head advt

संवेदनशील समझे जाना वाला ‘भद्रलोक’ का मानुष जब नागरिकता संशोधन कानून पर हो रहे प्रदर्शनों को धर्म के आयने से परखने लगता है तब संकट गहरा जाता है



निश्चित ही हरेक के पास पूरी आजादी है कि वह किस विचारधारा को अपनाए। लेकिन किसी को भी यह अधिकार नहीं कि अपनी विचारधारा को पोषित करने के लिए तथ्यहीन टिप्पणिया करे या फिर सोशल मीडिया में प्रतिदिन लाखों की तादात में फेंके जा रहे ‘कूड़े’ को अपना समर्थन दे — अपूर्व जोशी

संवेदनशील समझे जाना वाला ‘भद्रलोक’ का मानुष जब नागरिकता संशोधन कानून पर हो रहे प्रदर्शनों को धर्म के आयने से परखने लगता है तब संकट गहरा जाता है

संवेदनशील समझे जाना वाला ‘भद्रलोक’ का मानुष जब नागरिकता संशोधन कानून पर हो रहे प्रदर्शनों को धर्म के आयने से परखने लगता है तब संकट गहरा जाता है

— अपूर्व जोशी

कॉलेज के दिनों में ही 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था। मुझे भलीभांति याद है कि हम तीनों ही बढ़ती सांप्रदायिकता से चिंतित रहते थे। धर्म के आधार पर समाज को बंटते देखना हमारे लिए पीड़ादायक था। कह सकते हैं कि हम तब तक धर्मनिरपेक्ष हुआ करते थे। मार्क्स का कथन कि धर्म अफीम माफिक होता है, निजी तौर पर मैंने अपने प्रिय मित्र पंकज भटनागर के संदर्भ में समझा। — अपूर्व जोशी

कितना बदल गया इंसान — अपूर्व जोशी


पंकज भटनागर और मैं लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज, लखनऊ विश्वविद्यालय में साथ पढ़े। दोनों ने बीएससी साथ किया। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से तीन वर्ष का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स भी हमने ज्वाइन किया। पंकज मेधावी छात्र थे इसलिए पार हो गए। मैं और एक अन्य मित्र मंजुल भटनागर ‘गंजिंग’ करने के चक्कर में रहे, डूब गए। ‘गंजिंग’ ठेठ लखनऊ शब्द है जो प्रसिद्ध हजरतगंज में आवारागर्दी के लिए प्रयोग में लाया जाता है। बरहाल कॉलेज की मित्रता आज भी यथावत है। हम तीनों ने ही व्यावहारिक जीवन या व्यासायिक जीवन साथ शुरू किया। नोएडा संग-संग आए। एक साथ काम करने लगे। फिर मैं पत्रकारिता में आ गया। पंकज ने दवाओं का व्यापार शुरू कर दिया और मंजुल टेलीकम्युनिकेशन की दुनिया के हो गए। पंकज ‘दि संडे पोस्ट’ में भी लंबे समय तक सक्रिय रहे। हमारे उत्तर प्रदेश संस्करण के वे ही प्रभारी थे। लब्बोलुआब यह कि पंकज मेरे घनिष्ठ मित्र आज भी हैं।
धर्म के नाम पर विद्वेष का जहर व्यक्ति की चेतना हर लेता है, उसके विवेक पर घातक प्रहार कर डालता है
कॉलेज के दिनों में ही 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था। मुझे भलीभांति याद है कि हम तीनों ही बढ़ती सांप्रदायिकता से चिंतित रहते थे। धर्म के आधार पर समाज को बंटते देखना हमारे लिए पीड़ादायक था। कह सकते हैं कि हम तब तक धर्मनिरपेक्ष हुआ करते थे। मार्क्स का कथन कि धर्म अफीम माफिक होता है, निजी तौर पर मैंने अपने प्रिय मित्र पंकज भटनागर के संदर्भ में समझा। समझ में आया कि धर्म के नाम पर विद्वेष का जहर किस प्रकार व्यक्ति की चेतना हर लेता है, उसके विवेक पर कैसा घातक प्रहार कर डालता है। पंकज बीते एक दशक के दौरान पूरी तरह कट्टर हिंदुवादी हो चुके हैं। उनकी फेसबुक पोस्ट मुझे भयभीत और कुछ हद तक अवसादित करने लगी हैं। तो चलिए उनकी फेसबुक पोस्ट के जरिए चलिए तनिक समझा जाए कि कैसे धर्म का नशा हमारी सोच को अपने वश में कर मानवीय सरोकारों की मृत्यु का कारक बन जाता है। पिछले लंबे अर्से से उनकी फेसबुक पोस्ट पर मैं नजर रखे हुए हूं।

विचारधारा को पोषित करने के लिए तथ्यहीन टिप्पणियाँ

निश्चित ही हरेक के पास पूरी आजादी है कि वह किस विचारधारा को अपनाए। लेकिन किसी को भी यह अधिकार नहीं कि अपनी विचारधारा को पोषित करने के लिए तथ्यहीन टिप्पणिया करे या फिर सोशल मीडिया में प्रतिदिन लाखों की तादात में फेंके जा रहे ‘कूड़े’ को अपना समर्थन दे। खेदजनक कि मेरे मित्र ऐसे ही वीडियो, ऐसी पोस्ट शेयर करते हैं जो पूरी तरह तथ्यहीन और घृणा फैलाने वाली होती हैं। कितना घातक है धर्म का नशा पंकज भटनागर सरीखे संवेदनशील व्यक्ति तक को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। मैं सहम उठता हूं कि इस नशे की चपेट में यदि पंकज जैसे आ सकते हैं, तो उन धर्मांधों की सोच किस तरह धर्म के नाम पर विकृत हो चुकी होगी जिन्हें न तो इतिहास बोध है, न ही सामाजिक बोध। हिंदू, हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्र और इस्लाम के नाम पर ऐसे बबालों का गलत इस्तेमाल कितना खौफनाक मंजर पैदा कर सकता है।

सच यह कि बार-बार झूठ को बोलने, उसे प्रचारित-प्रसारित करने के बावजूद वह झूठ ही रहता है

पंकज मुस्लिम महिलाओं की पर्दानशीनी पर ऊंगली उठाते हैं। वह जेएनयू में हुए ताडंव पर चुटकी लेने वाली पोस्ट को शेयर करते हैं। उत्तर प्रदेश की पुलिस नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध- प्रदर्शन करने वालों को अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर धमकाती है तो उसका वीडियो वे शेयर करते हैं। हद तो यह कि वे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर निम्नतर स्तर की छींटाकशी करने वाली, उन्हें मुसलमान बताने वाली घटिया और झूठी पोस्ट भी बड़े फख्र के साथ साझा करते हैं। बहुत सारे लोग स्व राजीव दीक्षित के प्रशंसक हैं और उनके ‘ज्ञान’ भरे वीडियो को शेयर करते हैं। दीक्षित भी अपने एक ऐसे ही वीडियो में नेहरू को मुसलमान बताते हैं। सच यह कि बार-बार झूठ को बोलने, उसे प्रचारित-प्रसारित करने के बावजूद वह झूठ ही रहता है। सच यह कि नेहरू कश्मीरी पंडित, गौर सारस्वत ब्राह्मण थे। आज भी कश्मीर के कौल ब्राह्मणों की बड़ी तादाद अपने नाम के आगे नेहरू लिखतें हैं। नहर के किनारे घर होने के नाते इन लोगों को कौल नेहरू कहा जाने लगा था जो कालांतर में नेहरू बन गया। जवाहरलाल के पिता मोतीलाल नेहरू थे। उनके दादा गंगाधर नेहरू थे जिनकी बाबत मिथ्या प्रचार किया गया कि उनका असली नाम गयासउद्दीन था। सच यह कि गंगाधर नेहरू के परपिता तक का इतिहास उपलब्ध है जिनका नाम राज कौल था जो संस्कृत और फारसी के बड़े विद्वान थे। बहरहाल इंटरनेट से लेकर कई ‘प्रदूषित पुस्तकों’ तक में नेहरू के साथ-साथ फिरोज गांधी की बाबत ऐसा लिखा मिलता है जिनका सच से कोई सरोकार नहीं।

मुझे निजी तौर पर पकंज भटनागर के इस कट्टर हिंदुवादी अवतार पर बेहद अफसोस तो होता ही है, मैं भयभीत हो जाता हूं, सिहर उठता हूं, यह सोच-सोच कर कि कैसे धर्म के नाम पर हम अमानुष होते जा रहे हैं। 

सच कहूं तो मुझे अपने हिंदू होने पर इस बिना पर गर्व होता था कि हम बेहद खुले विचारों वाले हैं, कि हमारे धर्म में असहिष्णुता का कोई स्थान नहीं, कि हमारे धर्म की बुनियाद कई हजार बरस पुरानी है इसलिए वह अपने भीतर हरेक धर्म को समाहित करने की ताकत रखती है, कि मुस्लिम धर्म असहिष्णु है, कि मुस्लिम समाज में पर्दादारी, अशिक्षा का बोलबाला और धार्मिक कट्टरता होती है, जो हमारे धर्म में नहीं है। बहुत बाद में समझ आया कि अपने यहां ये सब कुछ पूरी शिद्दत्त से समाया हुआ है। अस्पृश्यता हो, नारी को पूजने के नाम पर छला जाना हो, जातिवाद हो, सबरीमाला में ‘देवी’ के प्रवेश का मामला हो या फिर अन्य किसी भी धर्म में व्याप्त जाहिलपना, सब अपने यहां भी बड़ी तादाद में मौजूद है। फिर भी यह भ्रम बना रहा, लंबे अर्से तक, कि हम गंगा- जमुनी संस्कृति वाला देश हैं तो केवल हिन्दुत्व के कारण जो उस पवित्र पावन मां गंगा के समान है जिसमें सब कुछ सहेजने- संवारने की शक्ति है। अब यह मुगालता भी दूर हो गया है। पिछले तीन दशक के दौरान देश में सबसे बड़ा बदलाव यही आया है। भले ही भौगोलिक विभाजन नहीं हुआ हो सामाजिक विद्वेष ने हिंदू- मुस्लिम के मध्य विभाजन रेखा खींच दी है।

आज जब देश ज्वलंत समस्याओं से जूझ रहा है तब 

जिन मुद्दां पर बहस होनी चाहिए उन पर बात तक नहीं हो रही। कथित तौर पर देश का पहरुवा, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया से लेकर आमजन तक बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, बढ़ती अराजकता, बढ़ती असहिष्णुता, घटती आर्थिकी, घटती नैतिकता के बजाए चर्चा कर रहा है राम मंदिर निर्माण की, हाउडी मोदी की, पाकिस्तान की, हिंदू राष्ट्र की।


‘भद्रलोक’ का मानुष जब नागरिकता संशोधन कानून पर हो रहे प्रदर्शनों को धर्म के आयने से परखने लगता है तब संकट गहरा जाता है

हैदराबाद की जांबाज पुलिस एक बलात्कार और हत्या के कथित तौर पर आरोपित चार नवयुवकों को ‘इन्काउंटर में ढेर कर देती है तो उसकी जयकारे में शामिल वे नाम भी हो जाते हैं जिनसे समाज उम्मीद करता है कि वे समग्र दृष्टि रखते हैं। न्याय व्यवस्था से आजिज आ चुके आम आदमी की ऐसी त्वरित प्रक्रिया तो समझ में आती है, लेकिन संवेदनशील समझे जाना वाला ‘भद्रलोक’ का मानुष जब नागरिकता संशोधन कानून पर हो रहे प्रदर्शनों को धर्म के आयने से परखने लगता है तब संकट गहरा जाता है। स्थापित, संविधान सम्मत जांच अथवा न्याय प्रक्रिया को धता बताने वालों को जनता जनार्दन से लेकर भद्रलोक तक हीरो बनाने लगें तब समझ लेना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से जनमानस की आस्था डगमगाने लगी है। संकट तब ज्यादा गहराता नजर आता है जब समाज को जाति अथवा धर्म के आधार पर बांटने की साजिश सफल होती नजर आने लगती है। हमारे मुल्क में इन दिनों यही सब हो रहा है। राष्ट्रवाद के नाम पर बहुत कुछ ऐसा चल रहा है जो भले ही बहुसंख्यक आबादी को अभी समझ नहीं आ रहा, वह भारी मुगालते में जी रही हो कि वर्तमान निजाम ने भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बना डाला है, हकीकत इससे ठीक उलट है। हम नैतिक, मानवीय, सामरिक और आर्थिक दृष्टि से लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। फिर भी यदि हमारी समझ पर ताला लगा हो तो जाहिर है बहुत सोची समझी रणनीति के तहत ऐसे ज्वलंत मुद्दों से जनता जनार्दन का ध्यान भटकाया जा रहा है। चारण-भाट बन चुके पत्रकार, दब्बु, रीड़विहीन नौकरशाही और भयभीत न्यायपालिका आज के दौर का कटु सत्य है। शर्म आती है कि अब हमारे यहां फैज अहमद फैज जैसे महान शायरों की नज्म को भी हिन्दू-मुस्लिम के फेर में डाल दिया गया है। नेहरू के राष्ट्र निर्माण में योगदान पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता, चर्चा का मुद्दा उनके मुस्लिम होने, परस्त्रीगामी होने का रहता है। अरे मूर्खों कुछ तो शर्म-हया रखो, इतने भी भक्त न बनो कि देश के निर्माण, देश की आजादी में अहम भूमिका वाले नेहरू को कोसने लगो। अपना योगदान जरा परखो। नेहरू ने साहसी निर्णय लिये, एक मजबूत भारत की नींव रखी। शिक्षा, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष, विज्ञान, जमीन बंदोबस्त, रियासतों का एककीकरण, अन्न में आत्मनिर्भरता, जम्मू- कश्मीर का भारत में विलय आदि ऐसे कदम उठाए कि आज हम एक मजबूत लोकतंत्र बन पाए हैं। निश्चित ही उनसे कई बड़ी भूलें भी हुईं, कई निर्णय प्रतिगामी भी रहे, लेकिन इससे उनके राष्ट्र निर्माण में योगदान को कमतर नहीं किया जा सकता। बहरहाल मुद्दा नेहरू को गाली देने से कहीं ज्यादा गंभीर इस असहिष्णु मानसिकता के विस्तार पाने का है जो मेरे संवेदनशील, संस्कारी, ईमानदार और मानवीय सरोकारों वाले मित्र को पूरी तरह बदल पाने में सक्षम नजर आ रहा है। डरता हूं कि आज धर्म के नाम पर रंगों का बंटवारा तक हो चुका है कल सब्जियों का बंटवारा भी हो न जाए। बेचारा शाकाहारी मेरा दोस्त हरी सब्जियों से वंचित हो केवल टमाटर, पपीता आदि तक सीमित न हो जाए। जागिए, समझिए इस धर्म रूपी अफीम के नशे में चूर हम कितना बदल गए, कितने अमानुष हो चुके हैं। अभी भी वक्त है, कल कहीं देर न हो जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००







टिप्पणी पोस्ट करें

1 टिप्पणियां