इरा टाक की कहानी 'मैडम का बंटी' | @tak_era - #Shabdankan

इरा टाक की कहानी 'मैडम का बंटी' | @tak_era

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मासूम कहानियाँ जिनमें इंसानियत अपने रोज़मर्रा के रूप में नज़र आती रहती है, उन्हें पढ़ना न सिर्फ एक मुस्कान दिए रहता है साथ ही स्फूर्ति भी देता है. इरा टाक शब्दांकन की स्टार कहानीकार हैं, और उनकी कहानियों में यह मासूमियत होती है... भरत तिवारी 


मैडम का बंटी

— इरा टाक



नेगी मैडम अल्मोड़ा के एक डिग्री कॉलेज में गणित की प्रोफेसर थीं, छोटा कद, दुबला पतला शरीर, गोरा रंग, भूरी बादामी ऑंखें, मेहँदी से रंगे बॉय कट बाल, चेहरे पर रोब! मिस्टर नेगी के गुजर जाने के बाद वो अब अपनी बड़ी सी कोठी में बिल्कुल अकेली रहती थीं। कोठी के ऊपर उनके सीढ़ीदार कुछ खेत भी थे और सामने एक बड़ा सा बगीचा जिसमें उन्होंने अपनी पसंद के ढेरों पेड़ पौधे और सब्जियां उगा रखी थीं।

एक ही लड़का था वरुण जो अपने परिवार के साथ अमेरिका में था, वो कई बार कह चुका था, "माँ, वोलंटरी रिटायरमेंट ले कर यहाँ आ जाओ...कोई कमी तो है नहीं, वहां अकेले रह कर अब नौकरी क्यों करनी!"

पर मैडम का मन अपने पुरखों का बंगला और देश छोड़ने का हरगिज़ नहीं था। फिर शुरू से अपने मन की करी थी। बुढ़ापे में बहू के शासन में रहना उन्हें गवारा न था। पिछली बार जाड़ों की छुट्टियों में दस दिनों के लिए अमेरिका गयीं थीं, पर वहां पाँच दिन रहना भी उन्हें भारी पड़ गया।

"मम्मी ये मत करो, यहाँ ऐसे करते हैं, ऐसे बैठो, ऐसे बोलो, बाहर मत जाओ, सामान यहाँ मत रखो...वहां मत रखो..."—बहू की रोक टोक सुनते सुनते मैडमजी आजिज़ आ गयी थीं। ज़िन्दगी भर अल्फा बीटा सिखाते हुए काटी थी अब बहू नया पाठ पढ़ाना चाहती थी, मैडमजी के लिए बर्दास्त से बाहर था। किसी तरह दिन काटे और वापस अमेरिका न जाने की कसम खा ली।

अभी सेवानिवृति को पाँच-सात साल बाकी थे, क्यों किसी पर जाकर बोझ बनें...? उनकी दुनिया, कॉलेज और उनके स्टुडेंट्स थे, पर घर आते ही उनको अकेलापन खाने को दौड़ता...कभी टीवी देखतीं...कभी पुराने एल्बम। .कभी बगीचे में फूलों को निहारती...कपडे खरीदने का उन्हें खासा शौक था, हर हफ्ते बड़े बाज़ार जा कर एक-दो नयी साड़ियां ले आतीं, पर इन सब चीजों से कभी अकेलापन दूर होता है भला! रोज वरुण को अमेरिका फ़ोन लगातीं...पर फिर भी मन न लगता और इस अकेलेपन की वजह से कभी बेहद हँसमुख और ज़िंदादिल रहीं मैडमजी दिन पर दिन चिड़चिड़ी और झक्की होती जा रही थीं।

आज उनका जन्मदिन था, कड़क कलफ लगी नीली धारी वाली तात की नई साडी पहन कर वो कॉलेज को निकली। कॉलेज में सभी उनकी साड़ियों और रुतबे पर फ़िदा रहते थे, फिर आज तो ख़ास दिन था इसलिए ख़ास साडी! ये साडी उन्होंने पिछले महीने कलकत्ता से आये दास बाबू से खरीदी थी। दास बाबू हर महीने साड़ियां लेकर कॉलेज आ जाते थे, और कॉलेज की सारी टीचर्स उन पर मधुमखियों के झुण्ड की तरह टूट पड़ती। सब बढ़िया साड़ी छांट लेना चाहती थीं। दास बाबू कुछ खास मनुहार करने पर घर भी चले जाते थे। तो इस बार वो नेगी मैडम के घर धमक गए, आते ही बोले "ई साडी ख़ास आपके लिए रखा है मेडम, वरना कॉलेज में शुक्ला मेडम झपट लेता!"

लेकिन असली बात ये थी कि इसी तरह कह कर दास बाबू ने हरी चेक वाली साडी मिसिस शुक्ला को भी बेचीं थी और दोनों एक दम नायाब साड़ियां पा कर खुश थीं। रासोगुल्ले जैसी मीठी और गोल बातें बना के टीचर्स के साडी मोह को कैसे कैश करना है वो अच्छी तरह जानते थे!

कॉलेज के रास्ते में एक शिव मंदिर पड़ता था। वहां जाना उनका रोज का नियम था, मंदिर में जाकर उन्होंने भगवान को शिकायती लहजे में कहा...

" आज मेरा जन्म दिन है, नेगी जी थे तब सुबह-सुबह मेरे लिए फूलों का गुलदस्ता लाते और अपने हाथो से खीर बनाते थे! मन बहुत उदास है...कितनी अकेली हो गयी हूँ मै! वरुण ने भी अभी तक फ़ोन नहीं किया। बहुत बदल गया है वो! उस के पास मेरे लिए टाइम नहीं है। मेरी पूजा का कोई फल नहीं दिया आपने "

भगवान् से शिकायतें करते हुए उन्होंने अपनी घड़ी पर नजर डाली। उन्हें देर हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने अपनी शिकायतों को विराम दिया। मंदिर की घंटी बजाई, आंसू पोछे, आले पर रखी कटोरी से लाल रंग का टीका अपनी उँगली से ले कर माथे पर लगाया और कॉलेज की तरफ तेज चाल से बढ़ गयी। कॉलेज में पहुचंते टीचर्स और स्टूडेंट्स ने उन्हें घेर लिया। मॉर्निंग असेंबली में उनका ही इंतज़ार हो रहा था, बधाइयों की झड़ी, फूलों और उपहारों का ढेर लग गया। उनके लिए बर्थडे सोंग गाया गया। कोई स्टूडेंट उनके लिए हलवा बना के लाई थी, तो कोई लड्डू! सबका प्यार देख के उनका चेहरा खिल उठा। उन्हें लगा कि भगवान् को आज शायद ज्यादा ही सुना दिया। इंटरवल में उन्होंने रामखिलावन, जो उनके कॉलेज में माली था, को भेज कर सारे स्टाफ के लिए मिठाई और समोसे मंगवाए।

शाम को जब वो कॉलेज के बाहर निकली तो रामखिलावन गेट पर खड़ा मिल गया, उसके हाथ में एक छोटा सा भूरे रंग का भोटिया पिल्ला था।

"मैडमजी हमारी भूरी ने सात पिल्ले दिए हैं, आज आपका जन्मदिन है, जे पिल्ला हमारी तरफ से आपको भेंट! मैडमजी, पलीज़ रख लें...बहुत चुलबुला है ये! आपका मन लगा रहेगा...!"

"शायद सब जानते हैं कि मेरा मन नहीं लगता! मेरे अपने बेटे को छोड़ कर !" उन्होंने मन में सोचा

अब मैडम क्या करें ? वो सोच में पड़ गयीं!

कुत्ते की जिम्मेदारी भी एक इंसान के बराबर होती है...अकेले रहो तो चाहे कुछ बनाओ या नहीं पर कुत्ते के लिए तो बनाना ही पड़ेगा। फिर जगह जगह गन्दा करेगा। उन्हें सफाई का बहुत मेनिया था। कहीं भी धूल भी देख लें तो देवकी की आफत आ जाती थी। देवकी उनके घर में कई सालों से काम करती थी। छुट्टी के दिन आधा समय उनका साफ़ सफाई में कट जाता, आधा किताबें पढ़ने और अगले दिन का लेक्चर तैयार करने में।

ऐसे में कुत्ता...! जितनी बार छुओ उतनी बार हाथ धोना। बीमार भी वो कुछ ज्यादा ही रहती थी। जानवरों से उन्हें वैसे भी शुरू से कोई ख़ास लगाव नहीं था। बचपन में जब वरुण सड़क से पिल्ले पकड़ लाता था तो उसे मैडम की खूब डाँट खानी पड़ती थी। अब बुढ़ापे में ये बवाल पालें!

'मैडमजी। .क्या सोचने लगी आप...?'- रामखिलावन की आवाज ने उनकी सोच को ब्रेक लगाया

'रामखिलावन। .तुम तो जानते हो मैं अकेली हूँ। ऐसे में इस पिल्ले की जिम्मेदारी!'

'मैडमजी ये तो हाल ही पल जाते है...आप टेंशन न लो और अगर फिर भी आपको परेशानी हुई तो मुझे फ़ोन कर देना, मैं वापस ले जाऊंगा। आपका मन लग जायेगा'

"मन लग जायेगा" पर उसका विशेष ज़ोर था।

मैडम ने सोचा- "बात तो ठीक है। बेचारा कितने प्यार से लाया है, एक दो दिन रख लेती हूँ। फिर कह दूंगी कि मुझे परेशानी हो रही है, ले जाओ आके"

"ठीक है, पर तुम्हें इसे छोड़ने मेरे घर चलना पड़ेगा, मैं इसे कैसे ले जाऊँ?"

'मैं भी चलता हू...मैडमजी! बंटी मेरे बिना कहीं नहीं जाता..." रामखिलावन का छोटा लड़का दीपू चहकता हुआ न जाने कब आ गया

'बंटी कौन...? ओह ये पिल्ला...इसका नाम बंटी है...! ठीक है, तुम भी चलो...'-वो मुस्करा के बोली

आज जन्मदिन पर उनका मूड कुछ ज्यादा ही अच्छा हो गया था।

सात साल के दीपू को मैडमजी का बंगला हमेशा महल सा लगता था। अपने पिता के साथ अक्सर वो वहां बगीचे की निराई-गुड़ाई करने आ जाया करता था। मैडमजी की नजर घूमते ही वो सोफे पर बैठ जाता था, मानो उससे सिंहासन मिल गया हो! मैडमजी दीपू को चार टॉफ़ी ज़रूर देती थीं। इसलिए दीपू बस इस इंतज़ार में रहता कि कब मैडमजी के घर जाने का मौका मिले।

रास्ते भर दीपू बंटी की देखभाल और शरारतों के बारे में मैडम को जानकारी देता रहा, उनको भी उसकी बातें सुनने में बड़ा आनंद आ रहा था। दीपू को देख के उन्हें बचपन का वरुण याद आ जाता था। वैसे तो वो बड़ी अनुशासनप्रिय और कठोर थी, पर अंदर से उनका मन बहुत कोमल था। उनके अकेलेपन ने उन्हें कठोर बना दिया था।

"देखो देवकी! आज घर में एक नया मेहमान आया है...बंटी!" मैडमजी ने दरवाजे से ही देवकी को आवाज लगायी

देवकी हाथ पोछती हुई आई, पिल्ले को देख कर वो एकदम से खिल गयी।

'घर में कोई तो आया...चहलकदमी करने वाला। वरना मैडमजी तो मुंह लटकाए रहती हैं...'-देवकी ने सोचा

जैसे ही दीपू ने बंटी को फर्श पर रखा, उसने सुसु कर दी। मैडमजी को एकदम से गुस्सा आ गया।

लो हो गयी परेशानी शुरू...!

देवकी ने जल्दी से पोछा ला कर सुसु साफ़ की, उसे डर था कि मैडमजी का मूड बदलते ज्यादा देर नहीं लगेगी और मेहमान आज ही उल्टे पांव विदा कर दिया जायेगा...!

“अभी छोटा है न धीरे धीरे बाहर जा कर सुसु पोट्टी करना सीख जायेगा”- देवकी ने पिल्ले की तरफ से सफाई दी

खैर मैडमजी ने गुस्से पर काबू किया। देवकी से कह कर दीपू रामखिलावन को चाय नाश्ता करवाया।

पिल्ले को एक टाट के बोरे पर बिठा कर दोनों थोड़ी देर बाद चले गए।

थोड़ी देर बाद पिल्ले ने सप्तम सुर में रोना शुरू कर दिया। शायद भूखा था। देवकी उसके लिए दूध लेकर आई तो वो सुपुड सुपुड कर के पूरी कटोरी चाट गया। देवकी ने स्टोर से एक बड़ा सा गत्ते का कार्टन निकाला उसमें पुरानी दरी और चादर का छोटा बिस्तर बिछाया और बंटी का घर तैयार कर दिया।

मैडमजी निर्लिप्त भाव से सोफे पर बैठी सब देख रही थीं। उस कार्टन को देखते ही उन्हें वो दिन याद आ गया जब नेगी जी इक्कीस इंच का टीवी लाये थे और कई दोस्तों को उसके उद्घाटन में चाय समोसा खाने बुलाया था!

खाना बना के, बंटी को गत्ते वाले घर में डाल कर देवकी तो अपने घर चली गयी। अब घर में बचे दो प्राणी! बंटी एक-डेढ़ घंटे तो सोता रहा, फिर उसने गला फाड़-फाड़ कर गत्ते के घर से निकलने के लिए मदद मांगनी शुरू कर दी। मैडमजी ने उसे बाहर निकाला।

बंटी ने मैडमजी को देख शुक्राने में अपनी छोटी सी पूंछ हिलाई और उनके पैरों पर लोटने लगा। अब वो जहाँ जाएँ बंटी उनके पीछे-पीछे! उनको बड़ा अच्छा लग रहा था कि कोई तो उनके साथ है।

मैडम ने खाना खाया, बंटी उनके पैरों के पास बैठा रहा।

उन्होंने दो - तीन बार निर्देश देने की टोन में कहा " जाओ अपने बिस्तर पर सोने..."

छोटा सा पिल्ला क्या समझे, वो तो कूद कूद कर उन पर चढ़ने लगा!

बंटी तो जैसे उन्हें अपनी माँ मान बैठा था। वही उनके पैरो के पास झंडा गाड़ बैठ गया और अपनी छोटी छोटी आंखे बंद कर ली।

उनके मन में ममता उमड़ आई। उन्होंने उसे गोद में उठा लिया।

“बंटी तुझे ठण्ड लग रही होगी, चल अपने डिब्बे में सो जा। ये तेरा नया घर है”

फिर वो भी अपने कमरे में सोने चली गयीं। आज कुछ ज्यादा ही थक गयी थीं और खुश भी थीं, इसलिए लेटते ही नीद आ गयी। आधी रात को बंटी की रोने की आवाज से उनकी नींद टूट गयी। बंटी जोर जोर से कू कू कर रहा था। वो उठ कर कार्टन के पास पहुंची। उनको देखते ही वो उनकी गोद में आने की जिद करने लगा...! उन्होंने उसे बिस्कुट खिलाया, थोडा पुचकारा फिर उसे गत्ते के डिब्बे में सुला के वापस सोने चली गयी पर बंटी कहाँ मानने वाला था। उसने मैडम का कमरा देख लिया था, थोड़ी देर बाद, चुपचाप जाकर उनके बिस्तर पर सो गया।

सुबह देवकी ने जब डोर बेल बजायी तो मैडम की आँख खुली। पिल्ले को अपने बगल में सोता देख के उनका पारा चढ़ गया। गुस्से में उन्होंने बिस्तर की चादर ही खीच दी और बंटी चादर समेत नीचे आ गिरा और जोर जोर से अपनी एक टांग उठा के कू कू कर रोने लगा।

"देवकी मेरे बिस्तर की चादर को डिटोल डाल के धोना और गद्दों को धूप दिखाओ। देखो जरा, इस पिल्ले की हिम्मत मेरे पास आकर सो गया। जगह जगह गन्दा करता है। सारे घर में फिनायल डाल के पोछा लगाना...पता नहीं क्यों मैं ये मुसीबत घर ले आई...?"

" मैडमजी अकेले डर रहा होगा, छोटा है न...धीरे धीरे आदत पड़ जाएगी। मैं आज इसको नहला दूंगी साफ़ हो जायेगा। आप गुस्सा नहीं करो वरना ब्लड प्रेसर बढ़ जायेगा"

मैडम का पारा गिरता, इससे पहले ही उन्हें सोफे के पास बंटी की पॉटी नज़र आ गयी। देवकी ऐसे भाग भाग के सफाई में लग गयी, जैसे कोई आपात्कालीन स्थिति पैदा हो गयी हो।

थोड़ी देर बाद देवकी चाय ले आई। मैडम ने आदत के मुताबिक बाहर अखबार लेने गयी तो देखा कि बंटी (पिल्ला) बाहर बैठा अखबार का पोस्ट-मोरटम कर रहा है! मानो आग में घी पड़ गया! मैडम को लगा जैसे ये बंटी धीरे-धीरे उनके घर पर भी कब्ज़ा कर लेगा! रामखिलावन पर उन्हें बहुत गुस्सा आ रहा था।

"देवकी! अभी के अभी जाकर इसे राम खिलावन के घर छोड़ आओ। अब ये कुत्ता मेरे घर में एक मिनट और नहीं रह सकता..."

" मैडमजी मुझे आज जल्दी जाना है रामू की मैडम ने स्कूल बुलाया है। मैं शाम को छोड़ आउंगी। जब तक इसे बगीचे में ही छोड़ दें..."

..."ठीक है। इसे अन्दर मत आने देना, इसका खाना-वाना यही बाहर रख जाना। इंटरवल में रामखिलावन को भेज दूंगी। खुद आकर ले जायेगा ये मुसीबत!" कहते हुए वो गुस्से में बाथरूम में घुस गयी

देवकी ने फटाफट नाश्ता बनाया। बंटी को खाना दिया और चली गयी।

मैडम भी तैयार हो गयी कॉलेज जाने को बाहर निकली तो देखा...पिल्ला बागीचे में बहुत खुश था, कभी किसी चिड़िया के पीछे दौड़ता, तो कभी घास खाने लगता, कभी मिटटी खोदता।

उन्होंने कहा "खोद ले बेटे! शाम को तो तू रामखिलावन का आँगन खोदना! "

मैडम को देखते ही बंटी पूँछ हिलाता हुआ आ गया और उनके पैरों पर लोटने लगा जैसे मान जाने के लिए खुशामद कर रहा हो! पर मैडम का इरादा पक्का था उसे छोड़ने का...

मैडम कॉलेज को निकल गयी। घर में उन्होंने ताला लगा दिया और बंटी को बगीचे में ही छोड़ दिया।

रामखिलावन कॉलेज के गेट पर ही मिल गया "मैडमजी नमस्ते...कैसा है बंटी उसने ज्यादा परेशान तो नहीं किया?"

मैडमजी गुस्से में तो थी ही...

एक दम से झल्ला पड़ी — “शाम को उसे ले जाना अब मैं इस उम्र में जानवरों की पोट्टी सुसु साफ़ करुँगी क्या...? बिस्तर गन्दा किया। अखबार फाड़ दिया...बगीचे की मिटटी खोद दी। मेरे बस का नहीं कुत्ता पालना "

मैडमजी का खराब मूड देख रामखिलावन डर गया।

"जी ! आप कहे तो अभी जाकर ले आऊ...? "

"नहीं इंटरवल में ले आना, बाहर गार्डन में ही छोड़ा हुआ है। अब जाओ जाकर अपना काम करो"

उन्होंने क्लास ली, फिर स्टाफ रूम में आ गयीं। उनका मूड कुछ उखड़ा देख कर मिसिस शुक्ला बोली...

"क्या हुआ नेगी मैडम वरुण का फ़ोन नहीं आया?...आपको जन्मदिन की बधाई देने को ?

मिसिस शुक्ला को दूसरो के मामले में टांग अड़ाने में बहुत मज़ा आता था। मैडम का ख़राब मूड और खराब हो गया। पिल्ले के चक्कर में तो वो भूल ही गयी थी कि वरुण इस बार भी उनका बर्थडे भूल गया!

पर घर की बात बाहर क्यों बताएं, सो बोली –

"उसका तो कल से तीन बार फ़ोन आ चुका है। मेरा बहुत ध्यान रखता है वो। अमेरिका से एक स्वेटर भी पार्सल की है। मेरा मूड तो उस पिल्ले की वजह से ख़राब है जो रामखिलावन जबरदस्ती मेरे घर छोड़ गया, अब आप ही बताइए मिसिस शुक्ला...कॉलेज आऊ या पिल्ला पालूं...?"

मिसिस शुक्ला ने सोचा था कि आज वरुण को लेकर जम कर ताना मारेंगी कि क्या फायदा ऐसी औलाद का...जो माँ को भूल गया। किस्मत वालों के लड़के ही ठीक निकलते हैं बाकी तो कभी सगे नहीं होते। मेरा बेटा देखो यहीं टीचर है कितनी सेवा करता है मेरी आदि आदि...!

पर नेगी मैडम के जवाब ने उनकी प्लानिंग पर ठंडा पानी डाल दिया। वो सपाट स्वर में बोली "पाल लो! क्या बुराई है, अकेलापन तो दूर होगा, मन लग जाएगा!" और अपना पर्स और किताबें उठा स्टाफ रूम से निकल गयीं।

नेगी मैडम सोच में डूब गयी..."हाँ कितनी अकेली हूँ मैं...! नेगी जी वक़्त से पहले छोड़ गए। लड़के को हाल पूछने की फुर्सत नहीं। बस रात में सोना और सुबह कॉलेज आ जाओ। ज़िन्दगी जैसे मशीन बन के रह गयी है कोई ख़ुशी नहीं, बस जी रहें है क्यूंकि जीना है, वैसे भी मांगने पर तो मौत भी नहीं आती"

बादल तो सुबह से ही थे, अभी थोडा मौसम और गहरा गया और जोर शोर से बारिश शुरू हो गयी। बारिश देख कर मैडम ने पानी में यादों की कश्ती उतार ली!

"नेगी जी बादल देखते ही पकोड़े और मीठे चीले बनाने की फरमाइश करने लगते थे। फिर बगीचे से ताजे पालक और हरी मिर्ची तोड़ लाते, आलू भी छील देते! वो चाय बनाते और मैं पकोड़े!...फिर बरामदे में बैठ के बारिश का मज़ा लेते हुए खाते रहते। कितने सुकून भरे दिन थे, देर तक बारिश को देखते रहते, नेगी जी कवि- हृदय थे, वो नयी नयी कविताये बनाते जाते और कहते…

"गीता तुम्हारे हाथो के पकोड़ो में जादू है, इनको खाते ही मुझे नए नए आईडिया आते हैं...कवितायेँ बह निकलती हैं!"

और मैं शरमाते हुए मुस्करा देती। नेगी जी जब तक जिन्दा थे घर में रौनक थी, कभी वरुण की कमी नहीं खलती थी और ये लड़का यह भी नहीं सोचता बूढी माँ अकेले सब कैसे सम्हालती होगी ? वैसे गलती तो बहू की ज्यादा है। वो बेचारा तो काम में लगा रहता है। बहू को कौन सी फ़िक्र है...अपनी माँ को तो रोज़ फ़ोन करती है! क्या मैंने उसे बेटी की तरह नहीं समझा...? उसी टाइम मना कर देती शादी को, तो अच्छा रहता! सभी कहते थे अपनी कास्ट की पहाड़ी लड़की लाओ, मैदानी लड़कियां बहुत तेज़ होती हैं और ये तो दिल्ली की है! एकदम एडजस्ट नहीं करती दिल्ली वाली लड़कियां!

पर मैंने सोचा लड़के की पसंद ज़रूरी है। वरुण उसे बहुत प्यार करता था। दोनों ने साथ ही दिल्ली से इंजीनियरिंग किया था। बिरादरी की होती तो कम से कम लिहाज़ तो करती...अमेरिका जाके खुद को अमेरिकन समझने लगी है..."

चपरासी ने घंटा बजाया तो उनकी यादों की कश्ती रुकी। बारिश अभी भी बहुत तेज हो रही थी। वो अपना क्लास लेने गयीं, क्लास में पढ़ाते हुए उनकी नज़र खिड़की से बाहर गयी, उन्होंने देखा कि रामखिलावन की भूरी मुँह में एक पिल्ला दबाये हुए बारिश से बचने को बरामदे की तरफ भाग रही थी। भूरी को देखते ही उन्हें बंटी का ध्यान आया।

"अरे बंटी को तो मैं बाहर ही छोड़ आई थी वो बेचारा भीग रहा होगा! कहीं ठण्ड न लग जाये!"

आसमान की घटायें चिंता बन के मन पर भी छा गयीं। जैसे तैसे क्लास खत्म किया। अब उनका मन कॉलेज में नहीं लग रहा था।

"अगर बंटी को कुछ हो गया तो कितनी बदनामी होगी! एक दिन छोटा बच्चा न संभाला गया...बारिश में मार दिया...पिल्ला तो छोटा है नासमझ है, उसकी क्या गलती?"

अब उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था, “क्यों मैं उसे बाहर छोड़ कर आई...एक दिन घर के अन्दर रह जाता तो क्या होता...?मैं भी सच में पत्थर दिल हो गयी हूँ..."

उन्होंने प्रिंसिपल साहब से निवेदन किया "सर! मुझे घर जाना है, मेरी तबियत ठीक नहीं...। "

"अरे नेगी मैडम! ऐसी बारिश में आप कैसे जाएँगी? यही पर आराम कीजिये, मैं रेस्ट रूम खुलवाता हूँ "

"नहीं सर! मेरा जाना बहुत जरूरी है, मेरी दवाइयां घर पर हैं"

"अच्छा ठीक हैं " कह के उन्होंने अपने ड्राईवर को फ़ोन किया...:"

"राम सिंह! नेगी मैडम को उनके घर छोड़ आओ"

मैडम ने कृतज्ञता भरी नज़रों से उन्हें देख कर आभार व्यक्त किया। रास्ते में कई जगह छोटे छोटे झरने बहने लगे थे। जैसे-जैसे घर पास आ रहा था, उनकी धड़कने बढ़ रही थी,

"कहीं बंटी ठण्ड से मर न गया हो!"

घर के सामने पहुँचते ही वो जल्दी से कार से उतर गयी। डरते हुए उन्होंने मेन गेट का ताला खोला तो देखा बंटी गमलों के बीच भीगा हुआ सुस्त सा पड़ा है। उन्हें देखते ही वो कू कू करने लगा।

उनका दिल भर आया, लपक कर उसे गोदी में उठा लिया और अन्दर ले आई। उस पर डिटोल का पानी डाला, तौलिये से पोछा और हीटर चला कर सामने बैठा दिया। बंटी के लिए दूध गरम कर के उसमें हल्दी मिलायी। बंटी अभी भी ठण्ड से कांप रहा था। उसने दूध पी लिया और फिर थोड़ी देर में उल्टी कर दी और सुस्त सा जमीन पर लेट गया। उन्होंने उसे खाने को बिस्कुट दिया पर बंटी ने बिस्कुट की तरफ देखा तक नहीं।

मैडम बहुत दुखी हो गयी वो रह-रह के खुद को कोस रही थीं। एक अपराधबोध ने उनके मन को भारी कर दिया था। बंटी ठण्ड से कांप रहा था। उन्होंने अलमारी से एक शाल निकाली और उसे लपेट लिया, पैरासिटामोल की आधी गोली बंटी के गले में डाली और फिर उसे गोद में लेकर बैठ गयीं। उन्हें ऐसा लग रहा था मानों उनका अपना बच्चा बारिश में भीग कर बीमार हो गया हो! उसे गोद में लिए हुए वो सोफे पर बैठे-बैठे सो गयीं। एक घंटे बाद उनकी नीद खुली, बंटी अभी भी उनकी गोद में दुबक के सो रहा था, उन्होंने उसको चूम लिया, पिल्ला जग गया और उनका मुँह चाटने लगा। उन्होंने उसे नीचे उतारा, उतरते ही उसने सुसु कर दी। पर आज उन्हें गुस्सा नहीं आया। उन्होंने मुस्कराते हुए एक पुराना अखबार सुसु पर रख दिया। बंटी का बुखार उतर चुका था। अब वो भूखा था, एक कटोरा दूध पीकर और आठ-दस बिस्कुट खा कर उसकी भूख शांत हुई।

शाम हो गयी थी पर बारिश अब भी चालू थी। देवकी तो आई नहीं, आज तो खुद ही कुछ बनाना पड़ेगा। सोचते हुए मैडमजी किचन में घुस गयी..."क्यों न आज पकोड़ी बनाऊ!"

पिल्ला भी किचन में घुस आया। उन्होंने प्यार से उसे कई बार समझाया तो वो किचन के दरवाजे पर डेरा डाल के बैठ गया। और बीच बीच में कु कु कर के और पूँछ हिला के उन्हें अपनी उपस्थिति का अहसास कराता रहा।

उन्होंने बंटी को पकोड़ी खाने को दी तो वो फटाफट खा गया। वो सोफे पर बैठ के आराम से चाय के साथ पकोड़ियाँ खाती रही और बंटी एक बाल को उछाल उछाल कर खेल रहा था।

"बंटी अपने इंतज़ाम खुद कर लेता है, पता नहीं ये बॉल कहाँ से ले आया!" मैडम को हँसी आ गयी

टीवी पर एक पुरानी पिक्चर आ रही थी, वो देखने लगी और बंटी भी सोफे पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। कई बार गिरने के बाद, आखिर चढ़ ही गया और मैडम की गोद में सर रख के सो गया। उन्होंने कुछ नहीं कहा बल्कि उन्हें उसका स्पर्श बड़ा सुकून दे रहा था।

जब वो सोने जाने लगी तो बंटी को डिब्बे में सुला गयीं, लेकिन बंटी फिर रात में बिस्तर पर मिला। उन्होंने थोडा कड़क स्वर में उसे समझाने की कोशिश की, पर बंटी अड़ा रहा और बड़ी मुश्किल से कु कु कर के इस शर्त पर राजी हुआ कि उसका बिस्तर भी मैडमजी के बिस्तर के पास ही लगेगा। ये समझौता रात के लगभग डेढ़ बजे हुआ!

अगले दिन सुबह देवकी जल्दी ही आ गयी। बंटी, घंटी की आवाज सुन के भौकने लगा। मैडम को ऐसा आनंद हुआ मानो उनका बच्चा पहली बार कुछ बोला हो.!

"मैडमजी मैं अभी इसे छोड़ आती हूँ। कल बारिश की वजह से नहीं आ पाई"

वो घबराई हुई थी पर मैडम को मुस्कराते हुए देख के उसे अचरज हुआ। कल का मिज़ाज़ देख कर तो वो आज आते हुए भी डर रही थी।

मैडम बोलीं- "नहीं देवकी अब बंटी मेरे साथ ही रहेगा। ये बहुत प्यारा है और इसकी वजह से मेरा मन भी लगा रहेगा और फिर तुम तो हो ही इसे सँभालने को!"

देवकी के चेहरे पर रौनक छा गयी।

***


बंटी की वजह से मैडमजी अब खुश रहने लगी। रोज सुबह सुबह उसे लेकर सैर पर निकल जातीं। लौट के देवकी की बनायीं चाय पीती, नाश्ता करती, जब वो बगीचे में पानी डालती तो बंटी उनके आगे पीछे पाइप से पानी पीने की कोशिश में लगा रहता। और मैडम उसे पूरा भिगो देती थीं, भीगा हुआ बुनती पूरे घर में चौकड़ी मारता हुआ भागता। कई बार गंदे मिटटी लगे पैरों के निशान भी सोफे और चादरों पर छूट जाते पर मैडम को अब किसी चीज़ पर गुस्सा नहीं आता। बुनती की शरारतें देख वो आनंद और उर्जा से भर जातीं। जब मैडमजी कॉलेज जाने लगती तो बंटी भोंक भोंक के शिकायत करता मानो कह रहा हो

"मुझे भी ले चलो...मैं अकेला क्या करूँगा."

शुरू शुरू में बंटी मैडम के कॉलेज से आने तक बहुत नुक्सान कर चुका होता था, कभी चादर फाड़ देता, कभी मोबाइल का चार्ज़र काट देता। फिर मैडम उसे नाराजगी जाहिर करती तो बंटी मासूम सी डरी हुई ऑंखें बना कर उन्हें इस तरह देखता कि उनकी हंसी छूट जाती।

“तू मेरा कृष्ण है, नटखट”- कहते उसे वो उसे दुलारने लगतीं!

धीरे धीरे मैडम उसे लाइन पर ले आई। बड़ा होने के साथ साथ बंटी समझदार भी हो गया। जब वो घर लौटती तब बंटी घर के बाहर बैठा हुआ मिलता। उन्हें आता देख उनकी तरफ दौड़ जाता। देर तक उनके पैरो पर लोटता रहता और वो ख़ुशी से फूली न समाती। पहले तो घर लौटना ही उन्हें बोझ लगता था। अब तो उन्हें आखिरी घंटा शुरू होते ही घर जाने की हूक लगने लगती थी।

मैडम की वीरान नीरस ज़िन्दगी में बहार आ गयी थी। उधर वरुण हैरान था कि माँ अब रोज फ़ोन क्यों नहीं करती। मैडमजी जिनका एक दिन भी उससे बात किये बिना मन नहीं लगता था। अब पंद्रह-बीस दिन में कभी कभार फ़ोन करतीं। अब वो खूब आनंद से भोजन करती, पहले तो एक रोटी भी मुश्किल से गले से नीचे उतरती थी। शाम को बंटी से खेलने आस पड़ोस के बच्चे भी आ जाते, जो पहले मैडमजी के घर के सामने से भी जाने से डरते थे! अब मैडमजी उन्हें टॉफी देने लगी थीं।

शाम को खूब रौनक रहती। उन बच्चो की माएं भी कभी कभी आ जाती। जिन्होंने कई सालो से मैडमजी को हँसते हुए नहीं देखा था अब वो उन्हें खिलखिलाता देख के खुश होती। कोई उनके लिए अपने बगीचे की मीठी खुमानी ले आती तो कोई मीठे शक्कर पारे, चाय-नाश्ते का दौर चल जाता। वो सबको नेगीजी और वरुण के बचपन के किस्से सुनाती और उनके सुख दुःख को भी साँझा करतीं। सन्डे को वो बच्चों को गणित के आसान फॉर्मूले भी बता देती!

अब वो अकेली नहीं थी और वो मन ही मन रामखिलावन का धन्यवाद देती। जिसने उन्हें बंटी दिया। दीपू अक्सर बंटी से खेलने आ जाता तो वो उसे खूब खिला पिला के विदा करती।

बंटी की वजह से उनका स्वास्थ भी सुधर गया था। वो रोज कॉलेज जाते समय शंकर भगवान को धन्यवाद करना नहीं भूलती। समय गुजरता गया। बंटी एक साल का हो चुका था। भूरा चटकीला रंग, रेशमी मुलायम बाल और बड़ी मासूम सी चमकीली हरापन लिए भूरी ऑंखें। देखने में बहुत शानदार लगता था। उनके साथ थैला पकड़ कर बाजार जाने की वजह से नेगी मैडम और बंटी पूरे अल्मोड़े में मशहूर हो गए थे, अब उन्हें को वरुण का इंडिया न आना खटकता नहीं था। कॉलेज के बाद उनका पूरा समय बंटी के साथ चुटकियों में कट जाता था। उसे वो बिलकुल अपने बच्चे की तरह पाल रहीं थी।

एक दिन वो कॉलेज से लौटी तो बंटी रोज की तरह गेट पर उनका रास्ता देखता नहीं मिला। उन्हें हैरानी हुई। शायद पिछले आठ महीनों में ऐसा पहली बार हुआ था! उन्होंने सोचा शायद बंटी सोफे पर बैठा कैल्सियम ब़ोन चबा रहा होगा। उन्होंने जोर से उसका नाम पुकारा। लेकिन कोई हलचल नहीं हुई, मारे घबराहट के उनकी साँसे तेज़ हो गयी। अन्दर जाकर देखा तो बंटी का कहीं नमो निशान नहीं था। उसका खाना भी कटोरे में जैसे का तैसा रखा था। .

मैडम ने बहुत आवाज़ लगायी पर बंटी का कही पता न था। उन्हें चिल्लाते देख के आस पास के बच्चे भी आ गए, वो सब भी बंटी के न मिलने की खबर से हैरान हो गए। पड़ोसियों का जमावड़ा लग गया था। सभी दिशाओ में बच्चे दौड़ा दिए गए, पर बंटी का दूर दूर तक कोई पता नहीं था...!

***


बारिश के दिन थे। आसमान पर बादल छाए थे...अँधेरा गहरा रहा था। हालाँकि शाम के पाँच ही बजे थे पर ऐसा लग रहा था कि रात हो गयी। बंटी की खोज खबर न मिलती देख मैडमजी ने छाता निकाला और टोर्च लेके खुद ढूंढने निकल पड़ी।

लोगो ने बहुत समझाया कि " बंटी आ जायेगा आप ऐसी बरसात में न जाए...!"

पर वो धुन की पक्की थी बोलीं " मैं कैसे अपने बेटे को बारिश में भीगने को छोड़ दूँ ? ज़रूर कोई बंटी को कुछ खिलापिला के ले गया है। शायद मेरी आवाज़ सुन के बंटी का पता लग जाये...!"

मैडमजी सबकी ख़ास थी, सो अकेले कैसे जाने देते...! मोहल्ले के पाँच-सात तगड़े लड़के भी उनके साथ लग लिए। अगले दो घंटों तक वो अल्मोड़ा की सभी सड़को और गलियों को छानते रहे, पर बंटी का कोई सुराग नहीं मिला...!

थक हार के वो सब घर लौट आये। पड़ोस की मिसेज़ पन्त मैडमजी के लिए खाना दे गयी पर भूख तो बंटी के साथ ही गायब हो चुकी थी। रात के बारह बजने को आये पर आँखों में नीद का नाम न था। रह रह के उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे, बाहर ज़ोरदार बारिश हो रही थी। बार बार उन्हें अहसास होता बंटी उनके पास है, वो चौक जाती पर कोई न होता।

"कैसा होगा मेरा बंटी? कहाँ चला गया अचानक...! पता नहीं उसने कुछ खाया भी होगा या नहीं...? किसी से मेरी क्या दुश्मनी थी जो मेरे बच्चे को ले गया...शायद कल सुबह वो लौट आये "वो अपने आप से बातें कर रही थी

बार-बार खिड़की का पर्दा खिसका कर वो मेन गेट की तरफ देख लेती कि कही बंटी आ गया हो और बारिश में भीगता रहे...रात भर में वो जाने कितनी मन्नतें मांग चुकी थी...!

जैसे-तैसे सुबह हुई, देवकी आई तो देखा कि मैडमजी को तेज बुखार था। देवकी को घर के बाहर ही सारी बात पास वाले बबलू से पता चल चुकी थी, कल वो बारिश की वजह से नहीं आ पायी थी। बंटी के गुम हो जाने की खबर से वो भी बेहद दुखी हुई! उसने जल्दी से आ कर चाय बनाई और उनको मनुहार कर के चाय नाश्ता करा दिया।

अभी मैडमजी सोफे पर बैठी हुई, वो साड़ी देख रही थी जो बंटी के लाड में आकर फाड़ दी थी.!.घर की हर चीज़ उन्हें बंटी की याद दिला रही थी। वो सोच रहीं थी, शायद अकेलापन ही उनकी नियति है...! ज्यादा दिन वो खुश रहें भगवान् देख नहीं सकते...!एक बार फिर भगवान शंकर से उन्हें शिकायत थी!

तभी उनका पढाया हुआ एक स्टुडेंट प्रकाश बिष्ट जो अभी हाल में ही सब-इंस्पेक्टर बना था, कमरे में दाखिल हुआ!

पैर छूता हुआ बोला..."मैडम मुझे पता चला कि आपका बंटी रात से गायब है, आप चिंता न करें। शाम तक बंटी घर पर होगा...! मेरे होते हुए आपने रात में सडको पर चक्कर लगाया। एक बार फ़ोन तो कर दिया होता...!"

वो रुधे गले से बोलीं..."प्रकाश परेशानी में ध्यान ही नहीं आया...अगर तुम मेरे बंटी को ले आओ तो तुम्हारा बड़ा अहसान होगा वही तो एक मेरे बुढ़ापे का सहारा था...उसकी वजह से थोडा हँस लेती थी..."

"मैडम आप फ़िक्र न करो...! सोचो बंटी आ गया...! मैंने उसे लेकर ही लौटूंगा और अहसान कैसा? आप तो मेरी माँ समान हैं, आपकी वजह से ही आज मैंने ये वर्दी पहनी है। वरना तो मैं पढ़ने में "माशाअल्लाह" ठहरा। आप का मार्गदर्शन न मिलता तो कहीं पान की दुकान लगा कर बैठा होता!" प्रकाश अपनी वर्दी का कालर ठीक करते हुए बोला

उसके जाने के बाद देवकी भी काम निपटा कर चली गयी। मैडमजी का फ़ोन बजना रुक ही नहीं रहा था, शायद सारे अल्मोड़े को खबर मिल चुकी थी! जैसे ही फ़ोन बजता मैडम को लगता बंटी की कोई खबर आई होगी पर हर बार निराश हो जातीं।

***


देवकी भी आज बहुत परेशान थी। मैडमजी ने उसे तब सहारा दिया था, जब उसका आदमी जेल चला गया था। दस सालों से वो मैडमजी के साथ थी, नेगी जी के जाने के बाद उसने आज पहली बार मैडम को इतना दुखी देखा! उसे भी बंटी को बहुत याद आ रही थी। जैसे ही देवकी घर मैडम के घर पहुँचती बंटी खूब उछलता। जितने देर वो सफाई करती बंटी उसके साथ खेलता, कभी झाड़ू छीनता कभी उसे पोछा नहीं लगाने देता। देवकी उसे बांध आती फिर वो भौकने लगता और मैडम से उसकी शिकायत करता। बंटी की वजह से घर में रौनक बनी रहती थी।

घर पहुँच कर देवकी ने चूल्हा जलाया और पतीले में कढ़ी चढाई। पानी लेने वो आंगन में आई तो उसे उसके बेटे रामू का बस्ता चारपाई पर पड़ा नज़र आया। वो रामू को आवाज़ लगाते हुए ढूंढने लगी।

“इजा (माँ) छत पर हूँ” - रामू ने चिल्लाते हुए कहा

देवकी छत पर चली आई। रामू छत पर पैर फैला का बैठा कबाब खा रहा था।

रामू उसका इकलौता बेटा था, जो चौदह साल का था। अपने दोस्तों के चक्कर में पड़ कर सारा दिन आवारा घूमता, पढाई लिखाई में जीरो था। सारा दिन मटरगस्ती में निकाल देता था। माँ की बातों पर कान न देता। किसी तरह देवकी घरो में झाड़ू पोछा कर के अपना घर चला रही थी। उसको घर पर कबाब खाते देख देवकी को हैरानी हुई...

"क्यों रे रमुआ आज इस्कूल नहीं गया? क्या इस साल भी आठवी में रहने का इरादा है ? और ये कबाब कहाँ से लाया...?'

"इजा (माँ) ये मेरे दोस्त की इजा ने दिए हैं, आज उस का जन्मदिन था न...उसके घर बकरा कटा था। ले तू भी खा" - कहते हुए उसने एक कबाब देवकी की तरफ बढाया

'छि...नी खाना मुझे। कौन सा ऐसा दोस्त है जिसकी बकरा खरीदने की औकात है...झूठ मत बोल सच बता...".

"इजा तू नहीं जानती उसे! मेरे स्कूल में पढता है, नदी पार रहता है...तू भी न! कितने सवाल करती है...अबकी बार मैं कक्षा में फस्ट आऊंगा...देख लेना"

"आ गया फस्ट तू...! अरे रमुआ कितना रुलाएगा अपनी इजा को? तेरे बोजू (पिता) ने क्या कसर छोड़ी थी..." - बडबडाते हुए देवकी घड़ा उठा के नौले पे पानी भरने चली गयी। साथ में धोने को गंदे कपडे भी ले गयी। ये उसका रोज का नियम था।

नौले पर नहाने के बाद उसने उसने गंदे कपडे धोने को उठाये। रामू की पैंट में साबुन लगा ही रही थी की उसे लगा जेब में कुछ कागज हैं। उसने देखा तो उसे तीन सौ रुपये मिले। इतने रुपये देख उसका माथा ठनका, आसपास और औरतें भी थी। उसने चुपचाप छुपा कर किसी तरह रुपये अपनी चोली में रख लिए। कपडे धो कर वो गुस्से में वो घर पहुंची। रामू अच्छे बच्चे की तरफ पढने बैठ चुका था। वो गुस्से में कपडे पीटने का धोबन लेके रामू के ऊपर झपटी

"रमुआ...सच बता इतने रुपये कहाँ से आये ?"

रामू बचने को दौड़ा

"इजा मारना नहीं...ये तो मेरे दोस्त के हैं..."

"फिर झूठ...ऐसा कौन कृष्ण मिला गया तुझे सुदामा को जो कबाब भी खिला रहा और पैसे भी बाँट रहा? सच बता वरना आज मैं तुझे नहीं छोडूंगी..."-कहते हुए देवकी ने एक धोल उसकी पीठ पर जमा दिया

दो चार झापड़ खा कर रामू का मुँह खुला..."इजा! मैंने मैडमजी का बंटी पाँच सौ रुपये में नदी के पास भीकम ढाबे वाले को बेच दिया, सौ रुपये के कवाब ले आया और सौ रुपये बिल्लू को दिए"

"हाय राम...!" देवकी सर पकड़ के बैठ गयी...

"तूने मैडमजी के बंटी को बेच दिया! चोर कही का...! पता है न उनके कितने अहसान है हम पर और तूने इतना नीच करम कर दिया...! जा मर जा कही डूब के! अब तू जेल जायेगा। देखना मैडमजी का पढाया हुआ पुलिसवाला तुझे खूब मारेगा। अब तो मेरी नौकरी भी जाएगी। "

"कहाँ है बंटी? जा कर उसे लेके आ। कैसे चुराया तूने उसे ? अपने बौजू के जैसा ही चोर और आवारा है तू"

रामू घबरा गया था। उसकी आँखों के सामने पुलिस के डंडे घूम रहे थे।

"इजा मुझे बिल्लू ने बोला था कि भीकम बंटी जैसे मोटे ताजे कुकुर के अच्छे पैसे देगा। वो अपने ढाबे के लिए कुत्ता पालना चाहता है। वो ही नशीला बिस्कुट लाया था। जिसे खाकर बंटी चुपचाप हमारे साथ चल दिया था। फिर बिल्लू और मैं उसे भीकम को बेच आये..."-रामू ने रोते हुए सारी बात उगल दी

"चल मुझे बता कहाँ है बंटी...?"-देवकी ने घास काटने की दराती उठा ली, मानो बंटी की रक्षा करने के लिए उसमे साक्षात दुर्गा उतर आई हों!

रास्ते में रामू के दोस्त बिल्लू को भी साथ लिया जिसके उकसाने पर रामू इस काम को राजी हुआ था। पहले तो वो भीकम के पास चलने को आनाकानी कर रहा था पर जब देवकी ने उससे पुलिस का डर दिखाया तो वो फटाफट तैयार हो गया।

लगभग एक घंटे चल के वे लोग नदी किनारे बसे छोटे से गाँव में पहुंचे। भीकम के ढाबे के सामने के सामने बंटी बंधा था। बंटी मिटटी से लथपथ उदास सा बैठा था। देवकी को देखते ही बंटी भोकने लगा, भीकम के डर से जो पूंछ लंगोट बन गयी थी, वो अब तेजी से हिलने लगी। बंटी अपनी चेन तुड़ाने लगा, देवकी को देख के उसे हिम्मत मिल गयी थी...!'

अपने नाम को चरितार्थ करता भीकम, गल्ले पर बैठा कोई पुराना पेपर पढने में लगा था, ढाबे पर कुछ लोग खाना खा रहे थे। भीकम का ढाबा उस इलाके में मशहूर था।

देवकी ने उसे नमस्ते किया और बोली -"दाजू (बड़ा भाई) ये कुकुर हमारी मैडमजी का है उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया है। ये लो अपने पांच सौ रुपये और हमें कुत्ता वापस कर दो..."

भीकम अड़ गया -" कुकुर (कुत्ता) अब मेरा है और मैं वापस नहीं दूंगा, लेना है तो हज़ार रुपये दो, वैसे भी कल से ये यहाँ मीट खा रहा है अब इसके दाम बढ़ गएँ हैं!"

देवकी रोने लगी..."दाजू...दया करो गरीब हूँ। कहाँ से इतने पैसे लाऊंगी...? लड़के ने नादानी कर के दोस्तों के कहने में आकर कुकुर चुरा लिया। मैडमजी बड़े कॉलेज में पढ़ाती हैं। उन्होंने पुलिस वाला बुला लिया है। बात कहाँ छुपती है ? मेरे लड़के को पकड़ ले जायेंगे। मेरा और कोई नहीं उसके सिवा और तुम भी लपेटे में आ जाओगे। ये रुपये लो और कुकुर (कुत्ता) वापस कर दो...".

भीकम ने थोडा सोचा। पुलिस का चक्कर हो सकता है। अभी तीन महीने पहले ही वो मारपीट के आरोप में सजा काट के आया है। फिर कही कोर्ट कचहरी के चक्कर न पड़ जाएँ। सोचते हुए उसने पांच सौ का नोट चुपचाप जेब में सरका लिया। और बंटी की चेन खोल देवकी को थमा दी।

देवकी और रामू ख़ुशी ख़ुशी बंटी को लेकर मैडम के घर की तरफ चल पड़े। रास्ते में देवकी ने गुल्लू की दूकान से रस्क खरीद बंटी को खिलाये। उसने रामू को सख्त हिदायत दी कि वो और उसके दोस्त आगे से मैडम के घर के आस पास भी न दिखें...

मैडम की गली आते ही बंटी चेन छुड़ा के दौड़ गया और गेट को छलांग मार के पार कर गया। मैडम उदास सी सोफे पर लेटीं थी। बंटी सीधे उनके ऊपर कूदा और उन्हे चाटने लगा। मैडमजी समझ नहीं पा रही थी कि ये अचानक क्या हुआ। उन्होंने बंटी को जी भर के प्यार किया। बंटी उनसे ऐसे चिपक गया जैसे शिकायत कर रहा हो..."माँ तुमने मेरा ध्यान नहीं रखा...तभी तो मुझे कोई चुरा के ले गया "

तब तक देवकी और रामू भी आ गए।

देवकी बोली...

"मैडमजी बंटी को कोई चुरा के ले गया था नदी के पार। रामू और उसके दोस्तों ने देखा तो पीछा किया और बड़ी मुश्किल से छुड़ा कर लाये। आप कहो तो पुलिस वाले भैया को वहां लेकर जाऊ...?

बंटी की हालत देख उनकी आंखे भर आई। मिट्ठी उसके भूरे बालों पर सूख कर चिपक गयी थी। वो बंटी को सहलाते हुए रुधे गले से बोली-" देवकी तुम्हारे रामू ने मेरा बेटा वापस लाके मुझ पर बहुत उपकार किया है। अब छोड़ो! बंटी मिल तो गया है, प्रकाश तो वैसे ही गुस्से वाला है। बात बढ़ाने से क्या फायदा? आज से रामू को पढ़ाने की जिम्मेदारी मेरी हुई। बड़ा बहादुर बच्चा है".

फिर अन्दर से एक नयी साड़ी लाकर देवकी को दी। देवकी की आंखे डबडबा गयीं। उसने मैडम के पैर छू लिए।

"मैडमजी आप हमारी माई बाप हो! आप जिए हजारो साल...आपका बंटी सलामत रहे!"

“और ये रामू के लिए, नयी शर्ट खरीद लेना”-कहते हुए उन्होंने पास रखे पर्स से पांच सौ रुपये देते हुए कहा

रामू ने मैडमजी के पैर छुए और रामू मन ही मन अच्छा बनने की कसम खाई। उसने शुक्र मनाया कि बंटी बोल नहीं पाता वरना उसे पाँच सौ रुपये नहीं पाँच सौ डंडे पड़ते!

मैडम को अपना बंटी वापस मिल चुका था। उन्होंने रामू को भेज कर लड्डू मंगवाए और भगवान का भोग लगा के पूरे महोल्ले में बटवाए। मैडमजी को अपनी ख़ुशी वापस मिल चुकी थी।

घर का मेन गेट पहले से ज्यादा ऊँचा कर दिया गया था और बाड़े में नए कटीले तार लगा दिए गए थे। बंटी को ख़ास ट्रेनिंग दी गयी कि मैडम के अलावा किसी की दी हुई चीज़ को न खाए। उधर वरुण अमेरिका से अपने आने की सूचना देने को फ़ोन पर फ़ोन मिला रहा था और मैडमजी बंटी के साथ बगीचे में बॉल खेलने में मस्त थीं...!




(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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