राजेन्द्र यादव की कहानी: गुलाम | #HappyBirthdayRajendraYadav #RajendraYadav - #Shabdankan
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राजेन्द्र यादव की कहानी: गुलाम | #HappyBirthdayRajendraYadav #RajendraYadav

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हिंदी साहित्य में 'नई कहानी' को गढ़ने वाली त्रयी के महान कथाकार राजेन्द्र यादव की कहानी,गुलाम...

हिंदी साहित्य में 'नई कहानी' को गढ़ने वाली त्रयी के महान कथाकार राजेन्द्र यादव की कहानी,

गुलाम... 


रंगे स्यार को राज तो मिल गया, लेकिन समस्या यह आयी कि अब शासन कैसे चलाया जाये । जंगल में शेर-चीते, भालू-भेड़िये सभी थे और सब पर अपना हुक्म चलाना आसान नहीं था। उनमें से कौन कब अचानक बिगड़ खड़ा हो और अपनी ही जान के लाले पड़ जाये । राजा बनने के बाद भी तरह-तरह के भय और सदेह उसे सारे समय चील-कौवों की तरह खाते-नोचते रहते थे। कही किसी को असली बात का पता चल गया तो बोटी-बोटी अलग हो जायेगी इसलिए नींद आना तो उसे वैसे ही बन्द हो गया था । | लोमड़ी पूछ फुलाये उसके आस-पास ही घूमती थी और इन दिनों वही उसकी सबसे भरोसे की और अच्छी सलाहकार थी। उसने राजा की चिन्ता समझ कर एक दिन बड़े प्यार से कारण पूछा। राजा बोला, ‘लोमड़ी रानी, इतना बड़ा राज है, समझ में नहीं आता इसे कैसे चलाऊँगा ? अन्दरूनी इन्तज़ाम देखता हूँ तो बाहरी हमलों का डर रहता है, और बाहर ज्यादा ध्यान दें तो यहाँ गड़बड़ी होती है । इसी चिन्ता में मैं हूँ कि सारी चीज़ें कैसे ठीक रक्खी जायें ।'



लोमड़ी ने अक्लमंदी से गंभीर मुँह बनाकर कहा, 'आप एक एक हिस्सा एक-एक को सौंप दीजिए और समझा दीजिये कि वे अपनी सारी जिम्मेवारी को देखेंगे, आप उन्हें मंत्री बना लीजिए इज्ज़त दीजिए और समझा दीजिए कि वे सारी हालत रोज आपको बताते रहे। मेरा सुझाव यह हैं कि एक शेर बाहरी विभाग का अधिकारी हो और भेड़िया घरेलू विभाग का ।

राजा को अपनी लोमड़ी-रानी की अक्ल पर बहुत भरोसा था । उसे यह सलाह पसंद आयी । यही सबसे सीधा तरीका भी था । लेकिन तब शेर और भेड़िया दोनों आस-पास ही बने रहेंगे, उनसे घंटों बैठकर सलाह और विचार करने पड़ेंगे। पता नहीं, कब कहाँ असलियत खुल जाय और लेने के देने पड़ जाये । राजा तो यह चाहता था कि राज अच्छे ढंग से चले, लेकिन इस तरह के खूंखार जानवरों से कम से कम मिलना जुलना हो । उसने हिचकिचाकर कहा, 'तुम्हारी सलाह तो एकदम ठीक है, लेकिन,’

हिचक देखकर लोमड़ी राजा के मन की बात समझ गयी। बोली, ‘नये और जवान लोगों मे जोश और गुस्सा तो बहुत होता है, समझ और अनुभव नहीं होते । राज-काज जोश से नहीं अनुभव और समझदारी से चलता है। इसलिए ये भेड़िया और शेर ऐसे चुने जाये जो बूढे हो और अनुभवी हों और इनकी अपने-अपने समाज में इज्जत हो...।'

हाँ बूढे होगे तो डर कम रहेगा । डरपोक और कमजोर का दिमाग बहुत चलता है। राजा के दिमाग़ में अचानक ही आ गया कि इन बूढ़ों को इज्ज़त और सुरक्षा की बड़ी भूख होती है। इनमें कुछ और तो रह ही नहीं जाता, अपने को इज्ज़तदार बता कर ये लोग सुरक्षित रहना चाहते हैं। दोनों को बराबर का ओहदा दिया जाय ताकि अपनी-अपनी इज्जत के लिए दोनों आपस में ही लड़ते रहे और दोनों को एक दूसरे का डर बना रहे । अगर दोनों मिल गये तो अपने लिए खतरा बढ जायेगा। उसने खुद अपने आप को शाबासी दी कि उसका दिमाग सचमुच चलता है और ऐसा कुशाग्र बुद्धि प्राणी राजा होने ही लायक है। उसने समझदारी से कहा, 'तुम्हारी बात ठीक है लोमड़ीरानी, हमे अनुभवी लोगों की जरूरत है। लेकिन मेरे राज में सब बराबर हैं । शेर को मैं चाहे जितनी इज्ज़त की निगाहों से देखता होऊ, लेकिन सरकारी तौर पर दोनों को बराबर का ही ओहदा दूंगा ताकि कहने को यह न हो जाये कि मैंने किसी के साथ पक्षपात किया। लेकिन मैं चाहता हूँ कि इनका सम्बन्ध सीधा मुझ से न रहकर तुमसे रहे। उसने सोचा, इस तरह रोज-रोज उनका सामना होने से वह बच जायेगा। | लोमड़ी धन्य हो गयी। उसने प्रशंसा और प्यार से राजा को देखा और जीभ से उसकी मूँछें चाटी। अगले दिन ही सभा बुलायी गयी और लोमड़ी ने बडे प्रभावशाली भाषण के बाद राजा की ओर से एक बहुत बूढे शेर और भेड़िये को बाहरी और घरेलू शासन का भार सौंप दिया। अनुभवी और बड़ी उम्र की पूरी कद्र करते हुए भी राजा के लिए सब बराबर हैं और उनकी आज्ञा से दोनों को बराबर का दर्जा दिया जाता है, इस भाषण से प्रजा पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा। यह आशा भी प्रकट की गयी कि हमारे सामने बहुत काम हैं और अभी हमें बहुत कुछ करना है। आपसी सहयोग और सद्भावना से ही हम बडे और आगे बढे हुए राज्यों के बराबर पहुँच जायेंगे। तालियाँ बजी राष्ट्रगान गाया गया।

अब माद के भीतर अँधेरे मे स्यार राजा बैठता, बाहर इधर-उधर दोनों बूढे — यानी शेर और भेड़िया। उन्हें हटाया नहीं जा सकता, किस समय उनकी सलाह की जरूरत पड़ जाये, या उन्हे ही राजा को कोई खबर देनी पड़े। लोमड़ी संदेश लाने-लेजाने के लिए बराबर बाहर-भीतर का चक्कर काटती । लेकिन राजा को हमेशा यही डर था कि पता नहीं कब भेद खुल जाये ! उधर जो वह चाहता था वह भी नहीं हो रहा था, दोनों बेहद सुस्त और मरे से पडे रहते, मक्खियाँ भनभनाया करती। जब तक इन दोनों के बीच खटपट नहीं करायी जायेगी, न तो इनकी यह सुस्ती टूटेगी और न जोश आयेगा। लेकिन शुरूआत कहाँ से की जाय ? इधर राजा को यह महसूस हुआ कि सारी बाते लोमड़ी के जरिए नहीं कहलायी जा सकती। मन का असली डर उसके सामने भी नहीं खुलना चाहिए। साथ ही यह भी लगा कि लोमड़ी भेड़िये के आस पास बहुत चक्कर लगाने लगी है और दोनों सारे समय कुछ खुश-पुस किया करते हैं। हो न हो, लोमड़ी ने असली भेद भेड़िये को बता दिया है। और दोनों उसे मारकर खुद राजा रानी बन बैठने की साजिश कर रहे हैं। ऐसे में अपनी बिरादरी के कुछ लोग मदद कर सकते थे, लेकिन उनसे डर था कि कोई दिलजला सबसे पहले ही भण्डा भी फोड़ सकता था !

आखिर बहुत दिमागी उठा-पटक के बाद उसने तय किया कि क्यों न भेड़िये को राज्य की स्थिति देखने के लिए कुछ दिनों को बाहर भेज दिया जाय । इससे लोमड़ी से भी उसका मिलना-जुलना कम हो जायेगा और वह खुद भी आँखों से दूर रहेगा । उसने एक दिन लोमड़ी को बुलाकर राज्य की बुरी स्थिति का बखान किया और समझाया कि इस समय बहुत जरूरी है कि घरेलू मंत्री सारे राज्य का दौरा लगाकर असली हालत बतायें । लोमड़ी राजा के पास ही रहती थी, सारे उतार-चढाव वह समझ गयी कि मामला कुछ और है। उसने जाकर सारी बात भेड़िये को बतायी, उसे कुछ समझाया। थोड़ी ही देर में गुर्राता हुआ भेड़िया सीधा राजा के सामने जा पहुँचा।



‘धूर्त, बदमाश गीदड़, मेरे सामने चालाकी करने की कोशिश की तो एक पल में ठिकाने लगा दूंगा। मैं तेरी असलियत जानता हूँ। तुझे शर्म नहीं आती कि बूढ़ों को आराम से बैठने देने की बजाय इधर-उधर दौड़ाता है। डर और डाह से तेरा दिमाग खराब हो गया है।' भेड़िये ने झपटने के लिए तैयार होकर राजा को सुनाया। लोमड़ी खिसक गयी थी।

भय और घबराहट से राजा को पसीना छूटने लगा। उसकी घिग्घी बंध गयी और मुँह से बोल निकलना मुश्किल हो गया। हकलाकर कहा, 'भेड़िये बाबा मेरी बात तो सुनो। मेरी असलियत आपके सामने खुल ही गयी है, अब मारो या जिलाओ — सब कुछ आपके हाथ में ही है मैं तो आपकी दया पर ही हैं। सब कुछ होते हुए भी आप ही मेरे पास पड़ते है । शेर और हाथी तो हमारी बिरादरी के भी नहीं है। आप इस गद्दी पर बैठिये, मैं आपकी सेवा करूंगा।' कह कर वह भेड़िये के चरणों पर गिर पड़ा।

भेड़िया अनुभवी था। उसने सोचा कुछ भी हो, जंगल के सारे जानवर तो इसे राजा मानते है, वे इसे भगवान की तरफ से भेजा हुआ समझते है। मेरे राजा बनने से नया बखेड़ा खड़ा हो जायेगा। उसने उड़े होकर कहा, 'मुझे गद्दी लेकर क्या करना है। गद्दी पर तू ही बैठ लेकिन यह समझ ले कि हम इज्ज़तदार जानवर हैं और इज्ज़त से ही रहेंगे । तू अपनी हैसियत में रह और बूढ़ों को इधर-उधर दौड़ाकर परेशान मत कर...।'

राजा खुशामद से उसके पाँव चाटता और पूंछ सहलाती रहा । तभी कही से लोमड़ी भी आ गयी और तीनों ने सलाह की कि राज्य की सरहदों की देख-भाल के लिये शेर को दौरे पर भेज दिया जाय । लोमड़ी और भेड़िये ने लगातार बाहरी हमलों और खतरों की ‘बाते कह-कह कर, राजा की आज्ञा का हवाला देकर शेर को दौरे पर भेज दिया। शेर बड़े बेमन से चला तो गया, लेकिन भीतर बहुत ही भुनभुनाया । सारे दिन लोमड़ी और भेड़िये को “महल” में आते-जाते देखकर उसे किसी गहरी साज़िश की गध भी आ रही थी। बुढापे में आराम की जगह यह भाग-दौड़ उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं आयी।

इधर एक तरह भेड़िया ही राज्य करने लगा था । वह राजा की आज्ञा के नाम पर चाहे जिसे मरवा देता, चाहे जिसे इधर से बदल कर उधर फेंक देता । सारे खास-खास ओहदों पर वह अपने और लोमड़ी के भाई-भतीजों को ले आया । उसके नाम से जंगल के सारे जानवर काँपते थे और अब जब महल में आता तो शान से गद्दी पर बैठता। राजा अपने दोनो पजो से उसकी पूँछ दबाता और जीभ से उसका शरीर चाटता रहता। उसके सामने ही लोमड़ी और भेड़िया इश्क लड़ाते रहते, आपस मे किलोले करते और वह मन ही मन कुढता हुआ इनकी सेवा करता । उसकी इज्ज़त और जान भेड़िये के हाथ में थी। कभी-कभी उसका मन होता कि बाहर जाकर अपनी सारी प्रजा को बता दे — भाइयों, मैं राजा-वाजा कुछ नहीं, एक छोटा और डरपोक गीदड़ हैं और मेरा नाम ले-लेकर जो कुछ किया जाता है उसमें न मेरा हाथ है न मेरी जानकारी । लेकिन जानता था कि ऐसा वह नहीं कर सकता। इतने दिनों धोखा दिया है इस आधार पर सारे जानवर उसे मार ड़ालेंगे, और अगर वे न भी मानें तो यह भेड़िया तो छोडेगा नहीं । लोमड़ी भी उससे जा मिली है। वह भी कही मुझे नीचा समझती है । बस एक ही उम्मीद थी कि शेर लौट आये तो किसी तरह उस तक अपनी बात पहुँचाई जाय । तब तक तो पूँछ से भेड़िये का चँवर डुलाते हुए सब कुछ बर्दाश्त करना ही होगा।

शेर खुद ही गुस्से में दहाड़ता हुआ लौटा था। कही भी कुछ नहीं था और उसे बेकार ही इन लोगों ने दौड़ा दिया था। वह सीधा महल में घुसा चला गया। भेड़िया नहीं चाहता था कि शेर और राजा मिले, लेकिन शेर का मिजाज़ देखकर भीतर जाने और भेद लेने की हिम्मत नहीं पड़ी। उधर राजा भी अचानक शेर को सामने देखकर सकपका गया, उसकी बोली बन्द हो गयी । वह सीधा उसके चरणों पर लेट गया, 'महाराज, आपको परेशान करने में मेरी कोई गलती नहीं है। मुझे तो इन लोगों ने किसी लायक नहीं रक्खा और मेरी कोई पूछ नहीं है । जो मन होता है, करते हैं। मैं तो एक तरह से यहाँ कैद हैं। आप खुद सोचिए मेरी हिम्मत आपको परेशान करने की हो ही कैसे सकती है ? मैं क्या जानता नहीं हैं कि आप ही जंगल के असली राजा है, आपके खून में शासन करना है। मैं तो सच्चे दिल से चाहता हूँ कि आप जैसे अनुभवी और रोबीले हाथों में सारा राज-काज रहे और मुझे छुट्टी मिले । आपके साथ जो ज्यादती हुई है उसका मुझे सचमुच बहुत अफसोस है ।'

यह सब सुनकर शेर दया से पिघल गया। उसकी समझ में सारा खेल आ गया। वह एकदम बाहर निकला और सीधा भेड़िये पर टूट पड़ा। जब तक कोई कुछ समझे, उसने भेड़िये के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर उसी तरह लौटकर राजा को बताया कि उस बदमाश का सफाया कर दिया है । तुम राजा हो, राजा ही बने रहो। मैं इज्ज़त के साथ कही आराम करना चाहता हूं। मुझे छुट्टी मिलनी चाहिए। राजा ने सोचा कि अगर ऐसा दयालु और शक्तिशाली शेर अपने पास बना रहे तो किसी का ड़र नहीं रहेगा । उसने फिर उसके पाँव चाटे, पूंछ दबाई, शरीर चाटा ‘महाराज, आप इस उम्र में कहाँ जंगल-जंगल मारे फिरेंगे ? आप यही रहिए, आप को सारी सुख-सुविधाएँ देने का जिम्मा मेरा है। हम लोग आप की सेवा करेंगे। खैर किसी तरह शेर मान गया। उधर लोमड़ी भी पलट गयी थी और राजा के पास आकर इस तरह शेर से रुकने का आग्रह करने लगी थी जैसे कभी भेड़िये से उसका परिचय ही न रहा हो ।

अब शेर मजे में अच्छे से अच्छा खाना खाता, जब तक मन होता रहता और बहुत थक जाता तो बाहर घूम आता। जब तक वह महल में रहता, लोमड़ी और स्यार दोनो उसकी सेवा करते रहते। राजा उसकी पूंछ दबाया करता और लोमड़ी शरीर चाटती रहती । लोमड़ी ने पहिले भेड़िये की तरह शेर को भी पटाने की कोशिश की, लेकिन शेर ने उसकी तरफ देखा भी नहीं । उसे भी लगा कि उसका उद्धार राजा की रानी बने रहने में है। अब वह रानी बनकर सारा राज-काज देखती, राजा के नाम पर तरह-तरह की आज्ञाएँ जारी करती। इस तरह राजा का यश दिन दूना और रात चौगुना बढता चला गया । उसके योग्य शासन की चारों तरफ धाक जम गयी। राजा बिना शेर की सलाह के कुछ न करता । शेर भी बड़ा सुखी था।

शेर बूढा तो था ही । एक दिन यों ही बाहर चहल-कदमी करने गया तो लौटा नहीं । या तो कही मर गया या किसी और ने उसे मार दिया। जैसे ही महल में खबर पहुंची तो चारों तरफ मातम छा गया । पूरे जंगल मे सरकारी शोक मनाया गया, झंडे झुका दिये गये। दफ्तरों की छुट्टियाँ हो गयी और चारों तरफ शोक-संगीत गूंजने लगा। राजा को सचमुच ही दुख हुआ था। एक तो उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि सारा राज्य कैसे चलेगा वह किससे सलाह लेगा । भेड़िया अपनी तेज़ बुद्धि के कारण और शेर अपने अभ्यास के कारण जिन मसलों को चुटकी में हल कर देते थे उनमें स्यार राजा के हाथ-पांव फूल जाते थे, दिमाग ही काम नहीं करता था। दूसरे, सारे दिन उसके हाथ-पाँव दर्द करते रहते, जीभ ऐंठती रहती, पूँछ दबाने और शरीर चाटने की ऐसी आदत पड़ गयी थी कि समझ में ही नहीं आता था कि अपने पंजो और जीभ का क्या करें। वह सुस्त और उदास रहने लगा ।



एक दिन सारे जंगल में तहलका मच गया कि राजा बीमार हो गया ह और उसकी तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली जा रही है। राजा की हालत सचमुच बहुत ही खराब हो गयी थी और सारे सरकारी अफ़सर, मातहत इधर से उधर दौड़-धूप कर रहे थे कि अब क्या होगा । ईश्वर का भेजा हुआ राजा अगर बीमार हो गया है तो जरूर कोई भारी मुसीबत राज्य पर आने वाली है। लोमड़ी बेचारी रात-दिन सेवा कर रही थी । राजा सूख कर काँटा हो गया था और कोशिश करने पर भी उसकी आवाज़ नहीं निकलती थी, बस आँखें फाड़े इस छूटते वैभव और राजसी ठाठ बाट को देखा करता था। सबको लग गया कि अब राजा कुछ ही दिनों का मेहमान है । लोमड़ी सबसे कहती कि राजा को अपने दोनों प्रिय मंत्रियों के जाने को ऐसा सदमा बैठा है कि अब शायद ही उठ सकें । वह जोर-जोर से रोने लगती अब पता नहीं कौन राजा हो ? उसे अपने सुख-आराम छिन जाने की चिन्ता हो रही थी । उधर यह भी समाचार उसे मिल रहे थे कि राजा बनने के लिए बड़ी-बड़ी उठा-पटक जंगल के जानवरों में चल रही है। किसी का कहना था कि फौजें विद्रोह कर देंगी और कोई सेनापति ही राजा बन बैठेगा, किसी को अन्दाज़ था कि भेड़िये के लाये हुए भाई-भतीजों में से ही कोई राजा बनेगी। उधर राज्य-भर के हकीम-वैद्य रात-दिन एक करके राजा की जान वापस लाने में लगे हुए थे।

तभी किसी ने खबर दी कि बहुत दूर जंगल के किसी कोने की माद में कोई बहुत ही बुढा स्यार-वैद्य रहता है और आस-पास उसकी बड़ी शोहरत है। वह किसी से कुछ लेता-देता भी नही है। फौरन राजा के चर दौडे गये और उस वैद्य को ले आये। बड़ी गम्भीरता से नाक पर चश्मा खिसका कर वैद्य ने राजा की हालत देखीं। वह देखते ही राजा की असलियत समझ गया। लोमड़ी को एक तरफ ले जाकर उसने कुछ समझाया । लोमड़ी की समझ में कुछ भी नहीं आया, लेकिन उसने फौरन ही सेवक दौड़ाये कि जैसे भी और जहाँ से भी हो, कोई मरा हुआ शेरया भेड़िया लाया जाय। लोगों ने समझा कि शायद उसके किसी हिस्से की दवा बना कर राजा को खिलायी जायेगी। सारा राज-काज ठप्प हो। गया था और लोग जल्दी से जल्दी राजा की समस्या को हल कर डालना चाहते थे।

बड़ी मुश्किल से किसी झाड़ी मे फंस कर भूख-प्यास से मरा हुआ एक सूखा-सा बाध मिला। शेर या भेड़िया मिला ही नहीं उस समय । खैर, बाघ की ठठरी अन्दर भेज दी गयी और जनता भीड़ लगा कर महलों के बाहर नये सूचना-पत्र की राह देखने लगी। वैद्य ने सबको महलों से बाहर निकाल दिया, सिर्फ लोमड़ी ही वहाँ रही। आज्ञा दे दी गयी कि कोई भीतर न आने पाये। अब वैद्य ने राजा को उठाकर बाघ के पैरो पर डाला और उसके पजे अपने हाथ में पकड़ कर बाघ की पूछ सहलाने लगा। और कुदरत का कमाल देखिए, जैसे-जैसे उसके पजो से बाघ की पूछ सहलायी जाती रही, बीमार और बेहोश राजा में उसी-उसी तरह शक्ति का संचार होता रहा। सारे शरीर में चेतना आयी, आँखें खोली और राजा खुद ही जीभ से बाघ के पाँव और शरीर चाटने लगा।

सारे जंगल में खुशी की लहर दौड़ गयी कि वैद्य के इलाज से राजा की हालत सुधर गयी है । प्रार्थनाएँ और मंगल-गान होने लगे, वैद्य का जय-जयकार होने लगा । और कुछ ही दिनों में राजा स्वस्थ हो गया। वह और लोमड़ी मिलकर निहायत ही योग्यता और कुशलता से राज्य करने लगे । वैद्य के सिवा इस रहस्य की किसी को भी जानकारी नहीं हो पायी कि यह चमत्कार कैसे हुआ ? आज भी राजा जब बाध की पूंछ पर हाथ फेरता है या उसके पाँव चाटता है तो जादू की तरह उसके भीतर आत्म-विश्वास की लहरे आने लगती है। जटिल से जटिल समस्या के हल उसके दिमाग के सामने खुद ही खुलने लगते है। इस तरह वह दिन-रात अपनी साधना में लगा, योग्यता पूर्वक राज-काज चला रहा है।

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