योगिता यादव की कहानी 'नई देह में नए देस में' | #हिंदी #कहानी - #Shabdankan
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योगिता यादव की कहानी 'नई देह में नए देस में' | #हिंदी #कहानी

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योगिता यादव की लेखनी को मैं सदैव कहानी की विषयवस्तु को बिलकुल ताज़ा लिखने वाली मानता हूँ ,'नई देह में नए देस में' उन्होंने मेरी यह धारणा और मजबूत की हैं, उन्हें बधाई देता हूँ.

भरत एस तिवारी




"दो औरतें जब आपस में मिलना चाहती हों तो उन्‍हें मिलने देना चाहिए। किसी को भी फि‍र उनके बीच में नहीं आना चाहिए। एक स्‍त्री की दूसरी स्‍त्री से मुलाकात ही आने वाले भविष्‍य का माहौल तय करती है। वे जब प्‍यार से मिलेंगी तो आने वाली दुनिया प्‍यार की होगी और अगर नफरतों में मिलेंगी तो आने वाली दुनिया नफरतों से भरी होगी।” 

नई देह में नए देस में

— योगिता यादव

ठाकुर साहब संस्‍कृति प्रेमी हैं। ठाकुर साहब कला प्रेमी हैं। ठाकुर साहब पुरातन प्रेमी हैं। अब तो ठाकुर साहब देश की सबसे बड़ी सांस्‍कृतिक संस्‍था के अध्‍यक्ष हो गए हैं। अब वे देश-विदेश के दौरे करेंगे। करते ही रहे हैं। कला, संस्‍कृति और प्रेम सबका उत्‍थान एक साथ होगा।

इसी बीच बेटे का ब्‍याह जुड़ गया । तब..., इससे क्‍या फर्क पड़ता है। वे सबके साथ हैं पर किसी के निजी जीवन में हस्‍तक्षेप नहीं करते । यही वे औरों से भी चाहते हैं कि कोई उनके निजी जीवन में कोई हस्‍तक्षेप न करे। व्‍यवसायिक जीवन में तो और भी नहीं।

शादी के शामियाने आंगन से चोगान तक सज गए हैं । एकदम कलात्‍मक पर पारंपरिक अंदाज में सजावट की गई है। केले के पेड़ तने सहित काट लिए गए है, जिनसे द्वार बने हैं। आमों के दरख्‍त पर्ण विहीन कर हरियल झालरें बनी हैं। गोटा पट्टी के कुरतों के साथ डोगरी सुत्‍थन और मां जाल की ओढ़नी ओढ़े गाने वालियों ने आंगन में रौनक लगा दी है। कींग, मोरचांग, सारंगी की भूली बिसरी लोक धुनों के मधुर नाद के बाद औरतों ने ढोलकी उठा ली है। आज दूल्‍हे की मामियां गीत गवा रहीं हैं। बांटने को सुंड के कटोरे भर लाईं हैं। मामियों ने ठाना है कि उनकी रौनक कहीं भी चाचियों या बुआ-बहनों से कम नहीं पड़नी चाहिए। गाने वालियों ने भी ढोलकी की थाप पर ऐसे सुर छेड़ें कि बन्‍ना और घोडियों का सुरूर हर आम और खास पर चढ़ गया है। माहौल में एक अजब सी तरंग उठ आई है। भूले बिसरे गीत सब फि‍र से होंठों पर उतर आएं हैं। दो जनानियां ढोलक पर डटी हैं। एक के घुटने के नीचे दबी ढोलक उसकी हथेलियों की थाप पर बज बज रही है। दूसरी ने अपनी हथेली से उसे थामा और पतली सींक से उस पर ऐसी चोट दे रही है कि नया सुर बंध गया है।

... बन्‍ना और घोडि़यां गाते हुए ये किसने ढोलक पर थाप दी कि महफि‍ल का रंग एकदम से बदल गया। तान शायद उस आसमानी ओढ़नी वाली ने दी थी जो ढोलकी पर बजाने के लिए चम्‍मच ले आई थी,

काला घघरा सिंवाई के ओ...
काला घघरा सिंवाई के ओ...

सब गाने वालियों के सुर उसकी लय में लयबद्ध हो गए। कि जैसे सबको याद है यह गीत।

काला घघरा सिंवाई के ओ...
काला घघरा सिंवाई के ओ...
ओ धोबन पाणिये जो चली ऐ मैं तेरी सों ...
ओ धोबन पाणिये जो चली ऐ मैं तेरी सों ... 

(नया सिला काला घाघरा पहन कर धोबन पानी लेने चल दी है। )

शादी ब्‍याह की इसी लकधक के बीच कैथरीन का फोन आ गया, कि वो भारत आ रही है। ठाकुर साहब के पर्सनल मोबाइल पर। हां, बहुत जल्‍दी वह भारत आ रही है। ठाकुर साहब का दिल बाग बाग हो गया है।

कैथरीन से ठाकुर साहब की पहली मुलाकात रूस के दौरे पर हुई थी। जब वे वहां ‘इंडिया डे’ पर अपने देश के नृत्‍य, संगीत और संस्‍कृति का प्रदर्शन करवा रहे थे।

लंबी गर्दन, नीली हरी आंखें और काले लॉन्‍ग गाउन में कैथरीन किसी अप्‍सरा से कम नहीं लग रही थी। रूसी भाषा और संस्‍कृति में भले ही इसके लिए और रूपक हों पर ठाकुर सुरेंद्र प्रताप सिंह को उस समय बस अप्‍सरा ही याद आई । और वे इस रूसी अप्‍सरा पर अपना भारतीय दिल हार गए। यूं वे सौंदर्य के उपासक शुरू से ही हैं पर इस बार उपासना से ज्‍यादा मामला दिल के चोटिल होने का था। यूं लगा कि इस बार उनके दिल के ऐन बीचोंबीच कोई सुराख हो गया हो।

उत्‍सुकता से भरी वह रूसी लड़की अभी तक रूस के लोक नृत्‍यों पर शोध कर रही थी कि ठाकुर साहब से मिलकर उसे मालूम हुआ कि भारत के तो चप्‍पे चप्‍पे में लोक का सौंदर्य ठाठे मारता है। क्‍या कालबेलिया, क्‍या कुड और क्‍या कायकोट्टिकली .... यहां की तो मिट्टी भी लोक की धुनों पर थि‍रकती है। बस तभी से कैथरीन भारत आना चाह रही थी।

पर समस्‍या यह थी कि खाली हाथ वह भारत कैसे आए। माने, कुछ ठौर ठिकाना तो होना ही चाहिए। लेने को ठाकुर साहब उसकी जिम्‍मेदारी ले सकते थे पर इसमें कई तरह के जोखिम थे। प्रेम चाहें जितना हो ठाकुर साहब किसी तरह के जोखिम में पडना पसंद नहीं करते।

तो इसके लिए रास्‍ता यह निकाला गया कि कैथरीन कल्‍चरल फैलोशिप के लिए आवेदन करे। पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान, कजाकिस्‍तान और चीन के युवाओं को भारत हर साल करोड़ों रुपये की फैलोशिप देता है सांस्‍कृतिक संबंधों के नाम पर, तो क्‍या कैथरीन को नहीं दी जा सकती। उससे तो फि‍र कितने आत्‍मीय संबंध हैं। भविष्‍य में क्‍या पता यह और भी प्रगाढ़ हो जाएं। ठाकुर साहब के होते यह काम सफलतापूर्वक हो गया। कैथरीन की लगन, मेहनत और प्रपोजल भी इसमें सहायक हुआ। उम्र भर जिसने अपनी मां को श्रम करते देखा वह अब श्रम में जिंदगी का सौंदर्य देखना चाहती थी। उसने ‘भारतीय लोक जीवन में श्रम के गीतों’ को अपने शोध के लिए चुना। वो गीत जो किसान धान की पनीरी लगाते हुए गाते हैं, जिन्‍हें फावड़ा चलाते हुए मजदूर गाते हैं, जिन्‍हें औरतें घाटों से घड़ों में भर लाती हैं। ठाकुर साहब तो कैथरीन पर पहले ही मुग्‍ध हो गए थे पर जब यह प्रपोजल उनकी आंखों से गुजरा तो उन्‍हें लगा कि गहरी आंखों वाली यह लड़की अद्भुत है। कुछ तो इसमें है जो औरों में नहीं है। वरना कितनी लड़कियां आईं और गईं, कभी उन्‍हें किसी से इस तरह लगाव नहीं हुआ।

कैथरीन लगभग उसी उमंग और उन्‍माद में थी, बस कारण थोड़ा अलग था। वोल्‍गा के ‘ब्रिचिस’ पर उसने कई गीत सुने और गाए थे। बोट चलाने वालों के जीवन और प्रेम को भी उसने रूसी गीतों में सुना था पर उसे यह बात एक अलग ही रोमांच से भर रही थी कि यहां लोग शोक में भी उतनी ही मधुरता से गीत गाते हैं। इसके बावजूद उसने अपने प्रोजेक्‍ट के लिए श्रम के गीतों को चुना, क्‍योंकि वह और शोक में पड़ना नहीं चाहती थी। उसने और गेव्रियल ने तय किया था कि इंडिया से लौटते ही, यानी यह फैलोशिप खत्‍म होने के बाद वे दोनों शादी कर लेंगे। जिस ग्रोसरी शॉप पर गैव्रिएल ने काम करना शुरू किया था वह अब वहां का मैनेजर हो गया था। और जब तक कैथरीन इंडिया से लौटेगी वह कुछ और धन जोड़ लेगा ताकि वे अपने हनीमून के लिए कोई सुंदर यात्रा प्‍लान कर सकें।

गेव्रियल हर सुख-दुख में कैथरीन के साथ बने रहना चाहता है, पर जाने क्‍यों उसका मन नहीं कर रहा कि कैथरीन इंडिया जाए। कैथरीन के इंडिया जाने से पहले यह आज उनकी आखिरी मुलाकात है। वह उसे एयरपोर्ट पर सी ऑफ करने जाना चाहता था, पर ग्रोसरी शॉप के मालिक ने उसे इसके लिए छुट्टी देने से मना कर दिया।

वोल्‍गाग्राद में गेव्रियल से अलग होते हुए कैथरीन ने उसे बताया कि उसकी फैलोशिप अप्रूव्‍ड होने पर वह कितनी ज्‍यादा खुश है। एक धड़कते हुए दिल और आशंकित मन के साथ गेव्रियल ने बहुत संकोच से कैथरीन से पूछा -

कैथरीन फ़ ईन्द्जियु अबिज़ात्चेल्ना नादा येख़त्च ? ( कैथरीन इंडिया जाना जरूरी है?)

एतो मोया मिचता गैव्रिएल (ये मेरा सपना है गैव्रिएल) ती ज़्नाएश गैव्रिएल (तुम जानते हो गैव्रिएल)

इन्दिया ने बेजअपासना द्ल्या झेनशीन (पर भारत औरतों के लिए सुरक्षित नहीं है। )

येस्ली फ़ ईन्द्जि ने बिज़अपासना, तो फ़ रस्सी बिज़अपासना श्तो ली ? (अगर भारत औरतों के लिए सुरक्षित नहीं है, तो क्‍या रूस है?) ती पोमनिश मर्गारितु ग्राचिवु ? (मारग्रेटा ग्रेचेवा तुम्‍हें याद है गैव्रिएल)

कैथरीन के इस प्रश्‍न पर गैव्रिएल चुप हो गया। उसने दुनिया भले न देखी हो पर अपने आसपास की औरतें देखी हैं। जो खुश नहीं थी, घर भी उनके लिए बहुत सुरक्षित नहीं थे। जिस रूसी महिला का कैथरीन ने नाम लिया उसका एक हाथ उसके पति ने सिर्फ जलन के कारण काट दिया था। अब मारग्रेटा बायोनिक हाथ का इस्‍तेमाल करती है। इसके बावजूद आज के दौर में भी कुछ रूसी महिलाओं की मानसिकता ऐसी है कि उन्‍हें लगता है कि उनका पार्टनर उन्‍हें मारता है तो इसका अर्थ है कि वह उन्‍हें प्‍यार करता है। कैथरीन की मां की कहानी कुछ इससे बहुत अलग नहीं रही है। गैव्रिएल ने कैथरीन को बचपन से अपने लिए खुद मेहनत करते देखा है। वह उसके सपने, संघर्ष और यातनाओं से परिचित था। कैथरीन रशियन पिता और लातवियन मां की संतान है। कैथरीन तब सिर्फ पांच साल की थी जब दोनों का तलाक हो गया। उसके बाद का जीवन कैथरीन के लिए संघर्ष और यातनाओं से भरा रहा है। इसके बावजूद उसके मन की कोमलता कम नहीं हो पाई। वह कला और संगीत के प्रति उसकी रुचि से भी बहुत अच्‍छी तरह वाकिफ है। 26 साल की इस प्‍यारी सी लड़की के लिए किसी दूसरे देश से फैलोशिप मिलना किसी सपने के सच होने जैसा ही है। गेव्रिएल ने सोचा, इस पर कैथरीन को रोकना नहीं चाहिए, बल्कि बधाई देनी चाहिए। यह सेलिब्रेशन का समय है।

स नेलुचशिमी पोज़ेलानियामी कैथरीना (शुभकामनाएं कैथरीन। ) व्‍से त्‍वोइ मि‍चती स्‍व्‍यवायुत्‍स्‍या (तुम्‍हारे सब सपने सच हों ) बेस्‍ट ऑफ लक।

और गैव्रिएल ने बढ़कर कैथरीन को गले से लगा लिया। एक लंबे चुंबन के साथ यह कैथरीन से गैव्रिएल की शायद आखिरी मुलाकात हो। अगले दिन कैथरीन को अपने सपनों की यात्रा पर निकलना था।

आसमानी ओढ़नी वाली की ओढ़नी की किनारियां लकधक कर रहीं हैं और वह गा रही है, अपनी तालियों को सुर से संगत करती बाकी औरतें भी टेर दे रहीं हैं ... हाय मैं तेरी सों

मत जांदी धोबणे तू मेरिये
नी आय हाय मेरिये
उत्‍थूं राजेयां दा डेरा हे मैं तेरी सों
ओ उत्‍थूं राजेयां दा डेरा हे मैं तेरी सों

(आज मत जा मेरी प्‍यारी धोबन, आज वहां राजा आखेट के लिए आए हुए हैं। तेरी कसम मैं सच कहता हूं )

धोबणे घड़ा सिर चुकेया
नीं आय हाय चुकेया
हो धोबण पाणिये जो गई ए मैं तेरी सों
ओ धोबण पाणिये जो चली ऐ मैं तेरी सों

(धोबन ने सिर पर घड़ा लिया और धोबी की कोई भी बात सुने बिना वह पानी लेने चल दी।)

[.[.[.].].]

गेव्रिएल से पहली बार अलग होने और लंबे सफर की थकान में कैथरीन कुछ उदास सी हो गई। वह अपने होटल के कमरे में थी जब ठाकुर साहब ने उसके चेहरे पर यह थकान देखी।

अक्षांश और देशांश बदलने के साथ ही व्‍यक्ति व्‍यक्ति के संबंध और भाव में भी कुछ कुछ परिवर्तन आ जाता है। कैथरीन को गले से लगाते हुए ठाकुर साहब ने ऐसा महसूस किया। वह लड़की जो उन्‍हें रूस में अप्‍सरा लग रही थी, यहां लिटिल एंजेल लगने लगी। उन्‍हें लगने लगा कि दूर देस से आई इस बच्‍ची की जिम्‍मेदारी अब उन पर है। वे खुद को उसका लोकल गार्जियन महसूस करने लगे।

कैथरीन के चेहरे की थकान ने उन्‍हें वात्‍सल्‍य भाव से भर दिया। ‘चहकती हुई लड़कियां कभी उदास नहीं होनी चाहिए’- जैसे उन्‍होंने खुद ही से कहा।

फि‍र कैथरीन से – “अगर तुम बहुत ज्‍यादा थकी हुई न हो तो हम लंच करने बाहर चल सकते हैं। “

दरमियाना कद, गठा हुआ शरीर और चेहरे पर उम्र के अनुभवों का डेरा, कैथरीन के लिए ठाकुर सर के प्रश्‍न भी निर्देश ही हुआ करते हैं। इसमें हां या ना का कोई विकल्‍प ही नहीं है। अगर ठाकुर सर उसे बाहर लंच करवाना चाहते हैं तो निश्चित ही वह थकी हुई नहीं है। वे उसके बारे में उससे भी बेहतर जानते हैं । वरना उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि उसे इंडिया में इतना बड़ा प्रोजेक्‍ट मिल सकता है। उसने झटपट अपने सूटकेस से सफेद रंग की कढ़ाईदार मिडी निकाली और तैयार होने ड्रेसिंग रूम की तरफ चल दी।

उसकी नजरें यहीं सर के पास रह गईं हैं, उसे बिल्‍कुल अच्‍छा नहीं लग रहा कि इतने बडे आदमी को उसका इंतजार करना पड़ रहा है। अगर वे पहले मैसेज भिजवा देते तो कैथरीन तैयार होकर खुद उनका इंतजार कर रही होती।

वे जल्‍दी ही हरिसिंह पैलेसे रेस्‍तरां पहुंच गए हैं। एक कर्तव्‍यनिष्‍ठ, प्रजावत्‍सल, प्रगतिशील सोच के राजा की पीढि़यां उसके नाम पर दो चार मूर्तियों, थोड़े से खजाने के अलावा ये एक लाइब्रेरी और रेस्‍तरां ही बचा कर रख पाईं हैं। आम के बाग से घिरा यह छोटा सा पैलेस तवी किनारे की पहाड़ी पर है जहां से पूरा जम्‍मू शहर एक नजर में दिखाई देता है। कैथरीन और ठाकुर साहब के लिए बाहर लॉन में खाने का इंतजाम किया गया है, जहां हल्‍की धुंध है। आम के बाग से आती खुशबू तवी के पानी से उठती ठंडक में घुलमिल गई है। कभी भी अचानक ठंडी हवा का झोंका देह को छू जाता है और स्‍लीवलैस मिडी में कैथरीन सिहर जाती है। एक खूबसूरत आत्‍मीय मुलाकात के लिए इससे सुंदर माहौल और क्‍या हो सकता है। कैथरीन को अचानक गेव्रिएल की याद आ गई है। ठाकुर साहब धीमे कदमों से चलते हुए कुछ ऐतिहासिक प्रसंगों के साथ कैथरीन को हरिसिंह पैलेस दिखा रहे हैं।

वे इस पूरे माहौल को ऐसे बरत रहे हैं कि वही राजा है और यह महल उन्‍हीं की विरासत है। अपने पूर्वजों की वीरता के किस्‍से सुनाते हुए उन्‍होंने तय किया कि पारंपरि‍क खानपान के बारे में वे उसे खाना खाते हुए ही बताएंगे। और श्रम के गीतों के लिए वे उसे उन सब ठिकानों पर ले जाएंगे जहां लोग श्रम को नाच गा कर सेलिब्रेट करते हैं। फि‍र इसके लिए उन्‍हें कितने ही शहरों, गांवों, पहाड़ों, घाटों और मेलों की खाक क्‍यों न छाननी पड़े।

एक अनुभवों में पगा हुआ आदमी है, एक जिज्ञासा की फुनगी पर बैठी लड़की है। दोनों की बातों और मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा है। एक शहर से दूसरे शहर, एक गांव से दूसरे गांव। अलग अलग बोलियां, अलग अलग भाषाएं, अलग अलग परिधान, पर पसीना सबका एक सा। सुरों में हिलते होंठ और धुनों पर थिरकते पांव सबके एक से। यह दोनों की जिंदगी का अब तक का सबसे सुंदर समय है। इसे कभी बीतना नहीं चाहिए।

कभी किसी ऐतिहासिक इमारत में, कभी लाइब्रेरी में, कभी किसी पुराने बाग में तो कभी किसी पहाड़ी खेत पर दोनों साथ घूम रहे हैं। देहरियों, देवस्‍थानों, कारकों, भाखों में कैथरीन लोक के सुरों की सरगम संजो रही है। मेले ठेलों की रौनकों में मचल रहे हैं दोनों। वे किसी गांव में हैं जहां औरतें हिलमिल गा रहीं हैं...

पेहलियां पौणियां उतरी
ओ आय हाय उतरी
ओ राजे गिटुए दी मारी ऐ मैं तेरी सों
हाय मैं तेरी सों
ओ राजे गिटुएं दी मारी ऐ मैं तेरी सों
दूजीयां पौणियां उतरी
ओ आय हाय उतरी
ओ राजे बांह फड़ लई ऐ मैं तेरी सों

(धोबन पहली ढलान उतरी तो राजा ने कंकड़ मारकर उसे छेड़ा। और दूसरी ढलान उतरते हुए राजा ने धोबन की कलाई पकड़ ली। )

देख सुन कर मन नहीं भरता कैथरीन लोक की इस आत्‍मा को छूकर देखना चाहती है। अभी पौ फटी नहीं है। गूजरी के सिर पर दूध का भारी डोल है, डोल को टेंपो में चढ़ाकर वह छलांग मारकर खुद भी टैंपो में चढ़ गई हैं। उसका दिन उसकी मेहनत के संग चढ़ेगा। कैथरीन उसकी नाक के फूल को छूकर देखना चाहती है, पर गूजरी के पास कैथरीन जितनी फुर्सत कहां। खड़-खड़ करता टैंपों उसके जैसी ही कई और गूजरियों को लेकर रवाना हो गया है। कैथरीन की शिकस्‍त ठाकुर साहब की मुस्‍कान में झरने की तरह फूट पड़ी है।

छड देआ राजेयां ओ बाईं जो
आय हाय बाईं जो
ओ मेरी जा‍त कमीनी है मैं तेरी सों
ओ मेरी जात कमीनी है मैं तेरी सों

(राजा मेरी कलाई छोड़ दो, मैं नीची जाति की लड़की हूं। )

तेरी जाति दा मैं क्‍या करना
ओ आय हाय करना
तेरी सूरत बड़ी सोहणी है मैं तेरी सों
हो तेरी सूरत बड़ी सोहणी है मैं तेरी सों

(तेरी जाति का मुझे क्‍या करना, मैं तो तेरी सूरत पर मुग्‍ध हो गया हूं। )

कैथरीन हल्‍की मुस्‍कान के साथ अफसोस करती है। पर खजाना अभी खाली नहीं हुआ है। कई राहें हैं, कई डेरे हैं, सबके पते ठाकुर सर के पास हैं।

ठाकुर सर का साया कैथरीन के लिए जैसे सूफी का चोला हो गया है। वह उसी में सोने जागने लगी है।

क्‍या घर, क्‍या बाहर, कैथरीन ने यादों और बातों की सब पोटलियां ठाकुर साहब के सामने खोल बिखेरी हैं... हां गेव्रिएल के बारे में भी। और संभावित हनीमून यात्रा की गेव्रिएल की तैयारियों के बारे में भी। मां और पिता के कड़वे संबंधों और अपने दुख भरे बचपन और किशोरावस्‍था के आंसुओं को भी वह अब ठाकुर सर के साथ बांटने लगी है।

वह गेव्रिएल को हर दिन याद करती है, तब और भी जब वह ठाकुर सर के साथ संकोच के पलों में होती है, कि वक्‍त उसे किस घाट ले आया। क्‍या ये मीठे दुख और तीखे सुख उसके सपनों के कारण उपजें हैं। पचास के ठाकुर साहब चालीस पर खिसक आए हैं, 28 की कैथरीन 38 की हो गई हो जैसे। मन-विचारों के तार सम भाव पर ठहरने लगे हैं। ईश्‍वर जाने सरगम अब किस राग में गानी पड़ जाए।

[.[.[.].].]

“जानते नहीं ठाकुर साहब कितनी मेहनत करते हैं दिन रात।

उन्‍हें तो काम से फुर्सत ही नहीं होती। कभी यहां तो कभी वहां, जानें कहां कहां जाना पड़ता है। ”

काम से परेशान सोमा रानी यानी मिसेज ठाकुर खुद ही से बतिया रहीं हैं और बीच बीच में नौकरों को झिड़क भी रहीं हैं। इतनी मेहनत से जोड़ा एक-एक सामान ये सब ऐसे ही बर्बाद करते हैं।

“कोई एक देश की तो बात है नहीं। उन्‍हें तो कई देशों के साथ सांस्‍कृतिक संबंध बेहतर बनाने है। उसके लिए इतने बड़े-बड़े आयोजन करने पड़ते हैं। घर भर की सारी जिम्‍मेदारियां तो अब मुझे ही संभालनी हैं। पर अब बहू आ गई है। ”

हां, बस आ ही गई है, जिम्‍मेदारियां अभी क्‍या संभालेगी। कितने ही महीने तो नूं -पुत्‍तर(बेटा बहू) की हनीमून यात्राएं ही चलती रहीं। अब जब सोमा रानी ने सोचा कि उसे थोड़ा बात व्‍यवहार का शउर सिखाया जाए तो मालूम हुआ कि उसकी छुट्टियां खत्‍म हो गईं हैं और उसे टोरंटो लौट जाना है। अभी उसकी डिग्री पूरी होने में भी कुछ समय बाकी है।

आज रूस से आई कोई खास मेहमान घर आ रही है। उसकी तैयारी भी सोमा रानी को अकेले ही संभालनी है। यूं घर पर देशी-विेदेशी लोग आते ही रहते हैं। खा-पीकर चले जाते हैं। अगर किसी से कोई खास काम साधना हो तो ठाकुर साहब पहले ही बता देते हैं। उसी हिसाब से सोमा रानी खुद की और घर की सजावट कर लेती हैं। और जितना बड़ा काम सधना हो लगभग उसी के अनुरूप तोहफे का इंतजाम भी वे किए रहती हैं। पर इस बार ठाकुर साहब ठीक-ठीक कुछ बता ही नहीं रहे कि यह किस लेवल की मेहमान है। मतलब प्रोजेक्‍ट सिर्फ कुछ लाख का है या करोड़ों का। अब वे तोहफे में देने के लिए अपने संदूक से पश्‍मीना की शॉल निकालें या सुनार से डोगरी झुमके मंगवा लें। देने को वे चांदी के गोखरू भी दे सकती हैं पर पहले पता तो चले कि मेहमान है किस काम की। सुबह से ठाकुर साहब अपनी स्‍टडी में बैठे हैं। बाहर ही नहीं आ रहे। देख रहीं हैं कि पिछले कई दिनों से अनमने से हैं। न ठीक से खाते हैं, न बात ही करते हैं। खैर बात तो वे पहले भी बहुत कम ही करते थे।

[.[.[.].].]

स्‍टडी में लैपटॉप खोलकर बैठे ठाकुर साहब भयंकर उधेड़बुन में हैं। दो साल, दो साल बीत गए और उन्‍हें पता ही नहीं चला। ऐसा कैसे हो गया आखिर। कैथरीन कोई पहली लड़की तो है नहीं। न ही वे सत्रह-अठारह साल के कोई युवा हैं। तब उनमें इतनी भावुकता कहां से आ गई। इसी भावुकता से बचने के लिए वे कई दिनों से कैथरीन से मिले नहीं हैं। पर भावुकता कम होने की बजाए और भी ज्‍यादा बढ़ गई है। वे बीस दिन के लिए उड़ीसा चले गए थे। पर वहां भी उन्‍हें कैथरीन ही याद आती रही। हालात इस कदर बदतर हो गए हैं कि अब कभी-कभी उन्‍हें सोमा रानी में भी कैथरीन नजर आने लगती है। क्‍या यह कैथरीन के लगातार साथ रहने का प्रभाव है या वाकई उन्‍हें कुछ हो गया है। नई उम्र के लड़के-लड़कियां जिसे प्‍यार कहते हैं। पर वे कभी इस फालतू की भावुकता में नहीं फंसे। वे जानते हैं हर व्‍यक्ति की एक-दूसरे से कुछ जरूरतें होती हैं, जिन्‍हें वे अलग अलग आडंबरों में छुपा कर पूरा करते रहते हैं। सोमा रानी सुंदर हैं, व्‍यवहार कुशल हैं। फि‍र ऐसा क्‍या है जो उन्‍हें कैथरीन के पाश में बांधता जा रहा है।

इस पाश से मुक्‍त होने की कोशिश में ही उन्‍होंने तय किया था कि वे अब कैथरीन से नहीं मिलेंगे। वह जो काम करने आई है करे और अपने देश रूस लौट जाए। पर ऐसा हो नहीं पा रहा। कैथरीन की फैलोशिप पूरी होने को है। पर वे भीतर से नहीं चाहते कि कैथरीन उनसे दूर हो। वे इस जुगाड़ में लगे हैं कि किसी तरह कैथरीन यहीं रह जाए। उन्‍होंने मिनिस्‍ट्री में भी बात की है, शायद कुछ हो सके। और नहीं तो हमारे देश में इतने विश्‍वविद्यालय हैं। कहीं न कहीं कोई न कोई तो ऐसा शोध होगा जहां कैथरीन फि‍ट हो सके।

मगर क्‍यों, क्‍यों चाहते हैं वे ऐसा...

कहीं ऐसा तो नहीं कि जिंदगी को दो और दो चार करते हुए उन्‍हें कैथरीन में अपनी तीस साल पुरानी निश्‍छलता दिखाई देती है। ऐसी निश्‍छलता जिसमें व्‍यक्ति सिर्फ प्रेम कर सकता है। कै‍थरीन भी उन्‍हीं की तरह धुन की पक्‍की है। और बिल्‍कुल वैसी ही मासूम, जैसे वे तीस साल पहले हुआ करते थे। अब तो वे सोमा रानी से भी जरूरत के हिसाब से ही व्‍यवहार करते हैं। यही सोमा रानी भी करती हैं। वे जानते हैं। यही उनका बेटा भी करता है। सारे रिश्‍ते नातेदार भी। बड़े-बड़े पदों पर बैठे उनके तथा‍कथित दोस्‍त भी। सब नाप कर मुस्‍कुराते हैं, नाप कर हाथ मिलाते हैं। तो क्‍या कैथरीन भावनाओं का ऐसा जंगल है जहां वे किसी अबोध बच्‍चे की तरह बिना किसी अनुशासन के रह सकते हैं। इन्‍हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए उन्‍होंने आज कैथरीन को अपने यहां खाने पर बुलाया है। पर खुद नहीं कहा, बस गाड़ी के साथ ड्राईवर को भेज दिया है उसे लाने। ड्राईवर की जगह अगर वे कबूतर को भी भेजते कि उन्‍होंने उसे बुलाया है तो भी कैथरीन बिना किसी ना नुकर के आ जाती, वे जानते हैं। सोमा रानी उसकी आवभगत में कोई कमी नहीं छोड़ेंगी, यह भी वे जानते हैं। उनके भंडारगृह को संभालती वे साक्षात अन्‍नपूर्णा हैं।

और वे खुद क्‍या हैं ... ? एक पचास से उपर के बूढ़े व्‍यक्ति, जिनके बेटे की उम्र कैथरीन से कुछ ज्‍यादा ही है। कैथरीन के साथ बीते हर पल का अहसास उन्‍हें संतोष से भर रहा है। वे हर पल को उम्र भर के लिए संजो कर रख लेना चाहते हैं। बस उनकी अपनी उम्र उन्‍हें कचोट रही है। क्‍या कैथरीन को उनकी उम्र का अहसास है ? अगर नहीं है तो होना चाहिए।

आज ठाकुर साहब ने अपनी उम्र को पूरी तरह ओढ़ लिया है। पिछले कई दिनों से उन्‍होंने दाढ़ी नहीं बनाई है। सफेद दाढ़ी ने उनका आधा चेहरा ढक लिया है। बालों में खिजाब भी नहीं है, वह कुर्ते की तरह झक्‍क सफेद लग रहे हैं।

उनकी ऐसी हालत देख कर सोमा रानी कुछ परेशान हैं। ठाकुर साहब जिन्‍हें आज तक सभी ने बस सूट-बूट में ही देखा है वे एक विदेशी मेहमान के घर आने पर भी कुर्ते पजामे में बैठे हैं। ये तो सचमुच चिंता करने वाली बात है।

गाड़ी के हॉर्न की आवाज सुनकर उनकी तंद्रा भंग हुई। उन्‍हें अहसास हुआ वे कितने घंटों से ऐसे ही बैठे हैं।

बाहर की आवाजें भीतर आ रहीं हैं,

सोमा ने कैथरीन का स्‍वागत किया है

कैथरीन शायद उन्‍हीं के बारे में पूछ रही है।

वे परेशान हो गए हैं। वे छुप जाना चाहते हैं। पर किससे?

कुछ कदम उनके स्‍टडी रूम की ओर बढ़ रहे हैं। वे अपने चेहरे की परेशानी को उन कदमों के नजदीक आने से पहले ही मिटा देना चाहते हैं। लैपटॉप बंद करके उठ गए हैं। और बाहर आ रहे हैं।

ये कदम नौकर के थे, जो उन्‍हें कैथरीन के बारे में बताने आ रहा था, वह दरवाजे के पास ही मिल गया है।

बाहर लीविंग एरिया में नजर पड़ते ही उनकी सहेजी हुई ताकत फि‍र से साथ छोड़ गई और वे आश्‍चर्यचकित रह गए …

हल्‍के बादामी रंग के गाउन में कैथरीन बिल्‍कुल ज़रीना लग रही है। रूसी साम्राज्‍य की सम्राज्ञी। वे मंत्रमुग्‍ध से उसे देख रहे हैं। ओह कितनी खूबसूरत, कितनी अद्वितीय है ये लड़की। अपूर्व सुंदरी। ग्रेसफुल ... जैसे महान सम्राज्ञी ।

और कल्‍पना कर रहे है कि वे उसके दायीं तरफ खड़े हैं, हाथ में रूसी साम्राज्‍य का चिन्‍ह लिए... वे खुद भी ‘ज़ार’ हैं। और ‘जरीना’ कैथरीन उनके साथ-साथ चल रही है। कैथरीन, हां कैथरीन ही वह स्‍त्री है जो हर लिहाज से उनके अनुकूल है। वे उससे हर मुद्दे पर विमर्श कर सकते हैं। उन दोनों की खुशियों के कारण एक से हैं। अगर उनकी जरीना उनके साथ है तो उन्‍हें दुनिया में किसी का डर नहीं। वे पूरी दुनिया पर अपना परचम लहरा सकते हैं।

उन्‍होंने गर्व से अपनी चिहुक ऊपर उठाई है और तन कर चलने लगे हैं। अब दोनों को मिलकर अपने साम्राज्‍य का विस्‍तार करना है और ... और... और इस साम्राज्‍य को ऐसा ही एक होनहार वारिस देना है, जिसमें उन दोनों के ही गुण हों।

“आहा किन्‍ना शैल है नुहाड़ा गाउन, दिक्‍खो हां, कामना वास्‍ते मंगवाई लैचे (आहा, कितना खूबसूरत है इसका गाउन, देखिए न, कामना यानी अपनी बहू के लिए मंगवा लें। ) पेट नहीं दिखेगा उसका, गोद भराई में मैं उसे तोहफे में दूंगी। ”

सोमा रानी ने हल्‍की कोहनी से ठाकुर साहब को टोका तो उनकी तंद्रा भंग हुई।

“क्‍या, हां-हां बहुत सुंदर। मेहमान है।”

बहुत खराब तरीके से ठाकुर साहब को अपनी कल्‍पना से वापस लौट कर इस खुरुदरे यथार्थ में आना पड़ा। कि अब उन्‍हें किसी साम्राज्‍य को वारिस नहीं देना है, वे अब दादा बनने वाले हैं। सोमा रानी अपनी बहू यानी कामना के लिए ऐसा ही गाउन मंगवाना चाहती हैं जिसमें उसका पेट ढक जाए।

सोमा रानी भी अजीब है। अभी तो रूसी मेहमान के लिए तोहफे सोच-सोच कर परेशान हो रहीं थीं और अब उसके गाउन पर उनकी आंख लग गई है।

पर वे ऐसी ही हैं। देती भी खुले हाथ से हैं और जब लेने पर आती हैं, तो लेती भी पूरे अधिकार से हैं।

कैथरीन चौंक गई है ठाकुर साहब को इस हालत में देखकर, बड़ी हुई दाढ़ी, थका हुआ चेहरा।

क्‍या वे बीमार हैं...पर उसकी नीली हरी आंखें बस सौंदर्य खोज लेने की आदी हैं। इस रूप में भी उसे वे कितने सुंदर और आकर्षक लग रहे हैं। आज पहली बार उसने ठाकुर सर को एक अलग लिबाज में देखा है।

उसने पूरे सम्‍मान के साथ ठाकुर सर का झुककर अभिवादन किया है। सोमा रानी बहुत देर से अंग्रेजी बोलते हुए थक गईं हैं, वे हल्‍के इशारे से ठाकुर साहब से पूछ रहीं हैं कि क्‍या मेहमान को थोड़ी बहुत भी हिंदी आती हैं?

और जवाब कैथरीन ने दिया, “आप हिंदी में ही बात करें। मैं हिंदी बोल सकती हूं मैम। ”

“हां हां, हिंदी में ही बात करो। कैथरीन तो हम सबसे भी अच्‍छी हिंदी बोलती है। ” ठाकुर साहब ने एक आत्‍मीय मुस्‍कान के साथ कैथरीन को गले से लगाया है और वे उसकी तारीफ कर रहे हैं। कि जैसे कोई टीचर अपनी स्‍टूडेंट की तारीफ करता है, पूरे गर्व के साथ।

साथ-साथ वे सोमा रानी को जरूरी निर्देश देते जा रहे हैं, जैसे हर व्‍यक्ति देता है अपने परिवार को, किसी आत्‍मीय मेहमान के आने पर।

माहौल बहुत सुंदर होने लगा है। तीनों जन एक-दूसरे के बारे में केवल सुंदर बातें कर रहे हैं। देश-विदेश के दौरों का लंबा बखान करने के बाद सोमा रानी बता रही हैं कि ठाकुर साहब बहुत केयरिंग हसबेंड हैं। आजकल टाइम बहुत कम मिल पाता है। पर कभी उन्‍होंने परिवार में किसी चीज की कमी नहीं आने दी। खैर पब्लिक लाइफ में जब आदमी हो तो फैमिली को बहुत सारे समझौते करने ही पड़ते हैं।

परिवार को समझौता करना पड़ता है, इसका कैथरीन को अभी कोई अनुभव नहीं है। पर ठाकुर सर बहुत केयरिंग है, यह उसने भी महसूस किया है।

वह उमंग में बता रही है कि उसे हिंदी तो आती है, पर यहां के लोकल एक्‍सेंट को समझ पाना उसके लिए बिल्‍कुल संभव नहीं हो पाता, अगर ठाकुर सर उसके साथ नहीं होते। उन्‍होंने दिन रात, गर्मी सर्दी की परवाह किए बगैर उसके साथ कितनी अजीब जगहों की यात्राएं की हैं। गांवों के, पहाड़ों के, खेतों के किस्‍से तो बहुत हैं। कैथरीन कभी धीमे, कभी सकुचाए स्‍वर में उन किस्‍सों को सुनाती जा रही है।

छिपाने को वह इन किस्‍सों में से बहुत कुछ छिपा भी गई है। वो दिन, वो रातें, वो मुलाकातें ...

पर उसे लग रहा है कि ठाकुर सर ने उसे कितना सपोर्ट किया है। उसे उनके प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए।

और सोमा रानी की आंखें फैलती जा रहीं हैं। बेटे की शादी के बाद के सारे रस्‍मो रिवाज, नाते रिश्‍तेदारियां सोमा रानी ने अकेले निभाई कि ठाकुर साहब बिजी हैं और ठाकुर साहब हैं कि कहीं और अपना सपोर्ट दे रहे थे। बिना दिन रात की परवाह किए।

सिर घूम गया, दिमाग भन्‍ना गया। मन तो किया कि अभी फोन करके बेटा बहू को विदेश से बुलवा लूं। एक एक फोन इनके भाइयों और अपने भाइयों को भी खड़का दूं। जरा वे भी तो देखें कि इस उम्र में भी ये आदमी कितना सपोर्टिव हुआ जा रहा है इस रूसी लड़की के लिए।



एक तो ठाकुर साहब अपनी ही उधेड़बुन से बाहर नहीं निकल पा रहे उस पर सोमा रानी के चेहरे पर खिंचता तनाव उन्‍हें और असहज कर रहा है।

ये लड़कियां भी न। पढ़ने-लिखने में भले ही कितनी इंटेलीजेंट हो, पर कहां कितना आभार जताना है, इसकी समझ सबको होना बड़ा मुश्किल है। वो जिसे अड़तीस की समझकर खुद चालीस पर खिसक आए थे, आज लगा, है तो वह अठाइस की ही। वही मूर्खता भरी मासूमियत है, जो अनुभवों से गुजरे बिना व्‍यक्ति में होती है। सोमा रानी के चेहरे पर खिंचते तनाव के बीच उन्‍हें फि‍र से कैथरीन की मासूमियत पर प्‍यार उमड़ आया। इस बेचारी का क्‍या दोष।

ठाकुर सर की यह मीठी मुस्‍कान कैथरीन को और अधिक आश्‍वस्‍त कर गई।

प्रेम में घायल दो पंछियों के बीच मोर्चा अब सोमा रानी ने संभाला है।

“किस सब्‍जेक्‍ट पर काम कर रही हो कैथरीन, मतलब जहां ठाकुर सर ने तुम्‍हें इतना सपोर्ट किया। ” बेमन से खमीरे का कौर तोड़ते हुए सोमा रानी ने पूछा।

कैथरीन ने बहुत उत्‍साह से जवाब दिया- “लोक में श्रम के गीत। ”

“ह़म्‍म काफी श्रम करना पड़ा होगा, तुम्‍हें इन सबके लिए, है न। ”

“यस, बट इट वाज वेरी एक्‍साइटेड एक्‍सपीरिएंस। इसके लिए हम कितने ही लोगों से मिले। कितने सारे लोगों के इंटरव्‍यू किए हमने। अब तो पूरा हो गया। सबमिशन भी हो गया। ”

“ओहो, पर मुझसे तो तुम मिली ही नहीं। ऐसे कैसे पूरा हो गया। तुम्‍हारे ठाकुर सर क्‍या जाने लोक। इनके पास तो बस फाइलों और स्‍टेज वाला लोक मिलता है। असल लोक तो हमने संभाला है इनका दोहरे घूंघट में चूल्‍हा फूंकते। ”

“यू मीन फोक”, कैथरीन कुछ अचकचा गई। बाकी सब तो उसे समझ आया। पर दोहरे घूंघट में चूल्‍हा फूंकने का मतलब वह ठीक-ठीक समझ नहीं पाई।

और उसने इसे विस्‍तार से समझाने की गुजारिश सोमा रानी से की।

“अरे ऐसा कुछ खास भी नहीं है। अच्‍छा तुम ही बताओ लोक आखिर है क्‍या ?”

कैथरीन, गीत, धुन, मिट्टी, वाद्य सबके बारे में एक साथ सोचने लगी है।

ठाकुर साहब और परेशान हो गए हैं। वे जल्‍द से जल्‍द इस मुलाकात का समापन करना चाहते हैं। उन्‍हें लगने लगा है कि ये उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती है। इसके सुधरने का तो सवाल ही नहीं उठता। अब ये जब तब उनके गले में फंसती रहेगी।

फि‍र किसी दार्शनिक की तरह क्षितिज में नजर गढ़ाए सोमा रानी खुद ही बोल पड़ी हैं -

“ठीक से महसूस करो तो बस स्‍त्री के आंसुओं पर उसके हुनर की कशीदाकारी है लोक। इसी ने अब तक दुनिया को संभाला। कितने ही विचार आए, क्रांति हुई और चले गए। पर लोक अपने धीमे स्‍वर में इस दुनिया को सहारा देता रहा। ” कहते- कहते सोमा रानी कुछ भावुक हो गईं।

“ओह सच । आप कितना डीप सोचती हैं मैम। ”

कैथरीन को अभी अहसास हुआ कि मिसेज ठाकुर तो ठाकुर सर से भी ज्‍यादा गहरे से लोक को समझती हैं। उससे वाकई गलती हो गई। उसे उनसे बहुत पहले मिल लेना चाहिए था।

“लो इसे टेस्‍ट करो, ऐसा टेस्‍ट तुम्‍हें दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। ” डोंगे से अंबल कैथरीन की प्‍लेट में परोसते हुए ठाकुर साहब ने माहौल बदलने की कोशिश की।

पर माहौल तो उनके हाथ से निकल चुका था। सोमा रानी पूरी मुस्‍तैदी से मोर्चे पर डटी थीं -

“अब आगे क्‍या सोचा है कैथरीन। ”

कैथरीन सोमा रानी से पहली बार मिल रही थी, वह ठीक-ठीक उनका व्‍यवहार नहीं समझ पा रही। पर ठाकुर सर के चेहरे से उसे अंदाजा होने लगा था कि कुछ तो ऐसा है जिससे वे असहज हो रहे हैं। अब ठाकुर सर के चेहरे का तनाव उसके मन में भी उतरने लगा था। वे जल्‍द से जल्‍द यहां से निकल जाना चाहती है। और ठाकुर सर के साथ अकेले में कुछ वक्‍त गुजारना चाहती है।

“बस जल्‍दी ही यहां से जाना है। ”

“कहां रूस?”

“हां, शायद...” वह समझ नहीं पा रही कि उसे क्‍या कहना है और क्‍या नहीं कहना चाहिए।

“पर अभी तो तुम कह रहीं थीं कि तुम्‍हें मुझसे कुछ सीखना है। चलोगी नहीं मेरे साथ, लोक देखने।

राजाओं के किले तो तुम्‍हें ठाकुर सर ने भी दिखा दिए होंगे। मैं तुम्‍हें रनिवास के हुनर दिखाउंगी। और हां हम उन बाडि़यों की तरफ भी चलेंगे जहां हमने जिंदा लड़कियां गाढ़ी हैं। तुम्‍हें पता है, वहां धनिया बहुत अच्‍छा होता है। ”

प्‍यार परोसने बैठी सोमा रानी ये कैसे हिंसक संदेश देने लगी हैं। ये वक्‍त किस करवट बैठ गया। ये वे किस घाट पर पहुंच गए। ये क्‍या हादसा घट गया।

कैथरीन का चेहरा भय से कांपने लगा है। ठाकुर साहब का चेहरा गुस्‍से से तमतमा रहा है। इस बार उन्‍होंने बोलने की बजाए बस हाथ के इशारे से काम लिया। जिसका अर्थ था कि तुम अब बहुत बोल चुकीं। और तेजी से कुर्सी सरका कर डायनिंग टेबल से उठ खड़े हुए।

“आओ कैथरीन मैं तुम्‍हें छोड़ आता हूं। आय होप, तुम्‍हें खाना अच्‍छा लगा होगा। ”

“या श्‍योर। थैंक्‍यू सर, थैंक्‍यू मैम। ”

ठाकुर साहब तेजी से बाहर की ओर निकल गए हैं, उनके पीछे-पीछे कैथरीन है।

आगे आगे राजा चलेया ओ आय हाय चलेया
ओ पीछे धोबणी दा डोला है मैं तेरी सों
खबर करो मैहलां राणियां, ओ आय हाय राणियां
तेरी सौतण जे आई हे मैं तेरी सों
आई ऐ ते औंणा दे
मैं भी बसना नई देणा ऐ मैं तेरी सों
ओ मैं भी बसने नई देणा ऐ मैं तेरी सों

(आगे आगे राजा चला और उसके पीछे धोबन की डोली है। महलों में रानी को खबर करो कि तेरी सौतन आई है। रानी भी डट गई है, आ रही है तो आने दो, पर मैं भी बसने नहीं दूंगी। कसम खाती हूं। )

[.[.[.].].]

अब दृश्‍य बदल गए हैं। घर में कोहराम है, बाहर कैथरीन भय से घिरी है। उस दिन के लंच पर सोमा रानी द्वारा कही गई बातों का आधार बनाकर ठाकुर साहब बगावत पर उतर आए हैं, कि जिसे जो करना है कर ले, यह उनका निजी जीवन है। इसमें वे किसी का दखल बर्दाश्‍त नहीं करेंगे।

“इतने सालों से तुम्‍हें रानी बनाकर रखा है सोमा और तुम्‍हें यह भी तमीज नहीं कि घर आए मेहमान से बात करने की तमीज क्‍या है, आखिर रहोगी तो तुम कंडी के इलाके की ही। रूखी, बंजर…”.

ठाकुर साहब ने पिया होगा तत्‍ते चश्‍मों का पानी पर सोमा को भी अपनी कंडी पर मान है।

“अपनी रियासत अपने पास रखें, कंडी के कुओं में जितनी गहराई है उतना पानी आपके झरनों में भी नहीं। आप क्‍या समझते हैं, मैं नहीं समझती कि आप बाहर क्‍या-क्‍या कर रहे हैं।

पर ध्‍यान रहें बाहर के जूते बाहर ही झाड़ कर आएं। ये मेरा घर है, आपका स्‍टेज नहीं। आप उस फि‍रंगन के लिए मुझसे जिरह कर रहे हैं?”

यह दोनों के मध्‍य के आखिरी संवाद थे।

ठाकुर साहब अब भी परेशान हैं। वे खुद को ही नहीं समझ पा रहे। सोमा उनकी सुख-दुख की साथी रही है। नहीं साथी नहीं, असल में साक्षी। “दुख की सलीब तो हर व्‍यक्ति को स्‍वयं ही ढोनी पड़ती है। पुरस्‍कारों, सम्‍मानों से पटी दीवार के इस शोकेस में से कभी कभी वे दिन भी झांकते हैं, जब उनका पूरी तरह बॉयकाट कर दिया गया था। और वे बस एक मौके के लिए तरस रहे थे। वो तड़प, वो बेचैनी मैंने अकेले झेली है। उसका कोई साथी नहीं था। सोमा केवल उस समय की साक्षी है। उन सिगरेटों की तरह जिन्‍हें मैं उस तनाव में धुआं करता था। पर अब मैंने सिगरेट पीना छोड़ दिया है। यह सेहत खराब करती है। ”

“मैं हर उस युवा की तड़प समझता हूं जिन्‍हें अवसर नहीं दिए जाते। प्रतिभा, कला, रूप, सौंदर्य ... सब अवसर पर ही निखरते हैं। मेरे हाथ में अवसर हैं, मैं जिसे चाहूं ऊपर उठा सकता हूं। और बदले में... बदले में अगर मैं किसी से कुछ चाह रहा हूं तो इसमें बुरा क्‍या है। क्‍या मेरा अपना निजी कुछ नहीं। क्‍या मैंने कुछ अनैच्छिक चाह लिया। सबका अपना अपना जीवन है, क्‍या मेरा नहीं है।

खुद को भीतर ही भीतर मथ रहे ठाकुर साहब ने घोषणा की, कैथरीन मेरी है। मैं अब उसके खिलाफ एक शब्‍द नहीं सुनूंगा। इस बात को जितनी जल्‍दी समझ लोगी, उतना अच्‍छा है। “

होना तो यह चाहिए था कि बादल फट पड़ता, दरिया उफन आते, सैलाब आ जाता, कोई जलजला ही आ जाता... पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

ठाकुर साहब के बड़े से बंगले में अपना दिल थामे सोमा रानी अकेली रह गईं। और ठाकुर साहब अपनी लग्‍जरी कार में घर से बाहर निकल गए। कहां, अब तो सब ही जान गए हैं।

कहां खबर करे, किसको बुलाए। इस उम्र में क्‍या मुसीबत खड़ी हो गई। लोग बुढ़ापे में घर आते हैं और मेरा बुड़ढा घर से निकल पड़ा। बच्‍चे भी सुनेंगे तो क्‍या कहेंगे।

चल रानिये तू भी ढूंढ ले अपने लिए कोई। दिल बहलाने को टीवी ऑन कर दिया है। टीवी में सुंदर-सुंदर लड़कियां ठुमक-ठुमक कर नाच रहीं हैं, एक लड़की सिर पर पगड़ी बांधें राजा का वेष धरे है और सब उसके आसपास नाच रहीं हैं। सुर तो शोक का है, पर कैसी पागल हैं कि नाच रहीं हैं -

आपू बैठी राणी पलंगैं
ओ आय हाय पलंगैं
ओ धोबण पंजी पर बैठाई ऐ मैं तेरी सों
ओ धोबण पंजी पर बैठाई ऐ

(रानी खुद पलंग पर बैठ गई है और धोबन को नीचे जमीन पर बैठाया है। )

कालीयां पीन्नियां बणाईयां
ओ बणाईं आं
बिच जहर मिलाया ऐ मैं तेरी सों
ओ बिच जहर मिलाया ऐ मैं तेरी सों
खाई लिेया धोबणें तू पिन्नियां
ओ आय हाय पिन्नियां
ओ भाजी प्‍योकेओं तों आई ऐ मैं तेरी सों

(रानी ने काली दाल की पिन्नियां बनाईं और उनमें जहर मिला दिया है। धोबन के सामने पेश करते हुए वे कहती हैं, ले धोबन खा ले। मेरे मायके से भाजी मिठाई आई है। खा कर बता, कैसी है।

पैहली पिन्‍नी खांदी ऐ धोबणीं
ओ धोबणीं
ओ धोबण औंधे मुंह है पैई ऐ मैं तेरी सों
दूजी पिन्‍नी खा दी ऐ धोबणी
ओ धोबण मर मुक गई ऐ मैं तेरी सों

(पहली पिन्‍नी खाते ही धोबन औंधे मुंह गिर पड़ी है और दूसरी पिन्‍नी खाते तो उसका काम तमाम हो गया है। )

चन्‍नने दी पेड बनाई के
ओ बनाई के
धोबन नदीयां रूड़ाई ऐ मैं तेरी सों
आगे धोबी कपड़े धोवदां
नी आय हाय धौंदा
उत्‍थे पेड रुडदी आई है मैं तेरी सों

(चंदन का ताबूत बना कर उसमें धोबन को बहा दिया है। तैरते हुए वह ताबूत वहां पहुंचा जहां उसका धोबी कपड़े धो रहा था।

पेड़ गुआड़ी ये दिक्खिया
ओ मेरी धोबन रुड़दी आई है मैं तेरी सों
सोहणी सूरत वालिये ओ आय हाय वालिये
बजों जान गंवाई ऐ मैं तेरी सों
ओ बजां जान गंवाई ऐ मैं तेरी सों।

(ताबूत खोलते ही धोबी चीख पड़ा है, ये तो मेरी धोबन है। तेरी इस सोहनी सूरत ने ही तेरी जान ले ली। )



केह करलांद पाया ऐ,
इन्‍दै कोलां कथा गे नी मुकदी…

(क्‍या शोर मचाया है, इनसे कथा ही नहीं समाप्‍त होती। )

जैसे अपने एकांत में चीख पड़ी हैं सोमा रानी। अगले ही पल सोमा रानी की आंखें भीग गईं हैं। क्‍या कसूर था बेचारी धोबन का। पर कभी-कभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि किसी का वश ही नहीं चलता। इसमें रानी का भी क्‍या कसूर भला। उन्‍हें जैसे नई राह मिल गई है। कुछ-कुछ मन संभल रहा है।

[.[.[.].].]

वे टोरंटो फोन मिलाती हैं और बेटा बहू से लंबी बात करती हैं। बहू से कुछ बात करते उनका मान कम होता है और बेटे को भी वे इतनी दूर परेशान नहीं करना चाहती। पर परिवार है। सुख है तो दुख भी तो साझा है। और बहू से कैसा मान। वह भी तो अब उनके सम्‍मान का हिस्‍सा है। क्‍या पता उसे कब ऐसे ही किसी दोराहे पर आकर खड़ा होना पड़ जाए। दुख भी तो एक तरह का प्रशिक्षण ही है।

[.[.[.].].]

अबोला कुछ कुछ कम होने लगा है। ठाकुर साहब ज्‍यादा समय बाहर ही रहते हैं। वे जी जान से जुटे हैं कि कैथरीन को यहीं एक अच्‍छी सी नौकरी मिल जाए। कभी कभार ही घर आते हैं। पर जब भी आते हैं सोमा रानी और ठाकुर साहब एक-दूसरे से बुरा बर्ताव नहीं करते। कि जैसे थोड़े से समय को ही अच्‍छे से बांटना चाहते हैं। आज बेटा-बहू भी आने वाले हैं। तब शायद माहौल और बेहतर हो जाए। बेटे के साथ अच्‍छी बनती है ठाकुर साहब की। मां की आस भी बेटा ही है।

हालांकि कैथरीन ठाकुर सर के बेटे के लिए लंच प्‍लान करना चाहती है। पर उन्‍होंने बरज दिया है। एक ही लंच अब तक उनके गले की हड्डी बना हुआ है। अब तो उन्‍हें लंच के नाम से ही घबराहट होने लगी है। असल में बात एक और भी है। अपनी अत्‍याधुनिक लाइफ जीते हुए भी उन्‍होंने बेटे से सिर्फ लाड़-प्‍यार ही बांटा है। अब वे उसे एक ऐसी लड़की से कैसे मिलवा सकते हैं जिससे वे प्‍यार करने लगे हैं। यह सोच वे कुछ असहज से हो गए है। पर इसमें कुछ भी तो गलत नहीं। हर व्‍यक्ति को अपना जीवन अपने तरीके से जीने का अधिकार है। वे जब बहुत परेशान हो जाते हैं तो कुछ लिख-पढ़ नहीं पाते। इस समय वे सितार या संतूर की धुन सुनना पसंद करते हैं। उनके पास पंडित शिव कुमार शर्मा के कार्यक्रमों के कई रिकॉर्ड पड़े हैं। उन्‍हीं में से एक को लगाकर वे चुपचाप अपनी ईजी चेयर पर बैठ गए हैं। संतूर के मद्धम सुर उनके कानों में पड़ रहे हैं। बस वे हैं और ये सुर हैं। इनके बीच कोई नहीं। वाह कितनी सुंदर धुन है कि जैसे खपरैल की कच्‍ची छत पर बारिश टपक रही हो। अचानक उनका मन हुआ कि ये धुन कैथरीन को भी सुननी चाहिए। दोनों साथ बैठकर इस धुन को सुनें तो इसका मजा दोगुना हो सकता है। सुर, संगीत और कला तो कल्‍पना करने वाले की कल्‍पना शक्ति पर और और ज्‍यादा निखरती है। और कल्‍पनाओं के मचान बांधने में कैथरीन का कोई जवाब नहीं।

वे रिकॉर्ड बंद कर कैथरीन के पास जाना चाहते हैं। पर ठहर जाते हैं, आज ज्‍योति आने वाला है, उनका बेटा। ठाकुर ज्‍योतिप्रताप सिंह। आज का समय वह किसी के साथ नहीं बांट सकते। वे खुद उसे लेने एयरपोर्ट जाना चाहते थे। पर बेटे ने ही मना कर दिया।

लो जिसका इतनी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे वह पहुंच भी गया। सामान के सामान उतर रहे हैं गाड़ी से। घर में रौनक मेला लग गया है। पूरा घर ही जैसे खुश है ज्‍योति की आमद पर। साथ में कामना भी है। सोमा रानी भावुक हो गईं हैं दोनों से मिलकर। अब वह अकेली नहीं हैं। बहू का उभरा हुआ पेट अपने साथ एक और के होने की खबर दे रहा है।

“अब कहीं नहीं जाना, जब तक हमारे खेलने को खिलौना न आ जाए। ” सोमा रानी बहू की बलाएं लेती हुई बहू से मासूम आग्रह कर रहीं हैं।

कामना बढ़ कर ठाकुर साहब के चरण स्‍पर्श करना चाहती है, पर वे उसे झुककर रोक देते हैं। एक ही उम्र की दो लड़कियों के प्रति उनके मन में कितने अलग-अलग भाव हैं। क्‍या यही मनुष्‍य होना है। या यही एक मनुष्‍य होने का सबसे बड़ा अभिशाप भी है। घर-गृहस्‍थी की इन खुशियों और रौनक मेले के बीच भी उन्‍हें कैथरीन याद आ गई है।

“तुम लोग खाना खाकर आराम करो। मुझे कुछ काम है। मैं निकलता हूं । ”

“डिनर साथ में ही करेंगे पापा”

पापा का बुझा हुआ चेहरा शायद पढ़ रहा है उनका बेटा। ज्‍योति ठाकुर साहब को विदा और मनुहार एक साथ करता है। ठाकुर साहब उसे गले से लगाते हैं। पर नहीं आज ज्‍योति ठाकुर साहब को गले से लगा रहा है। वह पिता बनने वाला है या कि बन ही गया है। बेटे के सीने से लगकर ठाकुर साहब के भीतर का ठहरा हुआ लावा पिघलने लगा है। मौन ही मौन संप्रेषण हुआ है, हो रहा है।

एक सत्‍तासीन, संसाधनसंपन्‍न पुरुष भी अपने निजी क्षणों में नितांत अकेला हो सकता है। कोई भी उसका दुख बांट सके यह जरूरी तो नहीं। आज उन्‍हें यहीं, इसी तरह बेटे के पास रहने का मन है। पर यह संभव नहीं। उन्‍हें अब और भावुक नहीं होना है। मौन ही मौन में वे फि‍र से मजबूत हुए हैं।

“हां जरूर, डिनर पर मिलते हैं बेटे। ”

वे फि‍र से पिता बन गए हैं। ठाकुर ज्‍योतिप्रताप सिंह के पिता ठाकुर सुरेंद्र प्रताप सिंह। और अपनी गाड़ी से निकल पड़े हैं अपनी राह पर। अपनी राहों पर उन्‍हें कोई और ड्राईवर कभी पसंद नहीं आया। अपनी गाड़ी वे हमेशा खुद ही ड्राईव करते हैं।

यही उन्‍होंने कैथरीन को भी सिखाया है। कि अपनी जिंदगी की गाड़ी में जितने कम ड्राईवर होंगे उतना अच्‍छा है।

[.[.[.].].]

“पिछली सीट का कंट्रोल हर बार आपके हाथ में नहीं होता। तब और भी जब आपका दिल कुछ बड़ा, कुछ भावुक हो। ” ज्‍योति की बातों ने जैसे ठाकुर साहब का दिल एक दम खोल कर रख दिया है। कई दिन से वे इसी पसोपेश में थे कि इतने दिन हुए अभी तक कैथरीन को लेकर घर में कोई बात क्‍यों नहीं उठी। आज नहीं तो कल यह बात बेटे के सामने आनी ही है। तो यूं ही शाम को बेटे के साथ बात करते हुए उन्‍होंने कैथरीन का जिक्र छेड़ा। और वे सबसे ज्‍यादा हैरान इस बात पर हुए कि ज्‍योति के चेहरे पर इस बात को लेकर कोई हैरानी नहीं थी।

“आपको जहां खुशी मिले, आपको वही करना चाहिए पापा। मैं जानता हूं आपको, आपको यह कतई पसंद नहीं होगा कि कोई और आपके फैसले लें। पर कुछ फैसले आप सचमुच खुद नहीं ले रहे होते। बस दिख रहे होते हैं। पिछली सीट का कंट्रोल हर बार आपके हाथ में नहीं होता। तब और भी जब आपका दिल कुछ बड़ा कुछ भावुक हो। ”

यह कैसी बात कह गया ज्‍योति। वह नाराज होता, मेरे खिलाफ अपनी मां के साथ खड़ा हो जाता, तो भी मैं उसका कोई हल ढूंढता। पर इस तरह उसके साथ आ़ खड़े होने से मैं सचमुच कन्‍फ्यूज हो गया हूं। क्‍या मेरा बेटा बोलना मुझसे ही सीखा है, या वह मुझसे भी बड़ा डायरेक्‍टर हो गया है। क्‍या वह बस वही बोल रहा है जो मैं सुनना चाहता हूं। अगर वाकई ऐसा है तो मेरा बेटा मुझसे भी ज्‍यादा डिप्‍लोमेट है।

“पर तब तुमने अपनी मां के लिए क्‍या सोचा है?” ठाकुर साहब ने ज्‍योति की भावुकता और डिप्‍लोमेसी को जांचने की कोशिश की।

“अभी नहीं, अभी कुछ नहीं पापा। अभी मम्‍मा को किसी भी तरह का स्‍ट्रेस देना ठीक नहीं। वे कामना को लेकर बहुत खुश हैं।

हम सब सोच रहे हैं कि अगले सप्‍ताह किश्‍तवाड़ चलें। कामना अपने मम्‍मी-पापा से मिल लेगी और एक फैमिली आउटिंग भी हो जाएगी। ”

“आप सब जाओ, मुझे कुछ काम है। शायद नेक्‍स्‍ट वीक मुझे श्रीलंका जाना पड़े। ”

“तो हम आपके लौटने के बाद चल पड़ेंगे। ”

“नहीं मेरे लिए अपना शेड्यूल चेंज क्‍यों करते हो। मुझे वक्‍त मिला तो मैं भी वहीं आ जाउंगा आप सबके पास। ”

“एक बात और”

“हां कहो”,

“कैथरीन को भी ले चलें अपने साथ? वह भी घूम आएगी। ”

“तुम कैथरीन को कैसे जानते हों?”, ठाकुर साहब ने ज्‍योति के सवाल का बहुत अलग तरह से त्‍यौरियां चढ़ाकर जवाब दिया।

इन त्‍यौरियों पर ज्‍योति अचकचा गया, पर घबराया नहीं। “पापा आज पूरी शाम हमने कैथरीन के अलावा कोई और बात की है क्‍या। अब जानने को और कितना जानना होता है किसी व्‍यक्ति को। ”

“ओह ...” ठाकुर साहब ने कुछ चैन की सांस ली। “पर मुझे नहीं लगता कि कैथरीन को वहां ले जाने की जरूरत है। आखिर यह हमारा फैमिली टाइम है। ”

“इतना रिजिड नहीं होना चाहिए पापा। सब कुछ के बाद भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक विदेशी मेहमान है। ऐसे भी वह अकेली ही तो है यहां। उसे वहां जाकर अच्‍छा लगेगा। इन दिनों केसर पर फूल आने लगे होंगे। बाद में तो बर्फ पड़ जाएगी। कुछ भी करना मुश्किल होगा। ”

“और सोमा?”

“उनसे मैं बात कर लूंगा। ”

“ठीक है मैं कैथरीन से बात करता हूं। ”

[.[.[.].].]

बेटे के साथ हुई सारी बातचीत किसी छोटे बच्‍चे की तरह शब्‍द-शब्‍द पुलककर ठाकुर साहब कैथरीन को बता रहे हैं। कैथरीन पुलक से भर गई है - कि कोई तो है जिसे उसके ठाकुर साहब के साथ होने पर कोई आपत्ति नहीं। क्‍या गैव्रिएल भी इसी तरह सोचेगा उनके रिश्‍ते के बारे में। हां उसे इसी तरह सोचना चाहिए। उसे ठाकुर सर की सुनाई एक मशहूर शायर गुलजार की पंक्ति याद आ गई -

जिंदगी में कोई मोड़ आए
तो मुड़ना पड़ता है
इसे रास्‍ते बदलना नहीं कहते।

वह आज भी गैव्रिएल को उतना ही प्‍यार करती है। बस इस मोड़ पर उसे मुड़ना पड़ा है।

एक अरसे बाद आज दोनों सुकून से बातें कर रहे हैं।

ठाकुर सर उसे किश्‍तवाड़ के बारे में बताकर उसकी राय जानना चाहते हैं।

कैथरीन पुलक से भर गई है। वह पूरी दुनिया घूमना चाहती है ठाकुर सर के साथ। उनके साथ दृश्‍य अलग रंगों में खुलते हैं। हर ध्‍वनि एक नए सुर में बंधती है। वह जरूर जाएगी किश्‍तवाड़ और केसर के फूलों से टोकरियां भरेगी उनके साथ।

“पर मैं नहीं जा पाउंगा”

“ओह नो, बट वाय?”

“मुझे कुछ काम है। नेक्‍स्‍ट वीक मुझे श्रीलंका जाना है। वहां एक कल्‍चरल ट्रूप का निर्देशन करना है। ”

कैथरीन का मन बुझ गया है। उसकी पहली मुलाकात ठाकुर सर से रूस के ऐसे ही एक कल्‍चरल ट्रूप में हुई थी। वह अनचाहे ही संदेह में भर गई है और खुद को मिसेज ठाकुर की जगह खड़ा पाती है। तो क्‍या ठाकुर सर अब और आगे बढ़ने लगे हैं।

“पर मुझे नहीं लगता कि तुम्‍हारा वहां जाना ठीक होगा। वो भी तब जब मैं साथ नहीं हूं। तुम जानती नहीं हो सोमा को। ”

“डोंट वरी सर, एवरीथिंग विल बी फाईन। हम किसी को भी अच्‍छी तरह से कहां जान पाते हैं। और अगर वे भी मुझे साथ ले जाना चाहती हैं, तो मुझे जरूर जाना चाहिए।

दो औरतें जब आपस में मिलना चाहती हों तो उन्‍हें मिलने देना चाहिए। किसी को भी फि‍र उनके बीच में नहीं आना चाहिए। एक स्‍त्री की दूसरी स्‍त्री से मुलाकात ही आने वाले भविष्‍य का माहौल तय करती है। वे जब प्‍यार से मिलेंगी तो आने वाली दुनिया प्‍यार की होगी और अगर नफरतों में मिलेंगी तो आने वाली दुनिया नफरतों से भरी होगी। ”

ठाकुर साहब एकटक कैथरीन को देख रहे हैं। उसके चेहरे पर उन्‍हें असीम संतुष्टि का अहसास हो रहा है। वह जैसे चालीस पार की अनुभवों में पगी स्‍त्री हो गई है। वे खुद को बहुत बौना महसूस कर रहे हैं आज उसके सामने। किसी छोटे बच्‍चे की तरह भय, आशंका सबसे विमुक्‍त होकर वह उसके बेहद करीब उसकी धड़कनों को सुनने की कोशिश कर रहे हैं।

ज‍बकि इन निजी पलों में भी कैथरीन जानना चाहती है कि केसर की क्‍यारियां कैसी दिखती हैं!

“ठीक है जब तुमने तय कर ही लिया है कि जाओगी तो मुझे हर रोज फोन करती रहना। ”

[.[.[.].].]

जब भी, जहां भी समय मिले। मुझे फोन करती रहना। वहां अकसर नेटवर्क की दिक्‍कत रहती है। पर लैंडलाइन जहां भी मिले, तुम मुझे फोन करना। यह सोचना कि मुझे हर दिन तुम्‍हारी फि‍क्र रहेगी। तुम्‍हारे लिए मैं किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकता। और कुछ भी खाने और पीने से पहले अच्‍छे से चैक कर लेना। कभी भी किसी भी जगह पर अकेली मत जाना।

ठाकुर साहब ने अपनी श्रीलंका यात्रा स्‍थगित कर दी है। इतने असहाय वे कभी नहीं हुए जितना आज महसूस कर रहे हैं।

कितना सब कुछ तो समझा कर भेजा था कैथरीन को। इसके बावजूद पिछले तीन दिन से उसका फोन बंद है। कल शाम सोमा से बात हुई थी। फोन उठाते ही उसने उलाहना दे दिया कि आज कैसे याद आई। तब कैसे कुछ पूछते कैथरीन के बारे में। ज्‍योति बिजी होगा कामना के परिवार के साथ। आज उसका फोन भी नहीं लग रहा। आखिर क्‍या हुआ आज, मन कुछ उचटने लगा है।

मैं पहले ही कह रहा था, उसे वहां उन लोगों के साथ नहीं जाना चाहिए था। घबराहट और भी बढ़ती जा रही है। कुछ पता नहीं चल रहा। जैसे-जैसे दिन ढल रहा है वे और परेशान होते जा रहे हैं। अगर आज भी कैथरीन का फोन नहीं आया तो कल सुबह वे खुद किश्‍तवाड़ जाएंगे। उफ्फ ये रात और किश्‍तवाड़ का सफर। बस किसी तरह सुबह हो। वे बेचैनी में कभी अपनी हथेलियां रगड़ते हैं, कभी कैथरीन के बनाए नोट्स पढ़ते हैं। वे तेज-तेज ईजी चेयर को आगे से पीछे और पीछे से आगे कर रहे हैं। टांगे थरथरा रहीं हैं, इस रात को जल्‍दी ही बीत जाना चाहिए। या कैथरीन का फोन आना चाहिए। फोन अचानक बजा है, वे झट से बढ़कर फोन उठाते हैं। पर यह कोई अननोन नंबर है। ठेठ पहाड़ी जुबान में कोई बोल रहा है, वे रॉन्‍ग नंबर कहकर फोन काट देते हैं। उसी नंबर से फि‍र कॉल आई है, वे फि‍र से रॉन्‍ग नंबर कहकर काट देते हैं।

“कुछ नहीं हो सकता इस देश का। जहां फोन का सिस्‍टम ही अभी तक ठीक नहीं है। न नेटवर्क प्रोपर है और न ही कॉल सही जगह लग रही है। ” उन्‍हें अपनी मिट्टी से प्‍यार न होता तो कब के विदेश में सैटल हो गए होते। कम अवसर नहीं मिले हैं उन्‍हें। पर हर बार उन्‍होंने उन अवसरों को ठुकरा दिया।

फोन फि‍र से बजा है, वे झुंझला कर बेमन से फोन उठाते हैं, इस बार फोन पर ज्‍योति की आवाज है।

“हां, हैलो!”

“कहां हो बेटा आप सब। मैं कब से आप सब का फोन ट्राय कर रहा हूं। ”

“पापा आप कहां हैं, इंडिया या श्रीलंका? मैं घर पर ही हूं बेटा और कैथरीन कहां है। ”

“बस हम घर ही आ रहे हैं। आकर बात करते हैं। ”

ठाकुर साहब कुछ निश्चिंत हुए! पर अब अगले ही पल कुछ और परेशान हो गए हैं। ज्‍योति बहुत सधे हुए शब्‍दों में बात कर रहा था। आय होप सब कुछ ठीक ही हो। ”

ये समय तो और भी परेशान कर रहा है। आखिर और कितनी देर लगेगी उन सबको यहां तक पहुंचने में।

वे बेचैन घर भर में चक्‍कर काट रहे हैं।

रात के सन्‍नाटे को चीरती हुई ज्‍योति की गाड़ी आकर रुकी है। उसमें बस दो जन है एक ज्‍योति और दूसरी सोमा।

बेचैन ठाकुर साहब बंगले के बड़े गेट तक आ गए हैं। कैथरीन कहां है और कामना

सोमा और ज्‍योति बदहवास पसीनों में तरबतर हैं ठंडी रात में भी। उनके चेहरे ठंडे पड़ गए हैं, वे कुछ बोल नहीं पा रहे।

“क्‍या हुआ ज्‍योति, सब ठीक तो है न, तुम सब इतने परेशान क्‍यों लग रहे हो और फोन क्‍यों नहीं मिल रहा था तुम में से किसी का...”

ठाकुर साहब सवाल पर सवाल कर रहे हैं, सोमा रानी बढ़कर उन्‍हें भीतर ले जाना चाह रहीं हैं, वे खुद भी तनाव और पसीने में सीज गईं हैं ।

“ज्‍योति मैं तुमसे पूछ रहा हूं कहां है कैथरीन?”

“आप अंदर चलिए पापा, बैठकर बात करते हैं!”

वह उन्‍हें अपनी मजबूत बाजुओं में पकड़कर लगभग अपने साथ-साथ घसीट ही लेता है

ठाकुर साहब की हिम्‍मत अब टूटने लगी है, वे बेटे के बाहूपाश में हैं, प्‍यासी नजरों से कभी बेटे को कभी सोमा रानी को देख रहे हैं।

फि‍र ठिठक कर एक ही जगह खड़े हो गए हैं कि बस अब इससे एक कदम भी आगे नहीं सरकेंगे, जो कहना है कह डालो –

“हम सुबह चार बजे से निकले हुए हैं पापा घर लौटने के लिए। “

“तो अब तो रात के बारह बज रहे हैं, इतनी देर, इतनी देर कैसे कहां लग गई

तुम बताओ सोमा, ठीक से क्‍या हुआ। ”

“कामना अभी कुछ दिन रहेगी मायके में। “

“मैं कैथरीन के बारे में पूछ रहा हूं सोमा, तुम जानती हो। “ वे निर्लज्‍जता से लगभग चीख पड़े हैं।

प्रतिउत्‍तर में सोमा रानी के चेहरे पर नफरत उभर आई है, वे झुंझला कर जवाब देती है – “उसकी कार का एक्‍सीडेंट हो गया। “

ये वज्रपात का समय है, ठाकुर साहब की भुजा फड़कने लगी है। वे टूटती हिम्‍मत बटोर कर एक बार फि‍र पूछते हैं - “कहां, कैसे” क्‍या वो अकेली थी, तुम सब कहां थे ?”

अब ज्‍योति बढ़कर ठाकुर साहब को संभालता है – “पुल डोडा के पास, हम सब साथ ही थे पापा। पर वो अपनी कार खुद ड्राइव कर रहीं थीं। मैंने मना भी किया था। पर उसने कहा कि वो खुद ड्राइव करेगी....”

“ओह, उसे अच्‍छा लगता है बारिश में ड्राइव करना। “ अबकी बार ठाकुर साहब की देह पूरी तरह ऐंठ गई है।

“पर ये रास्‍ते जटिल हैं कैथरीन, ये तुम्‍हारे अकेले के चलने के लिए नहीं थे। तुम्‍हें… मेरा… इंतजार… करना... चाहिए… था। “

सोमा रानी घबरा गईं हैं। वे अपनी बाहों में संभालना चाहती हैं ठाकुर साहब को

ठाकुर साहब के चेहरे पर अब भी आक्रोश है, नफरत है -

“मैं… सब समझ… रहा हूं, सिर्फ कैथरीन… की कार... का एक्‍सीडेंट हुआ, यह सब इतना आसान नहीं है, जितना तुमने सोच लिया। कैथरीन कल्‍चरल वीजा पर थी, तुम बच नहीं सकती सोमा। “

उनकी देह अब जुबान को संभाल नहीं पा रही।

वे जैसे गिर ही पड़ेंगे,

गिर ही पड़े हैं।

ठाकुर साहब के साथ ही सोमा रानी के भीतर से कुछ शब्‍द भी फर्श पर गिरकर बिखर गए हैं-

“मैं बची ही कहां हूं ठाकुर साहब, मैं तो कब की खर्च हो चुकी हूं। “

सोमा रानी अपने दुपट्टे को कस कर कमर पर लपेट रहीं हैं, अब उन्‍हें ठाकुर साहब को संभालना है। ज्‍योति डॉक्‍टर को फोन करो, घर के सब नौकर सब इकट्ठे हो गए हैं। आधी रात को बड़े बंगले में शोर दौड़ गया है, जल्‍दी करो ठाकुर साहब को शायद हार्ट अटैक आया है।

ज्‍योति ने तुरंत गाड़ी वापस मोड़ ली है, ठाकुर साहब को तुरंत हॉस्पिटल लेकर जाना होगा।

ठाकुर साहब अब निढाल हैं, सोमा रानी दोगुनी मुस्‍तैदी से तन गई हैं, वे ठाकुर साहब की छाती मल रहीं हैं।

ज्‍योति अब घबराने लगा है। वह ड्राईव कर रहा है, कि उसका फोन बजा है, मैसेज टोन में। यह कैथरीन का मैसेज है - ”थैंक्‍स, बोर्डिंग टू फ्लाइट। ”

एक हल्‍की मुस्‍कान उसके चेहरे पर आई, पर ज्‍यादा देर टिक नहीं पाई, “मम्‍मा हमने कुछ गलत तो नहीं किया न, पापा को कुछ हो गया तो!”

“तुम फि‍क्र मत करो, पापा को कुछ नहीं होगा, मैं हूं न।

जिंदगी में कुछ जोखिम तो उठाने ही पड़ते हैं। ये प्‍यार ये प्रपंच, ये दुख ये दया सब शाश्‍वत हैं, कभी खत्‍म नहीं होंगे। आज हमारी देह में हैं, कल किसी और देस में होंगे। और हर बार सजा धोबन को ही क्‍यों मिले, कभी तो राजा को भी देह के दंड मिलने चाहिए!

तुम बस सामने देख कर ड्राईव करो। “



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Yogita Yadav

(9599096226)

H.N. 316/4, Ashok Mohalla,

Nangloi, New Delhi- 110041

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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