यादनामा : न्यू यॉर्क की यादें — विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा - 36 | Vinod Bhardwaj on New York

इस आखिरी किस्त के साथ विनोद भारद्वाज जी की किताब यादनामा पूरी हो गयी है। इसका उप-नाम है, लॉकडाउन डायरी, कुछ नोट्स, कुछ यादें। जल्दी ही किताब भी सामने आयेगी।







न्यू यॉर्क की यादें 

— विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा

वर्ष 2007 में मैं पहली बार बिग एप्पल यानी न्यू यॉर्क गया था। मई का महीना था,अच्छी-खासी गर्मी थी। मैं फेब इंडिया के अपने लंबे कुर्ते और घर में इस्तेमाल होने वाली साधारण-सी हवाई चप्पल में घूमने के लिये निकला।शाम को सैफ़्रॉन आर्ट की नई गैलरी की उद्घाटन पार्टी थी। हाई फेशन के  इलाके में गैलरी खुल रही थी। उन दिनों तय्यब मेहता की चित्रकृति 7 करोड़ में बिकी थी। उसके खरीदार भी पार्टी में आने वाले थे। सूजा की बेटी शैली  भी पार्टी में शामिल होने वाली थी। भारतीय कला बाज़ार अपनी ऊँचाई पर था। बाद में कभी वह इस अनोखी और एक तरह से देखें तो हत्यारी ऊँचाई को नहीं पा सका।

मैं घूमते-घूमते थक गया था, सोचा कि कौन अब अपने कमरे में जा कर पार्टी के लायक कपड़े पहने। भला कौन देखेगा मेरी टूटी हुई हवाई चप्पल को।



लिफ्ट के पास शानदार कपड़ों में दो गोरे स्वागत के लिए खड़े थे। खैर,बेचारे कला समीक्षक की पोशाक पर कौन गौर करता होगा। पार्टी में उम्दा शराब थी और टी एस एलियट की कविता की पंक्तिओं को याद किया जा सकता था, स्त्रियां आ जा रहीं थीं, वे मिकेलन्जेलो के बारे में बतिया रही थीं।

पार्टी से बाहर आया तो पैट्रोल पंप पर एक काला आदमी बैठा था। उससे मैनें रास्ता पूछा। वह बोला, मैन, पहले मुझे ये बताओ कि ये जो तुमने पहन रखा है,वह कहाँ मिलेगा। पार्टी में भले ही कुर्ते ने कोई कमाल नहीं दिखाया पर वह काला आदमी खूब प्रभावित था।

मैनें उसे जैक्सन हाइट के बाज़ार में जा कर कुर्ते की फरमाइश करने की सलाह दी। वह बहुत खुश हुआ।

मैं तीन बार न्यू यॉर्क गया और हर बार चित्रकार विनोद दवे के घर में दोस्ताना पी जी के रूप में रहा। पहली बार वहाँ रहा तो उनकी बेटी मेलिका छोटी थी,आखिरी बार गया तो वह बड़ी हो चुकी थी,चित्रकार थी और गायक भी।


विनोद दवे एक अच्छे कलाकार हैं और वह जिस नामी वैस्टबेथ आर्टिस्ट कम्युनिटी में रहते हैं,वह अनेक कलाकर्मियों के एक कॉम्प्लेक्स में रहने की ऐतिहासिक जगह है। करीब चार सौ कलाकार यहाँ रहते हैं, उन्हें मार्केट रेट के हिसाब से बहुत ज्यादा किराया नहीं देना होता है। 1970 में वह 100 डॉलर था, आज सात सौ डॉलर से कुछ हज़ार डॉलर तक है। पर हडसन नदी के किनारे खड़ी ये इमारत ऐतिहासिक महत्व की है।अब तो ये मैनहट्टन  का पौश इलाका है। इस जगह पर कभी रॉबर्ट डी नीरो सीनियर (चित्रकार) भी रह चुके थे।

इस इमारत में कभी बेल टेलीफ़ोन लेब का काम भी होता था और बाद में मुझे पता चला कि ऐटम बम बनाने का जो लगभग कुख्यात मैनहट्टन प्रोजेक्ट था वह भी द्वितीय विश्व युद्ध के दिनों में इस इमारत का इस्तेमाल करता था।यानी तमाम संस्कृतिकर्मियों पर जाने अनजाने एक खराब इतिहास का बोझ भी है।



विनोद दवे के नवीं मंज़िल के स्टूडियो के ऊपरवाले हिस्से की खिड़की से ट्विन टॉवर के इलाके की हल्की झलक भी पायी जा सकती थी। तब तक ट्विन टॉवर गिर चुका था और जब मैं आखिरी बार न्यू यॉर्क गया, तो वहाँ एक मेमोरियल रूपी एक नई इमारत खुल चुकी थी।

न्यू यॉर्क में सबसे अधिक मुझे काले आदमी आकर्षित करते हैं। उनके बगैर न्यू यॉर्क में एक तरह की सुस्ती नज़र आती है। वे सचमुच बड़े जिंदादिल लोग हैं। एक बार मैट्रो में कुछ गोरे लड़कों के बीच एक काला लड़का अपनी अद्भुत मस्ती में नाच रहा था। उसकी बॉडी लैंग्वेज कमाल की थी।

ब्लैक फिल्म डायरेक्टर स्पाइक ली ने विएतनाम युद्घ पर अपनी नई फिल्म में इस तथ्य की ओर तीखा इशारा किया है कि ब्लैक जनसंख्या का प्रतिशत 11-12 से ज्यादा नहीं था, पर युद्ध में जाने वाले काले सैनिकों का प्रतिशत तीस से भी ज्यादा था।



न्यू यॉर्क की दूसरी खासियत मुझे वहाँ के पालतू कुत्तों और उनके मालिकों में दिखी। खास तौर पर स्त्रियाँ जब सजधज कर अपने कुत्तों के साथ निकलती हैं ।

सुना है कि कभी न्यू यॉर्क में रात को बाहर निकलना  खतरनाक था। पर एक बार मेरी फ्लाइट लेट हो गयी और मैं रात चार बजे सुनसान सड़क पर सामान घसीटते हुए और जेब में डॉलर सम्हालते हुए विनोद दवे के घर जा रहा था, दिल्ली से अधिक सुरक्षित महसूस करते हुए। सड़क के अंधेरे में आवारा कुत्ते भी नहीं भौंक रहे थे अपनी दिल्ली की तरह।

लेकिन रात तीन बजे की मैट्रो में मैनें गौर किया कि अधिकांश काम पर जानेवाले काले ही थे। न्यू यॉर्क की मैट्रो 24 घंटे चलती है।

न्यू यॉर्क हमारे समय की कला नगरी है, पेरिस उससे पहले हुआ करती थी। पेरिस में किसी शानदार इत्र की खुशबू है, एक एलिगेंस है। न्यू यॉर्क में धड़कता हुआ दिल है। मोमा यानी वहाँ के आधुनिक कला संग्रहालय में जाना एक बड़ा कला अनुभव है। गुगनहाइम म्यूजियम की तो इमारत ही अपनेआप में कला है।

मोमा में एक बार मैं अमूर्त कला के बहुत बड़े संग्रह के कई कमरों से गुजरते हुए आखिरी एक छोटे से कमरे में गया, तो भारतीय कलाकार गायतोंदे का एक कमाल का कैनवस देखा। मैं थोड़ी देर के लिए सारी अमेरिका की अमूर्त कला को भूल गया।

एक शाम मास्टर प्रिंटमेकर डाकोजी देवराज के घर डिनर पर गया, तो मैनें उन्हें उस चित्र के जादू के बारे में बताया। देवराज ने बताया गायतोंदे की विदाई के समय शमशान घाट में उनकी मित्र ममता के कहने पर कपाल क्रिया को उन्हें ही करना पड़ा था।



2007 में मैं अपने साथ भारतीय प्रिंटमेकिंग पर बनी फिल्म की डी वी डी ले कर गया था। राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय ने के बिक्रम सिंह से ये फिल्म बनवायी थी और मैं उस फिल्म का सब्जेक्ट एक्सपर्ट था। जरीना हाशमी का निधन हाल में हुआ है। वह अद्वितीय प्रिंटमेकर थीं। उन्होने अपने घर पर डिनर प्रोग्राम में कुछ जाने माने प्रिंटमेकर—देवराज,विजय कुमार,कैथी कुमार,तारा सभरवाल आदि बुला कर ये फिल्म दिखाई। विनोद दवे भी वहाँ थे। मेरे लिए ये शाम अविस्मरणीय है।

न्यू यॉर्क की यादें आसानी से खत्म नहीं हो सकती हैं। मेरे लिए लेकिन त्रिबेका फिल्म फ़ैस्टिवल को भुलाना आसान नहीं है। मैं उसमें एक मान्यता प्राप्त विदेशी पत्रकार के रूप में शामिल था। दिन भर फिल्में देखते थे, शाम को अनोखी रंगीन पार्टियों में मुफ्त प्रवेश के अनगिनत मौके थे। एक पार्टी में घुसा, तो फिल्म सेट जैसा माहौल था, अंधेरे में धुआँ धुआँ सा था। एक पार्टी एल जी बी टी समुदाय की थी जो रात 11 बजे शुरू होनी थी।माले मुफ्त, दिले बेरहम। दुनिया भर के प्रैस वाले एक जैसे हैं।

एक दिन एक फिल्म देख कर निकला, तो एक स्मार्ट सी लड़की ने कुछ कूपन दिए और एक होटल का कार्ड। वह होटल अत्याधुनिक था,भविष का एक जादुई और महँगा होटल। बार में मेरे कूपन सहर्ष स्वीकार कर लिए गए। काउंटर पर बैठा मैं एक स्वप्न लोक में था।

हॉलीवुड की किसी चमकीली दुनिया में।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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