शर्मिला बोहरा जालान की कहानी ‘ई-मेल’ | Heart touching story in Hindi by Sharmila Bohra Jalan


शर्मिला बोहरा जालान की कहानी ‘ई-मेल’ | Heart touching story in Hindi by Sharmila Bohra Jalan...

शर्मिला बोहरा जालान किसी कहानी को कहने से पहले उस कहानी की सोच में गहरी पैठ तक जाने वाली युवा कहानीकार हैं. उनके लेखन से यह अहसास होता है कि जहाँ एक तरफ आज की पीढ़ी के वह लेखक हैं जिनमें अपने से पहले की पीढ़ी का कम सम्मान और ज्ञान है वहीँ शर्मिला जैसे कथाकार भी हैं जो इससे नावाकिफ, बेख़बर और ला ताल्लुक़ नहीं हैं. उनकी कहानी ‘ई-मेल’ भी कुछ ऐसा ही दिखाती है. दौर कोई भी हो और उसमें तकनीकी कहाँ तक आगे बढ़ पायी कितना भी हो, परिवार यानी माँ-बाप की अपनी संतानों से लगाव की मात्रा उतनी ही रहती है.

भरत एस तिवारी




ई मेल

— शर्मिला बोहरा जालान

जग्गू हाथ में झाड़ू लिये ड्राइंगरूम झाड़ने लगा। नहीं झाड़ो भी तो चलेगा। कौन-सा कूड़ा पड़ा है? एक तिनका तक तो नहीं निकलता। झाड़ते-झाड़ते उसके हाथ रूक गये। वहीं ज़मीन पर बैठ कुछ सोचने-बुदबुदाने लगा - मुन्ना भइया की ब्रश नहीं मिल रही। पूरे घर में खोज चुका। कभी मुन्ना भइया अपनी पेन खो देते हैं, तो कभी टी.वी. का रिमोट, कभी वह क्या कहते हैं, फोन का चार्जर इधर-उधर रख देते। फिर पूरे दिन जग्गू यह खोज के दो, तो वह खोज के दो। घर में काम क्या कम है जो खोये सामानों को ढूँढने का काम भी करते रहो ! फिर चीजें मिलती कहाँ है? वहीं गाड़ी में। भइया हर सामान गाड़ी में छोड़ आते हैं और यह नया ड्राइवर आलसी और गैरजिम्मेवार है, कितनी बार कहा—‘बाबू का, भइया का सामान ठीक से खोज कर ऊपर ला दिया करो, तो सुनता थोड़े न है ! एक नम्बर का कामचोर जो है ! और देख लो छोटू भइया को। मजाल है कि कोई भी सामान इधर-उधर छोड़ आयें। इस निकम्मे ड्राइवर पर उनको एक पाई का भी विश्वास नहीं है|’

ओह, मैं भी क्या सोचने लगा? कहाँ है यहाँ मुन्ना भइया और कहाँ है छोटू भइया ! ऐसा भी कभी होता है भेज दिया दोनों भाई को बाहर। पहले पढने फिर नौकरी करने। क्या जरूरत है बाबू को उनसे काम करवाने की? किस चीज़ की कमी है इस घर में? घर-गाड़ी जायदाद-- क्या नहीं है बाबू के पास? पर कहते हैं, ज़माना बदल गया है। क्या बदल गया है ! बच्चों को इतने दुलार से बड़ा किया, इसलिए कि विलायत चले जाएँ? पहले मुम्बई भेजा फिर बड़के को भेज दिया अमेरिका।

बाबू बोलते हैं-- ‘जग्गू, तू समझता नहीं है, मना कर देते तो भी जाता। भलाई इसी में है कि मन की करने दो।’ मैं नहीं मानता बाबू की बात। इस घर में नहीं-नहीं तो भी बीस-पच्चीस साल से हूँ। दोनों लड़के, बाबू कहे उठो तो उठते हैं, बैठो तो बैठते हैं। भाभी को भी क्या कहा जाए? लड़कों को रोका नहीं।

जग्गू का बुदबुदाना धीरे-धीरे बन्द हो गया। वह खिड़की के बाहर देखने लगा। सावन का महीना चल रहा था। बूँदा-बाँदी होने लगी थी। गिरती हुई पानी की बूँदों को देखते हुए बोला, “वैसे बाबू ठीक कहते हैं आजकल का ज़माना अलग है। लड़की भी चली जाती है, लड़का भी। हम गरीबों के यहाँ लड़कें जहाँ कमाते हैं वहीं डेरा जमा लेते हैं। अमीरों के भी यहीं होने लगा।”

कमलेश बाबू ‘जग्गू ओ जग्गू’ पुकारते हुए अपने कमरे से बाहर निकले। बोले, “हो गयी सफ़ाई?”

“हाँ बाबू, अभी हो जाती है।”

“क्या हुआ तुझे? तू फिर वही बात लेकर बैठ गया? कितनी बार मैंने तुम्हें समझाया। मुन्ना ने एहमदाबाद से एम.बी.ए. किया है और छोटू ने बैंगलोर से। कहाँ पड़ा है उनके मन लायक काम कलकत्ते में? मैं हूँ बीस साल पुराना स्टॉक एक्सचेंज का मेम्बर। ठीक है, प्रॉपर्टी ले-दे करता हूँ पर आजकल के बच्चे ऊँची पढ़ाई करके ऊँचे पैकेज का काम पकड़ना चाहते हैं। कहते हैं, चैलेंजिंग हो काम तो मजा आता है।’

जग्गू बोला, “पैसों-वैसों की बात मुझे मत समझाइए। आपके पास पैसे क्या कम हैं? जनम ज़िन्दगी बैठकर बेटों को खिला सकते हैं। यहीं किसी धन्धे में लगा देते। आँखों के सामने रहते। आपको भी तो देखने वाला कोई चाहिए न?”

“तू है तो हम दोनों का ध्यान रखने वाला। क्यों मन ख़राब करता है?”

जग्गू थोड़ा गुस्से में बोला, “यह सब कहकर मुझे मत बहलाइए।”

दोनों बात कर रहे थे तभी बादल उमड़ने-घुमड़ने लगे। बिजली कड़की और मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी। जग्गू हड़बड़ा कर उठा और खिड़कियाँ बन्द करने लगा। लगा, छोटू स्कूल से पानी में भींगता हुआ आ रहा है। गाड़ी घर से कुछ दूर पर ख़राब हो गयी थी और छोटू ज़िद कर गाड़ी से निकल पैदल घर आने लगा था। जग्गू ने जैसे ही छोटू को अकेले आते देखा, छाता लेकर भागा और उसे गोद में उठाकर ले आया। फिर पूरे दिन में कई बार सरसों तेल की मालिश करता रहा। ड्राइवर को कमलेश बाबू क्या डाँटते, उसने खूब फटकारा, बोला, “बच्चे को समझा-बुझाकर गाड़ी में रखना था। घर आकर छाता ले जाते और बच्चे को समझा कर पानी से बचाकर घर लाते।” सच, उस ड्राइवर और जग्गू की कभी नहीं पटी। रोज़-रोज़ की खटपट से तंग आकर एक दिन कमलेश बाबू की पत्नी किरण ने कहा, “उसे निकल दो और जग्गू के भतीजे मदन को रख लो।” वैसा ही हुआ।

उन दिनों की बात याद करते हुए कमलेश बाबू जग्गू से बोले, “याद है कि नहीं तुम्हें, मुन्ना जब बहुत छोटा था। रहा होगा दो साल का। रात-रात भर सोता नहीं था... पर तू तो हमारे यहाँ था ही नहीं। तुम्हें क्या याद होगा?” जग्गू बोला, “नहीं बाबू, सब याद है। याद क्यों नहीं होगा?” कमलेश बाबू ने दोनों बेटों के बचपन की छोटी-छोटी बातें इतनी बार जग्गू को सुनाई हैं कि जग्गू हर बात में यही कहता, “हाँ, मैं कैसे नहीं था? रहता था आपके यहाँ।” कमलेश बाबू बात बढ़ाते हुए बोले, “रात भर मैं मुन्ना को गोद में लिये घूमता रहता। किरण से कहता, दूध बनाकर लाओ पर वह बेचारी आधी रात में दूध देने से घबराती। माँ ने मना जो कर रखा था। माँ कहती, बच्चा रात में रोये तो पानी पिलाकर थपकी देकर सुला दो। दूध देने से उसे रात में खाने-पीने की आदत पड़ जाएगी। मैं कहता, चुपचाप बना लाओ माँ को मत बताना। और जैसे ही बच्चे के पेट में दूध जाता, उनका रोना बन्द हो जाता। मुन्ना को रात में रोने की आदत थी तो छोटू को बहुत बोलने की। हर समय कहता- पापा एक बात कहूँ? एक-एक करके अनेक बातें कह जाता फिर भी उसकी बात ख़त्म नहीं होती।”

जग्गू बोला, “बाबू, आप दोनों बच्चों की हर बात का जवाब देते। बार-बार समझाते। वहीं भाभी तुरन्त गुस्सा हो जाती। डाँटती, कहती जाओ परेशान मत करो।” कमलेश बाबू हँस दिये। जग्गू को देखने लगे। मंझोला कद, ऐसा पक्का रंग कि अचानक कोई देखे तो थोड़ा डर जाए। बाबू को हँसता देख जग्गू भी हँसने लगा, बोला, “मुन्ना हर समय इतना मीठा बोलता कि पत्थर पिघल जाए। एक दिन बोला, ‘जग्गू, मैं भी तुम्हारे साथ चिकन खाऊंगा।’

कमलेश बाबू यह बात सुनते ही गुस्से में जग्गू को घूरने लगे, बोले, “तो तुम्हीं ने उसे चिकन-फिकन सिखलाया था !”

जग्गू घबरा गया, हकलाकर बोला, “नहीं-नहीं बाबू, वह तो सामने वह जो बापी का घर है न, सेन बाबू का, उसके घर में पकता था। उसकी गन्ध आती थी। मुन्ना पूछता रहता क्या बन रहा है?” ऐसा कह जग्गू मुँह झुकाकर खिसियायी हँसी हँसा।

कमलेश बाबू भी हँसने लगे। गम्भीर होकर बोले, “जो भी हो जगेशर, हमारे दोनों लड़के ऐसी-वैसी किसी भी चीज़ों को हाथ नहीं लगाते। आजकल के लड़के क्या नहीं खाते?”

जग्गू बोला, “हाँ बाबू, हमारे लड़के तो हीरे हैं मीट-फीट से कोसों दूर। सपने में भी यह सोच नहीं सकते।”

कमलेश बाबू बात करते-करते शेयर के भाव देखने उठ गये। टी.वी. चलाकर भाव देखा। मूड ख़राब हो गया। सो टी.वी बंद कर लैपटॉप ले बैठ गये, यह देखने कि मुन्ना का कोई मेल आया है कि नहीं? आँखें चमक उठीं। किरण को पुकारा, “जल्दी आओ, मुन्ना का मेल है, सुनो पढता हूँ” - ‘पापा कैसे हो? आज पूरा दिन काम में ही चला जाएगा। एक दो नये क्लाइंट से मिलना है। मम्मी ठीक है न? न जाने आजकल पेट कैसे ख़राब रहने लगा। जग्गू का बीड़ी पीना कम हुआ कि नहीं? इस बार दीवाली पर आऊंगा तो जग्गू की बीड़ी छुड़वा कर जाऊँगा। छोटू का मेल कुछ दिनों से नहीं आया। सब ठीक तो है न?’

कमलेश बाबू आवाज़ दे जग्गू को बुलाने लगे। बोले, “मुन्ना का मेल है। पूछ रहा है तुम्हारी बीड़ी बन्द हुई कि नहीं। दीवाली पर आएगा।”

जग्गू बोला, “बीड़ी क्या अब इस उम्र में छोड़ पाऊंगा? वैसे बाबू, दीवाली को अब कितने दिन बचे हैं?” ऊँगली पर हिसाब लगाने लगा। क्या? अढ़ाई महीने? ज्यादा दिन नहीं है। पूरे घर की सफ़ाई करनी है। मुन्ना भइया के कमरे को खूब अच्छी तरह झाड़ना होगा। मल्लिका बहू को गन्दगी एकदम पसन्द नहीं।

किरण बोली, “मुन्ना क्या खाने लगा जो उसका पेट ख़राब रहने लगा है? मल्लिका एकदम ध्यान नहीं देती। आजकल की लड़कियाँ पता नहीं क्यों पति का एकदम भी ख्याल नहीं रखतीं। इतना अच्छा, होनहार लड़का है। इतना सुन्दर। ऐसा ठंडा स्वभाव। इतना अनाप-शनाप कमा रहा है। उसके शरीर का ध्यान रखे। कपड़े-लत्ते, खाना-पीना देखे, सँभाले। यह सब औरतों के काम होते हैं। हम पूरे दिन घर की सार-सँभाल में पुरुषों के भोजन और कपड़ों को ठीक से रखने में लगे रहते थे, तभी घर में बरकत थी। घर सुन्दर लगता था। पहना-ओढ़ा खिलता-फबता था, शरीर स्वस्थ रहता था। मल्लिका से कुछ होता-हवाता नहीं। अपनी नौकरी में ही परेशान रहती है। क्या ज़रूरत है काम करने की? पर कुछ न करे तो मन कैसे लगे ! जो भी हो, शरीर का ख्याल रखना ज़रूरी है। शादी के दो-अढ़ाई साल हो गये, मल्लिका बच्चे की भी बात नहीं करती। दोनों ने क्या सोच रखा है, पता नहीं चलता। इस बार मल्लिका की माँ से बात करुँगी।”

जग्गू ने किरण से पुछा, “भाभी, छोटू भइया भी तो आएँगे?”

किरण बोली, “ नहीं, इस बार वह नहीं आ पाएगा। उसने अपनी छुट्टियाँ तो पहले ही घूम-फिर कर ख़त्म कर डालीं। बहुत दिनों से उसका मन था ऑस्ट्रेलिया जाने का। अपने दोस्तों के साथ पिछले महीने घूम आया, कोलकाता अगले साल आ पाएगा।मेरा मन है, दीवाली के बाद कुछ दिन हम मुम्बई चले जाएँ। छोटा न सही, बड़ा ही सही। कोई तो दीवाली पर यहाँ रहेगा। गणेश-लक्ष्मी की पूजा कम-से-कम अकेले नहीं करनी पड़ेगी। पटाखे-वटाखे भी फूटेंगे। नहीं तो हमलोग क्या अकेले बैठे पटाखे फोड़ते?”

कमलेश बाबू बोले, “जग्गू, तू बैठा-वैठा हमारे साथ बात बनाता रहेगा कि खाना-वाना भी देगा? मुझे स्टॉक मार्केट भी तो जाना है।”

जग्गू ‘हाँ बाबू देता हूँ’ कहता हुआ फुर्ती से रसोई की तरफ भागा। कमलेश बाबू प्रसन्न मन से खाकर गुनगुनाते हुए घर से निकल गये।


किरण उनके जाने के बाद देर तक लैपटॉप के पास बैठी रही। जग्गू को बोली, “कितनी बार तुम्हारे बाबू को कहा, मुझे भी यह ई-मेल करना सिखा दो, बहुत-सी बातें मुझे मुन्ना से करनी हैं पर ये मेरी एक नहीं सुनते। मुझे अंग्रेजी आती नहीं, क्या करूँ? वैसे ये लोग अंग्रेजी में हिन्दी ही लिखते हैं, पर यह सब कुछ मुझसे होता-हवाता नहीं। वह मेरी सहेली रुक्मणी यह सब कर लेती है। उसका बेटा भी तो एम.बी.ए करके एक दो साल से बम्बई में नौकरी करने लगा।”

जग्गू बोला, “अच्छा ! तब तो वह हमारे छोटू भइया के साथ रहता होगा। चलो, यह भी अच्छा हुआ।”

किरण बोली, “नहीं रे। हमारा छोटू रहता है सिद्धि विनायक मन्दिर के पास और रवि ने किराये पर फ्लैट लिया है चर्च गेट के पास। दोनों ने अपने-अपने दफ़्तर के पास फ्लैट लिये हैं। दोनों ही अकेले नहीं रहते हैं। अपने-अपने एक दोस्त के साथ फ्लैट शेयर करते हैं। जब शादी होगी, तब अकेले रहने लगेंगे।”

जग्गू बोला, “भाभी जी, आप अँग्रेजी क्यों नहीं सीखतीं? मुझे भी नहीं आती। यह कम्प्यूटर अगर हिन्दी हो जाए तो आप और हम दोनों मुन्ना भइया से बात कर सकेंगे।” आप टाइप करना सीख लीजिये|

किरण बोली, “पागल हो क्या? इस उम्र में टाइप-वाइप सीखूं! कैसी गँवारों जैसी बात करते हो? तुम्हें बुद्धि कब आएगी? सच, मुन्ना और छोटू दोनों कहते हैं कि मम्मी जग्गू के पास सब कुछ है बुद्धि के सिवा।”

जग्गू अपने सिर पर हाथ फेर कर भोलेपन से बोला, “हाँ, भइया लोग ठीक कहते थे।” किरण बोली, “जानता है जग्गू, इस बार मुन्ना जब आया था ढेर सारे रुपये लाया था। एक दिन अकेले में मुझसे बोला, मम्मी यह सब तुम्हारे हैं, रख लो।” मैं बोली, “पगला है क्या? इतने पैसों की मुझे कोई ज़रूरत नहीं। तुम्हारे पापा देते हैं।” मुन्ना बोला, “पापा तो देते हैं पर तुम्हारा दान करने का किसी को कुछ देने का मन हो। तुम्हारे मन में कुछ हो जो तुम पापा को नहीं बताना चाहती हो।” मैंने कहा, “नहीं बेटा ऐसी कोई बात मन में नहीं है। यह पैसे तुम रखो। मैं पापा को छोड़ किसी से कुछ नहीं लूँगी। भगवान तुम्हें खूब लक्ष्मी दे।” ऐसा कहते हुए किरण की आँखों में पानी आ गया। धीरे-से बोली, “मुन्ना जानता है, तुम्हारे बाबू के हाथ से पैसा छूटता नहीं है।”

जग्गू बोला, “हाँ भाभी जी, बाबू थोड़े कंजूस हैं पर हमारा भइया एकदम दिलदार। इस बार वह मुझे पाँच सौ रूपये देकर गया।”

किरण बोली, “तुमने बताया नहीं?”

जग्गू हकलाकर बोला, “वह क्या हुआ न भाभी, मैं पता नहीं कैसे वह एकदम भूल गया, उसने मना कर दिया था कहा मम्मी डाँटेंगी। मत बताना। पर एक बात कहूँ भाभी, बाबू कुछ बोल रहे थे बोले, ‘जग्गू, मुन्ना इस बार कुछ भी बाज़ार से मँगवा रहा है न, तो तुरन्त पर्स से पैसे निकल कर दे रहा है। उसके मोबाइल का चार्जर ख़राब हो गया है। मदन को बोला, ‘न्यू मार्केट से आते समय लेते आना।’ और तुरन्त पैसे थमाने लगा। मैंने कहा, “बेटा, रहने दो मैं दे रहा हूँ न।”

किरण बोली, “तुम्हारे बाबू मुझे भी कह रहे थे। यह भी बोले, “मुन्ना मेरा मनोबल है। भगवान न करे मुझे कभी उससे कुछ भी लेना पड़े, पर इन सालों में मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया है।”

जग्गू गम्भीर हो बोला, “किस चीज़ की कमी है बाबू के पास, पर लड़कों को खूब कमाते देख ताकत तो बढ़ती है।”


किरण जग्गू को देखने लगी। पूछा, “तुम्हारा लड़का अच्छा कमाने लगा। तुम्हें कुछ देता है कि नहीं?”

जग्गू बोला, “क्या ज़रूरत है मुझे पैसों की? न आगे कोई, न पीछे कोई। घरवाली बेचारी मर गयी। लड़के का मन भी हो तो भी क्या दे। उसकी औरत देने दे तब न ! ज़माना ख़राब है, अच्छा है मैं आपके पास पड़ा हूँ। यहीं मर-खप जाऊँगा।”

दोनों बात कर रहे थे तभी फोन की घंटी बजी। किरण की सहेली रुक्मणी का फोन था। कुछ दिनों से रुक्मणी किरण को बुला रही थी। किरण कई बार टाल चुकीं, पर इस बार न नहीं कर सकीं बोली, “ठीक है, आ रही हूँ।”

कुछ देर में कपड़े बदल तैयार हो साफ़ कलफदार मलमल की साड़ी पहन किरण बालीगंज सर्कुलर रोड निकल पड़ी। रुक्मणी किरण को देखते ही मुस्करा दी। बोली, “कितनी अच्छी लग रही हो कोटा पहनकर।”

किरण हँसने लगी, बोली, “ध्यान से देखो, मलमल है।”

रुक्मणी को बहुत आश्चर्य हुआ बोली, “सच? मैं तो पकड़ नहीं पायी। इतना मन होता था मेरा मलमल पहनने का पर मेरी सास मलमल देखते ही बिदक जाती कहती, ‘मैं नहीं पहनती तो मेरी बहू कैसी पहनेगी।’ जानती हो, मेरी शादी में मेरी माँ ने मुझे मलमल की भी साड़ियाँ घर में पहनने के लिये दी थीं। हमारे मायके में, वहाँ पलासी में मलमल पहनने का चलन था। मेरी सास ने जैसे ही देखा कि मैंने मलमल पहना है, मुझे डाँटा और फिर साड़ी साड़ियाँ उठाकर ब्राह्मणी को पकड़ा दीं। मैं बहुत रोयी। फिर उन्होंने महँगी साड़ियाँ मंगवायीं और कहा, ‘घर में यह पहना करो। मलमल पहनकर जो आराम मिलता है वह किसी और कपड़े में नहीं। क्या पड़ा है ऐसी रईसी में?’ किरण बोली, “मेरी सास भी कम गुस्सैल थी क्या? ऐसी कड़क आवाज़ कि क्या कहूँ? मेरे हाथ काँपने लगते। तुमसे क्या छुपाना, मेरी दोनों ननदें जो-जो कहतीं, मुझे सुनना-करना पड़ता।”

रुक्मणी बोल पड़ी, “जो भी बोल किरण, हमारे यहाँ ननद-वनद की कभी नहीं चली। हमारे ससुर जी को एकदम पसन्द नहीं था कि बेटियाँ मायके में हस्तक्षेप करें। यहाँ तक कि मेरी सास भी ससुर जी के सामने कुछ नहीं बोलती थीं। ससुर जी को माँ का पीहर जाना पसन्द नहीं था। बताओ, ऐसा भी कभी हुआ है? पर मां उन्हीं लोगों से मिलती-जुलती थी जिनसे बाउजी को मिलना जुलना पसन्द था।”

किरण बोली, “मेरी सास तो मज़े से मायके जाती थी। मुझे भी जाने देती पर मेरे मायके वालों को कम पसन्द करती थी। मेरी सास को मैं कभी भी सुन्दर नहीं लगी। यह नाक जो दबी हुई है। न ही तेरे जैसा खुलता रंग। मेरी सास का मन नहीं था यह रिश्ता करने का। मुन्ना के पापा को अलग ले जाकर समझाया कि ‘ना' कह दो तो मैं दूसरी सुन्दर लड़की से रिश्ता तय कर दूँगी। असल में अपनी बचपन की एक सहेली की लड़की उन्हें जँची हुई थी पर ससुर जी को पैसों से मोह था। तुम तो जानती हो हमारे मायके में कैसे रईसी है और कितना ऊँचा खानदान है। मेरे बाउजी को ससुर जी ‘हाँ’ कह चुके थे। बाउजी ने ब्याह में ढेर नगद रूपये दिये। बस, हो गया सम्बन्ध। एक बात कहूँ, ससुराल में मेरी सास को मेरी माँ का दिया हुआ एक सामान भी पसन्द नहीं आया। जब तक जीवित रहीं, किसी भी चीज़ को लेकर उनका मन कभी भी खुश नहीं रहा। खैर, छोड़, हम क्या लेकर बैठ गये। आज मेरा मन अच्छा है। मुन्ना का मेल आया है, वह दीवाली पर आएगा। इस बार दीवाली के समय की खरीदारी मुन्ना के साथ करुँगी। नयी चादरें, नयी क्राकरी। पर्दे-वर्दे पसन्द करना मेरे वश की बात नहीं है। मल्लिका नये चलन की चीजें खरीदती है, सो उसी को पर्दे का काम सौंपना है। इस बार मैं मुन्ना के पसन्द की साड़ी लूँगी। हर बार कहता है, “मम्मी यह क्या साड़ी खरीदी तुमने?”

रुक्मणी बोली, “तू कह रही थी वे दोनों धनतेरस के दिन आएँगे। कब तू पर्दों के कपड़े पसन्द करेगी कब सिलने देगी? बाज़ार-वाज़ार तो तुम्हें और भाई-साहब को पहले करना होगा। मेरी बात मान, दोनों के साथ सोने-चाँदी का सामान खरीद लेना। मेरा रवि भी तो धनतेरस के दिन ही आएगा। यह तो बता किरण, घर की सफ़ाई व झाड़-पोंछ के लिये तुमने आदमी बुला लिये? जग्गू उनके साथ मिलकर कर देता होगा। तुमलोग अपनी अलमारी भी जग्गू के सामने साफ़ करती हो? कुछ दिनों से अखबार में क्या आ रहा है, जानती हो? दिल्ली में नौकर किस तरह मालकिन की हत्या कर रहे हैं।”



किरण बोली, “हमारा जग्गू बहुत पुराना है। कम-से-कम पच्चीस साल। वह नज़र उठाकर भी नहीं देखता।”

रुक्मणी बोली, “किरण, हमलोग कुछ नहीं समझते। ज़माना कैसा ख़राब है? आजकल बीस साल पुरानी शादी टूट जाती है। यह तो नौकर और मालिक का मामला है। इतना विश्वास करना अच्छा नहीं।”

किरण चुप थी। थोड़ी देर बाद बोली, “हाँ, जग्गू बातें छुपाता है। उसने मुझे कहाँ बताया की मुन्ना उसे इस बार पाँच सौ रूपये देकर गया है। मुन्ना के पापा को आजकल रूपये गिन कर अलमारी में रखते देखती हूँ। मुझसे ज्यादा अखबार वहीं पढ़ते हैं। आजकल जग्गू से कहते हैं- काम हो गया तो नीचे जाकर बैठो। पहले कहते थे- जग्गू, तू बार-बार नीचे क्या करने जाता है? काम हो गया तो क्या हुआ? भाभी जी के साथ बात कर लिया करो। कम-से-कम घर में दो प्राणियों की आवाज़ तो सुनाई देगी। मुझे भी डर लगने लगा है पर सच कहूँ, मन नहीं मानता कि जग्गू को लेकर कुछ सोचूँ। तू ठीक कहती है, ज़माना बदल गया है।”

रुक्मणी बोली, “यही तो बात है। हम हैं एकदम भोले, पर दुनिया चालाक है। रवि के मुम्बई जाने के बाद से मैं तो बहुत संभल के रहती हूँ। डर लगता है पर हम अकेले रहने के अलावा करें भी तो क्या? इस बार दीवाली में फ्लैट में पेंट करवाने का मन है पर रवि के पापा कहते हैं साल-छह महीने में रवि की सगाई अच्छे घर-घराने में ठीक हो जाए तब करवाएँगे।”

किरण बोली, “ कोई लड़की नज़र में है क्या?”

रुक्मणी अनमनी-सी बोली, “क्या होगा नज़र में रखकर? तुमसे ही कह रही हूँ, रवि किसी साउथ इंडियन लड़की की बात पिछले साल करके गया था। मैंने उसे समझाया, ‘बेटा, उन लोगों का खान-पान, रहन-सहन देखा है तुमने? हमलोगों से एकदम अलग है। रीति-रिवाज़ भी कहाँ मिलते हैं। फिर, लड़की काली है।’ गुस्सा हो गया मेरी बात सुनकर। रवि एकदम अंग्रेज लगता है, तुम तो जानती हो। फिर वह लड़की साधारण घर की भी है। देखो, क्या होता है? उसके पापा को अभी पता नहीं है। पता चलेगा तो मन पर क्या गुज़रेगी? मैंने तो सब भगवान पर छोड़ दिया है।”


किरण रुक्मणी की बात सुन छोटू के बारे में सोचने लगी, कुछ दिनों से उससे जब भी शादी की बात करते हैं, वह टाल जाता है। कहीं उसका भी कुछ चल तो नहीं रहा? कम-से-कम मुन्ना ने ऐसा कुछ नहीं किया। ऊँचे घर की लड़की है मल्लिका। किरण ने ये बातें रुक्मणी से नहीं कहीं। जाते-जाते बोली, “चलो अच्छा है, दीवाली पर दोनों के बच्चे घर आएँगे। मन बदल जाएगा।”

सवा महीने बाद कमलेश बाबू व किरण के यहाँ दीवाली की सफ़ाई शुरू हो गयी। दीवाली के दिन क्या रसोई बनेगी, मुन्ना और मल्लिका को क्या पसन्द है, उसको नज़र में रखते हुए एक सूचि तैयार की गयी। कमलेश बाबू, किरण और जग्गू - तीनों मिलकर कभी किसी नमकीन को सूचि में जोड़ते तो कभी किसी मिठाई को घटाते। अन्त में बार-बार काटने-जोड़ने के बाद सब कुछ तय हो गया की क्या बनेगा। किरण ने मुन्ना के कुछ दोस्तों को फोन कर दिया कि दीवाली के दिन सभी समय निकलकर उनके यहाँ ज़रूर आयें, मल्लिका व मुन्ना न्यूयॉर्क से आ रहे हैं। कुछ ही दिन हाथ में थे, सो किरण रुक्मणी के साथ पार्क-स्ट्रीट निकल गयी साड़ी ख़रीदने। कमलेश बाबू ने नये कुर्ते-पायजामे का ऑर्डर दे दिया।

धीरे-धीरे दीवाली पास आने लगी। किरण व कमलेश बाबू के चेहरे की चमक दुगुनी हो गयी। मुन्ना का कमरा देखा, एकदम चमक रहा था। कमलेश बाबू खुश हो गये। किरण से बोले, “देखो, जग्गू ने एकदम नया कर दिया है मुन्ने के कमरे को। सच, मल्लिका से घबराता है जबकि वह उसकी बेटी की उम्र की है। पर जब आती है, हाथ पर सौ रूपये रख के जाती है, सो, उससे दबता है। है तो मल्लिका दिल्ली की लड़की। ब्याह के पहले हर साल अपने मम्मी -पापा के साथ छुट्टियों में विदेश जाती ही थी पर देख लो, हमारे मुन्ना के साथ उसकी खूब पटती है। मुन्ना है सीधा-साधा, पीने-खाने से कोसों दूर जबकि समधी राजकुमार बाबू क्लब जाते हैं तो चढ़ाते हैं।”

किरण बोली, “क्लब तो हम भी जाते हैं पर न तो मैं उसकी माँ की तरह स्वीमिंग कर सकती हूँ और न आप पीने में कभी दिलचस्पी दिखा सकें हैं। हाँ, हमलोग पुराने ढंग के लोग हैं। वैसे, यह तो बताइए मुन्ना की फ्लाइट कितने बजे की है? एयरपोर्ट से घर आने में इस बार भी दो घंटे लग जाएँगे। मुन्ना का कोई मेल आया कि नहीं? पैकिंग-वैकिंग दोनों ने शुरू कर ली होगी।”

अगले दिन कमलेश बाबू खुश नज़र आ रहे थे। उनके कपड़े सिलकर आज आने वाले थे। पूजा का सामान राशन वगैरह धनलक्ष्मी स्टोर से आ गया था। किरण सामान देख रही थी। कमलेश बाबू ने लैपटॉप खोला। मुन्ना का मेल नहीं आया। छोटू का था- सबको याद कर रहा था और उदास भी था कि दीवाली के दिन दफ़्तर जाना पड़ेगा। मुन्ना का मेल, पूरे पाँच दिन हो गये, नहीं आया। व्यस्त होगा। इंडिया आने के पहले कितने तरह के काम सलटाने होते हैं। कमलेश बाबू लैपटॉप लिये बैठे थे। तभी देखा, मुन्ना का मेल है। जल्दी से हल्के हाथ से बटन दबाया- ‘कुछ दिनों से आपसे बात नहीं कर पाया। थोड़ा व्यस्त था और मल्लिका से बात करने में उलझा रहा। आपलोग कैसे हैं? दीवाली की ख़रीददारी हो गयी होगी। गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति पापा ज़रा सँभाल के लाना। पूजा इस बार भी रात में बारह बजे करोगे? मम्मी तो जगी हुई रहती है पर पापा तुम्हारी नींद ! एकदम कुम्भकरण हो तुम। मम्मी के साथ जगे रहना, नहीं तो मम्मी अकेले बोर होगी। पूजा करते समय मम्मी को डाँटना मत कि यह पेड़ा, वह लड्डू रखना क्यों भूल गयी।’ खट करके झटके से लैपटॉप बन्द हो गया। पंखा धीरे-धीरे बन्द होने लगा। यह क्या लोड शैडिंग।

कमलेश बाबू को पसीना आने लगा। किरण को पुकारा, बोले, “मुन्ना ने मेल किया है पर उसकी बात कुछ भी समझ में नहीं आ रही। लिखा है- दीवाली की पूजा के दिन मम्मी के साथ तुम भी जागना। वह आएगा तो हम सभी जागेंगे। लो, बत्ती जल उठी। देखें मेल में आगे क्या लिखा है- ओह, अधूरा पत्र है, आगे कुछ भी नहीं है।”

किरण हड़बड़ा गयी, घबरा गयी बोली, “जल्दी से उससे पूछो वह कोलकाता कितने बजे पहुँचेगा?”

कमलेश बाबू ने उसे फटाफट मेल किया कि वह कब आ रहा है पर मेल बॉक्स खाली था।

पूरा दिन निकल गया। मुन्ना की कोई खबर नहीं आयी। कमलेश बाबू व किरण सुबह आये मेल की बात पूरे दिन करते रहे। जग्गू परेशान-सा घूम रहा था। तीनों पूरे दिन अनमने-से रहे।

रात ग्यारह बजे मुन्ना का मेल देखा। कमलेश बाबू ने जल्दी-जल्दी उँगलियाँ नचायीं। मेल खुला, “पापा मैं एकदम भुलक्कड़ होता जा रहा हूँ। सुबह हमारी बात अधूरी रह गयी। पूरे दिन यूरोप की टिकट वगैरह में लगा रहा। हाँ पापा, क्या है न, मल्लिका कह रही थी हर छुट्टियों में इंडिया ही जाते हैं। इंडिया में भी हमेशा कोलकाता। इस बार यूरोप घूमने जाएँगे। उसके मम्मी-पापा भी जा रहे हैं। पर चिन्ता मत करो पापा, अगले साल हम दीवाली साथ मनाएँगे। छोटू भी होगा। तुम मम्मी को प्लीज़ समझा देना। पापा तुम तो मल्लिका को जानते हो। बाय।”


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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