रविवार, जून 02, 2013

साहित्य में फिर सीआइए - ओम थानवी

आज के समय में सच के लिए लड़ने वाले और निर्भयता से झूठों के चेहरों का पर लगी नक़ाब उतारने इन्सान विरल हैं. राजनीति, पैसा, झूठी शान आदि समाज पर इतनी हावी हैं कि सच बोलने वाले को अक्सर ही सुझाव मिलते रहते हैं – “इससे आप को क्या मिलेगा” ? – “ये आप के स्तर के नहीं हैं” – “इनसे बनाकर रखो, कल ज़रूरत पढ़ सकती है”...  अवश्य ही ये सुझाव कहीं ना कहीं अपना असर दिखाते होंगे और सच को दबाने वाला झूठ जीत जाता होगा. बहरहाल इन परिस्थितियों को और इनसे बने मायावी दृश्यों के पीछे के सच को सामने लाने की मुश्किल जिम्मेवारी “जनसत्ता” संपादक श्री ओम थानवी ने अपने ऊपर स्वेच्छा से ली है... ये प्रशंसनीय है.

      फेसबुक जैसे सोशल मीडिया, जो आज हर तबके के लोगों पर अपना असर रखता है और उनकी सोच की दिशा भी निर्धारित करता है. उस पर यदि झूठ का प्रचार हो रहा हो तो उसके परिणाम बहुत घातक हैं. यदि बात सिर्फ साहित्य की करें तो कई दफा युवा पीढ़ी और अनुभवी लोगों को भी साहित्य में योगदान देने वालों की वरिष्ठता का पता नहीं होता, ऐसे में यदि उनकी छवि को गलत ढंग से रखा जाए तो कैसे पता चलेगा कि सच क्या है और झूठ क्या. ये बात तब और खतरनाक रूप ले सकती है जब यही काम कोई ऐसा इंसान करे जिसकी बातों को सोशल मीडिया में महत्व दिया जाता रहा हो. श्री थानवी का ना सिर्फ फेसबुक पर वरन अपने स्तम्भ “अनन्तर” में ऐसे लोगों पर लिखना और समाज को सच बताना, वो काम है जिसे करने की इक्षा रखने वाले तो बहुत होंगे लेकिन कर के दिखाने वाले उतने ही कम.

अपने उपर “अख़बारों की जूठन से काम चलाने” का आरोप लगने के बावजूद “शब्दांकन” अपनी निष्पक्षता पर अडिग है और जनसत्ता से साभार, श्री ओम थानवी का लेख आप के लिए यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ.

साहित्य में फिर सीआइए 

ओम थानवी
     
प्रोपेगैंडा यानी दुष्प्रचार के डैने बड़े होते हैं। खासकर तब, जब वे फेसबुक जैसे असंयमित और भड़ास भरे ‘सोशल मीडिया’ में उड़ान भरते हों। इन डैनों का प्रयोग सांप्रदायिक मामलों में संघ परिवार निरंतर करता है। लेकिन साहित्य में यह शायद मार्क्सवादी अतिवादियों का हथियार बन चला है। वह कब सफल होता है, कब नहीं, यह शोध का विषय है। पर इस दफा उसने मुंह की खाई है। हिंदी के प्रतिष्ठित कवि और विश्व-साहित्य के गहन अध्येता कमलेश को हिंदी के ही कतिपय लेखकों ने जबरन सीआइए की गोद में बिठाने की कोशिश की। हालांकि इन लेखकों में शायद ही कोई पाये का होगा। अर्चना वर्मा ने ‘कथादेश’ में एक लंबा लेख लिखकर उस अभियान को ‘‘युवजनोचित उत्साह का अतिशय और अबोध निष्ठुरता की अभिव्यक्ति’’ बताया है। अगर कहूं कि अर्चनाजी ने निहायत कुटिल और बचकाने हमले के खिलाफ सुविचारित और अकाट्य तथ्यों के साथ किसी कवि के समर्थन में खड़े होकर मिसाल कायम की है, तो गलत न होगा। यह बात जोर देकर इसलिए कह सकता हूं, क्योंकि मैंने- और अलग से कुलदीप कुमार, प्रकाश के. रे जैसे कुछ स्वतंत्रचेता लेखकों ने भी- कवि कमलेश के हक में खड़े होने का जतन किया था। क्षोभ की बात यह रही कि कमलेशजी के खिलाफ वह क्षुद्र अभियान एक ऐसे युवक ने शुरू किया, जिसे कभी प्रतिभावान कवि समझा जाता था। गिरिराज किराडू ने फेसबुक पर एक शिगूफा छोड़ा कि वह कौन-सा प्रसिद्ध हिंदी लेखक है, जिसने कहा कि मानवता को सीआइए का ऋणी होना चाहिए। सवाल उछाल दिया, मगर न लेखक का नाम दिया, न स्रोत कि कहां किस संदर्भ में कहा गया है। बस, एक सुरसुरी छोड़ दी गई जो सनसनी में तब्दील होती चली गई। धीमे-धीमे बात खुली कि रज़ा फाउंडेशन की ‘समास’ पत्रिका में कमलेशजी के 70 पन्नों के इंटरव्यू में से किराडू चंद शब्द उठा लाए हैं। विचित्र बात यह रही कि मूल इंटरव्यू का न उन्होंने हवाला दिया, न ठीक-ठीक उद्धरण। ‘मानव जाति’ को अपनी तरफ से ‘मानवता’ कर दिया। इंटरव्यू के पन्ने स्कैन करवा कर बीच बहस में मैंने जुड़वाए, ताकि लोग कम से कम संदर्भ जान सकें।

कमलेशजी ने उस इंटरव्यू में कहा था कि शीतकाल के दौरान भारत में हमें अमेरिका और सीआइए की बदौलत ऐसी किताबें कम दाम में उपलब्ध हो गर्इं, जो विश्व-स्तरीय थीं। सीआइए ने अपना दुष्प्रचार-साहित्य भी प्रसारित किया होगा, जैसे केजीबी किया करती थी। लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों एजेंसियों की बदौलत महान साहित्य सस्ते में सर्वसुलभ हुआ। कमलेशजी भावुक इंसान हैं। इस बात के प्रति शायद सजग भी नहीं कि निजी या घरेलू (सोशल) मीडिया के जमाने में बात समझने की नहीं, उसका बतंगड़ बनाने की कोशिशें ज्यादा होती हैं। सो अच्छी किताबों की समयोचित सुलभता के लिए उन्होंने अमेरिका और सीआइए के प्रति ‘‘मानव जाति’’ को ‘‘ऋणी’’ क्या बताया, मार्क्सवादी कट्टरपंथी मानो उनके खून के प्यासे हो गए। जबकि उसी इंटरव्यू में कमलेशजी ने यह भी कहा था कि ‘‘अवश्य ही उसमें बहुत सारा कम्युनिस्ट-विरोधी प्रचार-साहित्य भी था।’’ कमलेश-विरोधी अभियान में किराडू का साथ अशोक कुमार पांडे, वीरेंद्र यादव, आशुतोष कुमार, मोहन श्रोत्रिय, बटरोही, शिरीष कुमार मौर्य और आश्चर्यजनक रूप से कमलेशजी के ‘प्रतिपक्ष’ के जमाने में सहयोगी रह चुके मंगलेश डबराल ने भी दिया। बीच में कथाकार प्रभात रंजन भी आए। लेकिन जल्दी ही व्यक्तित्व और रचनाकार के भेद को समझ वे बहस से अलग हो गए। एक वजह शायद यह भी रही हो कि किराडू-पांडे ने बहस को किसी रंजिश या लड़ाई की शक्ल दे दी थी। बेटे की बीमारी में भी किराडू ने अपने शहर से लिखा- ‘‘प्रभातजी, मीर (बेटे) को उलटी-दस्त हो रहे हैं, कम रह पाऊंगा ऑनलाइन। लेकिन आपने बेटन थाम लिया है, अब यह (बहस) अंजाम तक पहुंचेगी।’’ किराडू से अशोक कुमार पांडे: ‘‘तुम मीर का खयाल रखो... यहां की चिंता छोड़ो अभी।’’ प्रभात हट गए, पर ‘बहस’ परवान चढ़ती गई। ‘मानव जाति’ को तो ‘मानवता’ कर ही दिया गया था, फिर वह ‘मानव कल्याणकारी’ हुआ, फिर सिर्फ ‘सीआइए-सीआइए’ होता रहा। यानी किताबों की सर्वसुलभता की बात करने वाले कमलेश सीआइए समर्थक घोषित कर दिए गए। जिन्होंने उनका पक्ष लिया, वे भी। जैसे कि यह खाकसार। मुझे लखनऊ में शमशेर सम्मान मिला। काव्य में नरेश सक्सेना को। बताते हैं कि निर्णायक-मंडल में ज्ञानरंजन, राजेंद्र शर्मा, विष्णु नागर, लीलाधर मंडलोई और मदन कश्यप थे। सब वामपंथी थे, मगर कुछ कट्टर मार्क्सवादियों को मेरा चयन खल गया। इनमें एक वीरेंद्र यादव कार्यक्रम में तो नहीं बोले, पर घर लौटकर फेसबुक पर शमशेर सम्मान के संस्थापक प्रतापराव कदम को उन्होंने इस तरह कोसा- ‘‘... क्या कोई साझा मंच सांप्रदायिकों और सीआइए के समर्थकों का भी बनाना चाहिए?’’

आप समझ सकते हैं, ऐसे दुराग्रहों के बीच कोई बहस क्या सचमुच बहस रह सकती है? मैंने तो यहां तक कह दिया था कि आप चाहे कमलेशजी को किसी भी एजेंसी का एजेंट मान लीजिए, लेकिन अब उनकी कविता की तो बात कीजिए क्योंकि मूलत: वे कवि हैं। कुलदीप कुमार ने कमलेशजी के इतिहास-बोध पर उनसे कड़ी बहस ‘जनसत्ता’ में की थी। पर उनके कविता-संग्रह ‘बसाव’ की उन्होंने ‘नेशनल दुनिया’ में तारीफ की। प्रकाश के. रे ने अनेक लेखकों-फिल्मकारों आदि के हवाले देकर समझाया कि सारे संसार में रचनाकार को रचना से समझा जाता है। लेकिन हिंदी जगत- और उसमें भी घरेलू मीडिया की सीमित दुनिया- में यह भेद शायद बुद्धि से दूर रहता आया है। कुलदीप कुमार मार्क्सवादी हैं, पर उस समीक्षा के लिए वे भी कट्टरपंथी मंडली के निशाने पर आ गए। उनके काव्य विवेक पर जो सवाल उठाए वे तो अपनी जगह ठहरे, अशोक कुमार पांडे ने यह आरोप भी जड़ दिया कि समीक्षा किसी ‘सौदे’ के तहत लिखी गई है। बात का सिर-पैर हाथ न लगने और निंदा से घिरने पर आरोप उन्हें वापस लेना पड़ा। मुझे किराडू-पांडे की जुगलबंदी पर हैरानी नहीं होती। साहित्य में उनकी कोई पहचान नहीं है। पत्थर उछाल कर ध्यान खींचने का भी अपना तरीका होता है। लेकिन मंगलेश डबराल अच्छे कवि हैं, वे पता नहीं इस मंडली में कैसे जुड़ गए! उनकी राजनीति वे जानें, पर उन्होंने कवि कमलेश पर अपना निर्णय सुनाया तो अंत में यह भी जोड़ा: ‘‘पोलिश कवि मिलोष के अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित चयन का नाम ‘खुला घर’ है तो कमलेश जी के संग्रह का नाम ‘खुले में आवास’ है, और फिर अगला कमजोर संग्रह है ‘बसावट’ (सही नाम है ‘बसाव’ -सं.)। और ये सभी नाम सचमुच के महाकवि पाब्लो नेरुदा के ‘रेजीडेंस ऑन अर्थ’- रेसिदेंसिया एन ला तियेरा- के फालआउट्स हैं। तो हिंदी में यह सब चलता है तात्कालिक और क्षणिक महानताओं के नाम पर।’’ कविता संग्रहों के नाम मिलते-जुलते हों, तो इससे क्या साबित होता है? पता नहीं कितनी किताबों के नाम पहाड़ पर हैं, उनका ‘पहाड़ पर लालटेन’ से क्या लेना-देना? तर्क की यह गिरावट हिंदी साहित्य की दयनीय दशा को चिह्नित करती है।

इस संबंध में एक रहस्य भरी चर्चा यह भी सुनने में आई कि सारे हमलों का निशाना कमलेश नहीं, कोई और है! ‘समास’ रज़ा फाउंडेशन की पत्रिका है, जिसके संचालक अशोक वाजपेयी हैं। ‘समास’ के संपादक उदयन वाजपेयी हैं। गिरिराज किराडू खुद एक पत्रिका निकालते हैं, जिसकी थोक खरीद के लिए उन्होंने रज़ा फाउंडेशन को आवेदन किया था। अशोक वाजपेयी ने उसे अस्वीकार कर दिया। वाजपेयी कहते हैं, रज़ा फाउंडेशन सरकारी विभाग नहीं है। फिर हजार पत्रिकाएं निकलती हैं, संस्था किस-किस की खरीद करे। बहरहाल, कमलेश विवाद के थमते-न-थमते इसी समूह की ओर से रज़ा फाउंडेशन से ‘मोटी राशि’ पाने वाले फेलो व्योमेश शुक्ल को भी घेरा गया। फिर अशोक वाजपेयी पर सीधा प्रहार शुरू हो गया, मुंबई में कथित रूप से एक सांप्रदायिक मंच पर शिरकत को लेकर। 
अब कौन किनके बीच कविता पढ़े, वरिष्ठ कवियों को इसका फतवा भी युवा पीढ़ी दिया करेगी? ऐसे माहौल में अर्चना वर्मा का आना और एक साफ स्टैंड लेना मुझे अच्छा लगा। वे उदार विचारों की हैं। पिछले दिनों जन संस्कृति मंच के कार्यक्रम में भी गई थीं। वत्सल निधि के शिविरों में भी जाती थीं; मेरी उनसे मुलाकात पहले-पहल तीस वर्ष पहले बरगीनगर (जबलपुर) में आयोजित वत्सल निधि के ऐसे ही एक शिविर में हुई थी। हालांकि यह समझना नादानी होगी कि अर्चनाजी के हस्तक्षेप के बाद वाचाल समूह अपनी अतार्किक और असाहित्यिक मुहिम पर नए पहलू से सोचने लगेगा। गिरिराज किराडू ने अर्चना वर्मा के लेख पर फेसबुक पर छिड़ी ताजा बहस में यों प्रतिक्रिया की है- ‘‘अर्चनाजी की दिलचस्पी सिर्फ इसमें है कि किसको किससे लड़ाना है... (उन्होंने) अपनी वृद्धोचित गफलतों का अच्छा प्रदर्शन कर दिया है।’’ तर्क के बाद यह भाषा की गिरावट है।

कहना न होगा, इन लोगों की रणनीति सोची-समझी चालों पर काम करती है। अर्चनाजी का लंबा विवेचन इसे साबित करता है। हालांकि उन्होंने जिस ‘बहस’ को आधार बनाया है, वह किराडू-पांडे की जोड़ी ने ही संपादित कर इ-मेल के जरिए प्रसारित की है। दोनों की नीयत में खोट है, इसलिए वह पाठ भी विश्वसनीय नहीं है। मूल बहस में कई बातें थीं, जहां उनकी कलई खुलती थी। मसलन कुलदीप कुमार की समीक्षा को प्रायोजित करार देने और फिर वह आरोप वापस लेने का प्रसंग। वह संवाद आखिर इसी बहस का तो हिस्सा था। कुलदीपजी पूछते हैं, वह हिस्सा निकाल कैसे दिया गया? बहस ने धीमे-धीमे जो रूप लिया, उसे एकांगी दिखाने का फैसला कोई कैसे कर सकता है, जब- उस प्रसारित मेल के मुताबिक- ‘‘दूसरी तरफ थे मुख्यत: जनसत्ता संपादक ओम थानवी, कुलदीप कुमार और उनके समर्थक’’। यह जानते हुए भी कोई संवाद, दूसरे पक्ष की जानकारी के बगैर, अपनी समझ से काट-पीट कर लोगों को पढ़वाना क्या जाहिर करता है? अगर अर्चना वर्मा ने पूरी ‘बहस’ पढ़ी होती तो उनके लेख का कलेवर और बड़ा होता। अर्चना वर्मा ने कमलेश और अशोक वाजपेयी को लेकर की गई अनेक छिछली टिप्पणियों का जायजा लेकर इस ‘‘संवाद’’ के बारे लिखा है- ‘‘औपचारिक बहस की तरह फ्रेम किए जाने के पहले बुजुर्गों की हंसी उड़ाता, भड़ास निकालता, युवा दोस्तों का आपसी लापरवाह और अनौपचारिक वार्तालाप जो फेसबुक की किसी पोस्ट के बाद टिप्पणियों में चलता रहता है। आपसी, लेकिन सार्वजनिक। जैसा कहा, सर्वत्र युवजनोचित उत्साह का अतिरेक और यत्र-तत्र एक अबोध निष्ठुरता और दंभ की अभिव्यक्ति। शायद इसी बड़बोले युवासुलभ अहंकार का लक्षण है कि अपने ‘होने’ और अपने आपे को साबित कर चुके होने की ऐसी आश्वस्ति कि दूसरे के (अपनी तरह से सिद्ध, लेकिन आपको अज्ञात) वजूद को निश्शंक अनहुआ किया जा सके। इन प्रतिक्रियाओं को सिर्फ गैर-जिम्मेदार, चलताऊ टिप्पणी कह कर छोड़ देना चाहती हूं, इनको ‘‘बयान’’ जैसा भारी-भरकम, जवाबदेह नाम मैं नहीं देना चाहती।’’

Archana Varmaअर्चना जिसे बयान तक मानने को तैयार नहीं, वह उन लोगों के लिए बहुत गंभीर संवाद बना हुआ है! मगर नितांत इकतरफा। इकतरफा इस मायने में कि न कमलेश फेसबुक पर हैं, न अशोक वाजपेयी, न उदयन वाजपेयी। जहां मूल निशाना कमलेश या अशोक वाजपेयी या उदयन हों, और वे फेसबुक से कटे होने के कारण फेसबुक पर लगाए जाने वाले आरोप न जान सकते हों, न उन पर अपनी बात कह सकते हों, वहां समर्थकों के साथ इकट्ठे होकर बारी-बारी से उन लेखकों पर हमला करना क्या साबित करता है? यह अनैतिक ही नहीं, पीठ पीछे वार करना है। उसे संवाद या बहस या महाबहस कह देना हास्यास्पद है, क्योंकि बहस में हमेशा दूसरा पक्ष मौजूद रहता है। इन लेखकों के हम जैसे ‘समर्थक’ अपने स्तर पर भले वहां कुछ कह आएं, वह दूसरे पक्ष की शिरकत नहीं कहलाएगी। जाहिर है, हिंदी साहित्य में पीठ पीछे वार का यह नया पहलू सामने आ रहा है। ‘समास’ के सत्तर पृष्ठों का इंटरव्यू के जिसकी एक पंक्ति ठीक से उद्धृत नहीं हुई, (उस ‘महाबहस’ में पता नहीं किसने उसे पूरा पढ़ा होगा) पाठ के बाद अर्चनाजी उसे आधुनिक भारतीय मानस की औपनिवेशिक बनावट के बरक्स भारतीय मेधा की मौलिकता के अनेक परतीय विश्लेषण का एक संग्रहणीय उदाहरण बताती हैं। ऐसे में इन विशद विचारों को- जिनमें कुछ से सबकी सहमति भले न हो- फेसबुक के वीर लेखकों द्वारा ‘अनर्गल’ ठहराने पर अर्चनाजी स्वाभाविक ही खीझ प्रकट करती हैं। वे कहती हैं कि ‘‘अब तक के पढ़े-लिखे, जाने-सुने से अलग किसी बात को इतनी आसानी से ‘‘अनर्गल’’ मान लेना शायद शुरू में ही अंत पर जा पहुंचने का, सब कुछ जान चुके होने के दंभ का पर्याय हो या फिर यह कि ऐसी भी बातें दुनिया में हैं, जिनको समझने की शुरुआत ही अंत पर जा पहुंचने के बाद होती है; इसलिए वहां जा पहुंचने का, सब-कुछ जान लेने का दंभ चाहे मौजूद हो, वहां तक वाकई जा पहुंचने में अभी देर है।’’

अर्चना वर्मा के लेख का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश वह है, जहां उन्होंने कमलेशजी की बात- कि शीतयुद्ध में कैसे बेहतर किताबें मिलने से पाठक समुदाय का भला हुआ- शोध से प्रमाणित की है। वे बताती हैं कि ऐसी किताबें किसी भारतीय प्रकाशक के साथ आर्थिक सहयोग द्वारा प्रकाशित की जाती थीं। इनमें से एक राजकमल प्रकाशन का सहयोगी प्रगति प्रकाशन था जिसका पता तो राजकमल प्रकाशन का हुआ करता था, लेकिन राजकमल के सूचीपत्र में उसकी किताबों के नाम नहीं होते थे। यहां से अमेरिकी सूचना विभाग द्वारा आर्थिक सहयोग वाली किताबें छपती थीं। संस्था पर श्रीमती शीला संधू का अधिकार होने के बाद सोवियत सूचना विभाग की किताबें वहां से छपने लगीं। इन किताबों के नाम भी राजकमल के सूचीपत्र में नहीं होते थे। दरियागंज में ही एक नेशनल एकेडमी नाम का प्रकाशन था। उर्दू के शायर और आलोचक गोपाल मित्तल उसके मालिक थे। उन्होंने हिंदी, अंगरेजी, उर्दू में कई सौ किताबें छापी थीं। बोरिस पास्तरनाक की डॉ. जिवागो, सेफ कंडक्ट, ऐन ऐसे इन ऑटोबायोग्राफी, अब्राम टर्ट्ज की द ट्रायल, बिगिन्स दूदिन्त्सेव की नॉट बाइ ब्रेड अलोन, सोल्जेनित्सिन की वन डे इन द लाइफ ऑफ़ ईवान डेनिसोविच, द फर्स्ट सर्कल, द कैंसरवार्ड और गुलाग आर्किपेलेगो इत्यादि। ऐसे ही उस सब्सिडी ने महत्त्वपूर्ण किताबों को सवर्सुलभ बनाकर एक बौद्धिक पर्युत्सुकता का वातावरण तैयार किया, अर्चना जी यह भी बताती हैं। रेमों आरो की ओपियम आफ द इंटेलक्चुअल्स, द फिलासफी ऑफ हिस्ट्री, मेन करेंट्स ऑफ सोशियॉलॉजिकल थॉट, येस्लॉव मिलोष की द कैप्टिव माइंड, डैनियल बेल की द एंड ऑफ आइडियॉलॉजी, द कमिंग ऑफ पोस्ट इंडस्ट्रियल सोसायटी, पैट्रिक मोयनिहन की द पॉलिटिक्स ऑफ गारंटीड इन्कम, इर्विंग क्रिस्टल की मेमॉयर्स ऑफ ए कन्जर्वेटिव जैसी अनेक गंभीर वैचारिक किताबें दो महादेशों की तकरार में सामान्य जेब वाले पाठकों तक आ पहुंचीं। बीसवीं शताब्दी के महान रूसी कवियों अन्ना अख्मातोवा, ओसिप मान्देलश्ताम, मारीना त्स्वेतायेवा, निकोलाई बोलोत्स्की की कविताएं और गद्य-रचनाएं, मिखाइल बुल्गाकोव, यूरी ओलेशा, आइजक बाबेल जैसे कथाकारों की रचनाएं तीस-चालीस साल तक रूस में ही नहीं छापी गई थीं, क्योंकि क्रांति के बाद सारी प्रकाशन संस्थाओं का राष्ट्रीयकरण और पुनर्गठन हुआ था। फिर, पुस्तकों का प्रकाशन सेंसर से गुजरने के बाद ही हो सकता था।

जाहिर है, उस दौर में विभिन्न किताबों के प्रसार में अमेरिका की भूमिका की पड़ताल की जा सकती है। कई किताबें अमेरिकी प्रचार-तंत्र का हित भी साधती रही होंगी- आखिर मास्को का प्रगति प्रकाशन भी दिल्ली में तोल्सोतोय के साथ स्तालिन की किताबें भी बांटता था- लेकिन एक पाठक के नाते कोई इन किताबों की उपलब्धि पर खुशी जाहिर करे तो उसकी भावना समझी जा सकती है। हां, शब्दों के चुनाव पर आपत्ति हो सकती है, लेकिन उनके आधार पर किसी को सीआइए एजेंट करार देने की मूढ़ता तो नहीं की जा सकती? दूसरे, उन विचारों के आधार पर क्या कवि के दाय का मूल्यांकन किया जा सकता है? कवि का काव्य छोड़कर किसी एक टिप्पणी पर इतना बखेड़ा करने का उद्देश्य क्या हो सकता है? साहित्य में ये संगीन आरोप किस चीज की याद दिलाते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि हिंदी में यह कुछ उस दौर की वापसी की पदचाप है, जब अज्ञेय जैसे कृती साहित्यकार को भी कभी अंगरेजों से, कभी सीआइए से जोड़ दिया जाता था? साहित्यकारों का अपमान अपनी जगह, क्या यह साहित्य को भी दुत्कारने की कार्रवाई नहीं है?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

गूगलानुसार शब्दांकन