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Hindi Story: कोई रिश्ता ना होगा तब — नीलिमा शर्मा की कहानी



कोई रिश्ता ना होगा तब 

— नीलिमा शर्मा की कहानी

Hindi Story

सुमन ने बहुत कोशिश की परतु उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती सी रह गयी आखिर टेस्ट कराना ही पढ़ा और डॉक्टर ने “जय माता की” कहकर जैसे वज्रपात कर दिया राजीव और मांजी पर...अब सबके सुर बदल गये। 

नहीं !! 

नहीं !! 

ऐसा नहीं कर !!!

बदहवास सी सुमन अचानक नींद से जागी। मार्च के महीने में भी सुमन के माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा रही थी। उसका रंग सफ़ेद पड़ गया था। हाथ पैर एक दम ठन्डे थे। उसने बहुत अजीब सपना देखा था। चारो तरफ नजर दौडाई तो सिर्फ सन्नाटा था। हाथ आगे बढाकर उसने बत्ती जलाई। पीले बल्ब की रौशनी में उसने देखा सुबह के चार बजे थे। 

सुबह के सपने सच होते है। उसने अक्सर ऐसा सुना था तो क्या उसका ऐसा सपना...सच...हो जायेगा। घबराहट के मारे उसकी धड़कन बढ़ गयी। किसको कहे यह अपना सपना कोई भी नही सुनेगा। अगर किसी ने सुन भी लिया तो कोई विश्वास नही करेगा। घर के लोग तो उसे मनोरोगी करार देंगे। देर तक घुटनों में सर छिपाए बैठी सुमन शून्य अवस्था में रही। 


फिर झटके से कम्बल को परे फेंक कर उसने खिड़की खोल दी। ठंडी हवा के झोंके से जैसे अंदर एक शान्ति भरने का प्रयास किया हो। सुबह ठंडी और अँधेरी थी लेकिन पहाड़ी जगह पर सुबह कुछ जल्दी होती हैं इसलिए धुंधलका छटने लगा था। उसका घर दो गलिया मकान था। एक तरफ सड़क से लगता हुआ लेकिन पीछे की तरफ से वही पोर्शन दूसरी मंजिल कहलाती थी। खिड़की से नीचे तक दूर तलक का मंजर दिखने लगा था। गहरी खाई के साथ बलखाती पहाड़ी नदी जिसमे आजकल पानी कम था। लेकिन पत्थर अब भी मुंह बाए सर उठाकर प्रश्न कर रहे थे मानो पूछ रहे हो कब तक आखिर हमें बरसाती पानी के थपेड़े सहकर ऐसे ही खड़े रहना हैं। हमें भी रेत के कणों-सा बिखर कर समंदर में एकाकार होना हैं। 

मौसम बदल रहा हैं सर्द गर्म ना हो जाए इसलिए सुमन ने खिड़की बंद कर दी और गुसलखाने में जाकर ठन्डे पानी से चेहरे पर पानी के छपाके मारे और उस परिदृश्य से बाहर निकलने की कोशिश की, जहाँ वह सपने में...

उफ़ !! कान बंद कर लिए उसने और आँखे बंद करके झट से खोल दी, “यह सपना कभी सच ना हो”, ईश्वरको मनाते हुए मन ही मन बोली। 

अम्मा के कमरे से खटपट की आवाज़ आने लगी थी। उसने तकिये के नीचे से शाल खिंची और रसोई की तरफ चल दी। एक एक कदम मानो 100 किलो का हो गया था, अम्मा पहले ही अपने लिए चाय बना चुकी थी। 

उसको देखते ही अपने लोटे से एक कप चाय सुमन को देते हुए पूछा

“आज कैसे जल्दी जाग गयी” 

“पता नही क्यों घबराहट हो रही थी”

कहकर चाय का कप हाथ में लिए वह फिर से अपने कमरे में लौट आई और फ़ोन का नेट ऑन कर दिया। 

चाय पीते पीते उसने व्हाट्सएप्प सन्देश स्क्रोल करने शुरू किये। वही रूटीन सुवचन. सुप्रभात सन्देश. फूलो भगवानों की तस्वीर पर कुछ लिखकर इनबॉक्स आने वाले संदेशो की भरमार थी। एक अजीब सा आक्रोश, अजीब सी घुटन और विवशता उसको अपने चारो तरफ लपेटे थी। कुछ न कर पा सकने की विवशता की खीज़ भी हर तरफ पसर रही थी और अब अतीत की किरचे उसे हर तरफ से चुभने लगी और मन याद कर रहा था बीते लम्हों को। 

सरकारी प्राथमिक विद्यालय की सहायक अध्यापिका, सुमन जब स्कूल में बच्चो को हिम्मत और बहादुरी का पाठ पढ़ाया करती थी तो एक जोश भरी आवाज़ निकलती थी। कितनी चाह थी उसको कि पढ़-लिख कर डॉक्टर बने परन्तु घर के सीमित साधनों ने उसके सपनो की उड़ान को सिर्फ कल्पनाओ में ही खुश होने दिया और न चाह कर भी पिता ने उसको बीटीसी करायी कि शर्तिया सरकारी नौकरी मिलेगी और उसका भविष्य सुरक्षित रहेगा। 

देहरादून शहर से बहुत दूर सहिया के पास बहुत ऊंचाई पर स्थित अलसी ग्राम में उसको पहली पोस्टिंग मिली। पहली बार जब पापा के साथ वो गांव देखने गयी थी तो उसके हौसले पस्त हो गये थे। कभी 2 किलोमीटर भी पैदल न चलने वाली सुमन को 5 किलोमीटर दुर्गम चढ़ाई चढ़कर गाँव तक पहुंचना होता था। मैदानी इलाके की सुमन को तब इतने ऊँचे पहाड़ पर जाना ही बहुत मुश्किल लगा, परन्तु पिता के दबाव और सरकारी नौकरी की सामाजिक इज्जत की वजह से उसको जाना ही पड़ा था । 

100 गज भूमि पर तीन कमरों का स्कूल था जिसमे एक कमरा अध्यापक के रहने के लिए था दूसरा कमरा प्रधानाध्यापक का, तीसरा कक्षा। पहली कक्षा से लेकर पांचवी कक्षा तक के बच्चे उसी एक कमरे में बैठ कर पढाई करते थे। कभी कभी ज्यादा शोर होने पर अध्यापिका पांचवी के बच्चो को कमरे के बाहर खुली जगह पर बिठा देती थी। घर से लायी पुरानी बोरी या पोलीथीन पर बैठकर बच्चे पूरी रौ में आकर सस्वर पहाड़े सुनाया करते थे या कवितायेँ गया करते थे। सीढ़ीनुमा ढाल पर उतर एक पेड़ के साथ पुराना दुपट्टा टाँगकर धूप से बचने का अनथक प्रयास करती भोजन माता बिना नागा बच्चों के लिए मिड-डे मील पकाया करती थी। दिन थे कि गुजर जाते थे या गुजारने ही होते थे। कितना अकेलापन सा लगता था उसको वहाँ, पहाड़ो पर सन्नाटा कुछ अधिक ही गूंजता हैं। चिडियों की चहक प्रकृति का सुन्दर सानिध्य जहाँ सबको अपना बना लेता है वहीं अभिराम दृश्य? बरसाती झरने भी मन में जगह बना लेते हैं। जब सपने पूरे न हो और वर्तमान को सच मान कर जीने की कोशिश करने लगो तो अकेलापन भी वरदान लगने लगता है। 

अब सुमन माह में एक बार देहरादून आती थी। धीरे धीरे उसने अलसी में मन लगा लिया। स्कूल में रहकर उसने ग्राम की सब बड़ी और समवयस्क महिलाओ से मित्रता कर ली। समय पंख लगा कर उड़ने लगा। पहाड़ जितने ऊँचे होते हैं वहाँ रहने वालो की ख्वाहिशे और उम्मीदे उतनी ही छोटी। कम में ही खुश रह जाने वाले भोले से लोग कितनी जल्दी सबको अपना बना लेते हैं यह वहाँ रहने वाले ही जान सकते हैं। समय बीत रहा था साथ ही उम्र भी हर बरस नए पायदान पर पांव रख आगे बढ़ती चलती जा रही थी। 

छुट्टियों में देहरादून जाकर लम्बे समय तक रहना और 3 छोटी बहनों के साथ उनकी छोटी-छोटी इच्छाएं पूरी करना उसके अतृप्त मन को संतुष्ट करता था। छोटी बहन मानसी का सुंदर रूप देख कर पड़ोसी वर्मा जी ने अपने बेटे के लिए उसका रिश्ता मांग लिया था। इतना अच्छा रिश्ता, चाहे विजातीय ही था, उसके पिता को मंजूर था लेकिन सुमन का विवाह नहीं हुआ था। इसलिये माता-पिता ने उसके विवाह से पहले तक रुकने के लिए वर्मा जी को मना लिया। 


उसके विवाह के लिये अब उचित वर की तलाश थी। शादी ब्यूरो वाली बबली के साथ अब मीटिंग्स बढ़ने लगी थी और क्लासीफाइड में रिश्ते का विज्ञापन देकर कोई लोकल रहने वाला लड़का तलाश किया जाने लगा । किसी के द्वारा सुझाई गयी रिश्ताघर की मालकिन बबली ने राजीव का रिश्ता सुझाया और राजीव अगले ही रविवार को अपने परिवार के साथ उसको देखने आये। सांवला-सा ऊँची कद-काठी वाला राजीव उसको एक नजर में ही अपना-सा लगा था। उस पर उसकी केन्द्रीय सरकार के आधीन नौकरी घर भर के लिय सबसे बड़ा आकर्षण थी। सुमन की सरकारी स्कूल की पक्की नौकरी भी उसको पसंद किये जाने का एक कारण बन गयी। 

राजीव की माँ उसकी बलाएँ लेते नही थक रही थी। अपनी गोरी चिट्टी चाँद-सी बहू में उनको कभी लक्ष्मी नजर आ रही थी तो कभी अप्सरा। अब तो सुमन को भी आईने के सामने सवाल उठाने को विवश होना पड़ा कि क्या वह सच में इतनी सुंदर हैं? कांवली रोड के नाथ पैलेस में धूमधाम से दोनों का विवाह संपन्न हुआ। घर-परिवार के साथ अब आस-पास के लोग उसके भाग्य को सरहाने लगे। 

एक माह के मधुमास के पश्चात वो अलसी लौट आई। अब माह में एक बार न लौट कर हर शनिवार को शाम तक वो वापिस घर लौट आती और सोमवार तडके ही उठकर अलसी को प्रस्थान कर जाती थी। पति उसके बिना अकेलापन महसूस करने लगे। नयी-नयी शादी के बाद के दिन वैसे भी मन कहाँ एक-दूसरे के बिना लगता हैं। पति ने कुछ हजार रूपये की रिश्वत देकर कुछ सिफारिश लगाकर उसका ट्रांसफर सहसपुर करा लिया। अब उसका नया रूटीन शुरू हो गया। अब रोजाना सुबह बस से जाना। स्कूल ख़तम होते ही लौट आना, सब खुश थे

जिन्दगी को जैसी जीने की वज़ह मिल गयी थी। 

समय पंख लगाकर उड़ रहा था बहुत खुश थी सुमन, परन्तु समय के साथ-साथ सास का लहजा बदलने लगा कि विवाह को 15 माह हो गये। अभी तक कोई खुश खबरी ही नही, आखिर राजीव उनकी एकलौती संतान थी। 

सुमन भी अब माँ बनना चाहती थी। उसका भी मन करता था कि उसकी गोद में भी एक प्यारा-सा बच्चा हो। जब भी वह इन ख्यालो में खो जाती तो उसको अपनी बाहों में एक प्यारी-सी बिटिया ही दिखती थी। पलटन बाजार में घूमते-घूमते उसको दुकानों के बाहर सुंदर से फ्रॉक नजर आते तो उसका मन करता था सब खरीद कर घर ले आयें। लेकिन उसने कभी अपने मन के सपने किसी के सामने बयां नही किये। राजीव भी अब अक्सर बच्चो की तस्वीर देख मुस्कुरा देते। 

कई दिन से सुमन का मन भारी-सा रहने लगा था कुछ भी खाने का मन नहीं करता था। एक सहेली की सहायता से उसने सहसपुर में ही एक डिस्पेंसरी में यूरिन टेस्ट कराकर जब रिपोर्ट देखी तो उसको खुद पर भी विश्वास न हुआ। वो मम्मी बन् जाने वाली हैं एक अजीब सी अनुभूति होने लगी थी। हाथ खुद-ब-खुद पेट पर चला गया लेकिन अब भी मन विश्वास न कर रहा था कि क्या सचमुच...और अब तो मन का मौसम फिर से बसंती हो गया था जो हलके पतझड़-सा मालूम होने लगा था अब राजीव को कैसे यह खुशखबर बताई जाए। 

उसने स्कूल से लौटते हुए प्रेमनगर से एक ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदा साथ में एक चॉकलेट भी। माँ जी ने उसको गेट पर ही अपने मायके धर्मपुर जाने की सूचना दी और अगली सुबह लौट आने का कहा वहां पर राजीव की छोटी मौसी भी आई थी। आज सुमन ने दाल-भात बने होने के बावजूद फिर से मटर-पनीर की सब्जी बनायीं साथ में थोड़ी सी खीर भी। मुंह हाथ धोकर आज उसने गुलाबी पजामी सूट पहना हल्का मेकअप करके घर में संगीत लगा दिया। ग्रीटिंग कार्ड पर दो लाइन्स लिखकर उसने राजीव के कुरते पजामे पर रख दिया। शाम को छह बजे तक आने वाला राजीव आज न जाने कैसे पांच बजे ही लौट आया था। 

“ए सुम्मी! अम्मा कहाँ गयी आज”, उसने हाथ मुंह धोकर रसोई के दरवाज़े के पास पहुंचकर पूछा 

“अम्मा मामा घर गयी है, आज मौसी आई हुयी है तो उन्होंने अम्मा को भी बुला लिया। अम्मा सुबह तक लौटने का कह कर गयी है”

चाय पीकर राजीव टीवी देखने लगा। अधीर होकर सुमन ने कपडे बदलने का अनुरोध किया कि कपडे बदल कर इजी हो जाओ। आज सीडी लगाकर कोई मूवी देखेंगे। बेमन से राजीव अपने कमरे में पहुंचा तो पलंग पर उसके बचपन की सब तस्वीरें रखी थी। एक छोटा सा झबला और एक झुनझुना भी। राजीव को कुछ समझ ना आया उसने अपना हाथ बढाकर कुरता पजामा उठा लिया ग्रीटिंग कार्ड नीचे गिर गया। राजीव ने हौले से उस कार्ड को उठाया और उसको हैरानी से खोलने लगा 

आज तो जन्मदिन भी नही मेरा और ना ही शादी की सालगिरह हैं। यह कार्ड तो सुम्मी...हाँ तभी लाया करती है, कितनी बार कहा कार्ड पर पैसा बर्बाद ना किया कर। कार्ड के अंदर चोकलेट भी थी उसने चोकलेट को हाथ में लेकर कार्ड खोला और पलट कर सुम्मी को जोर से आवाज़ दी … 

सुम्म्मी सूऊऊऊऊउ मीईईईई

लेकिन सुम्मी नही थी वो तो बाहर बरामदे में भी रसोई में भी नहीं थी। कार्ड हाथ में लेकर राजीव उसको खोजने लगा और अचानक उसको सुम्मी के तेज सांसों को गुसलखाने के दरवाज़े के पीछे से आते सुना … 

रक्त कपोल लिए सुम्मी सर झुकाए मुस्कुरा रही थी...नही नही उससे ज्यादा तो शरमा रही थी 

“ए सच बता जो लिखा तुमने क्या सच हैं?”

सुम्मी की ठुड्डी को हाथ से पकड़कर राजीव ने सवाल किया 

ह्म्म्म कहकर सुमन उसकी बाँहों में समा गयी “पढो तो मैंने क्या लिखा?”

“काली रेल काली रेल तू तो काली काली हैं, राजीव आप पापा आपकी सुम्मी मां बनने वाली हैं”

उसको गोद में उठाये राजीव कमरे में ले आया और अब तो उस शाम का एक एक पल सुनहरी था।

सुमन अब घर भर की रानी बन गयी। अम्मा भी अब सब भूलकर बस उसका ख्याल रखती थी। उसके खाने पीने से लेकर स्कूल आने जाने तक का इंतजाम नए तरीके से किया गया। अब घर के बाहर से ‘सूमो' उसको लेकर जाती और घर के बाहर ही छोडती थी। 

बसंत-विहार की सड़को पर सैर करती सुमन को अपना जीवन स्वर्ग सा लगता। सास अपने आने वाले पोते के लिए ऊन लाकर मोज़े स्वेटर बुन रही थी। उसके कमरे में पति के बचपन की तस्वीरो के संग बच्चो की तस्वीर टांग दी गयी थी। एक नंगे छोटे से लड़के की तस्वीर चिपकाते हुए राजीव को देख सुमन बहुत जोर से हंस पढ़ी थी। इसके पहले राजीव कुछ कहते मांजी कमरे में आगयी थी। सब उत्साहित थे।

9 माह कैसे बीते सुमन को मालूम ना हुआ। समय आने पर उसको आस्था नर्सिंग होम ले जाया गया। लम्बी दर्द भरी प्रसव पीड़ा के बाद उसने एक कन्या को जन्म दिया और मानो बसंत अचानक सबके चेहरे से लौट गया और पतझड़ ने फिर से वहां अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। सबके बात करने के लहजे से उसे ऐसे लगा जैसे उसने कोई गुनाह कर दिया। सबके चेहरे मुरझा गये, राजीव भी थोडा चुप हो गये। 

यंत्रवत अपने काम में लगे रहते, घर आकर भी सुमन ने सबके बदले व्यवहार को महसूस किया। कोई ख़ुशी नही की गयी बिटिया का नाम उसने खुद ही रूचि रख लिया। अगर रूचि रोने भी लगती भी तो कोई जल्दी से उसको उठाने वाला भी नही था। 

समय बीत रहा था। मैटरनिटी लीव ख़तम होने वाली थी। अब बिटिया को कौन देखेगा, यह सोच कर सुमन ने 2000 रूपये में एक महिला को रूचि को सम्हालने का काम दिया। 


सरल स्वभाव की ममतामयी मोनिका, सुमन की समवयस्क थी। उसकी अपनी भी एक बेटी थी जो 5 बरस की थी और स्कूल जाती थी मोनिका के सहारे बेटी को छोड़ कर स्कूल जाती सुमन अब निश्चिन्त थी। देखते ही देखते रूचि 11 माह की हो गयी थी। उसकी आँखों में माँ को देखते ही चमक आ जाती थी। परन्तु सुमन की तबियत फिर से कुछ ठीक सी नही थी। हर वक़्त थकान भूख न लगना जी मिचलाना। सुमन को घबराहट होने लगी। अभी तो रूचि बहुत छोटी हैं क्या एक बार फिर से वह...ओह! अब क्या करे। आजकल इस बात का पता करने के लिय हॉस्पिटल जाना जरुरी नही। टीवी ने इतना जागरूक बना दिया कि एक स्ट्रिप लाओ और घर में ही पता लगा लो कि गर्भ हैं या नही। सुमन को वे 2 पल जिन्दगी के सबसे भारी पल लग रहे थे। ख़ुशी भी भीतर से तो एक अनजाना डर भी। रिजल्ट सकारात्मक देख कर उसको घबराहट होने लगी थी राजीव का न जाने क्या रिएक्शन होगा और मांजी...उनकी सूरत याद करके सुमन के हाथ-पैर ही कंपकंपाने लगे। रूचि के जन्म के बाद से उनका व्यवहार एक अजनबी सा हो गया था। 

राजीव ने जैसे उसके फिर से गर्भ धारण की खबर सुनी तो ख़ुशी से फूले न समाये। 

जैसे उन्होंने कोई किला जीता हो। एक पुरुष की जिन्दगी का सबसे बड़ा क्षण होता होगा। जब उसको पता चलता होगा कि वह पिता बनने वाला हैं। एक नए जीव का आना सुखद ही लगता हैं। मांजी ने भी ख़ुशी जाहिर की परन्तु उनके तीखे शब्दों ने राजीव के मन में एक संशय भर दिया कि “इस बारी चेक करा लेना, कही इस बार भी लड़की ही न जन दे तुम्हारी लाडली बीबी ! बिना बेटे के तो स्वर्ग भी नही मिलता। आजकल वो जमाना तो हैं नही कि बेटे के इंतज़ार में 5-5 लडकिया जन दो। अब ख्याल रखना कही अपना माँ का इतिहास न दोहरा दे यह लड़की। और तू तमाम उम्र बेटियों के ब्याह के लिए पैसा पैसा जोड़ता रहे …”

राजीव की अल्पबुद्धि लड़के लड़की का फर्क तो समझ गयी परन्तु यह नही जानपाई कि लडकियां भी जिन्दगी में उतना ही महत्त्व रखती हैं जितना एक लड़का। बिना बहन का भाई जो था राजीव उसको वो खुशियाँ आनंद नही उपलब्ध हुए होंगे जो भाइयो को बहनों से प्राप्त होते हैं। 

अब राजीव सुमन पर दबाव बनाने लगा की हमें पहले टेस्ट करना होगा। वरना कहाँ से आएगा दो-दो बेटियों की पढाई से लेकर विवाह तक का खर्चा, सुमन ने बहुत कोशिश की परतु उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती सी रह गयी आखिर टेस्ट कराना ही पढ़ा और डॉक्टर ने “जय माता की” कहकर जैसे वज्रपात कर दिया राजीव और मांजी पर...अब सबके सुर बदल गये। 

मौसम भी इतनी जल्दी जल्दी बदलता हैं आजकल। अब तो समाज की भी ओजोन लेयर नष्ट हो रही हैं। समाज की, पैसे की, अगले लोक-परलोक की दुहाई देकर उसे इस गर्भ से छुटकारा पाने के लिये मजबूर किया जा रहा था। अपनी माँ के पास जाकर उसने उनका संबल और सहारा चाहा तो माँ के आंसू उसकी मज़बूरी बयां कर गये । 5 बेटियों की माँ कैसे उसका सहारा बनती जो खुद पति के सामने एक शब्द नही बोल पाती थी। 

घर लौट कर तकिये में मुंह छिपाए रोते हुए सुमन सोचने लगी...कितनी मजबूर हो जाती हैं ना नारी, कहने को कहा जा सकता हैं कि लड़ जाती अपनी अजन्मी संतान के लिए, एक माँ अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर सकती हैं। परन्तु सच एक दम अलग होता हैं। यह समाज पितृ प्रधान हैं मायके का संबल भी न हो तो स्त्री कुछ नही कर पाती। बचपन से पिता और भाई के आधीन रहने वाली सहमी सी लड़की सब विवाह के बाद पति के घर जाती हैं तो जाने-अनजाने वे उसकी जिन्दगी पर हावी हो जाते हैं। और स्त्री उसे प्यार समझ बैठती हैं और वही प्यार जब उसकी जिन्द्दगी के हर फैसले करते हैं तो उसे घुटन होने लगती हैं। परन्तु उस घुटन से निजात पाने के लिय विद्रोह करना सारे समाज से खुद को अलग करना होता हैं। किताबों में नारी स्वतंत्रता की बाते लिखना और अपनी जिन्दगी में उनको ढालना अलग बात है। जो ऐसा कर पाती हैं उनका बचपन या तो बहुत सुखद होता हैं या वह जिनके लिये यह सब बाते करना फैशन होता हैं या फिर वे महिलायें जिनमे आग होती होती है समाज से लड़ मरने की, लोहा बना लेती हैं खुद को... बचपन से पिता की एक ऊँची आवाज़ पर डरने-सहमने वाली लड़की ससुराल में भी मान्यताओ रिवाजो और परम्परा के नाम पर चुप रह जाती हैं या दबे स्वर में किया गया उसका विरोध कोई माने नही रखता हैं। 

आखिर टूट गयी सुमन। हार गयी उसकी ममता इस समाज के बनाये रिवाज़ के सामने कि पुत्र ही गति दिलाता हैं, पार लगाता हैं इस भवसागर से। एक नारी ने ही उसके नारीत्व का अपमान कर आने वाली नारी का क़त्ल कराने की योजना बना डाली वो भी एक नारी के ही हाथो से। किसी को भी जरा भी अपराध बोध नही, सिवाय सुमन के। 

उसके जार-जार बहते आंसुओ का किसी की आत्मा पर कोई फर्क नही पड़ रहा था। कौन कहता हैं कि क़त्ल सिर्फ गरीबी की वजह से होते हैं कुछ क़त्ल ऐसे भी होते हैं जो किसी को अपने होने की खबर भी नही होने देते। 

अचानक तेज आवाज़ ने सुमन का ध्यान भंग किया और रूचि घुटनों चलती हुए उसके पैरो के पास खड़ी थी रूचि का मन भीग गया। कम से कम जो आज मेरी झोली में हैं उसको तो सम्हाल लूँ। 

चाय ठंडी हो गयी थी राजीव भी दिल्ली से लौटने वाले होंगे सोचकर उसने कमरा समेटना शुरू कर दिया। 

गुस्सा राजीव पर भी था उसको और मन ही मन मूक प्रतिशोध लेने की ठान ली थी। कल रात उसे याद आया था कि अलसी में एक बूढ़ी मांजी ने कभी बताया था कि फलां जड़ी-बूटी खाने से नारी बंजर हो जाती हैं। ईर्ष्या के चलते कई स्त्रीयां अपनी ससुराल या मायके में धोखे से गर्भवती को वह बूटी पीस कर खिला देती हैं ताकि गर्भ नष्ट हो जाए और आगे कभी संतान भी ना हो। तो बस अब वह और संतान ही नही जन्मेगी, कर ले कोई कोशिश जितनी चाहे...कम से कम अपनी उस अजन्मी बेटी की आत्मा को तो न्याय दे पायेगी जिसका आज कत्ल कराने का इरादा रखते हैं सब। 

लेकिन रात का वो भयावह सपना...कहीं सच हो गया तो ? नहीं !

राजीव के आने पर भी अनमनी सी रही। बात भी की तो हाँ-हूँ कर के ही रह गई। रात को जब राजीव ने करीब आना चाहा तो वह चीख पड़ी, 

"हाँ हाँ !
नोचो इसी तरह देह को,
तुम पुरुष आज संतान तो बेटे के रूप में चाहते हो लेकिन देह की भूख को समेटना नही जानते हो।
कल रक्तबीज की तरह हर तरफ सिर्फ पुरुष ही होंगे और गिनती की ही लडकियां...
अपने पौरुष को हाथ मे थामे
तुम सब पुरुष तब फर्क नही कर पाओगे देह में।
तब ना कोई देह बेटी की होगी ना बहन की ना माँ की,
कोई रिश्ता ना होगा तब...”

राजीव हतप्रभत था, सहम गया था सुमन का यह रूप देखकर और सुमन अपना चेहरा हाथो में छिपाए सुबकियां लेकर रो रही थी और उसके दिमाग में घूम रहा था सपना। सुबह का सपना...

सुबह का सपना...चारों और सफ़ेद बर्फ ही बर्फ है...दूर दूर तक कोई इंसान नहीं दिखता, इस बर्फीले पहाड़ की एक गुफा में आग जल रही है...आग की मध्यम रौशनी में कई छायाएँ डोल रही हैं...चारों ओर शिकार के भूनते मांस का धुआं तैर रहा है, वह भी वहीँ है उसकी बेटी भी वहीँ है उसका बेटा भी वहीँ है और राजीव भी वहीँ है…और न जाने कौन कौन पुरुष भी साथ एक्का दुक्का स्त्री भी...

आदिम ज़माने की गुफा में आदिम मानव के बीच आदिम सभ्यता की आदिम भूख थी। आदिम सभ्यता के विपरीत उसके इस भयानक सपने में सहमति नहीं जबर्दस्ती थी...

उस गुफा में तन और मन के दर्द से भरी चीत्कारें थी। आदिम सभ्यता में मानवीय रिश्ते बने नहीं थे और उसके सपने में रिश्ते ख़त्म हो चुके थे, गुफा में मौजूद पुरषों के लिए न कोई माँ थी न बहन न बेटी न कोई बेटा था न भाई न पिता। बाकी बची थी तो सिर्फ भूख-देह और पेट की भूख...

राजीव सन्न रह गया, सपना सुन कर। उसने तो यह सोचा ही नहीं कभी, कि कभी यह स्थिति भी हो सकती है। वह यह क्यों भूल गया कि प्रकृति को नष्ट करने में वह भी तो भागीदार हो सकता है। उसने सुमन को गले लगा लिया और माफ़ी मांगी कि अब उसे बेटे की चाहत नहीं है। समाज में कभी ऐसी भयावह स्थिति नहीं आएगी। लोग अब जागरुक हुए हैं, ना जाने उसके ही मन की आँखों पर पट्टी कैसे बंधी रह गई थी। अब सिसकियाँ धीरे धीरे थमने लगी थी...



नीलिमा शर्मा 
C2/133, जनकपुरी, नई दिल्ली 58
ई-मेल: neavy41@gmail.com
मोबाईल: 8510801365

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11 टिप्पणियां

  1. सार्थक रचना... भ्रूण हत्या जैसे पाप करने वालों और बेटी-बेटा में फर्क करने वाले दकियानूसी विचारधारा के खिलाफ एक उत्कृष्ट रचना।
    बधाई!

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  2. बहुत सुंदरता से बुनी कहानी।

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  3. A very good story
    All characters ring true.
    Setting n locale well constructed
    Congratulations Neelima

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  4. जागरूकता के साथ सुंदर भाषा में रची कहानी । बधाई नीलिमा जी

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  5. भ्रूण हत्या पर बहुत ही अच्छी कहानी- अकु साहू

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  6. संवेदनात्मक कहानी है। कहन का निर्वाह भी अच्छे से हुआ है।
    कहानी का अंतिम भाग अधिक प्रभावी है।बिना संवाद के कहन का निर्वाह बखूबी किया गया है और पठनीयता अंत तक बनाये रखने में लेखिका सफल रही हैं।
    अच्छी कहानी के लिए बधाई।

    सन्दीप तोमर

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  7. औलाद के रुप में बेटा चाहिये और देह भोग के लिये स्त्री...वाह...बहुत सटीक कटाक्ष....अलंकृत शब्द ...अदभुत प्रभाव छोड़ती लेखन शैली..... कसी हुई कहानी की गाँठों ने पाठक को बाँध के रख दिया...लेखिका को हार्दिक बधाई
    छाया अग्रवाल

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  8. लड़कियों के प्रति संवेदनहीन व्यक्तियों को अच्छी शिक्षा देती हुई कहानी.. सशक्त भाषा के साथ मनोभावों का सुन्दर चित्रण.. बहुत अच्छी कहानी

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  9. अच्छी कहानी, स्त्री मर्म को छूती हुई ।

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