निर्माल्य — डॉ. सच्चिदानंद जोशी : हिंदी कहानी



निर्माल्य

— डॉ. सच्चिदानंद जोशी


मंच पर जैसे ही कलाकार के नाम की घोषणा हुइ, मै भौचक्का रह गया। कल से जिसे मैं लड़की समझ रहा था, वो लड़का निकला। वह मंच पर अपनी सितार हाथ में लिये आ रहा था और मैं कल के अपने लतिका के साथ हुए उस संभाषण को याद कर रहा था, जब इस संगीत सभा का कार्ड हमारे हाथ लगा।

‘‘ये आजकल के बच्चे भी बड़े चतुर होते हैं। रियाज करके अच्छा गाने-बजाने की बजाय नाम से सेंशेसन पैदा करने की कोशिश करते हैं।’’ मैंने कहा।

‘‘क्यों क्या हुआ? कौशिकी तो गाती भी शानदार है, जितना सुन्दर वो दिखती है, उतना ही सुन्दर वो गाती भी है।’’ लतिका ने कहा। उसे लगा, मैं कौशिकी चक्रवर्ती की बात कर रहा हूं।

‘‘अरे, मैं कौशिकी की नहीं, उसके नीचे लिखे नाम की बात कर रहा हूं। अब भला ये भी कोई नाम हुआ ‘एन. स्वरपुत्र‘ । लगता है, जैसे किसी ने प्रसिद्ध नामो का जुगाड़ कर एक नया नाम बना लिया हो।’’

‘‘नामो का जुगाड़?’’ लतिका को शायद मेरा ऐसा कहना पसंद नहीं आया था।

‘‘और नहीं तो क्या, एन. राजम के नाम से एन. चुरा लिया। और मुकुल शिवपुत्र से मिलता-जुलता नाम स्वरपुत्र रख लिया। अब कौन समझाये इस लड़की को कि शोहरत ऐसे विचित्र नाम से नहीं, अच्छा रियाज करने से मिलती है।’’

अपने कल के इस संभाषण के बारे में सोचकर मैं मन ही मन हंस रहा था और मंच पर बैठे उस पच्चीस साल के लड़के को अपनी सितार ट्यून करते देख रहा था। हॉल खचाखच भरा था लेकिन इस बात का अहसास शायद उसे भी था कि ये भीड़ उसके लिये नहीं, कौशिकी के लिये जुटी है। लेकिन वह जान रहा था कि यह अवसर भी है उसके लिये कि वह अपने इस विचित्र लेकिन सर्वथा अपरिचित नाम का परिचय पुणे संगीत रसिकों को करवा दे। इसलिये वह तन्मयता से अपनी सितार ट्यून कर कार्यक्रम की तैयारी कर रहा था।

उसी समय मुझे याद आ गया अपने विद्यार्थी जीवन का एक प्रसंग, जब किसी संगीत सभा के बारे में चर्चा करते हुये मेरे एक मित्र ने, जो संगीत की दुनिया से सर्वथा अपरिचित था, कहा था, ‘‘कल हमारे यहां एन. राजम आ रहा है।’’ और मैंने दुरुस्त करते हुये कहा था ‘‘आ रहा है, नहीं, आ रही हैं कहो-वे महिला हैं और बहुत वरिष्ठ कलाकार हैं वो वायोलिन की।’’

मेरे विचारों की तन्द्रा उसके सितार की झंकार से टूटी। उसके पहले ही सुर ने मानो मुझे बांध लिया। और जो एक बार मैं उसके सुरों के जाल में उलझा तो उलझता ही चला गया। वह पूरिया बजा रहा था। गायकी अंग से सितार पर ऐसा मार्मिक पूरिया मैंने पहले कभी नहीं सुना था। मैं चकित था इस उम्र में उसकी तैयारी और आत्मविश्वास देखकर। उन श्रोताओं को साधना और बांधे रखना बहुत कठिन होता है, जो आपको सुनने नहीं आये हैं। ऐसा अनुभव मुझे एक दो बार भाषणों के कार्यक्रम में हो चुका है, जब मेरे बाद किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का भाषण था। ऐसे में एक समय तो ऐसा लगता है कि अपनी बात कहे बगैर ही बैठ जाये। लेकिन इस लड़के ने तो समूचे श्रोता वर्ग को अपने सुरों में ऐसा जकड़ दिया था कि पूरे हॉल में लोग मुग्ध होकर इसे ही सुन रहे थे। सितार का ऐसा बाज इन दिनों सुनाई नहीं पड़ता। उसकी मीण का इतना और सधा हुआ और नाजुक था कि सितार गाती हुई सी सुनाई पड़ रही है। ज्यों ज्यों मैं उसके स्वरों में उलझ रहा था त्यों त्यों मुझे वर्षों पूर्व किसी की बजाई सितार याद आ रही थी। ऐसा बाज तो इन दिनों में कोई भी नहीं बजाता। उसने आलाप जोड़ झाला बजाने में ही एक घंटा लगा दिया। झाला बजाते समय उसकी ऊर्जा का भंडार पूरे हॉल में छलक गया था। तरब की तारों पर उसका अधिकार गजब का था। एक सुर उसके गुलाम दिखाई पड़़ रहे थे। मध्य लय से एक छोटी सी बंदिश बजाकर उसने अपना कार्यक्रम समाप्त कर दिया। इससे पहले कि श्रोता पूरिया के उस स्वर समुद्र से उबर पाते वह मंच से जा चुका था। तालियों की गड़गड़ाहट होती रही लेकिन वह तो मंच से अंर्तध्यान हो चुका था।

मुझे लगा कि मुझे उससे जाकर मिलना चाहिये और जानना चाहिये ये बाज उसने कहां से सीखा। मैं उठकर जाने लगा तो लतिका ने पूछा, ‘‘कहां जा रहे हो। अभी तो कौशिकी का गाना शुरू होगा।’’ मैंने टॉयलेट का बहाना बनाया और बाहर हो लिया। दरअसल मैं उससे अभी मिलना चाहता था। उसके स्वरों की कसक मुझे उसकी ओर खींचे लिये जा रही थी।

वर्षों तक दिल्ली में रहकर संगीत की समीक्षायें लिखता रहा इसलिये कलाकार से मिलने ग्रीन रूम में जाने का अच्छा खासा अभ्यास था। यहां भी ग्रीन रूम ढ़ूंढ़कर वहां पहुंचने में दिक्कत नहीं हुई। छोटा कलाकार होने के कारण उसको दिया गया ग्रीन रूम भी छोटा था, जहां वह अपने दो चार युवा मित्रों के साथ अपना सामान समेट रहा था। उसकी सितार की केस पर लगे देश विदेश के स्टिकर बता रहे थे कि लड़के ने कम उम्र में काफी यात्रायें कर डाली थीं। प्रशंसक के रूप में शायद मैं ही अकेला वहां पहुंचा था। कौशिकी के गायन की बाट जोहते प्रशंसक भला इसे शाबासी देने कहां आते।

‘‘वाह बेटे बहुत शानदर बजाया। सितार का यह बाज इन दिनों सुनाई ही नहीं पड़ता। मीण का ऐसा काम तो बजाने वाले और सिखाने वाले बचे ही नहीं।’’ मैंने कहा।

उसने अदब से मेरे पैर छुये। मैंने उसे आशीर्वाद दिया। तभी उसका मित्र बोला, ‘‘अच्छा आनंद चलता हूंै थोड़़ी देर कौशिकी जी को भी सुन लेता हूं।’’

‘‘अच्छा तू चल, मैं भी आता हूं ये समेट कर।’’

उसकी बात सुनकर उसके दोस्त चले गये। कमरे में बस हम दोनों ही बच गये।

आनंद नाम सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। ‘‘आनंद ही नाम है मेरा। मेरे यार दोस्त सब इसी नाम से पुकारते हैं।’’ उसने कहा।

‘‘मैं दिनकर गोडबोले।’’ मैंने अपना झूठा परिचय दिया। ऐन वक्त पर मुझे अपने लिये एक झूठा नाम याद आ गया इसका मुझे भी आश्चर्य हुआ। पता नहीं क्यों अपना असली परिचय देने की इच्छा नहीं हुई। जब से पुणे आया हूं, ऐसा ही हो गया हूं। अपने आप में कैद रहना चाहता हूं। लिखना पढ़ना भी छूट सा गया है।

‘‘तुम लिखना शुरू करो तो तुम्हारी तबीयत ठीक रहेगी।’’ लतिका ने कई बार कहा भी। लेकिन मन नहीं हुआ। पुणे को किसी जमाने में पेंशनरों का शहर कहा जाता था। लगता था कि मैं भी उसी मानसिकता में ढल गया हूं। दिल्ली की चकाचैंध भरी व्यस्त जिंदगी के बाद पुणे में शायद अपने आपको खोज पाना कठिन हो रहा था मेरे लिये। शायद इसीलिये मैं उससे अपनी पहचान छिपा गया।

‘‘आपसे मिलकर अच्छा लगा गोडबेले साहब। इतनी बारीकी से कोई सुनता नहीं आजकल। सभी को चाहिये फास्ट और फटाफट संगीत।’’

‘‘हां तभी तो मुझे आश्चर्य हुआ। तुम भी युवा हो। लेकिन फिर भी तुमने इतने सधे हाथों सुरों को और साज को साधा कि मजा आ गया। फिर द्रुत बजाने की झंझट में न पड़कर मध्य लय में ही समाप्त कर दिया। ये बहुत मार्के की चाल है। श्रोताओं केा अतृप्त छोड़ दो तड़पता हुआ।’’ मैंने कहा।

वह जोर से ठहाका मार कर हंसा। उसकी हंसी भी मुझे जानी पहचानी लगी। मैं दिमाग पर जोर देकर सोचने लगा, कहां देखी है ऐसी हंसी। लेकिन कुछ याद नहीं आ रहा था।

‘‘आप बहुत बड़े जानकार मालूम पड़ते हैं। आपने एकदम सही नब्ज पकड़ ली।’’

‘‘नहीं जानकार नहीं। रिटायर्ड स्कूल मास्टर हूं। पुणे में अपना वानप्रस्थ गुजार रहा हूं। जितना जो कुछ सीखा यहीं महफिलें सुनकर सीखा है।’’  मैंने फिर एक और झूठ बोला था लेकिन खुश था कि सही अवसर पर झूठ बोलना सूझ गया।

एक समय था जब मेरी कलम से कलाकार का ग्राफ चढ़ता उतरता था और बड़े से बड़े कलाकार मेरी समीक्षा की प्रतीक्षा किया करते थे। देश की संगीत की दुनिया में मेरे नाम का सिक्का बोलता था। देश के शीर्षस्थ संगीत समीक्षक की हैसियत से मुझे न जाने कितने सम्मान मिल चुके थे। लेकिन अब वह सब पीछे छूट गया था दिल्ली में। अब तो मैं शार्दुल और संहिता का दादा बनकर रह गया था, और वह पहचान मुझे भाने लगी थी।

‘‘लेकिन तुम्हारे नाम की गुत्थी बड़ी मजेदार है। मैं तो कार्ड देखकर समझा कोई लड़की है, जो एन. राजम जैसा नाम रखकर प्रसिद्धि पाना चाहती है।’’

मेरे इस वाक्य पर वह फिर जोर से हंसा। वही परिचित हंसी। फिर बोला, ‘‘आप पहले व्यक्ति नहीं हैं जिसने ऐसा कहा। लेकिन आपको सच कहता हूं नाम की गुत्थी वगैरा कुछ नहीं। वह सब मेरा अपना सोचा है। मेरा असली नाम तो आनंद है, आनंद प्रकाश।

‘‘फिर ये ऐसा नाम क्यों।’’

‘‘उसकी एक कहानी है। लेकिन आप भला उसमें क्यों इंटरेस्टेड होंगे। इस इतना जान लीजिये कि मैंने खुद चुना है अपने लिये यह नाम।’’ ऐसा नसीब भी कम लोगों को मिलता है कि वे अपना नाम खुद चुन सकें।

‘‘नहीं। मैं नाम की कहानी सुनना चाहूंगा।’’ मैं बच्चों की तरह मचलते हुये कहा। फिर अचानक मुझे लगा कि मैं कुछ ज्यादा ही जिद कर रहा हूं तो मैंने अपने आपको सम्हालते हुये कहा, ‘‘अगर तुम्हें ऐतराज न हो तो।’’

‘‘ऐतराज क्यों होगा। लेकिन सब कुछ आज ही सुन लेंगे? और हम कहानी सुनेंगे तो अंदर हॉल में जाकर कौशिकी जी को कौन सुनेगा।’’ उसने शरारती भाव से कहा।

‘‘तो फिर मुझे तुम्हारा नम्बर दो मैं बात करूंगा तुमसे।’’

‘‘नहीं ऐसा करते हैं कल सुबह मिलते हैं होट ब्ल्यू डायमंड में। मैं वहीं ठहरा हंू। दस बजे। ठीक रहेगा।’’ उसने पूछा तो प्रश्न था लेकिन वह मानो आदेश ही था। और मैं मना नहीं कर पाया। मुझे उससे मिलना ही था। उसके बजाये हुये ’’पूरिया’’ की खुमारी अभी उतरी नहीं थी। मैं उसके स्वरों का गुलाम हो गया था और इसलिये उसकी हर बात मानता जा रहा था।

हॉल में लौटा तो वहां कौशिकी का मारुबिहाग छाया हुआ था। आनंद के पूरिया का नामोनिशान मिट चुका था। लेकिन लतिका बेचैन थी। मेरे कुर्सी पर बैठते ही उसने पूछा, ‘‘कहां चले गये थे। मुझे तो घबराहट होने लगी थी।’’

‘‘अरे टॉयलेट में बहुत भीड़ थी। और पीने के पानी के लिये भी लम्बी लाईन थी।’’

‘‘पानी पीने के लिये वहां क्यों रुके। मैं लाई हूं न साथ में।’’

‘‘अरे ध्यान ही नहीं रहा।’’ मैंने उसकी बात टाली और अपने आपको कौशिकी के स्वरों में समा देने का नाटक करने लगा। कोई अवसर होता तो शायद इन्हीं स्वरों में मंत्रमुग्ध होकर मैं सब कुछ भूल जाता लेकिन वैसा नहीं हो रहा था। आनंद का विचार और उसके सुर दिमाग से हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कौशिकी का कार्यक्रम खत्म हुआ और हम बाहर निकलने लगे। हॉल से बाहर निकलते हुये दरवाजे के पास आनंद खड़ा दिख गया। मैं उसे टालना चाहता था ताकि लतिका को न पता चले कि मैं उससे मिलकर आया हूं। लेकिन उसकी नजरों ने मुझे पकड़ ही लिया।

‘‘अच्छा गोडबोले साहब। कल मिलते हैं दस बजे।’’ उसने कहा, ‘‘हां हां ठीक है।’’ मैंने जल्दी संभाषण समाप्त करते हुये कहा और बाहर निकलकर ऑटो में बैठ गया।

ऑटोवाले को घर का पता बताने के बाद लतिका ने पूछा, ‘‘ये गोडबोले का क्या चक्कर है? वो सितारिया तुम्हें गोडबोले क्यों कह रहा था। ‘‘और तुम उससे जाकर मिले थे क्या प्रोग्राम के बाद ? मुझे क्यों नहीं बताया तब ?’’

‘‘अरे बाबा घर चलो। कितने सवाल करोगी एक साथ। घर चलकर सब बताता हूं।’’ मैंने कहा और उनीदे होने का बहाना बनाकर चुप हो गया। दरअसल मैं लतिका को कोई ठोस बहाना बनाना चाह रहा था। लेकिन क्या बताता। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि मैंने उस लड़के से अपने बारे में झूठ क्यों बोला। क्यों छुपाया मैंने अपना परिचय। मेरे नाम से मुझे कोई जान लेगा ऐसा यहां पुणे में तो लगभग असंभव ही था।

घर पहुंचकर भी मैं सीधे जाकर सो गया ताकि मुझे लतिका के प्रश्नों का सामना न करना पड़े। लेकिन प्रश्न कहां कम होने वाले थे। सुबह तक तो प्रश्नों में गुणात्मक वृद्धि हो चुकी थी। मैं तैयार हो रहा था आनंद से मिलने जाने के लिये तभी लतिका ने प्रश्नों की बौछार शुरू कर दी। ‘‘ये सितारिये का चक्कर क्या है?’’, ‘‘तुम इतनी सुबह कहां जा रहे हो तैयार होकर’’, ‘‘अपना नाम क्यों छुपाया तुमने’’ ऐसे न जाने कितने सवाल लतिका ने दाग दिये। मैं सिलसिलेवार  जो मन में आया वो उसे बताता रहा। उसे भी आश्चर्य था कि मैं जबसे पुणे आया हूं कहीं भी किसी से भी मिलने नहीं गया। और आज अचानक बिना उसे बताये कहां जा रहा हूं। खैर जब मैंने उसे बताया कि ब्ल्यू डायमंड जा रहा हूं और दो घंटे में लौटूंगा, तब जाकर जान छूटी।

ब्ल्यू डायमंड में तो जैसे वो मेरा इंतजार ही कर रहा था। आज उसका रूप बदला हुआ था। जीन्स और टीशर्ट में उसकी उम्र दो चार साल कम ही लग रही थी। न जाने क्यों आज वह मुझे और भी अधिक अपना सा लगने लगा।

‘‘मैं आपका ही इंतजार कर रहा था। नाश्ता करेंगे या चाय?’’

‘‘मैं नाश्ता करके आया हूं। सिर्फ चाय लूंगा। तुम्हें लेना हो तो तुम ले सकते हो।’’ और अचानक मुझे याद आया कि मैं उसे ‘तुम‘ कह रहा हूं।’’ माफ करें मैंने आपको ‘तुम‘ कह दिया।’’

‘‘नहीं मुझे ‘तुम‘ ही अच्छा लगता है। कोई ‘आप‘ कहता है तो बेहद अटपटा लगता है। लगता है कि अपन बहुत बड़े हो गये हैं।’’

‘‘बड़े तो हो ही बेटा। तुम्हारा काम बहुत बड़ा है। तुम्हारा रियाज और तुम्हारी कला ही तो तुम्हें ये इज्जत दिलवा रही है।’’

‘‘फिर भी संकोच होता है सर ? खासकर आप जैसे बुजुर्गों के सामने।’’ वह विनम्रता से बोला।

‘‘हां तुम अपने नाम के बारे में कुछ बताने वाले थे।’’ मैंने मूल विषय पर आने की  गरज से कहा।

‘‘बहुत जल्दी है जानने की। आपको कहीं जाना है क्या ?‘‘ उसने शैतानी भरे लहजे में पूछा।

‘‘मुझे भला कहां जाना होगा। मैं ठहरा रिटायर्ड आदमी। लेकिन तुम्हें कहीं जाना हो सकता है।’’

‘‘नहीं सर! आज का पूरा समय आपके लिये है। आपने कहा, आप रिटायर्ड हैं, कहां काम करते थे।’’ उसने सहज भाव से पूछा लेकिन मुझे लगा कि वो मेरी जासूसी कर रहा है। झूठ बोलो तो ये जरूरी होता है कि याद रखे कब, कहां ,क्या झूठ बोला था। कल मैंने उसे बताया था कि मैं एक टीचर हूं। आज भी वही बात कायम रखना जरूरी था।

‘‘स्कूल में संगीत शिक्षक था। सरकारी नौकरी थी। निभ गई इतने साल। अब मामूली पेंशन है उसमें गुजारा हो जाता है। बेटे के पास रहते हैं जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है।’’

‘‘संगीत पढ़ाते थे तभी आपका संगीत का ज्ञान इतना पुख्ता है। वर्ना जिन बारीकियों को आपने पकड़ा कल, उन्हें भला कौन पकड़ सकता है।’’

‘‘हां थोड़ा बहुत जो पढाया़ था बच्चों को उसी के आधार पर कुछ कच्चा पक्का बता देते हैं। नही ंतो हमारी क्या हैसियत जो आप जैसे कलाकारो को कुछ कहे।’’

‘‘ऐसा नहीं है आप गुरुजनों के आशीष के कारण ही हम हैं।’’ वह विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने जा रहा था।

‘‘लेकिन तुमने अपने नाम के बारे में नहीं बताया।’’ मैं उसे फिर मूल बात पर लाना चाहता था।

‘‘लगता है आप उसे जाने बिना मानेंगे नहीं। कुछ नहीं है सर सीधा साधा नाम है लेकिन फिर भी लोग न जाने क्या क्या सवाल करते हैं।’’

‘‘सीधा साधा नाम है तो फिर क्यों सवाल करेंगे। नाम बताओ तो हम भी शायद पता लगा पायें कि लोग सवाल क्यों करते हैं।’’

‘‘सर मेरा नाम है ‘‘निर्माल्य स्वरपुत्र’’।’’

‘‘ ‘निर्माल्य‘ ये कैसा नाम हुआ।’’ मैं आश्चर्य से चैंका।

‘‘बस देखा सर आपने। आपके मुंह से भी वही सवाल निकला। मैं इस तरह के सवालों से तंग आ गया था। इसलिये अब मैंने अपने नाम का शार्टफार्म एन. स्वरपुत्र ही प्रचलित करना शुरू कर दिया। बहुत से बहुत अब लोग ऐसा समझते हैं कि मैं एन. राजम जी की नकल कर रहा हंूं। सच मानिये इतनी महान कलाकार की तो मैं नकल करने के बारे में सोच भी नहीं सकता ? मैं तो उनके पैरों के धूल के बराबर हूं।’’

‘‘सच कहूं तो पहले मैंने भी ऐसा ही सोचा था। मुझे भी लगा कि ये कोई नया बावला है जो संगीत की दुनिया में नाम चुराकर महान बनना चाहता है। एन. राजम का एन. और शिवपुत्र से मिलता जुलता स्वरपुत्र!’’ मैं बड़ी आसानी से उसे लड़की समझने की भूल वाली बात छिपा गया था।

‘‘लेकिन मेरा संगीत सुनकर आपको इतना अहसास तो हो गया होगा कि ये बावला उतना बावला भी नहीं है।’’

‘‘नहीं नहीं सिर्फ इतना ही नहीं, मैं तो तुम्हारा बाज सुनकर दंग रह गया। ऐसा काम तो सितार पर आजकल कोई करता ही नहीं। मैंने तो बरसों पहले-‘‘मैं कहते कहते रुक गया। मैं उसे अपना पूर्व परिचय नहीं देना चाहता था। आगे बोलता तो शायद वह कुछ समझ जाता। इसलिये झट से बात बदलते हुये कहा।’’ यह काम तुमने किससे सीखा है ?’’ जवाब में उसने कोई नाम बताया। वर्षों तक संगीत समीक्षक रहा था इसलिये इतना तो जानता था कि ऐसा काम सिखाने की कुव्वत उन उस्तादों में नहीं थी जिनका ये नाम बता रहा है। फिर भी अपने अविश्वास को परे धकेलते हुये मैंने कहा, ‘‘तुम अपने नाम की कहानी बता रहे थे।’’

‘‘जल्दी क्या है सर पहले चाय वाय पी लें। आती ही होगी।’’ उसने कहा और इंटरकॉम दबाकर चाय के बारे में पूछताछ करने लगा। मैं उसे गौर से देख रहा था। उसका आत्मविश्वास गजब का था। अपनी उम्र के हिसाब से वह बहुत अधिक परिपक्व और संजीदा लग रहा था। लेकिन जितनी भी बार उसे देखता, लगता था किसी पूर्व परिचित से मिल रहा हूं। अपनी इंटरकाम पर बात खत्म करके मेरी ओर मुखातिब होते हुये वह बोला, ‘‘अच्छा पहले ये बतायें कल के पूरिया में क्या कमी रह गयी।’’

‘‘कमी तो नहीं थी कुछ। हां कुछ जगह पर फिसलन दिख रही थी खासकर तार सप्तक के स्वरों में। लय में भी कहीं कहीं झोल था ?’’ अब कुछ तो गलती निकालनी ही थी इसलिये बोल बैठा।

‘‘आपने बिल्कुल सही पकड़ा है। आपकी दृष्टि गजब की है। संगीत शिक्षकों को आमतौर पर इतनी पैनी नजर रखते देखा नहीं।’’

‘‘ऐसे कितने संगीत शिक्षक देख लिये हैं तुमने’’ मैंने उपहास से कहा।

‘‘आपको पता नहीं मैं उन्हीं के खानदान से हूं।’’ ऐसा उसने कहा जरूर लेकिन फिर उसकी आवाज में उदासी छा गई। अपनी बात को आगे जोड़ते हुये बोला, ‘‘ऐसा मैं समझता हंू।’’

बात ज्यादा पर्सनल न हो जाये इसलिये मैंने फिर बातचीत का रुख मोड़ते हुये कहा, ‘‘निर्माल्य नाम कुछ अजीब नहीं लगता।’’

‘‘अजीब ही है सर! मेरा सब कुछ अजीब है। तो नाम भी तो अजीब होना ही चाहिये।’’ उसने मजे लेते हुये कहा। लेकिन शायद मेरा चेहरा देखकर वह भांप गया कि मुझे उसकी मजाक में बिल्कुल भी मजा नहीं आ रहा है।

‘‘क्या करूं सर। अपनी लाईफ ही कुछ ऐसी है। नाम था आनंद लेकिन जीवन में आनंद का पता ही नहीं था।’’ उसके आगे ‘प्रकाश‘ जोड़ा लेकिन जीवन में अंधकार छा गया।

‘‘आनंद प्रकाश तो ठीक है लेकिन उसके आगे क्या? शर्मा, पांडे, तिवारी, वर्मा, गुप्ता क्या नाम है पूरा।’’ मैंने जिज्ञासावश पूछा।

‘‘आनंद पटवर्धन। जी हां सुप्रसिद्ध संगीत मार्तण्ड गोपालराव पटवर्धन के परिवार से हूं मैं।’’ उसने ठसक से कहा।

‘‘तो फिर नाम की इतनी अदलाबदली क्यों ? वो भी ऐसी कि अपना मूल नाम समूल नष्ट हो जाये। कहां आनंद प्रकाश पटवर्धन और कहां ये निर्माल्य स्वरपुत्र। कहीं भी मेल नहीं बैठता।’’

‘‘नाम का ही नहीं सर मेरा तो किसी भी चीज का मेल नहीं बैठता। चलिये आपको अपनी पूरी कहानी सुना ही देता हूं।’’

मैं भी उसकी बात सुनने को अब ज्यादा उत्सुक हो चला था क्योंकि गोपाल राव पटवर्धन के परिवार से एक धागा मेरा भी जुड़ा था कहीं। वे महान संगीतकार तो थे ही साथ ही आरती के पिता भी थे।

हां आरती जो अपने समय की एक अच्छी गायिका रही। उसने गोपाल राव की विरासत को आगे बढ़ाया था। जब दिल्ली नया नया आया था तो उम्र थी पच्चीस साल। उन दिनों युवा गायिका के रूप में आरती के बड़े चर्चे थे। कई लोग दिवाने थे उसके गाने के। उनमें एक मैं भी था। दीवानगी थोड़ी ज्यादा बढ़ गई। लेकिन किस्मत को ये मंजूर नहीं था। फिर हमारे रिश्ते सिर्फ प्रोफेशनल बनकर रह गये, एक कलाकार और समीक्षक के।

‘‘मेरी माँ थी आरती।’’ उसने जैसे मेरे मन की बात पकड़ ली।

‘‘उसने ही मुझे संगीत की तालीम दी, सितार में ये गायकी का बाज मैंने उसी से पाया है। उसकी तानो को याद करके ही मैं मीण बजाता हूं। लय कारी और पलटे सभी कुछ उसी की देन है।’’

‘‘गला तो तुम्हारा भी अच्छा है। फिर गाना छोड़कर तुमने सितार  क्यों थाम ली। ग्लैमर के कारण।’’

‘‘काश इसका कारण ग्लैमर ही होता। बहुत छोटा था मैं और माँ के साथ रियाज करने बैठ जाता था। माँ मुझे मनोयोग से संगीत सिखाती। लेकिन गाना छोड़कर मेरा ध्यान दूसरे साजो पर चला जाता था। एक दिन माँ के साथ संगीत विद्यालय गया। वहां रखी सितार को हाथ में लेकर बजाने की कोशिश करने लगा। छः साल का था मैं जब। लेकिन जब मैंने पहला स्ट्रोक लगाया, सब चैक गये। उस स्कूल के सर बोले, ‘‘अरे ये तो एकदम तैयार लगता है।’’ तभी से माँ ने गाना छोड़कर मुझे सितार सीखने भेज दिया। माँ का गाना मेरा सितार दोनों अच्छा चल रहा था। लेकिन उसे छोड़कर बाकी सब कुछ घर में अच्छा नहीं चल रहा था। मेरी माँ और पिता के बीच लगातार तकरार बढ़ती जा रही थी। बहुत छोटा था मैं। महज सात साल का लेकिन इतना समझ में आ रहा था कि इस तकरार की एक वजह मैं भी हूं।

बार बार दोनों की बहस में मेरा नाम आता था। माँ उनसे हर बात पर बराबरी से बहस करती। लेकिन पता नहीं क्यों मेरा नाम आते ही माँ एकदम खामोश हो जाती।

और उस दिन तो हद हो गई जब मेरे पिता ने माँ की बुरी तरह पिटाई की। घर से बाहर निकल जाने को कहा। रात का समय जैसे तैसे माँ ने घर में गुजारा और दूसरे दिन सुबह माँ नानाजी के घर आ गई।’’

आरती पटवर्धन के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी मुझे भी थी। लेकिन मैं तो आनंद से अपनी असली पहचान छिपा रहा था, कैसे बताता उसे कि उसके पिता को मैं जानता था। दरअसल आरती ने मुझ जैसे ही एक पत्रकार से शादी की थी। नाम था भास्कर सरकार। वह ‘नवप्रभात‘ अखबार का सहसम्पादक था। विजातीय होने के कारण पटवर्धन साहब बहुत खुश नहीं थे इस विवाह से। शादी के बाद कुछ दिन तक तो आरती का उनके यहां आना जाना भी बंद था। आरती शादी के लगभग दो तीन साल बाद तक तो गाना छोड़कर सिर्फ घर परिवार में ही लगी हुई थी। लेकिन जो कुछ आनंद ने बताया वह तो होना ही था क्योंकि भास्कर की शराब की लत और गाली गलौच की आदत तो जगप्रसिद्ध थी। कलम की ऊर्जा के जिस क्षणिक आवेग में वह विवाह हुआ था वह ऊर्जा तो कब की जा चुकी थी। यही बात पटवर्धन साहब को भी पसंद नहीं होगी। इसलिये उन्होंने आरती का घर में आना जाना बंद कर दिया था।

‘‘मैं और माँ नाना के यहां आये जरूर लेकिन नानाजी और मामाजी दोनों ने साफ जता दिया कि हम माँ बेटे को जल्द ही अपना इंतजाम अलग करना होगा।’’ आनंद अपनी रौ में बताये चला जा रहा था। मैं इतना छोटा था कि कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। अपने से अचानक दूर हुये पिता के रहस्य को भी नहीं समझ पा रहा था। नाना और मामा की उपेक्षा भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।

आखिर एक दिन माँ को एक नौकरी मिल ही गई। तनख्वाह इतनी थी कि हम मां बेटा का गुजारा हो जाये।

माँ ने अपनी जिंदगी को धीरे धीरे संवारना शुरू किया। मैं भी उस उम्र में जितना समझ सकता था, उतना समझने का प्रयास कर रहा था। लेकिन जिंदगी की उलझन शायद मेरी अपेक्षा से ज्यादा ही बड़ी थी। स्कूल के दाखिला रजिस्टर में माँ ने मेरा नाम आनंद सरकार लिखने की बजाय आनंद पटवर्धन लिखवाया। मुझे समझ नहीं आया कि मेरे नाम के आगे सरकार की बजाय पटवर्धन क्यों लिखवाया गया।

इस रहस्य का पर्दा तब खुला जब मैं बारह साल का हो गया। तब तक माँ का भी तलाक हो चुका था और अब वह भी अपना नाम आरती सरकार के बजाय फिर से आरती पटवर्धन लिखने लगी थी। एक दिन स्कूल में जब किसी साथी ने पूछा कि मैं मेरे पिता का नाम क्यों नहीं लगाता तो मुझे भी कसमसाहट हुई ये जानने की कि मेरे पिता का नाम मेरे नाम के साथ क्यों नहीं लगता। उत्सुकता तो यह जानने की भी थी कि मेरे पिता को हमें घर से निकाल देने के बाद एक भी बार मुझसे मिलने की इच्छा क्यों नहीं हुई। ढेर सारे सवाल थे। माँ से बताने की जिद कर बैठा। लेकिन जो कुछ उसने बताया वह सचमुच गहरा धक्का देने वाला था। मेरे बारह साल के नाजुक मन पर कड़ा प्रहार करने वाला था।

‘‘सच्चाई ये है सर कि मैं आरती और भास्कर सरकार का बेटा हूं ही नहीं। मैं बेटा हूं आरती और उसके किसी समय के संगीत के साथी रहे प्रसिद्ध सितार वादक चैतन्य पंडित का।’’

आनंद की बात सुनकर मैं भौचक्का रह गया। संगीत की दुनिया में चैतन्य पंडित का नाम बहुत आदर और श्रद्धा से लिया जाता रहा है। उसके मुकाबले का सितार वादक तो आज पूरे भारत में कहीं नहीं है। अब मेरी समझ में आ रहा था आनंद की बजाने की शैली का। उसने चैतन्य पंडित का बाज हू ब हू उठा लिया था। उसके साथ अपनी मां की गायकी लेकर एक अलग शैली बना ली थी उसने। ये बात दूसरी थी कि प्रोफेशनली मेरी और उसकी कभी नहीं बनी। मुझे वह बड़ा घमंडी लगता था, और उसे मैं नकचढ़ा। इसलिये हम दोनों में कभी अच्छी दोस्ती नहीं रही।

‘‘चैतन्य पंडित। लेकिन वह तो.....’’ मैंने बात को आगे बढ़ाने की गरज से कहा।

‘‘जी वह तो मुम्बई में रहते थे। लेकिन नानाजी के कारण उनका हमारे घर  आना जाना था। माँ से भी उनका परिचय उसी दौरान था। लेकिन ऐसी कोई प्रगाढ़ता नहीं थी उन दोनों में। फिर माँ शादी करके चली भी गई थी। लेकिन जो विधि लिखित होता है उसे कौन टाल सकता है। ऐसे ही एक दिन किसी संगीत सभा के बाद माँ का उनसे मिलना हुआ। माँ शायद अपने पति के कड़ुवे व्यवहार और शराब की आदत से खिन्न थी। शायद कुंठा में भी थी कि उसका गायन का कॅरियर इस विवाद के कारण बर्बाद हो रहा है। ऐसे ही कमजोर क्षणों में चैतन्य पंडित जी का सहारा मिला और वे दोनों भावनाओं में बह गये।

माँ उसके बाद उनसे नहीं मिली। लेकिन उनके बीच हुये संसर्ग का बीज माँ के पेट में पनपने लगा मेरे रूप में। मेरे वैधानिक पिता भास्कर सरकार पेशे से पत्रकार थे ही सो उन्होंने खोज निकाला मेरे जन्म का रहस्य। उसी दिन से उन दोनों में तकरार शुरू हुई और नौबत तलाक तक आ पहुंची।’’ आनंद निर्विकार भाव से अपने जन्म की कहानी मुझे बता रहा था और मेरे मन में अनेक प्रश्नों का सैलाब उमड़ घुमड़ रहा था।

‘‘आश्चर्य है कि तुम्हारी माँ ने क्षणिक पे्रम आवेग की उस भेंट को तुम्हारे रूप में संजो कर रखा। यह जानते हुये भी कि इसमें खतरा है।’’

‘‘हो सकता है इसमें भी माँ का स्वार्थ ही हो। वह चाहती हो कि उसकी औलाद एक पत्रकार के बजाय एक संगीतकारके जीन्स लेकर पैदा हो। जिस दिन पहली बार मैंने सितार पर हाथ रखा था, मेरे सुर वहीं से सधने लगे थे। माँ ने भी यही सोचा होगा।’’ कमरे में थो ड़ी देर नीरवता छाई रही। वेटर चाय की केतली रख गया था सो हम दोनों धीरे धीरे चाय सुड़कने लगे। प्रश्न बहुत थे पर क्या बोलूं मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था। वह भी शायद अपनी कहानी पूरी कर चुका था। मुझे उत्कंठा थी जानने की क्या चैतन्य पंडित को यह सब मालूम है। मेरी बात का जवाब उसने खुद ही दे दिया।

कई साल तक मैं चैतन्य पंडित से मिलने की इच्छा मन में बांधे रहा। एक दो बार माँ से कहा भी तो उसने झिड़क दिया। कहा कि अभी समय नहीं है। सही समय आने पर मिलवा दंूंगी। मजे की बात तो यह भी थी कि उन्होंने भी कभी हम लोगों से मिलने का प्रयत्न नहीं किया। एक बार तो एक संगीत सभा में दोनों की प्रस्तुतियां आगे पीछे थीं। लेकिन मां ने कुछ इस तरह समय साधा कि उनका आमना सामना ही न हो पाये। मां मनोयोग से अपने सुरों की साधना करती रही और मुझे सिखाती रही।

पता नहीं दोनों का कैसा रिश्ता था उन दोनों में। न मिलते थे। न मिलने की चाह थी ? मुझे बार बार लगता था कि एक बार तो मिलूं अपने जन्मदाता से। लेकिन माँ की दहशत के आगे ज्यादा हिम्मत नहीं जुटा पाता था।

लेकिन जब मैं अठारह वर्ष का हो गया तब माँ ने मुझे एक नंबर दिया और कहा कि ये चैतन्य पंडित जी का पर्सनल नंबर है। इस पर चाहो तो बात कर लो। नंबर तो मैंने ले लिया लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई बात करने की। क्या बात करता-क्या कहता उनसे। और मेरे कहने का क्या वे विश्वास कर लेते। हमने फिल्मों में ऐसे दृष्य कई देखे जब पिता अपने ऐसी संतानों को भी गले लगाया है। लेकिन असलियत में क्या ऐसा होता है यह तय करना मेरे लिये कठिन था।

इस उधेड़बुन में मैंने न जाने कितने काल्पनिक संवाद रच डाले थे अपने पिता के साथ। आखिर एक दिन हिम्मत करके मैंने वह नंबर घुमा ही दिया। मुझे अच्छी तरह याद है वह गुरुपूर्णिमा का दिन था। सोचा जिससे जन्म से अनुवांशिक गुणों के माध्यम से शिक्षा मिली है, उसे प्रणाम कर लूं। उस संभाषण का एक एक शब्द मुझे आज तक याद है। उन्होंने फोन उठाया और कहा ‘‘श्रीराम! कौन बोल रहा है ?’’ ‘‘मैं आनंद ! आरती पटवर्धन का लड़का।’’ मैंने सहमते कहा। ‘‘आरती ? अच्छा। अच्छा गोपाल राव जी की लड़की। बहुत अच्छा गाती है वे। हां कहो बेटा कैसे याद किया।’’

‘‘कुछ नहीं आपसे बात करनी थी। मैं उनका लड़का हूं।’’

मैंने फिर जोर देकर कहा कि शायद इस बार उनके दिमाग में कुछ बात कौंधे। लेकिन वे निर्विकार थे। एकदम निर्विकार।

‘‘अच्छा तुम भी कुछ गा बजा लेते हो अपनी माँ और अपने नाना की तरह?’’ उन्होंने प्रश्न किया।

‘‘जी बस यूं ही थोड़ा बहुत सितार बजा लेता हूं।’’

‘‘देखो बेटा अभी तो मेरे पास छः लोग सीख रहे हैं। वैसे भी मैं एकदम सीधे किसी को सिखाता नहीं। अब चूंकि तुम गोपाल राव पटवर्धन के नाती हो इसलिये इतना कर सकता हूं कि तुम मेरे प्रिय शिष्य दीपक कपूर से सीख लो। उनके साथ सीखकर जब हाथ सध जाये तुम्हारा तो दो चार बातें हम भी बता देंगे।’’ चैतन्य पंडित जी मुझे मौका दिये बगैर अपनी बात कर डाली।

‘‘जी प्रणाम।’’ मैंने कहा और फोन काट दिया।

 क्या बताता मैं उन्हें। मुझे तो यह भी नहीं सूझ रहा था कि सामने वाले से कैसे भावनात्मक संवाद किया जाय जबकि वह इतना निर्विकार हो।’’

‘‘तुमने यह बात अभी मां को बताई।’’ मैंने पूछा।

‘‘हां बताई थी। लेकिन उसकी भी प्रतिक्रिया बड़ी विचित्र थी। उसने कहा कि मुझे मालूम था ऐसा ही होगा।

माँ ने जो बताया वह तो मेरे लिये ऐसा आघात था कि मानो मेरे सिर से घर की छत ही उड़ गई हो। माँ बोली उस रात के बाद जब इस बात का अहसास हुआ उसे कि वह गर्भवती है, तो उसने चैतन्य पंडित से मुलाकात की थी। लेकिन चैतन्य पंडित ने पूरी बात को हंसी में उड़ाते हुये माँ के चरित्र पर ही उंगली उठा दी। वे इस बात पर विश्वास करने को ही तैयार नहीं थे कि गर्भ में पल रहा बच्चा उनका है। उन्होंने माँ को सलाह भी दी कि जिस बच्चे के पिता के बारे में वह निश्चय नहीं कर पा रही है ऐसे बच्चे से पीछा छुड़ाना ही बेहतर है। उस दिन माँ ने दो निश्चय किये। एक तो यह कि वह जन्म भर चैतन्य पंडित से बात नहीं करेगी, और दूसरा यह कि चाहे कुछ भी हो जाये वह मुझे जन्म देगी। उस दिन भी माँ ने चैतन्य पंडित का फोन नंबर इसलिये दिया कि मेरे मन में कोई मलाल और कोई भ्रम न रह जाये।

‘‘मेरे लिये वे बहुत दुविधा के ऊहापोह के दिन थे। ‘सरकार’ मैं था नहीं, ‘पंडित’ ने अपनाया नहीं इसलिये जबर्दस्ती पटवर्धन नाम लगाना पड़ा था। और यही बात मुझे कचोट रही थी। जब यह तनाव, यह दुविधा असह्य होने लगी तब मैंने भी दो निश्चय किये।’’

‘‘कौन से निश्चय ?‘‘ मैंने पूछा।

एक ऐसा सितारिया बनना कि लोगों को खुद ब खुद चैतन्य पंडित का परिचय मिल जाये मेरे माध्यम से। दूसरा यह कि माँ की छाया से दूर होकर अपना अलग अस्तित्व बनाना। इसलिये मैं माँ की छाया से दूर कोलकाता चला गया। माँ का अपना संगीत विद्यालय है और उसकी तमाम शिष्यायें उसका खयाल रखती हैं। अब तो नाना भी नहीं हैं। मामा भी माँ का बहुत खयाल रखते हैं। मालूम पड़ा पिछले साल भास्कर सरकार भी लीवर की बीमारी से चल बसे। अब लगा कि जिंदगी का बाकी रास्ता अकेले ही तय करना है। बस इसीलिये आननफानन में ये निर्णय करना पड़ा नाम बदलने का।’’ उसका चेहरा देखकर लग रहा था कि वह अब थक चुका है, शरीर से ही नहीं, पर मन से भी। लेकिन मूल प्रश्न तो वही का वही जस का तस था।

‘‘लेकिन यही नाम क्यों ?‘‘ मैंने प्रश्न दाग दिया।

‘‘और क्या नाम होना चाहिये। हम पूजा में भगवान को रोज फूल चढ़ाते हैं। लेकिन आज चढ़ाया फूल कल काम नहीं आता। उसे उतार कर रख दिया जाता है, पानी में सिरा दिया जाता है, या ऐसी किसी जगह डाल दिया जाता है जहां किसी का उस पर पैर न लगे। पूजा के उतारे फूल को हम ‘‘निर्माल्य’’ कहते हैं। मेरी अवस्था भी ऐसी ही है। मैं भी पे्रम के देवता की भेंट पर चढ़ा, फूल ही हूं, जिसे उतार कर फेंक दिया गया है। मेरा महत्व उनके जीवन में कुछ नहीं है। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा मैं ‘फेंका जाऊं‘ या ‘सिराया जाऊं‘। कहते कहते उसकी आंखें डबडबा आई थीं।

‘‘और ये स्वरपुत्र। ये किसलिये ?’’

‘‘मैं दो स्वर साधकों के संसर्ग से उपजी संतान हूं इस बात का अहसास मुझे हमेशा रहे इसलिये। उनके जीवन में मेरा महत्व भले ही न हो। लेकिन मेरे होने में तो उन दोनों स्वरासाधकों का योगदान है। उनके इस स्वर युग्म को मैं सदा उत्सव रूप में मनाता रहूं यह सदा स्मरण रखना होगा मुझे।’’

इतना सुनने के बाद मेरे पास कुछ और कहने के लिये नहीं बचा था। ये सारी घटनायें दिल्ली रहते हुये मेरे आसपास घटित हुईं और मुझे इसकी जरा भी भनक नहीं लगी, इस बात का आश्चर्य हो रहा था मुझे। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि इस लड़के ने यह सारी बातें मुझे ही क्यों बताई। मैंने उससे पूछ ही लिया। वह मुस्कुराते हुये बोला, ‘‘आपको ही क्यों बताई, जानना चाहते हैं। इसलिये कि कोई तो हो जो मेरी बात मेरे दृष्टिकोण से जान सके। ताकि वक्त आने पर वो दुनिया को मेरी कहानी बता सके। और इसके लिये आपसे बेहतर कौन व्यक्ति हो सकता है सचिन मेहता जी ? द ग्रेट म्यूजिक क्रिटिक।’’

उसके मुंह से अपना नाम सुनकर मैं एकदम चैंक गया।

‘‘तुम ! तुम मेरा नाम कैसे जानते हो ?’’

‘‘आप अपना नाम भले ही गलत बतायें, लेकिन मैं आपको पहचानने में भूल नहीं कर सकता मेहता सर। संगीत समीक्षा पर मैंने आपकी दोनों किताबें पढ़ी हैं। उसमें फोटो भले ही आपकी युवावस्था का है लेकिन हमारी नजरों से आप बच नहीं सकते।’’ वह मुस्कुराते हुये बोला। ‘‘मैं यह भी जानता हूं कि इन दिनों आपका लिखना पढ़ना बंद है और प्रसिद्धि से दूर पुणे में अपना जीवन बिता रहे हैं। लेकिन जैसे सितारिये के हाथ से मरते दम तक सितार नहीं छूटती, वैसे ही लेखक के हाथ से मरते दम तक कलम कहां छूटती है। हो सकता है मेरी कहानी आपको कलम उठाने पर मजबूर कर दे।’’

मैं गहरे सोच में पड़ गया कि इतना सब कुछ जानते हुये भी यह लड़का इतनी देर तक अनजान बना रहा। एक अनजाना भय भी समाने लगा मन में। और वह भय अकारण नहीं था। क्योंकि अगला वाक्य जो उसने कहा, वह मेरे लिये अकल्पनीय था, ‘‘एक बात और मेहता सर! जब हम किसी से पे्रम करते हैं, तो उसे यंू मन में नहीं रखना चाहिये। कम-से-कम एक बार तो उससे कह ही देना चाहिये। कौन जाने यदि आप एक बार मां को अपने मन की बात कह देते तो शायद आज कहानी कुछ दूसरी होती।’’

लड़का सच ही कह रहा था। दिमाग को सुन्न कर देने वाली थी उसकी कहानी, जिसने मुझे मेरी कलम बंद हड़ताल तोड़ने पर मजबूर कर दिया। घर आकर बिना किसी से कुछ कहे दराज से कागज निकाला और लिखना शुरू कर दिया। जो पहला शब्द मेरी कलम से निकला, वह था ‘‘निर्माल्य।’’


डॉ. सच्चिदानंद जोशी
संपर्क:
सदस्य सचिव,
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, 
11, मान सिंह रोड, नई दिल्ली-110011
ईमेल: msignca@yahoo.com



(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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