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हिन्दी! मुनि जिनविजय को जानना ज़रूरी है | माधव हाड़ा संपादित ‘एक भव अनेक नाम’ की भूमिका

 

कन्हैयालाल मुंशी ने 1938 में भारतीय विद्याभवन की योजना को मूर्त रूप देने का का दायित्व मुनि जिनविजय को सौंपा। वे इसके पहले मानद निदेशक बनाए गए। विद्याभवन में कई शोध परियोजनाएँ मुनि जिनविजय की पहल पर शुरू हुईं। 


मुनि जिनविजय पर अपनी किताब ‘एक भव अनेक नाम' में आलोचक माधव हाड़ा यह लिखते हुए कि ‘अपनी जन्मभूमि राजस्थान को लेकर मुनि जिनविजय के मन में विशेष आग्रह और अनुराग था।‘ अपने अनुराग को भी बतला देते हैं। महज इस भूमिका को पढ़कर (उसके पहले तक मेरे लिए अज्ञात) पद्मश्री से सम्मानित मुनि जिनविजय के द्वारा हिन्दी साहित्य के लिए किए गए कार्यों की झलक भर से जी माधव हाड़ा और रज़ा न्यास के लिए प्रशंसा से भर गया है। हाड़ाजी का यह अनुराग बना रहे। भारतीय विद्याभवन के पहले मानद निदेशक मुनि जिनविजय पर आधारित पुस्तक तो अब पढ़नी ही होगी। ~ सं० 

एक भव अनेक नाम

माधव हाड़ा


मुनि जिनविजय ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने असाधारण और रोमांचकारी पच्चीस वर्षीय आरंभिक जीवन का वृत्तांत दो हिस्सों में लिखा, लेकिन हिन्दी में आत्मकथाओं की कमी पर रोने-धोने वालों ने भी कभी इसकी सुध नहीं ली। आँखों में रोशनी के अभाव में आठ वर्षीय बालक को बोलकर लिखाए गए ये आत्मवृत्तांत जिनविजय जीवनकथा और मेरी जीवन प्रंपचकथा हिन्दी के उपलब्ध आत्मवृत्तांतों से अलग और ख़ास हैं। इन वृत्तांतों में तटस्थ भाव और निर्ममता तो है ही, इनमें कहीं भी मूल्य निर्णय नहीं है, जो हिन्दी की अधिकांश आत्मकथाओं में ख़ूब मिलता है।



मुनि जिनविजय के काम का आकलन और मूल्यांकन नहीं हुआ, इसलिए उनको कम लोग जानते हैं। उनके अनुसंधान से हिंदी भाषा और साहित्य को अपने पाँवों पर खड़े होने की ज़मीन मिली, उनके काम से भारतीय राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के कई नए पहलू उजागर हुए, लेकिन इसका श्रेय उनको कम लोगों ने दिया। उनके अनुसंधान का मनोनीत क्षेत्र प्राचीन साहित्य था, इसलिए आधुनिक होने की हड़बड़ी और जल्दबाज़ी में आलोचक-इतिहासकारों ने उनके काम को महत्त्व ही नहीं दिया। उनके नाम में प्रयुक्त ‘मुनि’ पद भी उनके काम के मूल्यांकन में बाधा बन गया। उनका मुनि जिनविजय नाम संयोग से था—उनके आरंभिक इक्कीस वर्षीय जीवन के जो कई रूप और वेश थे, उनमें मुनि जिनविजय अंतिम था और इसके औपचारिक परित्याग के बाद भी यही नाम संज्ञा उनके साथ आजीवन रही। हिंदी के आधुनिक माहौल में यह नाम संज्ञा उनके काम के मूल्यांकन में अवरोध बन गई। उनके बहुत महत्त्वपूर्ण कार्यों को किसी साधु द्वारा किए धार्मिक-सांप्रदायिक कार्य की श्रेणी में डाल दिया गया। मुनि जिनविजय के कार्य का अधिकांश जैन धर्म और प्राकृत-अपभ्रंश से संबंधित था, इसलिए भी इसकी उपेक्षा-अवहेलना हुई। हिंदी भाषा और साहित्य की पहचान क़ायम करने वाले आरंभिक लोगों ने यह धारणा बना ली थी कि जैन साहित्य सांप्रदायिक और धार्मिक है और उसका साहित्यिक महत्त्व नगण्य है। यह धारणा हिंदी भाषा और साहित्य के विकास की सही और समग्र पहचान बनाने में अंतर्बाधा बन गई। हिंदी का बहुत सारा श्रेष्ठ साहित्य इस कारण इसके दायरे से बाहर हो गया। मुनि जिनविजय द्वारा अन्वेषित और संपादित बहुत सारा साहित्य जैनेतर भी था, लेकिन इस अंतर्बाधा के चलते कम लोगों का ध्यान उधर गया। आगे चलकर केवल हजारीप्रसाद द्विवेदी ने मुनि जिनविजय की अन्वेषित और संपादित जैन और जैनेतर कुछ रचनाओं के हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान की पहचान की। 

पूना प्रवास के दौरान ही वे लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के भी संपर्क में आए। तिलक शास्त्रचर्चा के लिए कभी-कभी मुनि जिनविजय के पास आया करते थे। 

एक भव अनेक नामवाली अपनी अद्भुत जीवन यात्रा के दौरान मुनि जिनविजय ने जो कुछ किया वो असाधारण और कुछ हद तक अविश्वसनीय है। उन्होंने लगभग दो सौ प्राचीन ग्रंथों का अनुसंधान और संपादन-पाठालोचन किया-करवाया, कई संस्थाएं बनाईं—उन्हें ऊँचाई पर पहुँचाया, असहयोग आंदोलन में भाग लिया और देश सेवा के रचनात्मक काम किए। वे कभी एक जगह के नहीं हुए—अहमदाबाद, पूना, बड़ौदा, शांति निकेतन, मुंबई, जोधपुर, जयपुर, चंदेरिया आदि कई जगहों को उन्होंने अपना कार्यस्थल बनाया और वे यूरोप भी गए। उन्होंने जब जो किया, पूरी निष्ठा और मनोयोग से किया और जब उसको छोड़ दिया, तो फिर उस तरफ मुड़ कर भी नहीं देखा। वे प्रकांड विद्वान् थे और ख़ास बात यह है कि उनकी विद्वत्ता उनके कर्म में फलीभूत भी हुई।



आरंभिक जीवन


मुनि जिनविजय का आरंभिक जीवन बहुत घटनापूर्ण और विचित्र है। विद्यार्जन की इच्छा से उन्होंने इस दौरान कई रूप और वेश धारण किए। किशनसिंह, किशन भैरव, मुनि किशनलाल और मुनि जिनविजय की नाम संज्ञाओं के साथ वे यहाँ-वहाँ भटकते रहे। उनके जीवन को उनकी रुचि और प्रकृति के अनुसार दिशा महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आने के बाद मिली। उनका जन्म 27 जनवरी, 1889 ई. को तत्कालीन मेवाड़ और वर्तमान राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के रूपाहेली गाँव में हुआ। उनका जन्म नाम किशनसिंह था और उनकी माँ उनको प्रेम से रणमल भी कहती थी। उनके पिता का नाम वृद्धिसिंह और माँ का नाम राजकुँवर था। मुनि जिनविजय को माता-पिता का सान्निध्य बहुत कम मिला। उनके दादा-पिता सहित अन्य परिजनों ने 1857 के विद्रोह में नसीराबाद छावनी के के विद्रोही सैनिकों की मदद की थी, इसलिए उनको लंबे समय तक अज्ञातवास में रहना पड़ा। चौदह-पंद्रह वर्षों बाद जब इस घटना की स्मृति धुँधली हो गई, तो वे घर लौट पाए। वृद्धिसिंह तत्कालीन सिरोही रियासत में वनों की देखरेख के लिए नियुक्त हुए, तो इस दौरान ही वहाँ के एक जागीरदार की बीस-बाईस वर्षीय बेटी राजकुँवर से उनका विवाह हुआ। पत्नी को रूपाहेली में छोड़कर वे सिरोही में नौकरी करते रहे। रूपाहेली में ही मुनि जिनविजय का जन्म हुआ। रूपाहेली में बच्चों की शिक्षा की कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं थी, इसलिए ग्यारह-बारह वर्ष की उम्र तक मुनि जिनविजय को अक्षरज्ञान तक नहीं हुआ। मुनि जिनविजय के पिता वृद्धिसिंह का निधन 1890 ई. के आसपास संग्रहणी रोग से हुआ। रूपाहेली में यति और वैद्य देवीहंस ने उनका उपचार किया, लेकिन वे नहीं बच पाए। पिता की मृत्यु के समय मुनि जिनविजय की अवस्था नौ-दस वर्ष रही होगी। अपने पिता के उपचार के दौरान ही मुनि जिनविजय यति देवीहंस के संपर्क में आए। देवीहंस के मार्गदर्शन में उनकी अनौपचारिक शिक्षा शुरू हुई। देवीहंस को मुनि जिनविजय अपना गुरु और मार्गदर्शक मानते थे। देवीहंस के व्यक्तित्व का बालक मुनि जिनविजय पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा। अपने घर के एक तख़्त से उतरते हुए वृद्ध देवीहंस के एक पुट्ठे पर गहरी चोट आई और उसकी हड्डी भी टूट गई। चित्तौड़-उदयपुर मार्ग पर स्थित बानेण गाँव का यति धनचंद देवीहंस का शिष्य था। उसके आग्रह पर देवीहंस स्वास्थ्य लाभ के लिए बानेण गए और वे अल्पवय मुनि जिनविजय को भी अपने साथ ले गए। कुछ समय बाद देवीहंस का निधन हो गया। माँ ने बालक मुनि जिनविजय की रूपाहेली वापसी के प्रयत्न किए, लेकिन वह सफल नहीं हुई। मुनि जिनविजय ने कुछ समय बानेण में रहने के बाद यति धनचंद का साथ छोड़ दिया और विद्यार्जन की लालसा में शिवानंदन भैरव नामक एक खाखी बाबा से भैरवी दीक्षा लेकर किशन भैरव बन गए। खाखी बाबा की जमात के साथ वे मध्यप्रदेश के जावद, मन्दसौर, प्रतापगढ़, जावरा, सैलाना, रतलाम आदि स्थानों पर प्रवास पर रहते हुए और अंततः उज्जैन पहुँचे। यहाँ खाखी बाबा का वर्षाकालीन प्रवास था। जमात का माहौल मुनि जिनविजय को अच्छा नहीं लगा। वे जमात में उत्तराधिकार के लिए होने वाले अंतर्कलह से भी दुःखी हो गए। एक दिन सुबह चार बजे सेवक के साथ उन्होंने खाखी जमात का मठ छोड़ दिया। उन्होंने वहीं पास में बहने वाली शिप्रा नदी में स्नान किया और कमंडल, चिमटा और खाखी वेश छोड़कर सामान्य वस्त्र धारण कर लिए। महाकालेश्वर के दर्शन के बाद वे गाड़ी में बैठ कर रतलाम की ओर रवाना हो गए।

वे महात्मा गाँधी से मिले और उनसे विचार-विनिमय के बाद उन्होंने जैन मुनिचर्या छोड़ दी और गुजरात विद्यापीठ में गुजरात पुरातत्त्व मंदिर का दायित्व सँभालने अहमदाबाद आ गए। 

उज्जैन से रवाना होकर मुनि जिनविजय ने मंडप्या के रहने वाले यति ज्ञानचंद के पास रहने लगे। ज्ञानचंद पढ़ा-लिखा यति था और जैन धार्मिक कर्मकांड की उसको अच्छी जानकारी थी। मुनि जिनविजय ने ज्ञानचंद के यहाँ उसके कृषि कार्य में सहयोग करना शुरू किया। वे उसके पशुओं को लेकर उसके खेत पर चले जाते और दिन भर वहाँ काम करते थे। यहाँ रहकर उन्होंने जैन धार्मिक पूजा-प्रतिष्ठा में बोले जाने मंत्र, स्तुति, स्तवन आदि सीखे। मंडप्या में ही उन्होंने ज्ञानचंद द्वारा ठेके पर लिए गए आम के वृक्षों की रखवाली की और गाँव की गलियों में सिर पर उठाकर कच्चे आम भी बेचे। मुनि जिनविजय चातुर्मास में जैन धार्मिक कर्मकांड के लिए पहले गुजरात के एक गाँव बडनगर और बाद में बदानावर और दिग्ठान गए। यहाँ पर्यूषण पर्व के दौरान वे स्थानकवासी आम्नाय जैन मत के एक साधु के संपर्क में आए। वहाँ के श्रावक जैन परिवारों के साथ मुनि जिनविजय की घनिष्ठता बढ़ती गई और इस कारण आम्वाय साधु के साथ उनका परिचय भी गहरा होता गया। अंततः एक दिन उन्होंने आम्नाय संप्रदाय में दीक्षा ग्रहण कर ली। अब उनका उनका नया नामकरण मुनि किशनलाल हो गया। स्थानकवासी सम्प्रदाय में मुनि किशनलाल के रूप में मुनि जिनविजय ने छह वर्ष व्यतीत किए और कठोरता से इस संप्रदाय के आचार-विचार का पालन किया। उन्होंने पन्द्रह वर्ष की किशोरावस्था में यह दीक्षा ली और इक्कीस वर्ष की युवावस्था में इसको छोड़ दिया। स्थानकवासी संप्रदाय की जीवनचर्या बहुत कठिन थी। दीक्षा लेने के बाद मुनि जिनविजय ने अपने गुरु तपस्वी जी के साथ दिग्ठान से प्रस्थान किया और कुछ गाँवों में होते हुए वे धार पहुँचे, जहाँ उन्होंने चतुर्मास किया। यहाँ से वे विहार करते हुए इंदौर, देवास आदि स्थानों से होकर उज्जैन पहुँचे। उज्जैन में चातुर्मास के बाद से उन्होंने तपस्वी जी के साथ दक्षिण देश का विहार शुरू किया। इस विहार में उन्होंने सतपुड़ा के दुर्गम जंगलों की यात्रा की। भुसावल, जलगाँव, पाँचोरा, वाघली, चालीसगाँव, वाघनी, अहमदनगर आदि कई गाँव-कस्बों से होते हुए वे वारी पहुँचे। वारी में चातुर्मास के दौरान उनकी भेंट एक मराठी शिक्षक और बंगाल मूल की हिंदू साध्वी से हुई। उनको लगने लगा कि वे जिस संप्रदाय में हैं, वहाँ ज्ञानार्जन की गुंजाइश नहीं है। अंततः उज्जैन चातुर्मास के दौरान एक दिन तपस्वी जी को एक पत्र लिखकर उन्होंने मुनि किशनलाल का वेश छोड़ दिया। 

कुछ समय यहाँ-वहाँ भटकने के बाद मुनि जिनविजय ने राजस्थान के पाली शहर में जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संप्रदाय के संवेगी मार्ग के मुनि पन्यास श्रीसुंदरविजय जी से दीक्षा ग्रहण कर ली। अब उनका नया नाम मुनि जिनविजय हुआ, जो आजीवन उनकी पहचान रही। यहाँ जैन-अजैन विद्वानों के साथ समागम की स्वतंत्रता थी। सभी तरह की सामयिक पत्र-पत्रिकाएँ और साहित्य पढ़ने की छूट थी। मुनि जिनविजय ने इसका पूरा लाभ उठाया। दीक्षा के एक वर्ष बाद मुनि जिनविजय प्रवास गुजरात के विभिन्न शहरों में हुआ। वहाँ से वे महाराष्ट्र के पूना और मुंबई भी गए। 1908 से लगाकर 1919 ई. तक वे बारह वर्ष तक इस संप्रदाय में रहे। उन्होंने इस दौरान प्राचीन साहित्य के अन्वेषण, संपादन-संशोधन और प्रकाशन का कार्य भी किया और कई प्रकार की सांस्कृतिक और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लिया। पूना प्रवास के दौरान ही वे लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के भी संपर्क में आए। तिलक शास्त्रचर्चा के लिए कभी-कभी मुनि जिनविजय के पास आया करते थे। पूना के कई विद्वानों-प्रो.गुणे, प्रो.रानाडे, प्रो.वेलवलकर, प्रो.धोंर्डो केशव कर्वे, रसिकलाल छोटेलाल पारिख आदि से उनका परिचय और मैत्री इसी दौरान हुई। मुंबई और पूना प्रवास के दौरान विद्वानों के साथ विचार-विमर्श ने उनकी आँखें खोल दीं। वे इन दिनों भीषण ऊहापोह से गुजर रहे थे— यह उनके जीवन का सर्वाधिक विचारपूर्ण और मनोमंथन का समय था। उन्होंने इस दौरान महात्मा गाँधी सहित कई विद्वान् मित्रों से परामर्श किया। अंततः वे महात्मा गाँधी से मिले और उनसे विचार-विनिमय के बाद उन्होंने जैन मुनिचर्या छोड़ दी और गुजरात विद्यापीठ में गुजरात पुरातत्त्व मंदिर का दायित्व सँभालने अहमदाबाद आ गए। काका साहब कालेलकर, पंडित सुखलाल सिंघवी, धर्मानंद कोसांबी, पंडित बेचरदास दोसी, रामनारायण विश्वनाथ पाठक, मौलाना सैयद अबुज़फ़र नदवी आदि विद्वान् इस योजना में सहयोगी थे। पुरातत्त्व मंदिर में उनके मार्गदर्शन में कई दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह किया गया और यहाँ से कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथ भी प्रकाशित हुए।  

मुनि जिनविजय 1928 ई. में विद्यापीठ से दो वर्ष का अवकाश लेकर जर्मनी गए। मुनि जिनविजय पहले लंदन गए, जहाँ उन्होंने चार माह के प्रवास के दौरान ब्रिटिश म्यूजियम आदि संस्थाएँ देखीं। लंदन से वे बेल्जियम के ब्रूसेल्स, अेन्टवेल आदि शहरों में होते हुए हेम्बर्ग पहुँचे। बर्लिन में वे एक वर्ष तक रहे और यहाँ उन्होंने भारत विषयक सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों को व्यवस्थित करने के लिए हिंदुस्तान हाउस की स्थापना की। उन्होंने यहीं एक इंडो-जर्मन सेंटर भी कायम किया। 1929 ई. में भारत आए, लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि वे वापस यूरोप नहीं जा पाए। 1930 ई. में महात्मा गाँधी ने जब दांडी कूच किया, तो मुनि जिनविजय उसमें शामिल हुए। उन्होंने स्वयंसेवकों की एक टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए अहमदाबाद से धरासणा की ओर प्रस्थान किया, लेकिन अहमदाबाद स्टेशन पर ही उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। जेल में वे विख्यात देश सेवकों—कन्हैयालाल मुंशी, जमनालाल बजाज और ख़ुरशीद एफ. नारिमन के संपर्क में आए। इसी समय उन्हें कलकत्ता के विद्याप्रेमी बहादुरसिंह सिंघी का सहयोग से शांति निकेतन में स्थापित जैन विद्यापीठ का दायित्व सँभालने का रवीन्द्रनाथ टैगोर का निमंत्रण मिला। क्षितिमोहन सेन, हजारीप्रसाद द्विवेदी और विधुशेखर शास्त्री जैसे विद्वानों के सान्निध्य के आकर्षण में वे वहाँ चले गए। शांतिनिकेतन में रहते हुए ही उन्होंने अपनी विख्यात सिंघी जैन ग्रंथमाला की शुरुआत की। शांति निकेतन में मुनि जिनविजय का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहा और पूना, पाटन आदि के ग्रंथागार भी उनकी पहुँच से यहाँ बहुत दूर हो गए, इसलिए उन्होंने कुछ् समय बाद ही इसको छोड़कर अहमदाबाद को फिर अपना कार्यक्षेत्र बनाया। 

कन्हैयालाल मुंशी ने 1938 में भारतीय विद्याभवन की योजना को मूर्त रूप देने का का दायित्व मुनि जिनविजय को सौंपा। वे इसके पहले मानद निदेशक बनाए गए। विद्याभवन में कई शोध परियोजनाएँ मुनि जिनविजय की पहल पर शुरू हुईं। उन्होंने यहाँ एक ग्रंथागार कायम किया, जिसमें कई पांडुलिपियां संगृहीत की गईं। यहाँ रहते हुए मुनि उन्होंने सिंघी ग्रंथमाला का कार्य भी जारी रखा। 1942-43 ई. में पाँच महीने तक वे अपने एकाधिक विद्वान् सहयोगियों के साथ जैसलमेर रहे। वहाँ उन्होंने कई ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ अपनी देखरेख में तैयार करवाईं। यह कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण था—इससे कई नए और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाश में आए, जिनसे भारतीय साहित्य की नयी पहचान बनी।

अपनी जन्मभूमि राजस्थान को लेकर मुनि जिनविजय के मन में विशेष आग्रह और अनुराग था। जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने इसको अपना कार्यस्थल बनाया। उन्होंने 1950 ई. चित्तौड़गढ़ के पास चन्देरिया में महात्मा गाँधी के आदर्शों को मूर्त रूप देने के लिए सर्वोदय साधना आश्रम का स्थापना की। इस आश्रम में मुनि जिनविजय ने एक सर्वदेवायतन मंदिर और एक पाठशाला का भी निर्माण करवाया। आश्रम की कुछ भूमि उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में भी दी, लेकिन बाद में अपेक्षित उपयोग न होने के कारण उन्होंने इसे फिर अपनी देखरेख में ले लिया। राजस्थान सरकार के तत्कालीन विद्यापेमी मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के आग्रह पर उन्होंने राजस्थान में भी प्राचीन साहित्य के शोध, संरक्षण और प्रकाशन का कार्य आंरभ किया। उनके मार्गदर्शन में राजस्थान पुरातत्त्व मंदिर की स्थापना की गई। बाद में इसका नाम राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान हुआ। इसका मुख्यालय और भवन जोधपुर में बनाया गया और इसमें कई प्राचीन बहुमूल्य हस्तलिखित ग्रंथ संगृहीत किए गए। इन ग्रंथों में से अस्सी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ राजस्थान पुरातन ग्रंथमाला के अंतर्गत प्रकाशित हुए। उन्होंने दो और बहुत महत्त्वपूर्ण स्थानों का निर्माण करवाया। इनमें एक से हरिभ्रदसूरि स्मृति मंदिर है। हरिभ्रद सूरि विख्यात जैन शास्त्रकार और तत्त्वद्रष्टा थे, जिनके लिए मुनि जिनविजय के मन में अपार श्रद्धा और भक्ति थी। दूसरा निर्माण कार्य उन्होंने इतिहास में दानी के रूप में प्रसिद्ध भामाशाह के स्मृति में भारती भवन के नाम से करवाया। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। मुनि जिनविजय का निधन 3 जून, 1976 ई. को अहमदाबाद में हुआ। अंतिम दिनों में वे अस्वस्थ थे—अपने असाध्य रोग के बारे में वे जानते थे, उनकी आँखें बहुत ही कमजोर हो गई थीं, लेकिन ऐसी स्थिति में भी उनका मन नितांत निर्मल और व्यथारहित था।

अंतिम दिनों में 


मुनि जिनविजय ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने असाधारण और रोमांचकारी पच्चीस वर्षीय आरंभिक जीवन का वृत्तांत दो हिस्सों में लिखा, लेकिन हिन्दी में आत्मकथाओं की कमी पर रोने-धोने वालों ने भी कभी इसकी सुध नहीं ली। आँखों में रोशनी के अभाव में आठ वर्षीय बालक को बोलकर लिखाए गए ये आत्मवृत्तांत जिनविजय जीवनकथा और मेरी जीवन प्रंपचकथा हिन्दी के उपलब्ध आत्मवृत्तांतों से अलग और ख़ास हैं। इन वृत्तांतों में तटस्थ भाव और निर्ममता तो है ही, इनमें कहीं भी मूल्य निर्णय नहीं है, जो हिन्दी की अधिकांश आत्मकथाओं में ख़ूब मिलता है। मुनि जिनविजय ने अपनी आत्मकथा के पूरक के रूप में अपने संपर्क में आए हुए, अपने क्षेत्र के कुछ विशिष्ट दिवंगत व्यक्तियों के पत्रों को मेरे दिवंगत मित्रों के कुछ पत्र नाम से प्रकाशित करवाया। ये पत्र उन खास लोगों के हैं, जिन्होंने मुनि जिनविजय को उनके साहित्यिक कार्यों में सहयोग दिया या जो उनसे किसी विषय में परामर्श या कोई जानकारी चाहते थे। संकलन में विद्याव्यसनी और साहित्यप्रेमी व्यवसायी राजकुमारसिंह, केशरीचंद भंडारी और पूरणचंद नाहर के पत्र हैं, जिन्होंने मुनि जिनविजय को उनके प्राचीन साहित्य के संरक्षण और प्रकाशन के कार्य में सहयोग दिया। इसी तरह इसमें अपने समय के ख्यातिलब्ध पुराततत्त्वविद, इतिहासकार, प्राचीन साहित्य के विशेषज्ञ और संस्कृति प्रेमी देवेंद्रप्रसाद जैन, गौरीशंकर ओझा, काशीप्रसाद जायसवाल, हीरानंद शास्त्री, महावीरप्रसाद द्विवेदी, ताराचंद राय, सत्यदेव परिव्राजक और राहुल सांकृत्यायन के पत्र हैं, जो अपने कार्य क्षेत्र से संबंधित किसी जिज्ञासा या समस्या के समाधान के लिए मुनि जिनविजय के संपर्क में थे। मुनि जिनविजय ने प्राक्कथन में इन व्यक्तियों का परिचय और इनके अपने संपर्क में आने के कारणों की भी संक्षेप में चर्चा की है।       

आत्मवृत्तांतों में आए मुनि जिनविजय के जीवन में जो निरंतर गतिशीलता है, वो उनकी ख़ास प्रकार की मानसिक बनावट के कारण है। यह दुर्लभ किस्म की मानसिक बनावट है। इसके संबंध में ख़ास बात यह कि यह परिवर्तन के लिए हमेशा तत्पर और खुली हुई है। यह परिवर्तन की पहल भी करती है और अपने को परिवर्तन के अनुसार जल्दी से ढाल या बदल भी लेती है। अपनी ख़ास मानसिक बनावट को खुद मुनि जिनविजय ने भी लक्ष्य किया है। उन्होंने अपने मेरी जीवन प्रपंचकथा  के प्रास्ताविक एक जगह लिखा है कि “मैं तो यों अत्यंत परिवर्तनप्रिय व्यक्ति हूँ। मेरे मन का गठन तो विशिष्ट प्रकार के परिवर्तनशील पुद्गलों से हुआ है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं अपने जीवन मार्ग में परिवर्तन करता रहा हूँ।” अपनी इस ख़ास मानसिक बनावट के कारण मुनि जिनविजय के जीवन में ठहराव नहीं है। कोई आग्रह, राग-विराग और विचार उनको बाँधता नहीं है। जैसे ही कोई आग्रह, लगाव या विचार उनको प्रयोजनहीन और निष्प्राण या बंधन लगने लगता है, वे इसको छोड़ या तोड़कर आगे चल देते हैं। खाखी वेश में उनकी निष्ठा-आस्था नहीं रही, तो उन्होंने इसे छोड़ दिया। स्थानकवासी संप्रदाय के साधुजीवन में उनको आनंद नही आया, तो वे इसे छोड़कर मूर्तिपूजक जैन सम्प्रदाय में चले गए। यहाँ उनका मन लग गया— माहौल भी अनुकूल था, लेकिन यह वेश उनके राष्ट्र सेवा के नए संकल्प अनुरूप नहीं था, इसलिए उन्होंने इसे भी छोड़ दिया। विचार और वेश में संगति उनके जीवन में हमेशा रही। जहाँ भी उन्हें लगा कि उनके विचार और वेश में असंगति बढ रही है, तो उन्होंने वेश छोड़ने में कभी देर नहीं लगाई।

मुनि जिनविजय के जीवन की निरंतर गतिशीलता का एक और उल्लेखनीय पहलू यह है कि वे जितने समय तक जिस संप्रदाय या वेश में रहे, उन्होंने उसकी चर्या और विचार में अपनी पूरी निष्ठा बनाए रखी। वे यति रहे, तो उन्होंने संपूर्ण निष्ठा और आस्था के साथ तत्संबंधी जैन धार्मिक कर्मकांडों का निर्वाह किया। स्थानकवासी जैन संप्रदाय की जीवनचर्या बहुत कठिन थी, लेकिन वे कभी इससे विचलित नहीं हुए। मूर्तिपूजक संप्रदाय के आचार-विचार का भी उन्होंने कठोरता से पालन किया। उन्होंने अपने जीवन वृत्तांत के प्रास्ताविक में इस संबंध में लिखा कि “मेरी यह मान्यता रही है कि जब तक हम किसी संप्रदाय विशेष का वेश धारण किए हुए हैं, तब तक हमारा आचार भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। विचार परिवर्तन के साथ आचार में भी परिवर्तन किया जाना है, तो तदनुसार वेश का भी परिवर्तन होना चाहिए, अन्यथा वह एक प्रकार का यांत्रिक जीवन होगा।”

अपने असाधरण जीवन और उपलब्धियों को लेकर मुनि जिनविजय में एक ख़ास प्रकार की तटस्थता, निर्ममता और विनम्र भाव है। उन्होंने अपने आरंभिक बाल्य और किशोरकालीन जीवन का वृत्तांत तो लिखा, लेकिन महात्मा गाँधी की तरह वे अपने सक्रिय और उपलब्धिमूलक जीवन का वृत्तांत लिखने से बच गए। जिनविजय जीवनकथा की भूमिका में उन्होंने इसके संबंध में केवल यह टिप्पणी की कि “वह तो अभी भावि के गर्भ में प्रसुप्त है। उसका जन्म होगा या नहीं यह विधि के विधान के हाथ की बात है।” अपने आरंभिक जीवन के संबंध में वे बहुत निर्मम हैं। उनका आरंभिक जीवन बहुत संघर्षवाला है, उसमें उठापटक भी पर्याप्त है और उनके यही जीवनानुभव उनके भावी अर्थपूर्ण जीवन की बुनियाद भी बनते हैं, लेकिन अपने इस जीवन को उन्होंने बहुत निर्मम और तटस्थ भाव से ‘प्रपंचमय’ कहा है। उन्होंने सिद्दर्षि की विख्यात जैन रचना उपमिति भव प्रपंच को आधार बनाकर अपने जीवन वृत्तांत का नाम ही मेरी जीवन प्रपंचकथा रखा। इसके प्रास्ताविक में उन्होंने लिखा कि “मैं धीरे-धीरे समझने लगा कि मनुष्य का सारा जीवन प्रपंचमय है, इसलिए पूर्व प्रकाशित पुस्तिका के अनुरूप इसको केवल जीवन कथा न देकर जीवन प्रपंचकथा नाम रखना मुझे उचित लगा। इसका नाम स्फुरण मुझे महाकवि सिद्दर्षि की बनाई हुई उपमिति भव प्रपंच कथा के नाम से हुआ। महाकवि सिद्दर्षि ने संसार के जीवों के भव अर्थात् जीवन के प्रपंचात्मक आंतर-बाह्य भावों का स्वरूप चित्रित करने के लिए उस कथा का निर्माण किया। वह जैन साहित्य की अद्भुत रचना है। उसके पढ़ने से विचारशील मनुष्य को जीवों के शुभाशुभ कर्मों के परिणामों और उनके सुखदुःखादि फलों का गंभीर ज्ञान प्राप्त होता है। मैं भी अपने इस जीवन प्रपंच में अनेक शुभ-अशुभ आदि कर्म करता रहा हूँ, इसलिए मैंने इस कथा को जीवन का प्रपंच बतानेवाली कथा के नाम से अंकित किया है।”

मुनि जिनविजय अपने जीवन को लेकर बहुत निर्मम थे। उन्होंने अपने आत्मवृत्तांत के संबंध लिखा कि “मेरे जीवन के इन क्षुद्र अनुभवों में किसी के कुछ ग्रहण करने योग्य बात नहीं है।” यह उनकी विनम्रता थी, अन्यथा भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य की बुनियाद के लिए सामग्री जुटानेवाले इस मनीषी के आरंभिक जीवन के आत्मवृत्तांत में ऐसा बहुत कुछ है, जिसे हमें जानना चाहिए।


मुनि जिनविजय, 
एक भव अनेक नाम,
रज़ा न्यास - सेतु प्रकाशन

 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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