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प्रतियोगिता का दबाव और कहानी — तो परियां कहां रहेंगी — आकांक्षा पारे काशिव


प्रतियोगिता का दबाव और कहानी — तो परियां कहां रहेंगी — आकांक्षा पारे काशिव

प्रतियोगिता का दबाव और कहानी

तो परियां कहां रहेंगी

— आकांक्षा पारे काशिव



100% पढ़ी जाने वाली और 101% तसल्ली बख्श कथा है आकांक्षा पारे काशिव की 'तो परियां कहां रहेंगी'। ज़िन्दगी की वह जंग जो एक सन्तान प्रतियोगिता का दबाव झेलते हुए अपने मातापिता की चाहत पूरी करने के लिये अपनी इच्छाओं वाली ज़िंदगी से लड़कर उसे हराकर और खुद हारकर जितनी पड़ती है, को देखकर आकांक्षा लिखती हैं 'जब वह जीवाश्म बनेगी तो दिल भी जीवाश्म बनेगा और जीवाश्म की कोई भावनाएं नहीं होतीं। जीवाश्म को किसी कसौटी पर खरा भी नहीं उतरना पड़ता।' अच्छा लगता है कि  उनके यहाँ कथाकर न सिर्फ  अपने बाल और युवा पाठक की गहरी पीड़ा समझता है बल्कि साथ ही अपने किंचित वरिष्ठ पाठक को देव और दानव की लड़ाई में परी को भुला न देने की समझ और आवश्यकता भी बतलाता है। मेरे 101% को गिनती भर जान-मान रहे हों तो इस पर नज़र भरिए :


"लेकिन एक होशमंद लड़की की तरह वह मुस्कराई, कोचिंग पहुंचने का टाइम और पता पूछा और भीतर चली गई ताकि गरम फुलके उतार सके। एक चौकोर मेज पर जिसके बीचों बीच उसकी बहन का बनाया हुआ एक अनगढ़ सा फूलदान रखा था, जिसमें रखे प्लास्टिक के फूल मैले होकर अपना रंग खो चुके थे पूरा परिवार बैठ कर खाना खा रहा था। बहन ने आंखों से इशारा किया। श्वेता ने नजरें झुका लीं। पिता अपने स्मार्ट फोन पर ऊंगलियां चलाते खाना खा रहे थे। टेबल के किसी कोने पर कोई संभावना नहीं थी।"

भरत एस तिवारी
संपादक शब्दांकन

तो परियां कहां रहेंगी...

मई का महीना सितंबर में उतर आया था। बस स्टैंड पर दो मिनट खड़े होना भी मुश्किल था। दोपहर के डेढ़ बज रहे थे और बस का नामोनिशान नहीं था। ठंडे कमरे से निकल कर गर्म वातावरण में खड़ा होने से ज्यादा मुश्किल उसे वह पल लग रहा था जिसका सामना करना अभी बाकी था। अभी नहीं तो अब से पांच-दस मिनट बाद बस आ ही जाएगी। लेकिन बस जहां छोड़ेगी वहां जाने से बेहतर है वो तमाम उम्र इसी बस स्टैंड पर बिता दे। उसे लगा बस ये दुनिया का अंत हो और आने वाला कल न आए। वह इसी धूप में तप कर चट्टान बन जाए और हजारों-लाखों साल बाद जब कोई नई सभ्यता उसे खोजे तो उसके कंकाल पर बहस करें कि उसके अंत का कारण क्या था। उसने सोचा पुरातत्ववेत्ता उसके कंकाल को देख कर मौत का कारण पता लगाने के लिए मौसम और बीमारियों के आसपास कयास लगाएंगे और किसी को उसके दिल का हाल पता नहीं चलेगा। जब वह जीवाश्म बनेगी तो दिल भी जीवाश्म बनेगा और जीवाश्म की कोई भावनाएं नहीं होतीं। जीवाश्म को किसी कसौटी पर खरा भी नहीं उतरना पड़ता। उसने थोड़ी देर पहले पढ़ाई गई बातें मन ही मन फिर दोहराईं। इस दोहराने में वह दो जगह अटकी। उसने खुद को कोसा। क्या यार दो महीने से ये छोटी बातें भी याद नहीं रख पा रही है। वह फिर असमंजस में पड़ गई। पब्लिक एड या इतिहास, यूपीएससी या बैंक। उसने अपने कंधे का बैग दाएं से बाएं कर लिया। उसे महसूस हुआ कि यदि भार की जगह बदल दी जाए तो भी काफी राहत महसूस होती है। उसने अपनी संभावनाओं को टटोला और एसी बस में चढ़ गई। शरीर से ज्यादा गरम होते दिमाग को राहत की जरूरत थी। एसी के इस नए वातावरण में उसने सोचा कि यदि बस भी जीवाश्म बन जाए तो क्या यह पता लगाया जा सकेगा कि बस कहीं जा रही थी या कहीं से आ रही थी! हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था क्योंकि पुरातत्ववेत्ता को आने या जाने से नहीं उस दौर के जन-जीवन से फर्क पड़ता है। बस झटके से रुकी तो उसे दुख हुआ। स्टैंड आ गया था। यानी दुनिया खत्म नहीं हुई थी और उसे अनचाही दुनिया में जाए बिना छुटकारा मिलने वाला नहीं था। बस से उतरने से पहले उसने पढ़ा, ‘यात्राएं जीवन का सार है।’




डोरबेल बजने पर जिसने दरवाजा खोला वो लड़की भी वहां नौकरी ही करती थी, पर उसकी और लड़की की नौकरी में अंतर था। दरवाजा खोलने वाली ने बहुत सहानुभूति से लड़की को देखा, जैसे कहना चाह रही हो, ‘कर लो, आज और एक कोशिश कर लो।’ इस घर में आते हुए उसका यह चौथा दिन था। उसने मुट्ठियां कसीं, गहरी सांस खींची, थोड़ा डगमगाई फिर अपनी पूरी हिम्मत बटोर कर कमरे में ऐसे दाखिल हो गई जैसे कोई कुशल सिपाही अपने कमांडर के आदेश पर रणक्षेत्र में आगे बढ़ जाता है। आज कमरा उसे इतना अनजाना नहीं लग रहा था। आज पलंग पर बहुत करीने से स्पाइडर मैन बिछा हुआ था। पूरी लंबाई में लाल रंग के कपड़े पहने स्पाइडर मैन सच में बहुत अच्छा लग रहा था। इससे पहले उसने स्पाइडर मैन को कभी इतने गौर से नहीं देखा था। नीली चुस्त पतलून पर लाल जूते, लाल मास्क पर काला चश्मा। उसे हल्के नीले बैकग्राउंड पर स्पाइडर मैन अपने पैर मोड़े कुछ इस तरह की आकृति में था कि बस अभी उड़ जाएगा। उसने कमरे में यहां-वहां झांका। कमरे का स्पाइडर मैन कहीं नजर नहीं आया। वह पलंग से कुछ दूर बिछे सोफे पर बैठ गई। इलाइची हरे रंग की टेपेस्ट्री पर इसी रंग से कुछ गहरे दो कुशन करीने से लगे थे। बीच में हल्के नारंगी रंग का कुशन था। पहले दिन वह सोफे पर बहुत सकुचाती सी बैठी थी, पर आज पीछे सरक कर आराम से बैठ गई। पढ़ने की मेज पर किताबें कॉपी करीने से रखी हुई थीं। पास में ही बड़ा सा ग्लोब था और कपड़े की अलमारी पर तरह-तरह के मैग्नेट चिपके हुए थे। वह थोड़ी देर बैठी रही। अब उसकी दिल की धड़कनें काबू में थीं। तभी लड़की को ‘क्या है, मुझे ऐसे घसीट क्यों रही हो? उनको कहो आज जाएं, आज नहीं पढ़ूंगा’ जैसी आवाज सुनाई दी। वह तन कर बैठ गई। आर या पार जैसा कुछ उसके मन में चल रहा था। एक लड़के को लगभग बाहों से घसीटते हुए एक सुंदर सी, दुबली पतली महिला ठीक उसके सामने आकर खड़ी हो गई। लड़की अदब से खड़ी हो गई। लड़का बगल में ऐसे खड़ा हो गया जैसे खलनायक के अगल-बगल गुर्गे खड़े होते हैं। ‘मैं इसकी मम्मी। मैं बाहर थी तो आपसे मिलना नहीं हो पाया। वैसे ये कैसा पढ़ रहा है?’

‘इसने अभी तक कुछ नहीं पढ़ा मुझसे। ये शायद...’ वह आगे कुछ कह पाती उससे पहले ही लड़के की मां बोल उठी, ‘आप देखिए इसे कैसे पढ़ाना है। मुझे बाहर निकलता है, आपके लौटने तक शायद न आ पाऊं। पर प्लीज आप नाश्ता कर के जाइएगा।’ लड़के की मां कमरे में अपने परफ्यूम के रूप में खुद को छोड़ कर हवा हो गई। उसने लड़के की तरफ देखा और मुस्करा दी। बदले में लड़के ने मुंह तिरछा कर लिया।

उसने बाहर से रिस कर आ रही आवाज पर कान लगा दिए।

लड़का अभी भी यूं ही खड़ा था बेपरवाह। दो लोग अपना-अपना पक्ष रख रहे थे। पुरुष की आवाज चाहती थी कि ‘ट्यूटर’ के रहने तक घर पर रहना चाहिए। जबकि महिला की आवाज को उसने कहते सुना कि ‘उस पर जितना भी वक्त लगाया जाए वह अंततः बर्बाद ही होगा।’ उसने कानों को वहां से हटा कर आंखों को लड़के पर जमा दिया। लड़का खड़ा था जैसे सिर्फ उसके खड़े रह जाने भर से घंटे दो घंटे यूं ही गुजर जाएंगे।

उसने लड़के की तरफ ऐसे देखा जैसे, कोई भक्त याचना के लिए ईश्वर को देखता है। कमरे की खूबसूरत सजावट से भी ज्यादा सजी हुई भाषा के साथ उसने कहा, ‘चलो पढ़ें?’

लड़के ने कुशल खिलाड़ी की तरह फिर पांसा फेंका, ‘कल पहले पापा से बात कर लेना।’ वो जानती थी कि यह नया पैंतरा है, फिर भी हंस कर बोली, ‘पापा से कल बात कर लेंगे बाबू, आज तो पढ़ लो।’ लड़का चिढ़ गया। उसने अपने हर शब्द को बदतमीजी में डुबो कर कहा, ‘मेरा नाम बाबू नहीं अभिनव है।’ उसके कहने के ढंग पर भी वह नहीं झल्लाई। लेकिन अगला वाक्य कहने से पहले उसने गिलास से कवर हटा कर दो घूंट पानी पिया, जैसे थोड़ी देर पहले हुए अपमान को पानी के सहारे अंदर घोंट जाना चाहती हो। फिर मुस्कराकर बोली, ‘ओके अभिनव। तो ये बताओ अभी क्या करने का इरादा है?’ ‘मेरे सिर में दर्द है।’ लड़के ने सपाट लहजे में कहा। उसने लड़के का हाथ पकड़ा और बोल पड़ी, ‘सिर दबा दूं?’

लड़के को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि उसे अपने रास्ते से यूं लौटना पड़ेगा। वह तो तय करके बैठा था कि आज इस ‘मिस’ जो भी इसका नाम है भगा कर ही दम लेगा। लेकिन ये है कि सिर दबाने की बात कर रही है। ओढ़ी हुई विनम्रता जैसे पानी में नमक की तरह घुल कर खत्म हो जाती है, बदतमीजी का भी यही हाल होता है। तय की गई बदतमीजी भी बहुत देर नहीं चलती। लड़के ने फिर भी कोशिश नहीं छोड़ी। उसने कमरे के बाहर देखा। शीशे के दरवाजे के पार तरह-तरह के कैक्टस रखे थे। उसने एक कैक्टस का पौधा लिया, उस पर अपने शब्द रखे और लड़की को थमा दिया। लड़की को ‘आप अपने काम से काम रखो’ चुभ गया। जबकि वो जानती थी कि शब्द कैक्टस पर था, वरना इतना चुभने वाला भी नहीं है। उसने बरामदे से दिख रहे वनचंपा के कुछ फूल पर अपने शब्द रख कर लड़के की हथेली पर रख दिए। लड़का कैक्टस के बदले फूलों के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। उसने लड़की के प्रश्न ‘तुमको स्पाइडर मैन बहुत पसंद है’ के लिए हरसिंगार के छोटे से फूल जितना ‘हां’ कहा और पसंग पर बैठ कर पैर हिलाने लगा। एक कुशल शिकारी की तरह लड़की ने मौका लपक लिया। जब फूल के बदले फूल आने लगें तो समझ लेना चाहिए कि यहां बगिया बनाना उतना भी मुश्किल नहीं। लड़की आगे बढ़ी और कमरे का पूरा परदा खोल दिया। कमरे में अचानक से रोशनी भर गई। कांच के बड़े दरवाजे के पीछे कैक्टस के तो सिर्फ चार गमले थे। बाकी गमलों में तरह-तरह के फूल थे। बाहर गर्मी थी फिर भी फूल मुस्करा रहे थे। उसने एक बैगनी रंग के छोटे से फूल को पसंद किया और पूछा, तुम्हें पता है, स्पाइडर मैन कौन बनाता है? बदले में लड़के ने सिर्फ पलकें झपका कर सिर्फ यहां वहां देखा। सारे फूल अंदर आ चुके थे। बस बोगनवेलिया बच गया था, जो एक लकड़ी के मंडप को घेरे हुआ था। उसकी कुछ डालियां लड़के ने उठाई और बहुत ही मुलायम आवाज में ‘नहीं’ कह दिया।




चलो तुम्हारे टैब पर गूगल करके देखते हैं। लड़की ने उत्साह से कहा। ‘तुम तो ट्यूटर हो, तुम्हें भी नहीं पता क्या?’ लड़के ने ऐसा कह कर एक बार में ही सारे फूल बुहार कर एक तरफ समेट दिए। लड़की ने कुछ छितरा गई पंखुड़ियों को बीना और एकदम सपाट आवाज में कहा, ‘स्टेन ली।’ लड़का चमत्कृत रह गया। बिना गूगल के इतनी जल्दी उत्तर। लड़के ने फिर चुनौती का पत्थर फेंका, ‘और बैट मैन?’

‘दो लोग मिल कर बनाते हैं। बॉब केन और बिल फिंगर।’

‘अच्छा बताओ एस्ट्रिक्स के दोस्त का क्या नाम है?’

‘ओबेलिक्स।’ लड़की ने शरारती मुस्कान के साथ देखा ‘और मुझे ये भी पता है कि 1959 में पहली बार एस्ट्रिक्स बनाया गया था। रोमन एंपायर के वक्त की कहानी होती है, गॉल गांव की। फ्रेंच कैरेक्टर है। अल्बर्ट उडरेजो और रेन गॉसिनी इसके क्रिएटर हैं।’ लड़के की आंखें फैल गईं। पलंग पर बैठ कर पैर हिलाता लड़का उचक कर खड़ा हो गया। और सिर्फ इतना ही कह सका, ‘तुम्हारे दिमाग में गूगल है क्या?’ लड़की हंसी और लड़के का हाथ पकड़ कर टेबल तक खींच लाई। ‘तुम्हें हीरो कौन पसंद है?’ ‘तुमको पता तो है, स्पाइडर मैन।’

‘ये तो कार्टून कैरेक्टर हैं। मेरा मतलब हॉलीवुड-बॉलीवुड में कौन पसंद है?’

‘वरुण धवन।’ लड़का चहका।

‘पर तुम्हारे कमरे में तो वरुण धवन का एक भी पोस्टर नहीं है।’

‘पापा कहते हैं, फिल्मी लोगों के पोस्टर लगाना सब स्टैंडर्ड है। पर मैं एक बात बताऊं...’ लड़के ने निगाहों में तौला। लड़की फौरन समझ गई। उसने नजरों से ही कहा, ‘किसी को नहीं बताऊंगी, स्पाइडर मैन की कसम।’

लड़का दौड़ कर गया और लकड़ी की अलमारी का पल्ला खोल दिया। छितरे हुए बाल, मंगोलियन चेहरे वाला एक लड़का टाइट लैदर पतलून में बस उछलने को तैयार था। लड़की ने खुशी से ताली बजाते हुए कहा, ‘ब्रूस ली।’ लड़का हैरान रह गया। ‘तुम इसको भी पहचानती हो!’ लड़की ने जवाब में लड़के के कंघी किए बालों को बिगाड़ दिया। लड़का हंसा और कमरे का माहौल वहां रखे बहुत सारे सॉफ्ट टॉयज जैसा हो गया। पढ़ाई की टेबल पर आधा घंटा बिताने के बाद लड़की को समझ आ गया लड़का जिद्दी है, ढपोरशंख नहीं।

होमवर्क पूरा हो चुका तो उसने धीरे से फुसफुसा कर कहा, ‘कल वरुण धवन का पोस्टर ले आऊं? पापा को मैं मना लूंगी।’

‘वो नहीं मानेंगे’ लड़के ने मुंह बिदका लिया।

‘मैं मना लूंगी। प्रॉमिस’

लड़के ने सिर्फ इतना ही कहा, ‘लेट सी’

...............

बाहर निकलकर उसने पीछे मुड़ कर एकबार फिर घर की तरफ देखा। महलनुमा सफेद घर अपनी पूरी शानो-शौकत के साथ खड़ा था। बाहर आकर उसे लगा जैसे पिछले पूरे साल में उसने अपनी पूरी जिंदगी जी ली है। एक दिन वह भी था जब वह पहले दिन इस घर से रो कर निकली थी। कितना अपमानजनक दिन था वह। उसे आज भी याद है जब बस स्टैंड तक जाने के लिए उसने ऑटो पकड़ा था तो रास्ते भर रोती हुई गई थी। आज जब निकली है तो कितनी खुश। इतने बड़े उद्योगपति के बेटे को नवीं पास करा देने का सुख आज उसकी झोली में है। वह पहले दिन से इस ट्यूशन को लेना नहीं चाहती थी, मगर यहां इतनी फीस थी जितनी चार बच्चों को पढ़ा कर भी नहीं मिलती। वह यह सब करना ही नहीं चाहती पर क्या करें, पिता की महत्वाकांक्षाओं का बोझ जो न करा दे कम है। साल भर पहले जब वह पहले दिन बाहर निकली थी तो उसका माथा दर्द से फट रहा था। वह इस घर में दोबारा आना ही नहीं चाहती थी लेकिन उसके पापा चाहते थे कि वह कॉम्पिटिशन की तैयारी करे। और हर तैयारी की एक कीमत थी, किसी तैयारी की बीस हजार किसी की तीस से ऊपर। ट्यूशन इसी तैयारी का टेका थी। 

लड़का नवीं पास हो गया था। लड़की को लगा जैसे वह किसी शिकंजे से आजाद है। लेकिन आजादी कोई चूरण की पुड़िया नहीं जो हर किसी के हाथ लग जाए। और लड़की शायद यह भी नहीं जानती थी कि खुशनुमा दिन की शामें अकसर बोझिल हुआ करती हैं। दिन भर की खुशी को पीठ पर लादे घूमना आसान नहीं। वह गहरी सांस खींचती हुई हल्का सा मुस्कराती जब घर में घुसी तो ‘सक्सेस फॉर श्योर’ उसके इंतजार में थी। एक लड़का पिता को कुछ समझा रहा था। पिता लड़की को देख कर चहके। घर की शाम उस लड़के के ब्रोशर से रोशन थी। यह उसका घर था लेकिन इस वक्त इस जगह से अनजानी उसे और कोई जगह नहीं लग रही थी। ब्रोशर पर नजर डालते ही वह समझ गई कि अब उसे मुस्करा कर बैठना है, समझने का पूरा प्रयास करना है, न समझने की कोई गुंजाइश वहां नहीं है क्योंकि वो नासमझ नहीं है। लड़की के पिता कुछ कहते उससे पहले ही मध्यम कद के लड़के ने, ‘हाय पराग’ कह कर हाथ आगे बढ़ा दिया।

दो घंटे बाद तय हुआ कि वह ट्यूशन पढ़ाने के बाद सीधा सक्सेस फॉर श्योर जाएगी। सोशियोलॉजी के वहां ‘बेस्टो में बेस्ट’ टीचर थे। ‘सक्सेस फॉर श्योर मेट्रो सिटिज में ‘कई दर्जनों’ आईएएस, आईपीएस, आईएफएस देने के बाद इस शहर में आई थी। इनका सक्सेस रेट गजब था। ऐसा हो ही नहीं सकता था कि कोई यहां आए और यूपीएससी ‘क्लियर’ न कर पाए। और ‘मिस श्वेता के तो चांस बहुत ब्राइट हैं क्योंकि दो बार प्री और एक बार मेंस निकालना आसान नहीं है।’ ग्रे टीशर्ट और आइस ब्लू जींस वाले पराग के इस कथन पर पिता रीझ गए। ‘अगर लक साथ देता तो इंटरव्यू भी निकल ही जाता।’ पिता की उदासी श्वेता नाम की लड़की को उस कमरे में ले गई जहां पहली बार क्रीम रंग की साड़ी पहने वह बैठी थी और इतने सवालों के जवाब देने के बाद भी नाकाम रही थी।




श्वेता का मन किया वह सोफे की टेक लेकर पैर सेंटर टेबल पर फैलाए और आंखें बंद किए हुए ऐलान कर दे, बस पापा अब और नहीं। प्लीज। वह जोर से कहे, मिस्टर पराग अपना तामझाम समेटो और अपनी लिस्ट से दूसरा नाम देख कर प्लीज कोई और दरवाजा खटखटाओ। वह चाहती थी कि वह एक आवाज लगाए और अपने लिए एक कड़क चाय की मांग करे और मां से कहे आज वह फ्राइड राइस और मंचूरियन ऑर्डर करेगी। लेकिन एक होशमंद लड़की की तरह वह मुस्कराई, कोचिंग पहुंचने का टाइम और पता पूछा और भीतर चली गई ताकि गरम फुलके उतार सके। एक चौकोर मेज पर जिसके बीचों बीच उसकी बहन का बनाया हुआ एक अनगढ़ सा फूलदान रखा था, जिसमें रखे प्लास्टिक के फूल मैले होकर अपना रंग खो चुके थे पूरा परिवार बैठ कर खाना खा रहा था। बहन ने आंखों से इशारा किया। श्वेता ने नजरें झुका लीं। पिता अपने स्मार्ट फोन पर ऊंगलियां चलाते खाना खा रहे थे। टेबल के किसी कोने पर कोई संभावना नहीं थी। सक्सेस फॉर श्योर और उसके बीच बस एक रात का फासला था। जो तय होना था इसी रात तय होना था। इसी रात उसे कह देना था कि वह कल से न ट्यूशन पढ़ाने जाएगी न किसी यूपीएससी की कोचिंग क्लास। उसने मन की नोटबुक से इनकार का एक पन्ना फाड़ा, उस पर अपनी इच्छा की स्याही से जैसे ही पहला अक्षर लिखा, पापा...बस तभी लगा अभिनव जोर से चिल्ला रहा है, पापा...। वह सहम गई। पापा की पुकार ने उसे फिर आलीशान कोठी में पहुंचा दिया। जब वह कमरे में  गई थी तो झुका हुआ अभिनव जोर से पापा...पापा चिल्ला रहा था। पिता पर इसका कोई असर नहीं था। उसकी पीठ पर सड़...सड़ की आवाज से बेंत पड़ रही थी। ‘नाइंथ का रिजल्ट तो अच्छा आया है, मिस्टर तनेजा’ उसने डरते हुए कहा या उन्हें चेताया उसे खुद याद नहीं। मिस्टर तनेजा की आवाज इस कदर नाटकीय हो गई जैसे वह किसी मंच पर खड़े हो कर बोल रहे हों। उन्होंने इस अदा से सिर उठाया जैसे बस अभी परदा उठा हो पहला सीन उन्हीं का हो। लगभग चढ़ी आंखों के साथ उन्होंने कहा, ‘इतने पैसे खर्च करता हूं इसके लिए और ये माली के लड़के के साथ कंचे खेलता है।’ कल आए रिजल्ट पर कंचों ने पानी फेर दिया। वह ज्यादा देर यहां रुकना नहीं चाहती थी। देर तक रुकने का मतलब था उस माहौल, उस बच्चे से फिर सहानुभूति हो जाना। उसने जल्दी से बस इतना ही कहा, कल से ट्यूशन पढ़ाने नहीं आ पाएगी। बदले में उसने सुना, ‘मैं दो गुनी फीस दूंगा। दसवीं तो आप ही पास करा पाएंगी। पैसे की चिंता मत कीजिए। और...और...’ उनकी आवाज किसी कुशल बनिये की तरह निकली, ‘मैं आपके कोचिंग की फीस...पूरी फीस भर देता हूं।’ ‘आपको स्कूटी खरीद देता हूं, आने जाने में समय बचेगा। आप मेरे लिए वेल्यूबल टीचर है, श्वेता जी।’ यह उनका मास्टर स्ट्रोक था। वह बारिश में कच्चे मकान सी ढह गई। एक पल में सब बदल गया। उसे पता भी नहीं था कि शाम की झोली में भी ऐसे ही ‘सौदेबाजी’ है। पराग ने कहा था, ‘सर, मैंने लोकल कोचिंग से डेटाबेस लिया था। मिस श्वेता हमारी वेल्यूबल कस्टमर हैं। मेंस क्लियर करना बड़ी बात है सर। हम श्वेता जी की फीस में 25 परसेंट डिस्काउंट दे देंगे सर।’ सुबह की वेल्यूबल टीचर शाम तक वेल्यूबल कस्टमर हो गई थी। स्टूडेंट और कस्टमर के बीच झूलती जब वह फिर टेबल पर लौटी तो उसने धीरे से कहा, पापा।

‘तू चिंता मत कर गुड़िया। मैंने उस कोचिंग वाले को बोल दिया है, श्वेता बहुत मेहनती स्टूडेंट है। इस बार वह पक्का यूपीएससी क्रेक कर लेगी। मैं फीस में और डिस्काउंट ले लूंगा। तू वो तनेजा को बोल की इस बार बच्चे की दसवीं है, मेहनत ज्यादा होगी इसलिए पैसे ज्यादा लगेंगे। एक ही ट्यूशन है, ज्यादा टाइम भी नहीं है और ये पैसे तेरी ही कोचिंग में लग रहे हैं बेटा। तू परेशान मत हो। इस बार तो तू डीएम होकर ही रहेगी।’

इस जवाब का कोई सवाल नहीं था। सवाल बनने से पहले ही जवाब दिया जा चुका था। पिता वाकई भावुक थे। मां ने आस्था से हाथ जोड़ लिए थे, वह वाकई अबूझ माहौल था। मां देख रही थी कि वो बिना दहेज के ब्याह दी गई है, पिता देख रहे थे कि वह लाल पट्टी पर सुनहरे अक्षर से डीएम लिखी जीप से उतरी है और रौब से दफ्तर में घुस रही है। बस एक बहन ही थी जो देख पा रही थी कि उसकी बड़ी बहन फिल्मफेयर की गुड़ियानुमा ट्रॉफी हाथ में लिए बोल रही है, ‘मैं अपने गुरुजी निंबालकर को धन्यवाद देना चाहती हूं, जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिलेगा।’ उसने नजरों से फिर उकसाया। श्वेता ने हिम्मत बांध कर कहा, ‘पापा, गुरुजी कह रहे थे कि एक स्टेट लेवल का कॉम्पिटिशन है तो...’

‘बेटा वो स्कूल के दिनों की एक्सट्रा कलिक्यूलर एक्टिविटि थी, करियर नहीं। तुमने जिद करके अपनी हॉबी को कॉलेज तक घसीटा। अब ये गाना वाना भूलो और पढ़ाई पर ध्यान दो। हम मध्यमवर्गीय लोग इस गाने-वाने में करिअर नहीं बना सकते बेटा। उनको बोल दो तुम नहीं आ सकतीं।’ फिल्मफेयर अवॉर्ड के मंच की सारी लाइटें अचानक बंद हो गईं। बेस्ट फीमेल प्लेबैक अंधेरे में अकेली खड़ी रह गई!

...........

दसवीं की छह माही परीक्षाएं खत्म हो गई थीं। अभिनव में गजब सुधार आया था। वह हर दिन पूरा सैंपल पेपर सामने सॉल्व करा कर देखती थी। अब उसे विश्वास हो गया था कि अभिनव गुड फर्स्ट डिविजन से आगे ही रहेगा। मिस्टर तनेजा नब्बे से कम के लिए तैयार नहीं थे। हालांकि उनके लिए ये भी कम थे। सोसायटी में नब्बे से कम वाले बच्चों के माता-पिता को कितनी शर्मिंदगी होती है, यह वह बता नहीं सकते थे। आईआईटी से कम उन्हें कुछ भी गवारा नहीं था। अभिनव स्कूल, ट्यूशन, फिटजी, नोट्स के बीच उलझा हुआ था। उसके टेस्ट रिजल्ट और पैरेंट-टीचर मीट में टीचर के बदलते रवैये ने मिस्टर तनेजा के उत्साह में ज्वार ला दिया था। साल के शुरुआत में जो पिता बच्चे के पास होने को भाग्य मानता था अब नब्बे प्रतिशत को भी कम मानने लगा था। उसने एक बार लड़के को यूं ही टटोला, ‘तुम्हें सब समझ आता है, फिर तुम पहले पढ़ते क्यों नहीं थे? देखो अब पापा कितने खुश हैं।’ ‘मैं आपके लिए पढ़ता हूं, पापा के लिए नहीं।’ लड़की ने माथे पर सिलवट डाल कर उसकी ओर देखा। ‘हां, आपके लिए ही पढ़ता हूं। अच्छा नहीं पढ़ूंगा तो पापा ट्यूटर बदल देंगे। पापा ममी को कह रहे थे, “लड़की मेहनती है, उसके पिता चाहते हैं लड़की किसी तरह यूपीएससी निकाल ले। लेकिन तुम तो जानती ही हो कॉम्पिटिशन की कोचिंग कितनी महंगी होती हैं। वो मेरे पास बेटी की पढ़ाई के लिए लोन लेने आए थे। मैंने कहा, अकाउंटेंट आदमी हो, दो बेटियां हैं, एक ही बेटी पर पूरा पैसा लगा दोगे तो कैसे काम चलेगा। मैं लड़की से पहले भी मिल चुका था। तो मैंने ही उन्हें ऑफर दिया कि शॉनी को पढ़ा दे और बदले में मैं उसकी आधी फीस भर दूंगा।” इस बार तो पापा ने आपकी पूरी फीस भरी है। अगर मेरा रिजल्ट अच्छा नहीं आया तो क्या पता पापा आपसे पूरे पैसे मांग ले।’

लड़की का मन हुआ कह दे, ‘तुम्हारे पिता जी समझते क्या है अपने आप को। खूब पैसे हैं तो वो किसी को भी खरीद लेंगे। मेरे पिता तुम्हारे पापा के यहां अकाउंटेंट हैं, बंधुआ मजदूर नहीं। अगर वो मेरी फीस दे रहे हैं तो मैं भी उनके लड़के को मेहनत से पढ़ा रही हूं।’ लेकिन उसने पाया कि उसके मुंह से निकला, ‘मैं यूपीएससी देना नहीं चाहती। मैं सिविल सर्विसेज में जाना ही नहीं चाहती।’

लड़के ने अवाक हो कर उसकी तरफ देखा, ‘मतलब तुम भी वो कर रही हो जो तुम नहीं करना चाहती, मेरी तरह।’ लड़का भूल गया कि वो आप से तुम आ गया है। उसने उत्सुकता से अपने पैर समेट कर कुर्सी पर रखे और किसी सीक्रेट एजेंट की तरह फुसफुसाया, तो फिर क्या करना है?

गाना गाना है। प्लेबैक सिंगिंग करना है।’ लड़की का जवाब एकदम सपाट था।

तो वही करो। लड़के की आवाज में चुनौती थी।

पर मेरे पापा ऐसा नहीं चाहते।

मेरे पापा कौन सा चाहते हैं कि मैं टेनिस प्लेयर बनूं। पर मैं तो वहीं बनूंगा। उसका आत्मविश्वास पूरे कमरे में पसर गया। ‘आप ही ने तो एक बार कहा था कि एक दिन ये सब खत्म हो जाएगा। फिर हम जीवाश्म हो जाएंगे। हम भी किसी सिंधु घाटी की सभ्यता या राखीगढ़ी की तरह फिर खोजे जाएंगे। ऐसा ही कुछ कहा था न। लेकिन उस खोजे जाने में सिर्फ हमारा डीएनए होगा, हमारी सभ्यता और संस्कृति की खोज होगी, कोई हमारी इच्छाओं को नहीं खोज पाएगा। क्योंकि इच्छाओं का कोई फॉसिल नहीं होता।’

लड़की हंस दी। उसने ऐसे ही किसी दिन लड़के को ये सब कहा था। उसने हैरानी से बस इतना ही पूछा, ‘तुम टेनिस खेलते हो?’

बदले में लड़का कपड़ों के बीच छुपा रैकेट निकाल लाया। रैकेट पकड़ते ही उसकी आंखों से निकलते चमकते सितारे यहां-वहां बिखर गए। उसने रैकेट हाथ में पकड़े हुए कहा, ‘श्वेता मिस, आपको याद है, आपने पिछले साल मुझे एक कहानी सुनाई थी कि एक लड़की प्री नर्सरी के बच्चों के स्कूल में पढ़ाती है। वो एक बार किसी प्ले की तैयारी के लिए बच्चों को दो ग्रुप में बांट देती है। एक तरफ मॉनस्टर दूसरी तरफ एंजिल। लेकिन एक बच्ची कहती है कि परी कहां खड़ी होगी। मैम कहती है, इस प्ले में परी है ही नहीं। तो बच्ची कहती है, लेकिन वो तो परी है और वही होना चाहती है। यदि प्ले में परी का रोल नहीं है तो वो प्ले में रहेगी ही नहीं। तब टीचर को लगता है कि हमें अपनी बात रखना आना चाहिए। हम जो हैं हमें वहीं रहना चाहिए। दुनिया एंजिल और मॉनस्टर को जानती ही इसलिए है क्योंकि परी अपनी जगह छोड़ देती है। किसी एक रोल को निभाने के लिए लोग परी होना छोड़ देते हैं। वो दबाव में वही हो जाते हैं जिसका विकल्प उन्हें दिया जाता है। फिर वो भीड़ में या या तो एंजिल हो जाते हैं या मॉनस्टर। हमें ऐसा नहीं होना है। हमें वही रहना है, वही करना है जो हम हैं। मैंने ठीक सुनाया न मिस।’

लड़की फुसफुसाई। लेकिन वो कहानी थी।

कहानियां जिंदगी से ही निकला करती हैं’ लड़का ऐसे हंसा जैसे वो उसका स्टूडेंट नहीं टीचर है।

तुम क्या करने की सोच रहे हो?

आप लोग नाइंटी परसेंट की बात कर रहे हैं। मैं हंड्रेड लाना चाहता हूं। शायद ले भी आऊं। नंबर कोई डॉन थोड़ी है जो नामुमकिन हो। वह हंसा। फिर मैं पापा को कहूंगा कि मैंने साबित कर दिया है कि मैं नंबर ला सकता हूं। अब मैं बेंगलोर जाना चाहता हूं। वहां एकेडमी में एडमिशन लूंगा। पूरी मेहनत करूंगा। मैथ्स नहीं लूंगा। आईआईटी नहीं जाउंगा।

वो न माने तो?

लड़का बहुत देर तक शीशे के दरवाजे के पार देखता रहा। खुली खिड़की से आती हवा से उसकी किताब के पन्ने फड़फड़ा रहे थे। उसकी आंखें सिकुड़ गई थीं। उसके अंदाज से लग रहा था कि उसकी जवाब देने में रुचि नहीं है। शाम नीचे उतरी तो बगीचे में नारंगी रंग के दो बिंदु जल उठे। वह अभी भी बाहर देख रहा था। लगा जैसे इस चुप्पी ने सालों की दूरी तय कर ली है। आखिरकार वो बोल ही पड़ा। मानना तो उनको पड़ेगा मिस। उसकी आवाज में गजब की दृढ़ता थी। मेरी परीक्षा में सिर्फ दो महीने बचे हैं। मैंने अपनी तैयारी शुरू कर दी है। परीक्षा के तुरंत बाद मैं एक कॉम्पिटिशन में हिस्सा लूंगा। पापा के क्लब में। वो ट्रॉफी मुझे जीतना है मिस। आपने ही मुझे कहा था न कि रिजल्ट का कोई सबस्टिट्यूट नहीं होता। जब रिजल्ट पापा की इच्छा से भी ज्यादा होगा तो मुश्किल नहीं होगी। मुझे बस इतना पता है कि मैं मैथ्स किसी कीमत पर नहीं पढ़ूंगा। मैं फेयरी हूं, जो किसी भी प्ले में हिस्सा लेने के लिए न एंजिल बनेगी न मॉनस्टर!

ग्याहरवीं का बच्चा अचानक बुजुर्ग हो गया था।

आप अपने पापा को कह दीजिए। जब मैं इतना छोटा हो कर कह सकता हूं तो आप क्यों नहीं कह सकतीं। कुछ नहीं होगा। एक बार कहिए तो। लड़की ने सोचा, जो मुझे करना और सोचना चाहिए वो ये कर रहा है। ये मेरे लिए शब्द तय कर रहा है, वाक्य गूंथ रहा है।

लड़के ने वाक्यों की एक सुंदर माला बनाई और लड़की के हाथ में पकड़ा दी। बस अब लड़की को आहिस्ता से यह माला अपने पापा को थमा देना था।

लड़की कमरे में तानपुरे के साथ एक बंदिश से जूझ रही थी। दो हफ्ते पहले ही उसका नया तानपुरा आया था। उसे निंबालकर गुरुजी के साथ शहर से बाहर एक प्रस्तुति के लिए जाना था। तभी लड़की की बहन दौड़ती हुई आई और थोड़ी सी घुटी आवाज में बोली, ‘टेंथ का रिजल्ट डिक्लेयर हो गया।’ लड़की ने अपना तानपुरा नीचे रखा और धड़कते दिल से अपना स्मार्टफोन उठा लिया।

सीबीएसई की वेबसाइट थी कि खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। तभी फोन की स्क्रीन पर मिस्टर तनेजा फ्लैश करने लगा। उसने बहन की ओर देखा, और पता नहीं क्या सोच कर फोन उसे पकड़ा दिया।

सफेद निकर और टीशर्ट में लड़का अलग दिख रहा था। उसने अब तक उसे स्कूल यूनीफॉर्म या लोअर टीशर्ट में ही देखा था। धूप से बचने के लिए भी लड़के ने कैप नहीं लगाई थी। वो ऐसे खेल रहा था जैसे वह बस अकेला है। कोर्ट में होने वाले शोर से भी जैसे उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। लग रहा था लड़का बस जीतने के लिए ही उतरा है। लड़की ने अपनी बीच वाली ऊंगली तर्जनी पर चढ़ा दी। जैसे-जैसे वक्त बीत रहा था, लड़की की बेचैनी मैदान तक पहुंचने लगी थी। पसीने से तर-बतर लड़का उस सैनिक की तरह जुटा हुआ था, जो अंतिम सांस तक लड़ता है। उसे न पॉइंट समझ में आते थे न लॉन टेनिस। उसका स्कोर बोर्ड मिस्टर तनेजा का चेहरा था। उसने एक बार लड़के को देखा फिर एक बार मिस्टर तनेजा को। मैच शुरू होने से पहले मिस्टर तनेजा के चेहरे पर जो उत्साह था वो गुम हो रहा था। भावहीन चेहरे के साथ वो सीधे बैठे थे। जो उनके चेहेर पर दिख रहा था वो उनके मन में नहीं था। जो मन में था वो दिख नहीं रहा था। उनकी भावनाएं इतनी सपाट भी नहीं थीं कि दिखाई न दें। अचानक सब लोग खड़े होकर ताली बजाने लगे। लड़की ने झटके से दूसरी तरफ देखा, दूसरा लड़का रैकेट लेकर उछल रहा था और उत्साह में हाथ हिला-हिला कर सबकी ओर देख रहा था। वह दौड़ कर जब तक लड़के के पीछे गई तब तक लड़के ने पसीने से भरी टी-शर्ट उतार कर बैग में रख ली थी और दूसरी टी-शर्ट पहन रहा था। उसने थोड़े सांत्वना के अंदाज में लड़के का हाथ पकड़ा। लड़का हंसा और कहा, ‘दुखी मत हो मिस। मैं यह मैच हारने के बाद भी बेंगलोर ही जाऊंगा।’ वह जोर से हंस दिया। ‘और आप?’




मैं तो जा रही हूं, निंबालकर गुरुजी के साथ। उसने थोड़ी उदासी से कहा।

अरे जो आप चाहती थीं, उस दिशा में आगे बढ़ रही हैं, फिर भी?

तुम हार गए न इसलिए।

मैच ही तो हारा हूं मिस। हौसला थोड़ी। अगर मैं सेवंटी फाइव परसेंट लाता और प्रैक्टिस करता तो मैच भी जीतता। पर मैं नाइंटी एट लाया मिस। नाइंटी एट। और बिना प्रैक्टिस के भी तीन सेट टिक गया। अब बताओ कौन जीता?’ उसने शरारत से देखा।

लड़की ने उसे गले लगा लिया। नाइंटी एट पर तो मुझे भी यकीन नहीं हुआ था सच्ची। लड़की की आंखों से दो बूंद गिर गए।

‘वो यकीन करने के लिए थोड़ी था मिस। वो तो बेंगलोर जाने का टिकट था।’ दोनों हंसने लगे। चलते हुए लड़के ने पूछा, ‘आपने बिना नाइंटी के सक्सेस फॉर श्योर से पीछा कैसे छुड़ाया?’

लड़की सिर्फ मुस्कराई। फिर धीरे से बोली, ‘मैंने पापा को भी वही परियों वाली कहानी सुनाई।

लड़के ने आश्चर्य से पूछा, ‘और वो समझ गए?’

ये तो एक और कहानी है। इस बार थोड़ी लंबी है। लड़की जोर से हंसी। जब तुम बेंगलोर से छुट्टियों में आओगे तो सुनाऊंगी।


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