के गोलाकार प्यालों-से कप उनके सामने रख कर वह मीरा की ओर झुकी, “हनी, तुम्हारा काजल फ़ैल गया है। ” उसने तर्जनी आँख की कोर पर रख कर कहा। “धन्यवाद” मीरा ने नैपकिन से आँखें पोंछ ली और कॉफ़ी का एक लंबा गमकता घूँट भरा। “ठीक है। ‘प्रेज़ेन्टेशन’ के बाद जाऊँगी। ”

“ ‘गुड गर्ल’! और परेशान मत होओ। जब जहाँ हो, वहीं मन रखो, वरना सेहत और काम दोनों पर असर पड़ेगा। ”

मीरा ने प्याले को दोनों हथेलियों में भर लिया। “मैं अकेली बहू हूँ, बहुत ‘प्रेशर’ है...”

“समझ सकता हूँ, मीरा। लेकिन तुम बहू के अलावा भी हो, ये भूलना तुम्हारे खुद के लिए अच्छा नहीं होगा। मेरी टीम में एक ‘ओपन हैडकाउंट’ है। मैंने पिछले हफ़्ते ही तुम्हें ‘ऑफर’ करने का तय कर लिया था। आसान नहीं होगा, न निर्णय और न ही काम। एकदम चुनौती भरा और इसीलिए सबसे ‘सैटिस्फैक्ट्री’। ”

मीरा का जैसे मन मसोस गया। ‘इन टीम’ में शामिल होने का मौक़ा, जिसके लिए कंपनी का हर इंजीनियर ललचाता है। “मेरे बारे में सोचने के लिए धन्यवाद, जावेद, मगर मुश्किल होगा मेरे लिए। मनु यहाँ आना नहीं चाहेंगे। मैंने आपको कहा नहीं लेकिन प्रोजेक्ट पर काम के लिए आने का ही काफ़ी विरोध हुआ घर पर...”

“देखो मीरा, मैं दबाव नहीं डाल रहा, प्रस्ताव है। अभी जवाब देने की ज़रूरत नहीं। सोच कर कहो। ‘लोकेशन’ के बारे में हल ढूँढा जा सकता है, कुछ‘अरेंजमेंट’ कर सकते हैं, जैसे छः महीने न्यूयॉर्क और छः महीने दिल्ली। मैं सिर्फ़ ये कहूँगा कि निर्णय लेने से पहले तुम अपने बारे में भी सोचो। पछतावे बेहद बुरे होते हैं। ‘रिज़ेन्टमेंट’ पैदा करते हैं। ” उन्होंने कॉफ़ी का आख़िरी घूँट लिया और दस डॉलर का नोट हवा में लहराया। वही मैक्सिकन लड़की आई। “बाक़ी तुम्हारा। ”

दफ़्तर की बिल्डिंग में घुसते हुए जावेद ने कहा। “रिश्ते अपनी जगह होते हैं, मीरा, व्यक्ति अपने जगह, अनुमान से नहीं, अनुभव से कह रहा हूँ। अपने आप से वफ़ादार रहना ज़रूरी है। अपनी मेहनत और क़ाबिलियत को ‘बिट्रे’ करने से और चाहे जो मिले, तसल्ली नहीं मिलती। घर जाओ, आराम करो आज। ‘पेल’ लग रही हो। ”

“नहीं, कोड आगे बढ़ाऊँगी। अच्छा ‘फ्लो’ है आज। खूब ‘प्रोग्रेस’ हुई है। ”

जावेद मुस्कुराए, “जो सैटिस्फैक्शन’ सफल कोड लिखने में है, बहुत ही कम चीज़ों में है। " लिफ्ट उनके फ़्लोर पर रुकी। "‘फ़िली’ का ट्रिप दिलचस्प रहेगी। ‘रियली लुकिंग फ़ारवर्ड’। ”

मीरा का फ़ोन बजा, सघन नींद की दीवार में सेंध लगाता। मनु था। “मीरा...तुरंत आओ, मम्मी जा रही हैं...”

उसके स्वर का आतंक महाद्वीपों और सागरों को पार कर मीरा के कान में अटक गया। “क्या... क्या मतलब?”

“क्या का क्या मतलब? ‘डोंट बी स्टुपिड’ मीरा। डॉक्टर्स कह रहे हैं बहुत समय नहीं है...एक-एक साँस के लिए तड़प रही हैं...”

“लेकिन...कैसे... जीजा जी ने कहा था समय है...”

“ ‘गॉड’... पहले क्या कहा, अब क्या कहा... ये बहस नहीं है, मीरा... ट्यूमर बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है, सारे ‘ऑर्गन्स’ पर दबाव डाल रहा है। मैंने अमित भाई को फ़ोन कर दिया है। तुम तुरंत ‘एअरपोर्ट’ पहुँचो। ” मनु ने फ़ोन काट दिया।

बाथरूम की तेज़ रोशनी में चौंधियाई आँखें अपने रंगहीन चेहरे पर गड़ाए मीरा ने दाँत माँजे। बुधवार को बोर्ड वाली प्रस्तुति थी। एक ‘ट्रेनिंग’ के लिए उसका नाम दिया था जावेद ने। “प्रोमोशन की तैयारी है ये ‘ट्रेनिंग’। ‘यू`व डन वेरी वैल’। ” ‘ह्यूमन रिसोर्स’ वाली लड़की ने कहा था। ज्यों-त्यों नहा कर उसने सूटकेस से ‘फिलाडेल्फिया’ के लिए रखे जींस, जैकेट्स आदि निकाले और उनकी जगह जो इने-गिने भारतीय कपड़े साथ लाई थी, रखे। फोन पर टैक्सी ‘एप’ से गाड़ी मँगाने के बाद उसने नीना के लिए एक नोट लिखा और 'रेफ्रिजिरेटर' पर चुंबक से चिपका दिया। लॉबी में टैक्सी का इंतज़ार करते हुए उसने अमित भाई को फ़ोन किया। “मीरा बेन, कोई फिकर ना करो। मैंने मनु भाई को जबान दी है। तमे कल रात तक आगरा पहुँचाने नू जिम्मा हमारा। ”

“जी। मैं ‘एयरपोर्ट’ ही जा रही हूँ। ”

“तम पहुँचो, टिकट ‘ईमेल’ कर दूँगा, रूटिंग कन्फर्म होते ही। बहुत दुःख है तमारे अने मनु भाई के लिए। "

टैक्सी में बैठ कर मीरा ने जावेद को ईमेल लिखा, अपने काम का ब्यौरा दिया, बचे कार्यों की फ़ेहरिस्त और उन्हें पूरा करने में सहायक जानकारी। अंत में अचानक जाने से होने वाली असुविधा के लिए क्षमा माँगी। घर की ज़िम्मेदारियाँ हैं, अभी कह नहीं सकती कितने दिनों की छुट्टी चाहिए, यदि प्रोजेक्ट की तिथियों के चलते मेरा काम किसी और को देना चाहें, तो मैं पूरे तौर पर समझ पाऊँगी।

एयरपोर्ट पहुँचने तक अमित भाई का ‘ईमेल’ आ गया। चार घंटे बाद की फ्लाइट थी। ‘चैक-इन’ करके मीरा ने ‘वेंडिंग मशीन’ से कॉफ़ी ली और प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गई। कॉफ़ी के बावजूद सर झनझना रहा था और आँखों में जलन लग रही थी। उसने फिलाडेल्फिया की यात्रा वाले ‘व्हाट्सऐप ग्रुप’ पर संदेश लिखा - पारिवारिक कारणों से अचानक भारत लौटना पड़ रहा है, सप्ताहांत की तस्वीरों की प्रतीक्षा रहेगी। कॉफ़ी का आखिरी घूँट लेकर, वह कप को कचरा-पात्र में डालने उठी। पौ फट रही थी। लोग जहाँ-तहाँ कुर्सियों पर आड़े-तिरछे सो रहे थे। सलेटी उजाले में सब कुछ बुझा-बुझा सा था। मीरा का फ़ोन बजा।

“जॉगिंग के लिए जा रहा था कि तुम्हारा ‘व्हाट्सऐप’ मैसेज देखा। तुम ठीक हो? किसी भी तरह की मदद चाहिए? फ्लाइट बुक हो गई?”

“जी। फ्लाइट तीन घंटे में है। अचानक हालत बिगड़ गई वहाँ, रात को एक बजे फ़ोन आया, छुट्टी के लिए ‘फॉर्मली’ लिखने का वक्त ही नहीं मिला...”

“उसकी कोई बात नहीं, मीरा। एयरपोर्ट कैसे जाओगी?”

“एयरपोर्ट पर ही हूँ, ढाई-तीन बजे से। ”

“इतनी जल्दी पहुँचने की क्या ज़रूरत थी? कुछ देर और आराम करना चाहिए था। दुआ करूँगा कि वहाँ हालत उतनी बुरी न हो लेकिन तुम्हें ताक़त की ज़रुरत होगी, बिना खाए और सोए सेनाएँ भी लड़ नहीं सकतीं। कुछ खाओ और उन सख्त बेआराम कुर्सियों पर ऊँघने की कोशिश करो। ”

मीरा के आँसू बहने लगे। धीरे से गला साफ़ किया। “काम आधा छोड़ कर जा रही हूँ...’वेरी सॉरी’...”

“तुम्हें ही आकर पूरा करना होगा। तुम्हारे ‘डेलिवरेब्ल्स’ अगले ‘फेज़’ के लिए मुल्तवी कर रहा हूँ। घर की जिम्मेदारियाँ पूरी करके आओ। ”

“थैंक्स...”

“फ़ोन करना चाहूँगा तुम्हारा हाल जानने के लिए। कोई परेशानी तो नहीं होगी?”

“नहीं, कोई परेशानी नहीं...”

“ठीक है। अपना ध्यान रखो। ‘गो सेफ़ली’। ”

प्लेन में बैठ कर मीरा ने मनु को संदेश भेजा – फ्लाइट 3 बजे रात उतरेगी दिल्ली। आशा है मम्मी आराम में हैं।

बीस घंटों की लंबी उड़ान में ‘इकॉनामी क्लास’ की सिकुड़ी सीट से अकड़ी देह को साधती मीरा ने दिल्ली हवाई अड्डे पर चारों ओर घूम कर परिचित चेहरा तलाशा। मनु का कोई संदेश नहीं आया था। इतनी रात गए फ़ोन करे या नहीं, इस पशोपेश में कुछ मिनट अनिश्चित खड़े रहने के बाद वह ‘प्री-पेड टैक्सी’ के काउंटर पर पहुँची। जब वह टैक्सी की पुश्त से सिर टिका कर बैठी तो आकाश के कोने मैले होने लगे थे। शुरू सितंबर की उमस से हवा बोझिल थी। पिछले चौबीस घंटों में बमुश्किल तीन-चार घंटे की नींद, प्लेन की बासी हवा की घुटन और जाने कब की थकान का बोझ उसकी पलकों, गर्दन, कंधों और कमर पर था।

आगरा पहुँचते-पहुँचते दिन उग आया। घर का बाहरी दरवाज़ा बंद था। लोहे के जँगले से सामने के छोटे से लॉन में बेतरतीबी से रखी प्लास्टिक की कुर्सियाँ और भीतरी द्वार के बाहर जूते-चप्पलों का अंबार दिखाई पड़ रहा था। साँकल खोल कर मीरा अपना सूटकेस घसीटती हुई भीतर दाख़िल हुई। जाली के दरवाज़े से फ़र्श पर जहाँ-तहाँ सोते लोग दिखे। मीरा ने मनु के ममेरे भाइयों और बड़ी जीजी के बेटे को पहचाना। दीवार से सटी चौकी पर उसकी सास की कुछ धुँधली, मुस्कुराती तस्वीर रखी थी। उस पर गुलाब और गुलदाऊदी का मुरझाता हार लटका था। धरती पर एक दीपक जल रहा था। मीरा घर की सीढ़ी पर बैठ गई। लाल से पीला पड़ता सूरज नीम, अशोक के पेड़ों के ऊपर उठ आया था और अमरुद के वृक्ष में तोते शोर मचा रहे थे।

“हाय राम, बहू तुम कब से यहाँ बैठी हो?” मीरा ने उठ कर मौसी के पैर छुए। “हाय बहू, सब खत्म हो गया। सरोज कल चली गई...” उनके आँसू झरने लगे। “हममें सबसे छोटी सबसे पहले गई, बहू ऊ ऊ ऊ...” उनके रोने की आवाज़ से घर में हलचल हुई। सोते पुरुष करवट बदलने लगे।

“मीरा... तुम अभी पहुँची? कैसे?” मनु भीतर से निकला।

“सुबह तीन बजे दिल्ली ‘लैंड’ किया फिर टैक्सी से...”

“तुम्हारा दिमाग ख़राब है? अकेले चली आई रात में? कोई बात हो जाती इस समय में तो?”

“मैंने ‘मैसेज’ किया था ‘प्लेन बोर्ड’ करते समय। उतर कर भी...”

“ ‘मैसेज’ देखने का वक़्त है ये? तुम फ़ोन नहीं कर सकती थी? वाकई ‘कॉमन सेन्स’ नहीं है तुममें। ”

मौसी जी ने बीच-बचाव किया। “गलती हो जाती है, समय ही ऐसा आया है, सभी की मति औंधा गई है। बेचारी सात समंदर पार से आई है हाल हाल...”

“गई क्यों थी?” देहली पर आईं बड़ी जीजी ने तल्ख़ स्वर में कहा “सब होने के बाद आई है अब। सास की कोई सेवा नहीं की। ” मीरा ने झुक कर उनके पैर छुए। “बाल बाँध लो तुम,” मीरा के खुले रूखे बालों को लक्ष्य कर के बोलीं, “तेल-शैम्पू नहीं करना है, सूतक लगा है तब तक। ”

घर में मेहमानों की रेल-पेल थी। मीरा ने पूजा घर में जाकर पापा के पैर छुए। उन्होंने मम्मी की तस्वीर की तरफ इशारा कर भरी आँखों से मीरा को क्षण-भर देखा और मूक माला जपते रहे। मीरा नहा कर जल्दी से रसोई घर जा पहुँची। ताई जी पीढ़े पर बैठीं दही बिलो रही थीं। “गौ-ग्रास और मनु के लिए खाना पकाना है जल्दी। गैया को खाना नहीं देंगे तब तक घर भर दाना नहीं डाल सकता मुँह में। ” मीरा ने चुपचाप साड़ी का पल्ला कमर में खोंसा और आटा गूँधने लगी। सबको खिलाते-पिलाते, दक्षिणा और रीतियों का सामान जुटाते दोपहर हो गई। गरुड़-पुराण का पाठ होने लगा और परिवार के लोग बैठ कर आत्मा की यंत्रणाओं के बारे में सुनने लगे। मीरा को ध्यान आया कि उसने सुबह से कुछ खाया-पिया नहीं है। ठंडी दाल के साथ एक रोटी जैसे-तैसे खा कर वह बैठक में लौटी तो बड़ी जीजी ने कड़ी आँखों से देखा। “बैठ कर सुनो। आख़िरी समय तक तो आईं नहीं, इतना तो उनकी आत्मा के लिए करो। ” मीरा एक ओर बैठ गई। उसकी कमर और पीठ दर्द से अकड़ रहे थे। जाँघों के बीच जब गर्म तरलता महसूस हुई तो वह समझी कि दर्द सिर्फ़ थकान का ही नहीं था। वह सँभल कर बैठ गई, साड़ी का पल्ला पीछे की ओर फैला लिया। सब आराम करने जाएँ तब ही गुसलखाने में जाकर ‘टैम्पून’ लगा पाएगी।

“अरे बहू कहाँ दौड़ी जा रही हो? देख कर, गिर-गिरा पड़ोगी। ” जल्दबाज़ी में मीरा का पैर कोने में रखी चौकी से टकरा गया था और हल्की नींद सोने वाली ताई जी जाग पड़ी थीं।

“कहीं नहीं, ताई जी, बस ‘बाथरूम’ जा रही हूँ। आप आराम कीजिए। ”

“बाथरूम? इस समय? सब ठीक तो है? जी घबरा रहा है?”

मीरा बिना जवाब दिए बाथरूम में घुस गई। प्लास्टिक ‘रैपर’ की आवाज़ को दबाने के लिए उसने नल चला दिया और साड़ी और पेटी कोट ऊपर उठाया। जल्दी-जल्दी मुँह-हाथ धोकर बाहर निकली तो ताई जी और मौसी जी दोनों को गलियारे में पाया। रसोई घर में जा कर वह चाय की तैयारी करने लगी। मेहमानों का ताँता लगा था। रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी, पापा के पुराने सहकर्मी, मम्मी की किटी की सदस्याएँ, जिसको पता चल रहा था, आ रहे थे। “फिरने आने वाले सूखे मुँह न जाएँ, बहू। ” ताई जी का निर्देश था और मीरा चाय और सूखे नाश्ते की तश्तरियाँ तैयार कर लगातार बाहर भिजवा रही थी। “मम्मी के बनाए लड्डू-मठरी किस काम आ रहे हैं...” मनु क्षण-भर को रसोईं में आया। मुँडे सिर और कई दिनों की दाढ़ी वाला उसका चेहरा मीरा को अनपहचाना लगा । “बुआ जी आई हैं, पैर छू लो आकर उनके। ”

रात को मीरा मम्मी के कमरे में चादर बिछा रही थी। फ़ोन की घंटी बजी। जावेद थे।

“मीरा कैसी हो? आराम से पहुँच गई?”

“मेरी सास का देहांत हो गया जावेद...”

“ओह। बहुत अफ़सोस है। अपने परिवार वालों को मेरी ‘कॉन्डोलेंस’ कहना। ”

“जी, कहूँगी। ”

“किसी तरह की चिंता मत करो काम के बारे में, परिवार के साथ रहो, उन्हें ढांढस दो। ”

“जी। ”

“तुम्हारा ज्यादा वक़्त नहीं लूँगा। अपना ध्यान रखो, थकी सी आवाज़ आ रही है तुम्हारी। सेना वाली बात याद रखो। ”

मीरा ने पलकें झपका कर आँसू रोके। “तकिये और चादरें चाहिए। तुम्हें पता है क्या मम्मी ‘एक्स्ट्रा’ बिस्तर कहाँ रखती थीं?” पूछता हुआ मनु कमरे में घुसा। मीरा ने फोन अपने बैग में रख दिया। “अंदर के कमरे की आलमारी में। लाती हूँ। ”

दसवें के ब्रह्म-भोज की तैयारी हो रही थी। मीरा आँगन के पीछे वाले कमरे में सामान से घिरी, फ़ेहरिस्त पढ़ कर चीज़ें थैलों में सँजो रही थी।

“हो गया क्या मीरा?” बड़ी जीजी कमरे के द्वार पर आईं।

“बस जीजी, तीन और बचे हैं। ”

“क्या-क्या रखा?”

“लिस्ट में जो था, सब। एक साड़ी, एक शॉल, एक जोड़ी चाँदी के बिछिया और पायलें, एक तौलिया, एक साबुन। ”

“चाय और शक्कर नहीं रखे?”

“हाँ, मम्मी का तो दिन नहीं कटता था पाँच-छः कप चाय के बिना...” कावेरी जीजी भी आ गईं।

“वो तो पंडितों के सीधे की लिस्ट में है, सुहागिनों की लिस्ट में तो बस इतना ही था। ”

“इनमें भी रखो, जो इन्हें देंगे, मम्मी को मिलेगा। मैं दीपू को कहती हूँ, बाज़ार से और ले आए। ” वो चली गईं।

दीपू बड़ी जीजी का बेटा है। इसी साल इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला लिया है। मीरा ने लक्ष्य किया कि इस बार वह उसके इर्द-गिर्द अधिक मंडराता रहता। बर्तन उतारने, सामान उठवाने के बहाने उसके निकट होने की कोशिश करता। मीरा को अपनी देह पर उसकी दृष्टि महसूस होती और अपने मन में उसकी सत्रह-साला कामनाओं के लिए कुछ करुणा। यदि दीपू आस-पास होता तो बड़ी जीजी की कड़ी निगाहें भी मीरा पर लगी रहतीं। वह हर क्षण सतर्क रहती और दीपू से दूरी बनाए रखती।

दीपू सामान के थैले ले आया। “मैं मदद कर दूँ मामी? इतने सारे थैले हैं। ”

“नहीं बेटा, बस हो गया है। कावेरी जीजी,” उसने आँगन के पार खड़ी ननद को आवाज़ दी, “ ‘प्लीज़’ देख लेंगी एक बार कोई गलती तो नहीं हुई?”

शाम को पूजा घर में धुले बर्तन रखते कमरे में सहसा पड़ी छाया से मीरा चिहुँक उठी। मनु था। “पापा की जाप वाली माला यहाँ है क्या?” मीरा ने पूजा के सामान की टोकरी में से माला निकाल कर मनु की ओर बढ़ाई। सात-आठ दिनों में पहली बार मनु से अकेले में मिल रही थी। वह घर के भीतर काम में लगी रहती थी और मनु बैठक में लोगों की भीड़ में घिरा सारा दिन पूजा और पंडित के बताए अनुष्ठानों में बिताता। “जल्दी ख़त्म करो यहाँ। खाने का वक़्त हो रहा है पापा के। ” मीरा सीधी खड़ी हो गई। “मेरे लौटने की ‘डेट’ तय करनी है। मैंने छुट्टी पंद्रह दिनों की ली थी...”

“लौटना?” मनु ने अपने सिर के छोटे-छोटे बालों को हथेली से मसला, खसखसाहट हुई। “यानि यू.एस.?”

“हाँ। मैं सब बीच में छोड़ कर आई हूँ...”

“सोचना पड़ेगा। मुझे नहीं लगता तुम्हारा जाना संभव होगा। पापा अकेले पड़ गए हैं। बड़ी जीजी और कावेरी जीजी अपने-अपने परिवारों को देखेंगी। मेरा काम भी ‘री-जॉइन’ करने पर ‘हैक्टिक’ होगा। सोच रहा हूँ पापा को दिल्ली ले चलें। कम-से-कम साल-छः महीने के लिए। तुम भी वापस दिल्ली ‘पोस्टिंग’ ले लो। ‘वर्क फ्रॉम होम’। तुम्हारी ‘टैक’ कंपनियों में तो होता है। मैं कोशिश करूँगा कम ‘ट्रैवेल’ करूँ पर मेरा काम तुम जानती हो। ”

“मनु, जावेद ने मुझे ‘इन टीम’ ‘जॉइन’ करने का ‘ऑफर’ दिया है। प्रमोशन के लिए भी नाम रखा है। बहुत बड़ा कदम है मेरे लिए। मुझे कम-से-कम एक बार जाना होगा। ”

“ओफ्फ़ोह मीरा”, मनु खीज गया, “ये समय है ‘सैलफिश’ होने का? हमारी ‘प्रायोरिटी’ पापा हैं। मम्मी का बारहवां भी नहीं हुआ है और तुम्हे अपने काम की चिंता है। ” वह कमरे से बाहर हो गया।

रात सब काम निबटने पर रोज़ की तरह मीरा मौसी जी और बड़ी जीजी के बगल में गद्दे पर लेटी। फ़ोन पर जावेद का मैसेज़ था – 'गुड न्यूज़ ऑन मैनेजमेंट प्रेज़ेन्टेशन। विल कॉल’। जवाब देने से पहले ही फ़ोन की घंटी बजी।

“मीरा! कैसी हो?”

“जी, ठीक। ”

“मैंने सोचा तुम्हें बोर्ड का ‘रिएक्शन’ बता दूँ। बहुत अच्छा रहा ‘प्रेज़ेन्टेशन’। तुम्हारा काम बहुत सराहा गया। ‘इट स्टुड आउट’। ”

मीरा मुस्कुरा उठी। “थैंक्स। बहुत अच्छा लगा जान कर। ”

“आए एम वेरी प्लीज्ड टू’। ‘इन टीम’ का ‘ऑफ़र’ ‘फार्मली’ ‘मेल’ कर दिया है तुम्हें। ”

“थैंक्स...लेकिन मैं अभी सोच नहीं पा रही हूँ कुछ... यहाँ माहौल ऐसा है...”

“मैं समझ सकता हूँ लेकिन ‘शेयर’ करना चाहता था। तुम्हें सोचने के लिए समय है। ‘ऑफ़र’ हाथ में है तुम्हारे। ” मीरा ने फ़ोन कान के और पास सटा लिया। “टीम में सबने याद किया है और ‘प्रेयर्स’ भेजी हैं। ‘हैंग इन देयर’। अपना ध्यान रखो। ‘बाए’। ”

मीरा ने फ़ोन रख दिया।

"कौन था?" बड़ी जीजी उसे देख रही थीं।

"मेरे बॉस थे। "

“इतनी लंबी बात करता है तुम्हारा बॉस?” बड़ी जीजी बोलीं, “इतनी रात गए? कोई काम नहीं उसको?” मीरा लेट गई।

देर दोपहर बारहवें का भोजन और हवन संपूर्ण हो गया। लोग थक कर जगह-जगह सो गए। बैठक के बीचों-बीच ताँबे का हवन पात्र अब भी धुँआ उगल रहा था। पूजा के लिए निकाले चाँदी के थाल, दरियाँ, आसन जहाँ-तहाँ धरे थे। मीरा ने हवन कुंड को सरका कर दरवाज़े के बाहर किया। कल से मेहमान विदा होने लगेंगे। घर ख़ाली हो जाएगा। मंडी से टोकरियों सब्ज़ी और गोशाला से बाल्टी भर दूध लाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। सब रीति-रिवाज़, जो दिनों को बाँट कर सहने योग्य बनाते हैं, निबट जाएँगे। मनु भी तीन-चार दिनों में दिल्ली लौटने को कह रहा था। पापा ने साथ जाने से मना कर दिया था। “हम यहीं रहे हैं हमेशा से, ये घर छोड़ कर नहीं जाएँगे। मिलने आ जाएँगे। तुम दोनों आना-जाना बनाए रखना। ” “आना-जाना क्या? मीरा को यहाँ रहना चाहिए अभी कुछ महीने। मनु शनिवार-रविवार आ जाए। बहू-बेटा किस दिन के लिए होते हैं। ” ताई जी बोलीं। “हाँ बहू, बुआ जी तुम्हारी बूढ़ी हुईं, उनसे ये घर नहीं सँभलेगा। सरोज ने एक-एक तिनका कितने मन से जोड़ा इसका...” मौसी जी रो पड़ीं थीं। मीरा झुक कर आसन वगैरह समेटने लगी। कमर में कौंधती पीड़ा की लहर को उसने होंठ दबा कर साधा।

“मामी, लाइए, मैं उठा देता हूँ। आप सुबह से दौड़ रही हैं। ” दीपू ने उसके हाथ से आसन ले लिए।

"थैंक्स दीपू बेटा। " मीरा ने एक-में-एक रख कर चाँदी के थाल उठाए। “ये आसन वगैरह पीछे के कमरे में रख आओ। ”

“ठीक है, मामी। बता दीजिए, वहीं रख दूँगा। ”

मीरा आँगन पार कर के सामान वाले कमरे में घुसी। उतरती दोपहर की धूप की चौंध के बाद कमरे का धुँधलका उसे अंधा कर गया। वह दीवार पर हाथ से बिजली का स्विच टटोलने लगी। “मामी, स्विच यहाँ है। ” दीपू ने आसन और दरियों का गठ्ठा जमीन पर पटक दिया और उसके बिलकुल निकट आ गया। उसने हाथ बढ़ा कर मीरा की कलाई पकड़ ली। अगले ही क्षण दीपू की बाँह मीरा के कमर के गिर्द थी और उसकी गहरी साँसें मीरा के कानों में। एक हाथ में थाल थामे मीरा ने दीपू को पीछे धकेलने की कोशिश की। “मामी” दीपू फुसफुसाया, “मामी, प्लीज़...” मीरा सिर-से-पाँव तक काँप गई। हाथ के थाल तीखी खनखनाहट के साथ नीचे गिर गए।

“क्या हुआ, क्या हुआ” की गुहार लगतीं मौसी जी और ताई जी आँगन में आए। पीछे-पीछे मनु और बड़ी जीजी भी।

“कुछ नहीं, मौसी जी, थाल छूट गए हाथ से। ”

“सारे घर भर को जगा दिया तुमने। दीपू, तू धूप में क्या कर रहा है?” जीजी के माथे पर बल थे।

“ ‘सॉरी’ जीजी। ” मीरा मनु की ओर मुड़ी, “मनु, मैं वापस यू.एस. जा रही हूँ दो दिन बाद। ” वह एक साँस में बोली और रसोई की ओर बढ़ गई।




(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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