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देशज भाषा सबल कहानी — दूसरी भग्गो — विनीता शुक्ला | Aanchalik Bhasha Kahani in Hindi

जन॰ 4, 2020

विनीता शुक्ला जी को पहली दफ़ा पढ़ा है. पढ़कर इस बात की ख़ुशी है कि देशज भाषा का सुन्दर प्रयोग करते हए लिखी गयी सबल कहानी पढ़ने का आनंद मिला.

भरत एस तिवारी


दूसरी भग्गो 

—  विनीता शुक्ला


सुमेर मिसिर हिचकते हुए, उस दहलीज़ तक आ पहुंचे थे, जहाँ कभी आने की, सोच भी नहीं सकते थे। क्या करते? चाचाजी का आदेश था...आना ही पड़ा। उन्हें दरवाजे पर खड़ा पाकर, रमेंद्र सुकुल दौड़े चले आये, “ अरे भगत! कब आये? कबसे खड़े रहे? आवाज नहीं दे सकत रहे...सांकल ही खटका दिए होते।” “कोई बात नहीं साढू भाई...आप काम में लगे रहे, सो हम बाधा नहीं डाले” यह सुनकर, सुकुल संकोच से भर गये। वे तो अपने छोटे सुपुत्र के कान उमेठ रहे थे; संभवतः मिसिर ने वही देखा होगा। खींसे निपोरते हुए कह उठे, “खिंचाई काहे करित हो, ई त राजकाज हय...चलत ही रहत हय।” “काहे नाहीं! आप राजा और छुटका आपकी परजा!” “छोड़ो भी महराज...आपन कहो...आप तो दरसन के लिए तरसा दिए। हम ठहरे मूढ़मति। आपकी संगत में हमहूँ, थोड़ी भगतई सीख लेत!” रमेंद्र ने झेंपते हुए बात को मोड़ा, “और कहिये, गरीबन के घर का रस्ता, कइसे भूल गये?”

उनके बोलने के ढंग ने, सुमेर को भी संकुचित कर दिया था। बोले, ‘आप तो शर्मिंदा करित हो...चाचाजी सोनू-मोनू के जनेऊ का न्यौता भेजे हैं।” कहते हुए उन्होंने, सत्येन्द्र भैया के जुड़वां बेटों के, यज्ञोपवीत का आमन्त्रण-पत्र निकाला और सुकुल को थमा दिया। सोनू-मोनू ने, हाल में ही, अपनी आठवीं वर्षगांठ मनाई थी। उसी के बाद से, रमेंद्र सुकुल का मुंह फूला हुआ था। नातेदारी में कहते फिरते, “हद है! इतना बड़ा कारज हुआ। हजारों लोगन की खवाई-पियाई...गली के आवारा कुत्ते भी आकर जीम गये...घर ही के मनई का, कोउ न पूछिस” रमेंद्र की नाराजगी दूर करने, सुमेर चले आये थे। सुमेर को बैठने के लिए, जर्जर सी कुर्सी दी गयी। उसके ऊल-चूल हिल रहे थे। वहीं बरामदे में, एक खटिया भी पड़ी थी। सुकुल जी उस पर विराजमान हो गये। उनके बैठते ही, वह चरमरा उठी। सुमेर को रमेंद्र की हालत पर तरस आने लगा। वे सोच में पड़ गये। रिश्तेदारी निभानी थी...नहीं तो दूरदराज के इस कस्बे का रास्ता, क्यों नापते? उन्हें पास के शहर तक, सरकारी काम से आना था। परिवार में और किसी को फुर्सत नहीं थी; लिहाजा उन्हें ही, ठेलकर यहाँ भेजा गया।

यह मजबूरी तो बस कहने की थी, असल मजबूरी तो दूसरी ही थी, जिसके तहत...! सहसा किसी कर्कश आवाज ने, उनका विचार-क्रम भंग कर दिया। उजड्ड...सत्यानासी! अब का तोड़ दिहिस?! ई लरिका, सिरिफ बवंडर मचा सकित हय...हमरी तो किस्मत ही फूट गयी।” रमेंद्र अब और भी अधिक झेंप गये थे। उन्होंने प्रतिकार किया, “ई का तरीका है? मेहमान आये बइठ हंइ; फिरौं कच-कच बंद नांय भई। ना चाय का आसरा न पानी का...जेका आपन होस नाहीं, ऊ दुसरे का खियाल कइस करी?” मेहमान का जिक्र सुनते ही, ‘गृहलक्ष्मी’ के कान खड़े हो गए। वह झट बाहर चली आई। उसे देख भगत, मानों जमीन में ही गड़ गये। अस्त-व्यस्त वेशभूषा, बिखरी हुई रूखी लटें, कमर में खुंसा पल्ला...जैसे कोई युद्ध लड़ने जा रही हो! उसने उड़ती हुई नजरों से उन्हें देखा। देखने पर, उन नजरों में, कुछ कौंधा जरूर...किन्तु दूसरे ही पल, वह कौंध मंद पड़कर, अपरिचय में ढल गयी! सुमेर का दिल डूबने लगा! धीरे-धीरे पुराने परिचित, अजनबी बनते जा रहे थे...ठीक भगवती की तरह। समय कुलांचें भर रहा था और लोग पीछे छूटते जा रहे थे। समय के इस खेल ने तो उनका हुलिया ही बदल डाला। सात बरस पहले, उनकी ऐसी घनी दाढ़ी और मूंछ नहीं थी...रामनामी अंगौछा और रुद्राक्ष की माला भी कहाँ थे!

इसी हुलिए को देखकर, रमेंद्र उन्हें भगत बुलाते हैं। रमेंद्र सुकुल तो उनसे मिलते ही रहते हैं...अक्सर वे उनके शहर आते हैं। वहां अपनी दुकान के लिए, चीजें खरीदते हैं; पर भगवती, पूरे सात साल बाद दिखाई पड़ी। क्या वास्तव में भगवती उन्हें पहचान न सकी...या फिर! हो सकता था, वह उनको, ठीक से देख नहीं पाई...तभी तो! “ऐ जी...” इस बार भगवती, पानी का लोटा और पेठे से भरी कटोरी लिए खड़ी थी। उसने सर पर पल्ला कर रखा था। उसका स्वर भी धीमा था। रमेंद्र आगे बढ़े। उन्होंने तिपाई खींचकर, मिसिर के आगे रखी और पत्नी के हाथ का सामान, उस पर जमा दिया। मिसिर को जोरों से प्यास लगी थी। गट-गट करके, लोटे का पूरा पानी डकार गये। रमेंद्र के इसरार पर, एकाध पेठा भी चबा लिया। कुछ देर इधर-उधर की बातें चलीं। सुमेर उठने को हुए तो रमेंद्र ने रोक दिया, “अरे महराज, किधर जात हो? भोजन का समय, हुइन गवा।”

“हमें आज्ञा दें...देर हो जाएगी” भगत ने हाथ जोड़ दिए। “काहे भाई? पहिली बार आये हो...खाना त खांय का परी” “लेकिन...” “लेकिन-वेकिन कछू नाहीं” कहते हुए वे, कमरे के भीतर चले गये। दो मिनटों में बाहर भी आ गये; बुदबुदाकर कह उठे, “ई छुटका त बहुतै उत्पाती हय। उत्पात करत-करत सोइ गवा...” फिर जमीन पर दरी बिछाते हुए, सुमेर से बोले, “आलू-टिमाटर की तरकारी अही...अम्बिया, गुड़ की चटनी...गर्म-गर्म पूरी उतारके लाय रही हैं” मिसिर समझ गये कि विरोध करने से कोई लाभ न था। सुकुल महराज मस्ती में, कोई आंचलिक गीत गाने लगे थे। वे हैण्डपम्प से, बाल्टी में पानी भर लाये। फिर भीतर से, मिर्ची-प्याज-नींबू लाकर, काटने लगे। इस बीच भगवती, खाने की व्यवस्था करने लगी। सीमित साधनों में भी वे, अतिथि का, यथायोग्य सत्कार कर रहे थे। व्यंजनों में, भगवती के हाथों का, वही पुराना जादू था। पेट-पूजा ख़तम होने को आई। भगवती हाथ धुलाने के लिए, दीवार से टिककर खड़ी थी; आँखें शून्य में, टिकी थीं...अनिद्रा से सूजी हुई, थकी-थकी, काले घेरों वाली आँखें! ये आँखें पहले कितनी सुंदर हुआ करती थीं!

किसी कपोती की तरह भगवती, उन्हें नचाती, मटकाती और उनसे पूछ बैठती, “आ गये छोटे जीजा! सहर से हमरे लिए का लाये?” सुमेर कुछ न कुछ, उसके लिए जरूर ले जाते; मालूम था कि ऐसा न किया तो वह उनका सर खा जायेगी। एक बार तो पॉपकॉर्न का पैकेट और लेमनचूस, उसे थमा दिया। वह छूटते ही बोल पड़ी, “ई का...जनावर का चबेना और कम्पट? हम तोहसे बोले रहे ना...हमका सुनहरा रिबन अउर डिजाइनर टिकुली चही” वह तब बेतरह खीज गया था। बोला, “आपन बड़के जीजा और जीजी से बोलो...उहै देबे करिहैं। अत्ते महंग आइटम...ऊ भी औरतन के...हम काहे खरीदी? नाक कटांय का है?? “कुछ और लेहौ भगत?” सोच में डूबे पाहुन से, रमेंद्र ने प्रश्न किया। इस प्रश्न ने भगवती और सुमेर, दोनों के अनमनेपन को, तोड़ दिया। “नाहीं...” भगत ने उठते हुए कहा। रमेंद्र ने भगवती को इशारा किया। वह बाल्टी और मग लाकर, हाथ धुलवाने लगी। फिर एक बार, सुमेर ने, उसे चोर निगाहों से देखा।

पल्ले का फटा हिस्सा, वह कांख में दबाकर, छुपाये हुई थी। उनका मन जोरों से कसकने लगा। यह संयोग ही था कि उससे लम्बे समय बाद मिलना हुआ। मायके से अलग-थलग, वह इस सुदूर कस्बे में पड़ी थी। कहीं आना न जाना। अपने ही माँ-बाप उसे बुलाना नहीं चाहते; यदि बुलाते भी हैं तो बहुत मजबूरी में। जाने पर ऊपरी मन से स्वागत करते हैं। वह उनकी नजरों से उतर जो चुकी है। बच्चों में ऐसी उलझी रहती है कि और कहीं जाना हो नहीं पाता। मिसिर ने कल्पना तक नहीं की थी कि इतने साल बाद, इस तरह...इस दशा में उसे देखेंगे! उनके आराम के लिए, रमेंद्र ने दरी के ऊपर गद्दा बिछा दिया था। पुराना सा मसनद भी उस पर लगा दिया। मिसिर ने प्रतिवाद नहीं किया। वे खुद भी आलस में थे और यात्रा से थक गये थे। भोजन के बाद शरीर ढीला पड़ गया। सरकारी काम पहले ही निपटाकर यहाँ आये थे; सो उसकी भी जल्दी नहीं थी।

गद्दे पर लेटते ही, पुनः चिंतन-प्रक्रिया चल निकली। तीन बच्चों की माँ, यह दलिद्दर से जूझती हुई औरत, कभी जिजीविषा से भरपूर थी। १४ बरस की उमर से ही, बड़ी-बड़ी बातें किया करती, “छोटे जीजा...हमका बहुत पढ़ैं का है। तुम्हरी तरह पहिले बी।ए। करिहैं, फिर एल।टी।, ओहिकै बाद टीचर बन जैहें। “पगली...ई बड़ी-बड़ी डिग्रियन के बारे मां, तोका को बताइस? कउन तोसे कहिस कि हम बी।ए। कइ रहे हैं? हम त बी।कॉम। करत रहे” २० वर्षीय सुमेर ने, भगवती उर्फ़ भग्गो को स्नेह से झिड़क दिया था लेकिन उसकी सयानों जैसी सोच से, उन्हें अचंभा जरूर होता। भग्गो का मानना था कि उसकी बड़ी और छुटकी जीजियों का विवाह, आठवीं पास करते ही हो गया। वह अपने साथ ऐसा नहीं होने देगी। अध्यापिका मौली दीदी, उसकी आदर्श थीं। उनका गरिमामय व्यक्तित्व, उसे आकर्षित करता। मौली दी सब लड़कियों को समझातीं कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना है। छोटी उम्र में शादी, शादी नहीं...बरबादी है। भगवती उनके चचेरे भाई, सत्येन्द्र की साली थी। सत्येन्द्र भैया ने बारहवीं के बाद, पुलिस की नौकरी कर ली। तब उनका ब्याह, फूलवती से हो गया। फूलवती के प्यार का नाम फूलो था। फूलो भाभी के साथ ही, भग्गो का, सुमेर के जीवन में प्रवेश हुआ। सुमेर तब पढ़ाई के सिलसिले में, सत्येन्द्र भाई के साथ ही रहते थे।

भगवती तेल से चुपड़ी हुई, दो एंटीने जैसी चोटियाँ बनाती थी। उसकी उटंगी-सी सलवार के ऊपर, चोली जैसी कुर्ती रहती। उसे देख, सुमेर को हंसने का मन होता; पर भाभी का लिहाज कर, वह अपनी हँसी जब्त कर लेते। तब भगवती तेरह बरस की थी और सुमेर उन्नीस के। भाभी को उनके मायके ईसपुर छोड़ना और मायके से लाना, सुमेर का काम था। इसी क्रम में भग्गो से टकराना, होता ही रहता। भग्गो के लिए, छोटे जीजा, किसी हीरो से कम ना थे। फटफटिया चलाते हुए, वह बड़े होशियार लगते। उनसे शहर के बारे में, गाँव से बाहर की दुनियां बारे में सुनना, रुचिकर लगता। सुमेर अक्सर, भाभी के हाथ के बने हुए लड्डू और मठरियां, भगवती के लिए लेकर आते। भाभी उन्हें कुछ रुपये भी पकड़ा देतीं--उनका मेहनताना! वे रुपए रास्ते में, कोल्डड्रिंक और जूस पीने के काम आते। कुछ तो, भग्गो के नजराने में, चुक जाते। ईसपुर में खूब स्वागत होता...और भगवती संग मीठी-मीठी बातें भी। लौटते हुए, उन्हें ‘देसी’ उपहारों से लाद दिया जाता-भुनी हुई शकरकंदी, भुट्टे, ईख, गुड़ की भेलियाँ, सत्तू, सरसों का तेल वगैरह-वगैरह। कुछ तो वह बाइक की पिछली वाली सीट से बाँध लेते, कुछ को डिग्गी में फिट कर लेते और कुछ पिट्ठू-बैग में भर देते। भगवती हाथ हिलाकर विदा करती... फटफटिया के ओझल हो जाने तक। मोह-सा हो गया, इस बालिका से। उनके लिए वह बच्चा ही बनी रही, जब तक कि...!

इतने में शोर सुनाई पड़ा और मिसिर फिर वर्तमान में लौट आये। उन्होंने अधखुली आँखों से देखा। सुकुल के दोनों बड़े लड़के, खेलकूद कर, कहीं से आये थे। उन्हें देखते ही, सुकुल का पारा चढ़ गया। नाक बहाते और धूल में सने हुए, वे घुसे चले आ रहे थे। रमेंद्र ने पहले तो उन्हें, एक-एक चपत लगाई फिर कोसना शुरू किया, “तनिकौ बुद्धि नाहीं, आवारा अस घूमत–फिरत हैं...कितनौ सिखा लेई, सहूर नाहिं आइ सकित।” इतने में छुटका भी जाग गया। तीनों बालकों के रोने-चिल्लाने से, माहौल बिगड़ गया था। भगवती ने किसी तरह, उन्हें पेठा देकर बहलाया और फिर सुकुल ने डपटकर, उन सबों को, हैंडपंप से नहला दिया। सुमेर आँख मूंदकर लेटे रहना चाहते थे; किन्तु उस ‘महाभारत’ के चलते, यह न हो सका। वे बैठकर तमाशा देखते रहे।

भगवती की कुगत पर, उन्हें अफ़सोस हो रहा था। सात बरसों में छह, साढ़े चार और ढाई साल के तीन-तीन बच्चे! तीनों एक बड़े थाल से, खाना खा रहे थे। फिलहाल शांति थी। रमेंद्र ने सुमेर से कहा, “भगत...सहर की बस का टैम होंय वाला है...हम तांगा ले आइत है’ “अरे नाहीं...आप तकलीफ ना करो...हम चले जइबे” लेकिन रमेंद्र नहीं मानें। वे एक डिबिया में सौंफ, सुपारी और इलायची भर ले आये, जिसे उन्होंने भगत की सेवा में पेश किया। तीनों बच्चे आकर खड़े हो गये थे। बस का किराया छोड़कर, जितने भी नोट बचे थे, मिसिर ने बालकों को पकड़ा दिए। इतना पैसा देखकर, सुकुल की आँखें चौड़ी हो गयीं। उन्होंने हल्की-सी आपत्ति दर्ज की किन्तु उनके चेहरे से स्पष्ट था कि वह पैसा मिलने पर, अति प्रसन्न थे।

जैसे ही सुकुल तांगा लेने बाहर गये, भग्गो झट दालान में आ गई। उसने मिसिर को गहरी दृष्टि से, घूरकर देखा। पल भर को, सुमेर की आत्मा काँप उठी! तत्क्षण वे समझ गये कि भगवती, जानकर अनजान बनी हुई थी; पहचान तो वह उन्हें, पहले ही गयी थी! बस में बैठे हुए, यादें करवटें लेने लगीं। वह भगवती को, वक्त की उस दहलीज पर छोड़ आये थे, जहाँ आज उनकी मेघना खड़ी थी...उनकी अपनी बहन मेघना! वयःसंधि की वह देहरी, जिसे पार करते ही, जीवन में नये रंग भर जाते हैं...देह और मन भ्रमित होने लगते हैं...वह नादान उमर बहका भी सकती है। सुमेर की पत्नी मालिनी भी यह सोचकर, डरी हुई थी; इसी से, ननद पर सख्ती करने लगी। वह उसे आधुनिक पहनावे से दूर रखती। सुमेर भी परोक्ष रूप से, पत्नी का समर्थन करते थे। बिन माँ-बाप की मेघना, आखिर उनकी जिम्मेदारी थी। एक दिन मालिनी ने मेघना को, छोटे कपड़ों में, आईने को ताकते हुए पाया। कठोरता से पूछने पर, सच्चाई सामने आ गई। वह ड्रेस मेघना को, उसके दोस्त निशांत ने, तोहफे में दी थी। मेघना ने उनको, एक बड़ा झटका दिया था...और भगवती...वह भी तो...!

भग्गो उनके लिए शायद...एक छोटा सा, प्यारा सा टेडी-बेयर थी...बोलती हुई गुड़िया; लेकिन उनकी यह स्नेह-भावना, बदलकर, कुछ और ही हो गई! भगवती अपने पन्द्रहवें जन्मदिन पर, भाभी का दिया हुआ लहंगा पहनकर बैठी थी। काजल की क्षीर्ण रेखा...छोटी सी बिंदी, बिखरी हुई जुल्फें! पहली बार उसके रूप में, नवयौवन का आकर्षण था। सुमेर ने, उसे दूसरी नजरों से देखना शुरू कर दिया। उनका भटका हुआ मन, उसको भी बरगलाने लगा। वे अपनी टैब पर, रूमानी गाने, डाउनलोड कर लाते और उसे भगवती को पकड़ा देते। कभी चुपके से उसे, दिल के आकार की चॉकलेट थमा देते या फिर लाली-लिपस्टिक। भग्गो के दिल में भी सुमेर को देखकर, गुदगुदी होने लगी। फिर भी वह उनसे, एक मर्यादित दूरी बनाये रखती। वह नवीं में गई थी और दसवीं हर हाल में, पास कर लेना चाहती थी। सुमेर ने तब, बी।कॉम फाइनल में दाखिला लिया था।

भगवती अजब कशमकश में फंसी थी। एक तरफ ‘छोटे जीजा’ और दूसरी तरफ उसकी महत्वाकांक्षाएं! वह इतनी परिपक्व नहीं थी कि स्थिति को स्वयं संभाल सके। भाग्य ने उसके लिए, दूसरा लेख लिख रखा था। एक दिन फूलो भाभी ने सुमेर को, ईसपुर भेजा। भगवती को उधर से लाना था। भैया अपनी सासू माँ को, पहले ही ले आये थे; घर में कथा का आयोजन जो ठहरा। ईसपुर में भगवती के पिता और चाचा-चाची थे। सुमेर को वे कुटुंब का सदस्य मानते थे, इसलिए बेधड़क होकर, लड़की को साथ भेज दिया। दोनों बाइक से, शहर पहुँचने को थे कि रास्ते में मेले का पंडाल पड़ा। उसमें कई लुभावने स्टाल और झूले थे। वहां रोमांस की प्रबल संभावनाएं नजर आ रही थीं। सुमेर का जेबखर्च, पिताजी ने बढ़ा दिया था; इसलिए आराम से, पैसे उड़ाए जा सकते थे। भग्गो फिर भी, मेले में घूमने के लिए, राजी न हुई। स्त्री-सुलभ मर्यादा उसे रोक रही थी।

सुमेर अपनी जिद पर अड़े रहे। दोनों के बीच इसे लेकर, बहुत बहस हुई। अंत में भगवती को, घुटने टेकने पड़े। वे झूलों पर साथ-साथ बैठे। रोमांटिक मुद्रा में फोटुएं भी खिचवाईं। बायस्कोप का वह शो देखा, जिसमें एक से एक, आइटम-सांग थे। एक ही नारियल में, दो स्ट्रॉ डालकर, नारियल पानी पिया। एक ही प्लेट में गोलगप्पे खाए... गुब्बारों पर निशाना लगाया...और ना जाने क्या, क्या किया! अब भग्गो को भी मजा आने लगा था। मस्ती के आलम में, सुमेर जान न पाए कि भैया के दो पड़ोसी, जगन और नरेश, उन पर आँख, गड़ाए थे। दोनों हद दर्जे के बकवादी थे। प्रेमी जोड़े के घर पहुँचने से पहले ही, वे नमक-मिर्च के साथ, लगाई-बुझाई कर चुके थे। फिर जो भूचाल आया, उसका तो कहना ही क्या!

अम्मा ने झोंटा पकड़कर, भग्गो की वह कुटाई करी, जिसे देख, फूलो का कलेजा, मुंह को आ गया। उन्होंने तुरत-फुरत ऑटो बुलाया और भगवती को लेकर, ईसपुर का रास्ता पकड़ा। भग्गो पर यह हिमाकत बहुत भारी पड़ी। नाकारा बेरोजगार के साथ, प्रेम की पींगे बढ़ाना, छोटा अपराध नहीं था! उसके सपने, खुलकर अंगड़ाई भी न ले सके और एक साधारण पंसारी संग, गांठ बाँध दी गयी। शिक्षिका बनने की उसकी आस टूट गई...भविष्य अभावों का पर्याय बन गया। इसके लिए, कहीं न कहीं सुमेर, खुद को जिम्मेदार पाते हैं। तब भगवती नाबालिग, नासमझ थी पर वह तो वयस्क थे। अपनी थोड़ी देर की तफरी के लिए, उन्होंने भग्गो को अंधेरों में धकेल दिया।

आज मेघना भी उसी मकाम पर है। सुमेर और मालिनी, हाथ से बेहाथ हुई बालिका को, ब्याह करके निपटाने वाले थे; लेकिन भगवती की दशा देखने के बाद, सुमेर ने इरादा बदल दिया है। भग्गो को लेकर ग्लानि पहले भी थी किन्तु अब वह तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है। वर्तमान, अतीत को दोहरा रहा है। मेघना ने तो हाथ जोड़कर, उनसे माफी भी मांगी थी। निवेदन किया था कि विवाह के कारण, उसकी शिक्षा रुक जायेगी...कि वह महज बारहवीं पास कहलाएगी... उसे और पढ़ने दिया जाए। किन्तु वे पसीजे नहीं थे। लेकिन अब...अब उन्होंने सोच लिया है कि मेघना को, दूसरी भग्गो नहीं बनने देंगे...कभी नहीं!

विनीता शुक्ला 
टाइप ५, फ्लैट नं. -९, 
एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, 
‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, 
पोस्ट- त्रिक्काकरा,  कोच्चि, केरल- ६८२०२१ 


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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