पटना: ‘ढूंढ़ोगे अगर मुल्कों मुल्कों’ — पंकज राग


आसमान खुला तो नहीं था उस वक्त भी
लेकिन बचपन की यादों में शायद धुआं नहीं होता

पटना: ढूंढ़ोगे अगर मुल्कों मुल्कों

पंकज राग की कविता

पटना: ‘ढूंढ़ोगे अगर मुल्कों मुल्कों’




राजेंद्र नगर के उस छोटे से पहले माले के फ्लैट के सामने
एक पतली सी सड़क थी
जिसके उस पार कुछ झाड़ झंखारों के बीच
एक पोखर था जिसमें सुबह सुबह कमल के फूल खिलते थे
उससे भी थोड़ा परे रेलवे लाइन थी
जिस पर भाप के इंजन वाली रेलगाड़ियां आया जाया करती थीं
इस पूरे परिदृश्य में कहीं ढलान, कहीं चढ़ाई
कुछ आहटें और कुछ घुमाव भी जरूर रहे होंगे
लेकिन पता नहीं क्यों
पटना को जब याद करता हूं तो एक सीधी रेखा की तरह ही
शायद इसलिए कि बचपन के कई वर्षों में से
यादों के कुछ क्षण ही जिंदा रह पाते हैं
और ऐसे क्षण अपने आप ही क्रमबद्ध होकर एक दूसरे को बढ़ाते चलते हैं
या शायद इसलिए भी कि गंगा के समानांतर बसने और बढ़ने वाला एक शहर
चाहता तो यही है
कि सीधी रेखा में ही बढ़ता और चलता जाए।


ऐसी चाहत कामयाब नहीं होती
न व्यक्ति की, न शहर की
रेखाएं आड़ी, तिरछी चलने लगती हैं, मिटने भी लगती हैं
जगह जगह बनने लगते हैं आयताकार खंड
और इन खंडों के अंदर ही व्यक्ति खोजने लगता है
अपनी पहचान और अपनी सफलता
ऐसे खंडों का बहुमत एक भारी भरकम सत्ता बनाता है
जो नदियों को मोड़कर
शहर के फूलों को झुकाकर
और रास्तों को टेढ़ा कर
सीधी सादी चाहतों को ही शर्मसार कर देता है


पटना की यादें बहुत बचपन की यादें हैं
शायद बचपन अकेला ऐसा समय होता है
जब सत्ता के असर को आप समझ नहीं पाते
इसलिए उससे बचे रहने की खुशफहमी में
रीडर्स कॉर्नर से खरीदी हुई किताबें
पटना मार्केट के बिकते हुए मकोए के गुच्छे
पटना कॉलेज के सामने के मारवाड़ी बासे का सुस्वादु खाना
सभी एक खुली हुई स्निग्ध धूप की तरह याद आते हैं
आसमान खुला तो नहीं था उस वक्त भी
लेकिन बचपन की यादों में शायद धुआं नहीं होता


फिर भी यादों के परे भी कुछ होता है
जहां आग भी होती है और धुआं भी
जहां सोडा फाउंटेन भी उसकी लपेट में आता है
और एक तथाकथित संपूर्ण क्रांति
का उद्घोष भी उसे प्रज्ज्वलित करता है
बुद्ध ने कभी कहा था
कि पाटलीपुत्रा एक मुख्य शहर बनेगा
लेकिन तीन खतरे उस पर मंडराते रहेंगे
अग्नि, पानी और आंतरिक मतभेद
1975 की उस विकराल बाढ़ से
तो कुछ खास नहीं बदला
लेकिन संपूर्ण क्रांति की उस आग ने शायद पटना
को अजीब तरह झकझोर दिया
यह एक नई सत्ता की शुरुआत थी
जो औरंगज़ेब के पोते आज़िम के बनाए अज़ीमाबाद से बिल्कुल अलग थी
यहां न तो अज़ीमाबाद के पहले बनी पत्थर की मस्जिद का एहतराम था
न पादरी की हवेली की मालूमात थी
न छज्जूबाग से बंगाल जाते आमों की महक थी
यहां न गोलघर की बेवकूफाना संरचना से कोई मतलब था
या फिर पटना कॉलेज की खूबसूरत डच इमारतों से कोई प्यार
अब बस हंगामा था
जिसके बीच जब मैं जाता था पटना
तो देखता था एक हुजूम में दिल्ली जाते छात्रों को
बर्बाद होते राजेंद्र नगर और कदमकुआं की सड़कों को
और अपहरण और हत्या की तमाम वारदातों के बीच भी
पान की दुकानों पर देश और व्यवस्था को लेकर
हर दिन दुहराई जाने वाले बहसों को


किसी ने मुझसे कहा कि क्यों दुखी होते हो
यह अब एक समीकरण है
और अब तुम्हारे बचपन की यादों की रेखाएं भी सीधी, आड़ी, तिरछी
सब से परे कुछ ऐसे चलने लगी हैं कि
अज़ीमाबाद के मुसव्विरखाने के वे चित्राकार तो
आज बेचारे ही हो जाते
कालिकिंकर दत्त, आर.के. सिन्हा और रामशरण शर्मा जैसे बुद्धिजीवियों की
अगर समाधियां होतीं तो उनके
पत्थर गिर गिर कर चीत्कार कर रहे होते
तुम तो बस खुश हो जाओ कि अब पटना में
शराब नहीं मिलती


लोग जब मुझसे ऐसी बातें करते हैं
तो मैं पटना नहीं जाना चाहता
लेकिन अज़ीमाबाद की गलियों में एक बार
घूमना चाहता हूं
शायद कुछ मिल जाए
शायद यह शहर एक मोड़ ले ले
शायद फिर से बन जाए एक सीधी रेखा नक्शे पर
भले ही शाद अजीमाबादी ने बहुत पहले कहा था
कि ‘ढूंढ़ोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम’
फिर भी लगता है
कि कोशिश करूंगा तो
कुछ न कुछ ढूंढ़ ही लूंगा
उस अज़ीमाबाद में
जहां से शायद एक रेखा निकलकर
पटना को भी अपनी बांहों में ले ले।


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