खुशियों की होम डिलिवरी (भाग - 4) : ममता कालिया

Mamta Kalia's Hindi Kahani "Khushiyon ki Home Delivery" Part - IV 

"खुशियों की होम डिलिवरी" भाग - 4 : ममता कालिया 


दिवंगत पिता को कोसते वक्त वह इस पर ज़रा विचार नहीं करता कि अपने कामकाज पर वह कितना कम ध्यान देता था। वित्तीय कारोबार में एक दिन की भी शिथिलता मतलब रखती और अकसर अच्छे सौदे उसके हाथ से निकल जाते। कभी वह अपने ग्राहकों को हैरान करता, कभी ग्राहक उसे हैरान कर डालते। ऐसे में वह बढ़ती महँगाई को कोसता, ‘‘अब लोग पैसा जोडऩा नहीं, उड़ाना चाहते हैं। इनके बाप-दादा गड़ी दौलत छोड़ गए हैं, उसी की गर्मी है। यहाँ इस टूटे-फूटे मकान के सिवा हाथ में कुछ नहीं है।’’
इससे ज़्यादा तकलीफ़ उसे तब हुई, जब उसने पाया कि उसकी आँसू बहानेवाली बीवी उसके देखते-देखते छोटे पर्दे की मशहूर तारिका बन गई। अख़बार और पत्र-पत्रिकाएँ उसके गुण गाने लगे। हफ्ते में दो बार वह किसी-न-किसी चैनल पर एप्रन पहने, करछुल घुमाती नज़र आती। प्रभाकर बड़े ध्यान से देखता कि पत्नी के चेहरे पर अपने पूर्व जीवन की कोई छाया या छवि नज़र आए, हर बार उसे निराशा हाथ लगती। उसकी मंडली के दोस्त यह कहकर उसका खून जलाते, ‘‘सुना है रुचि शर्मा एक शो में आने की फीस एक लाख लेती है!’’
प्रभाकर किचकिचाकर गगन पर और दबाव बढ़ाता, ‘‘तू अपनी माँ को फोन कर, पैसे माँग! मैंने तेरी देखभाल का ठेका लिया है क्या? अपनी आधी कमाई भेजे वह, तभी तुझे रखूँगा नहीं तो निकाल बाहर करूँगा! बे-बाप का हो जाएगा तू!’’
लड़कपन में तो गगन, पिता के कहे अनुसार माँ को फोन करता था लेकिन थोड़ा और बड़ा होने पर उसे इस काम में शर्म आने लगी। अपने समस्त उग्र स्वभाव के बावजूद उसे लगा, जो पैसे पापा मेरे बहाने ऐंठते हैं, उनसे मेरा तो कुछ भला नहीं होता।
गगन उन्नीस साल का हो गया था। बड़ी मुश्किल से वह बी.कॉम के पहले वर्ष में पहुँचा था। देखने में वह खूबसूरत और लंबे क़द का था, लेकिन अपने रख-रखाव के प्रति लापरवाह। उसने बेतरतीबी को भी अपनी अकड़ का हिस्सा बना रखा था। एक दिन प्रभाकर ने उससे कहा, ‘‘तेरा यूनिवर्सिटी जाना तो मेरे जी का जंजाल है! रोज़ तुझे बस के लिए सौ का नोट चाहिए! अपनी माँ को फोन करके तू मोटरसाइकिल माँग!’’
गगन ने भड़ककर कहा, ‘‘आपको शर्म आनी चाहिए! मेरी माँ से आपने कौन-सा रिश्ता रखा है, जो आपके लड़के को वे मोटरबाइक दिलाएँ!’
प्रभाकर एक पल को हतबुद्धि हो गया। उसने कहा, ‘‘मेरा लड़का उसका भी लड़का है, यह बात क्या बार-बार याद दिलानी पड़ेगी?’’
गगन ने उतनी ही उग्रता से कहा, ‘‘माँ आपसे लड़-झगड़कर घर छोड़ गईं। उनसे पैसा माँगना तो थूककर चाटने जैसा है।’’
प्रभाकर सोफे से उठा और उसने गगन को ज़ोर का धक्का दिया, ‘‘बड़ा आया माँ का हिमायती! भाग जा उसी के पास! देखता हूँ कितने दिन रखती है तुझे!’’
गगन ने कुछ क्षण पिता को घूरा, फिर वह अपने बैकपैक में कपड़े ठूँसने लगा। एक और बैग में उसने अपनी किताबें डालीं। कुछ चीज़ें ज़रूरी होते हुए भी नहीं ले जाई जा सकती थीं। पिता-पुत्र के पास टूथपेस्ट और शेविंग क्रीम की एक ही ट्यूब थी, ब्रश अलग थे। इसी तरह जूते अलग थे लेकिन बाथरूम स्लीपरों का एक ही जोड़ा दोनों के काम आता। इन ज़रूरतों को गगन अपरिहार्य नहीं मानता था। उसने अपनी जींस की ज़ेब टटोली। उसमें पाँच सौ का एक नोट और कुछ फुटकर रुपये बचे थे।
चलते हुए उसकी इतनी इच्छा भी नहीं हुई कि पिता से विदा ले।
‘पापा किसी के सगे नहीं, मेरे नहीं, मेरी माँ के भी नहीं।’ उसने मन-ही-मन कहा और घर से बाहर हो गया।
बाहर धूप कड़ी थी। सड़क पर कोई ऑटो या बस के आने की उम्मीद नहीं थी। दोपहर तीन से चार के बीच वाहनों की आमदरफ्त कम हो जाती। जहाँ सड़क कटती थी, वहाँ बायें घूमकर ऑटोरिक्शा का ठिकाना था। वहाँ तक पहुँचने में गगन पसीना-पसीना हो गया। सिर्फ एक ऑटो खड़ा था। 
‘‘ओशिवरा चलोगे?’’ गगन ने पूछा।
‘‘हो, तीन सौ रुपया लगेगा।’’ ऑटो चालक ने जवाब दिया।
‘‘दिमाग़ ठीक तो है तुम्हारा!’’ गगन ने भड़ककर कहा।
ऑटो चालक हिमाकत से हँसा और उसने ऑटो आगे दौड़ा दिया। काफी देर खड़े रहने के बाद उसे दूसरा ऑटोरिक्शा मिला, साढ़े तीन सौ में।
गगन के मन में इस वक्त उथल-पुथल मची थी। उसे यह भी शक था कि उसकी माँ उसे पहचान भी पाएगी या नहीं। टीवी प्रोग्राम देखने की वजह से उसे माँ का चेहरा परिचित लगेगा, ऐसा उसका विश्वास था। उसे इतना पता था कि ओशिवरा में उसकी माँ का मकान है, लेकिन मकान का नाम, नंबर उसके हाथ में नहीं था। उसे माँ की बेहद धुँधली याद थी। उसका एक मन हुआ, वह उन्हें फोन करे लेकिन दूसरे मन ने कहा, अगर उन्होंने फोन पर ही उसे रोक दिया, तब क्या होगा। उसका वाहन इस वक्त पवई से गुज़र रहा था। गगन को लगा, माँ के पास जाते समय अपना हुलिया दुरुस्त करना बेहतर होगा। छह दिन की हजामत और ताज़ा यतामत चेहरे पर ओढ़कर वह वहाँ पहुँचेगा तो माँ सोचेंगी, कोई चोर-उचक्का आया है। उसने ऑटोचालक से कहा, ‘‘बाजू में सलून पर गाड़ी रोकना, शेव बनवानी है।’’
‘‘खाली पीली टाइम खोटा करने का नहीं! वेटिंग का पैसा अलग से पड़ेगा।’’ कहते हुए ऑटोचालक ने एक केशकर्तनालय के सामने ऑटोरिक्शा रोक दिया। गगन ने दोनों बैग वाहन में ही छोड़े और सलून में घुस गया। उसे ध्यान आया डेढ़ महीने से उसने अपने बाल भी नहीं कटवाए हैं। उसने सब काम करवाया और डेढ़ सौ रुपये हेयरड्रेसर को दिए। हेयरड्रेसर ने कहा, ‘‘दाढ़ी बनाकर तो आप एकदम हीरो का माफ़िक लग रहे हैं सर!’’
गगन मुस्कुराया। शीशे में अपनी छवि देखकर उसने सोचा, ‘‘माँ कम-से-कम, धक्का देकर बाहर करने से पहले मेरी तरफ़ देखेंगी ज़रूर।’
बाहर आकर गगन का जी धक् से रह गया। इस बीच उसका ऑटोचालक गायब हो गया। उसका सामान भी नदारद था। यह एकदम नई स्थिति थी, जिसके लिए गगन तैयार नहीं था। अब तो माँ के पास पहुँचना बेहद ज़रूरी हो गया। कपड़े और किताबों के बिना वह लुटा- पिटा नज़र आने लगा। आसपास अन्य सभी वातानुकूलित दुकानें थीं, जिनके शीशे बंद थे। उनसे पूछना फिज़ूल होता। कुछ दूरी पर अंडे वाले की रेहड़ी थी। उसने उससे पूछा। उसने मुँह और कान के पास हाथ घुमाकर बताया कि उसे नहीं मालूम। वापस वाशी जाने की ज़रा भी इच्छा नहीं हुई गगन की। उसने अपने सभी दोस्तों को एक-एक कर याद किया। एक भी ऐसा नहीं था, जिसके घर वह शरण पाता।
गगन ने हाथ के इशारे से एक ऑटोरिक्शा रोका और पूछा, ‘‘ओशिवरा, कितने पैसे?’’
ऑटोचालक ने हैरानी से उसे घूरा, ‘‘मीटर से चलता है मैं।’’
ओशिवरा आते देर नहीं लगी। ड्राइवर ने मुड़कर पूछा, ‘‘ईस्ट या वेस्ट?’’
गगन क्या बताता। उसने कहा, ‘‘कोई होटल, कैफे हो तो वहाँ ले चलो।’’
ड्राइवर ने कहा, ‘‘साब सामान किधर है आपका?’’ मन तो हुआ गगन का कि फट पड़े, ‘‘तुम जैसा ही एक मवाली लेकर भाग गया’’ पर यह संकट काल था, गुस्से से काम और बिगड़ता। उसने कहा, ‘‘ठहरना नहीं है, एक पता ढूँढऩा है।’’
‘‘कौन का? बोलने से?’’
‘‘वह टीवी पर जो प्रोग्राम करती हैं रुचि शर्मा मैडम!’’
‘‘अरे, उनका ठिकाना मैं जानता। ओशिवरा के ‘विक्टोरिया चेंबर्स’ में रहती वह। उनसे काम माँगने जाता क्या?’’
माँ की लोकप्रियता देख गगन की तबीयत खुश हो गई। ऑटोचालक ने उसे एक बड़ी मुसीबत से उबार लिया। विक्टोरिया चेंबर्स की विशाल इमारत के आगे उतरकर उसने मीटर के हिसाब से एक सौ बीस रुपये अदा किए। फाटक पर सुरक्षाकर्मी ने रोका। नाम बताने पर कहा, ‘‘रुचि मैडम तो कभी-कभी आती यहाँ। पूछकर बताता मैं।’’ कुछ ही पल में उसने इंटरकॉम पर हाथ रखकर पूछा, ‘‘क्या नाम बताने का?’’
गगन पशोपेश में पड़ गया। नाम बताने पर माँ की प्रतिक्रिया हमेशा क्रोध और आवेश की होती थी। सुरक्षाकर्मी ने ऊबकर कहा, ‘‘अपना नाम नई मालूम क्या?’’
‘‘गगन’’, धीरे-से जवाब आया।
इस बार इंटरकॉम पर हाथ रखकर उससे पूछा गया, ‘‘मैडम पूछतीं है, क्या काम है?’’
‘‘ज़रूरी मिलना है।’’ गगन ने कहा। उसकी आवाज़ मरियल होती जा रही थी। उसके अंदर इतना भी मनोबल शेष नहीं था कि सुरक्षाकर्मी को धक्का देकर आगे बढ़ जाए। थोड़ी देर बाद सुरक्षाकर्मी ने छोटे फाटक के पास से कहा, ‘‘मैडम की ज़रूरी मीटिंग चल रही है। एक बजे के बाद आने को बोला।’’
गगन ने राहत की साँस ली। उसने इधर-उधर देखा। जगह-जगह कारें खड़ी थीं। कुछ गाडिय़ों में ड्राइवर बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे। तीन-चार आवारा कुत्ते दौड़-भाग में लगे थे। धूप के तेवर ढीले पड़ गए थे। थोड़ा आगे जहाँ सड़क चढ़ाई चढ़ती है, मदर डेयरी और अमूल के अड्डों पर दूध के क्रेट उतर रहे थे। वहाँ चार-पाँच अन्य दुकानें थीं जिनमें डबलरोटी, मक्खन और बिस्किट रखे दिख रहे थे। इमारत के सामने बड़ा-सा बगीचा था। गगन उसी में जाकर एक बेंच पर बैठ गया। आसपास बच्चे खेल रहे थे। कुछ अधेड़ लोग पैदल-पथ पर चल रहे थे। पार्क के दूसरे हिस्से में माली पौधों में पानी दे रहे थे। ये दृश्य गगन के सामने होकर भी नहीं थे। प्रतीक्षा का प्रतिपल उसकी परेशानी बढ़ा रहा था।
आि़खरकार सवा घंटे बाद उसका मोबाइल कसमसाया।
‘‘अब मुझसे क्या चाहते हो तुम? यहाँ क्यों आए हो?’’ यह रुचि का फोन था।
‘‘मॉम, मुझे दस मिनिट का वक्त दें। मिलकर सब बताऊँगा।’’ गगन ने कहा।
‘‘हर बार एक नई कहानी होती है तुम्हारे पास! मैंने कितनी बार कहा है, जो भी कहना है अपने पापा से कहो।’’
‘‘मॉम, पापा ने मुझे घर से निकाल दिया!’’ गगन के मुँह से निकल पड़ा।
‘‘ठीक है, दस मिनिट के लिए तुम आ सकते हो, फ्लैट नंबर 102।’’
गगन के पैरों में स्फूर्ति आ गई। वह लपककर घर पहुँच गया। दरवाज़ा खुला हुआ था मगर भिड़ा हुआ। गगन के घंटी बजाने पर रुचि द्वार पर आई। ‘मम्मा’ गगन के मुँह से वही संबोधन निकला, जो वह चौदह साल पहले बोलता था।
रुचि ने सोचा था, गगन के कुछ भी कहने से पहले ही वह उसे इतनी खरी-खोटी सुनाएगी कि वह दस की बजाय दो मिनट में ही भाग खड़ा हो। वह उसकी कोई आँसू छाप दास्तान नहीं सुनना चाहती।
गगन की बचपन मार्का भूरी आँखें, भूरे बाल, सुंदर मुख और लंबी पतली काया देख कर रुचि के मन में जो घुमड़ा वह दूध नहीं, दर्द था। वह वहीं खड़ी-खड़ी बुक्का फाड़ रो पड़ी कुछ इस तरह कि गगन की आँखें भी बरसने लगीं। वही रुचि को सहारा देकर अंदर के कमरे में ले आया।
‘‘मम्मा रोना नहीं, मेरी और आपकी एक कहानी है! पापा ने हम दोनों का शिकार किया!’’
गगन ने एक-एक कर वाकये गिनाए, आश्चर्य रुचि को एक भी वाकया झूठ नहीं लगा। हर घटना पर उसे लगा—ठीक ऐसा ही उसके साथ भी हुआ। पता नहीं किस मूर्ख ने उक्ति बनाई होगी कि समय से बड़ा उपचार कोई नहीं। यहाँ समय ने घावों को और गहरा किया था और उनमें न मिटनेवाली टीस भर दी थी।
आि़खरकार गगन ने कहा, ‘‘मम्मा आपने दस मिनिट दिए थे, मैं अब जाऊँ?’’
‘‘कहाँ, उसी यातना-घर में?’’
‘‘नहीं मम्मा, जो मैंने छोड़ दिया, छोड़ दिया। गुरुद्वारे में कारसेवा कर गुज़र कर लूँगा पर वहाँ क़दम नहीं रखूँगा। मेरा तो सामान भी लुट गया है। अच्छा हुआ, उस घर का कोई निशान नहीं बचा।’’
‘‘चुपचाप जहाँ बैठे हो, बैठे रहो!’’ रुचि ने बेटे को झिड़का, ‘‘सुबह से कुछ खाया है?’’
गगन की चुप्पी पर रुचि समझ गई। उसका मन ग्लानि से भर उठा। वह दिन भर केवल खान-पान से जुड़ी कारगुज़ारियों में लगी रहती है और यहाँ उसका इकलौता, निर्वासित बेटा भूखा-प्यासा भटक रहा है। कुछ देर पहले की मीटिंग में एक प्रायोजक ने उसकी मेज़ पर अपने फार्महाउस में उगे फलों का ढेर लगाया था। रुचि ने सेब काटा और रसोई में सैंडविच टोस्टर में चीज़ टोस्ट बनाया।
गगन भुक्खड़ की तरह खा गया। उसे नाश्ता कभी आज जितना स्वादिष्ट नहीं लगा था। घर में वह नाश्ते में ज़्यादातर मैगी बनाता था, जिसमें से आधी ज़ाया जाती।
तैयार पैकेटों में से खाना निकालकर गरम करते हुए रुचि का दिमाग़ तेज़ी से योजना बना रहा था। अगले कुछ दिन उसे गगन पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले उसे कपड़े और किताबें दिलानी होंगी।
सबसे बड़ा सवाल था कि बेटे की आमद के बारे में सर्वेश को जानकारी देनी चाहिए या नहीं। जितना वह उसे जान सकी थी, सर्वेश के अंदर धीरज का अभाव था। फिर बच्चे का प्रसंग उसकी दुखती रग था, जिसे वह किसी-न-किसी बहाने याद कर कलप उठता। वह गगन को इस मकान में ज़्यादा दिन गोपन नहीं रख सकती। आजकल सर्वेश काम के सिलसिले में राजकोट गया हुआ था, तीन-चार दिन बाद उसकी वापसी थी। उसके पास इस फ्लैट की एक चाबी थी। वह कभी भी यहाँ आ जाता।  रुचि के कमरे में सर्वेश के कुछ कपड़े भी रखे थे।
फ़िलहाल उलझन यह भी थी कि वह गगन को कैसे बताए कि उसे दूसरी शादी किए काफी वक्त हो गया है। यह बताने पर कहीं वह दुबारा बेघर, बेआसरा न हो जाए। वैसे ही गगन कोई नॉर्मल लड़का नहीं होगा। ऊपर से नया समाचार उसका मनोजगत झिंझोड़ देगा।
इसी सोच-विचार में पालक मशरूम जल गया। गगन ने रसोई में आकर कहा, ‘‘क्या हुआ मॉम, क्या कर रही हो...’’ तो रुचि तंद्रा से जागी। उसने जल्दी-जल्दी दूसरा पैकेट खोलकर मटर पनीर गरम किया और कहा, ‘‘तू चल मैं आती हूँ। यहाँ दो लोगों के खड़े होने की जगह भी नहीं है।’’
‘‘इतना छोटा घर क्यों लिया माँ! मैंने तो सोचा था, आप बहुत आलीशान मकान में रहती होंगी!’’
‘‘अकेली जान को तो यह भी काटने को दौड़ता है। मैं घर में रहती कितनी देर हूँ। बस सोने नहाने आती हूँ।’’
‘‘बाकी दिन?’’
‘‘हम कई कामकाजी लोगों ने मिलकर वर्ली में एक ठिकाना बनाया है। काफी समय स्टूडियो में बीत जाता है।’’
‘‘मॉम आप मुझे भी टीवी में कोई काम दिला दो! मैं अपना ज़ेब ख़र्च तो कमाना शुरू करूँ। अब मैं बड़ा हो गया हूँ, आपसे या पापा से पैसे माँगने में शर्म आती है!’’
‘‘देखो मेरी जो हैसियत है, उसमें मैं तुम्हारे लिए काम नहीं माँग सकती! तुम उन्नीस साल के हो गए हो। पहले ही तुम्हारी पढ़ाई पिछड़ गई है। पहले बी.कॉम पूरा करो, फिर कोई विशेष काबिलियत वाला कोर्स करो, तब नौकरी की सोचो!’’
‘‘मेरे जि़ंदा रहने का भी सवाल है मॉम! सब कहते हैं तुम्हें फ़िल्मों में या टीवी में काम मिल सकता है।’’
‘‘इस दुनिया से दूर रहो तो अच्छा! यहाँ दसियों साल एडिय़ाँ रगडऩी पड़ती हैं एक ब्रेक के लिए।’’
‘‘पर आप मेरा पहचान-पत्र हो माँ!’’
‘‘कोई किसी का पहचान-पत्र नहीं बन सकता गगन! अपनी पहचान खुद बनानी पड़ती है। अब वो दिन गए जब केवल शक्ल-सूरत की बिना पर फ़िल्मों में, टीवी में काम मिला करता था। इन सब लाइनों में मेहनत करनी पड़ती है, इनके खास कोर्स हैं, जो पढऩे पड़ते हैं। पहले अपना ग्रेजुएशन पूरा करो।’’
उस रात रुचि वर्ली नहीं गई। गगन ड्रॉइंग रूम में दीवान पर सो गया। रुचि को बड़े दिनों बाद यह घर, घर-जैसा लगा, जिसमें उसके अलावा भी कोई और हो! अगले तीन दिनों में रुचि ने गगन को सब कुछ दिला दिया—कपड़े, किताबें, तौलिये और नई चादरें। 
शाम को उसे घर की चाबी देकर समझाया, ‘‘जब कॉलेज जाओ, घर अच्छी तरह से बंद करके जाना! मैं तीन-चार दिनों में आती हूँ।’’
सर्वेश राजकोट से प्रसन्न लौटा। जिस सांसद की अवैध संतान के विषय में पता लगाने ‘खुलासा’ की टीम गई थी, उसके बारे में सब पता लग गया। वे उस घर की वीडियो रिकॉर्डिंग कर लाए थे, जहाँ अबीर यादव अपनी माँ के साथ रहता था। माँ-बेटे ने खुलासा टीम के साथ इस उम्मीद से सहयोग किया कि शायद इस रहस्योद्घाटन के पश्चात् सांसद उन्हें सामाजिक स्तर पर स्वीकार कर ले। सांसद विधुर था और उसके पास करोड़ों की संपत्ति थी। दिव्यदर्शन पाठक उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद संसदीय सीट से आज तक कोई चुनाव नहीं हारा था। श्यामा यादव से उसका नेह नाता कुछ लोगों की जानकारी में था, किंतु दिव्यदर्शन पाठक का दबदबा इतना था कि कोई ज़ुबान न खोलता। वर्चस्व के उन वर्षों में सांसद की पत्नी मीनाक्षी पाठक और श्यामा यादव एक ही कॉलेज के हिंदी विभाग में पढ़ाती थीं। मीनाक्षी एक कार-दुर्घटना में मारी गई और श्यामा उसके एक साल बाद त्यागपत्र देकर कहीं चली गई। कुछ दिन शहर के लोगों को इंतज़ार रहा कि उसका अता-पता मिलेगा। धीरे-धीरे लोग उसे भूल गए।

अगली  कड़ी मंगलवार 2 दिसंबर को प्रकाशित होगी... 


Share on Google +
    Facebook Commment
    Blogger Comment

0 comments :

Post a Comment

osr5366