पाठकों के कम होते जाने का कारण - कृष्ण बिहारी | Krishna Bihari: Samai se Baat-12


आज भी जब दुनिया का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार हिंदी का ही है तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि हिंदी साहित्य के पाठक दिन-प्रतिदिन कम होते गए .

 - कृष्ण बिहारी

पाठकों के कम होते जाने का कारण - कृष्ण बिहारी | Krishna Bihari: Samai se Baat-12


समय से बात -११


एक व्यक्ति अपने समय में तीन काल-खंड एक साथ जीता है . उसके साथ अतीत , वर्तमान और अनदेखा भविष्य होता है . जरूरी नहीं कि वह भविष्य का सही अनुमान कर सके . लेकिन यदि वह सजग है तो भविष्य का एक चित्र अवश्य उकेर सकता है . मुझे हिन्दी के भविष्य को लेकर कोई बहुत सकारात्मक चित्र नहीं दिखाई देता . एक सवाल उठ सकता है कि जब इस भाषा के सुन्दर भविष्य का मैं कोई खाका ही नहीं बना सकता तो इसके प्रचार-प्रसार में क्यों अपनी जान खपाए हूँ . यह बहुत स्वाभाविक प्रश्न है . आज के परिदृश्य में ले-देकर पचीस ऐसी साहित्यिक पत्रिकाएं हैं जिनके गिनती के पाठक हैं . इनके अलावा भी कुछ हिन्दी की पत्रिकाएं हैं जिनके पाठकों की संख्या अब कुछ हज़ार होगी . पहले यह संख्या लाखों में थी . यह बहुत पहले की भी बात नहीं है . बहुत समय नहीं बीता . पिछले पचीस वर्षों में यह ध्वंसात्मक परिवर्तन हुआ है . आज भी जब दुनिया का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार हिंदी का ही है तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि हिंदी साहित्य के पाठक दिन-प्रतिदिन कम होते गए . इस सवाल के कई जवाब हो सकते हैं . ऐसा होने के पीछे कई कारण भी हो सकते हैं . लेकिन जो सबसे प्रभावी कारण इस भाषा को जन-मानस से दूर करने का है वह देश की शिक्षा प्रणाली में जड़ों तक लगा एक किस्म का संक्रामक घुन है जिसने अंधी व्यावसायिकता की दौड़ में कामयाबी की हदें पार करते हुए यह प्रचारित कर लिया कि अंग्रेजी के बिना कहीं कुछ नहीं है . हर ख़ास और आम के दिमाग में यह कीड़ा बिठा दिया गया कि यदि तुम्हारी औलादें अंग्रेजी नहीं जानतीं तो तुम अनपढ़ कौम का हिस्सा हो . दुनिया के अनेक देश इस प्रचार की गिरफ्त में आने से जबतक दूर रहे तबतक अपने स्वाभिमान के साथ जिए. ऐसे देशों में चीन , जापान , रूस के अलावा फ़्रांस तथा अरब दुनिया के देशों का नाम लिया जा सकता है . अपनी भाषा के प्रति इन देशों का मोह अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है लेकिन इन देशों में भी अब वह प्रचार घुस गया है कि अंग्रेजी की बैसाखी के बिना वर्तमान के साथ कदमताल मुश्किल है . जो बात इन देशों की चेतना को आज कलुषित कर रही है उसने हमारे देश को ही नहीं तीसरी दुनिया के कई देशों की चेतना को चालीस साल पहले ही कर दिया था . उसका असर मीठे जहर की तरह हुआ और धीरे-धीरे उसने हिंदी की पाठकीय शक्ति को नष्ट करने का काम किया अन्यथा क्या कारण है कि जब आबादी पैंसठ – सत्तर करोड़ थी तब पाठक लाखों की संख्या में थे और अब जबकि आबादी लगभग एक सौ तीस करोड़ है तब पाठकों की जमात एक लुप्त प्रजाति होती जा रही है ! मैंने शुरू में ही कहा है कि एक व्यक्ति अपने समय में तीन काल-खंड एक साथ जीता है . जब मैं अपने बचपन की उस अवस्था और परिवेश को याद करता हूँ जहाँ सीमित सुविधाओं में चलने वाले विद्यालय थे और उनमें शिक्षा देने का अलौकिक वातावरण था . शिक्षा का माध्यम मातृभाषा थी और शिक्षा सस्ती थी . जो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता था , पढ़ा लेता था . कला-साहित्य-संस्कृति की रक्षा विरासत की रक्षा थी इसके लिए किसी को न तो किसी सरकारी महोत्सव की प्रतीक्षा रहती थी और न इसकी आवश्यकता महसूस की जाती थी . समाज की सांस्कृतिक आवश्यकता बिना किसी ताम-झाम के पूरी होती थी . पुस्तकें कम से कम दाम पर उपलब्ध होती थीं और पाठक अपनी रूचि की पुस्तक प्रायः हर शहर में प्राप्त कर लेता था . रचनाकार , प्रकाशक , सम्पादक और पाठक के बीच पोस्ट ऑफिस संवाद बनाए रखने में सेतु का काम करता था . यह वह दौर था जिसे मैं क्षेत्रीय भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य के स्वर्णिम दौर के रूप में याद करता हूँ . रचनाकार को कुछ पत्र-पुष्प भी मिलता था . उसकी भी ख़ुशी बढ़ जाती थी लेकिन फिर इस दौर के साथ घपले और घोटालों का एक ऐसा दौर शुरू हुआ जो अपनी सभी हदों को पार करता हुआ आज निरंकुश हो चुका है .


कृष्ण बिहारी
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हिंदी की वे पत्रिकाएं एक-एककर बंद होती गईं जिन्हें औद्योगिक घराने निकालते थे . समाचार-पत्रों में साहित्य की जगह कम होते-होते लगभग ख़त्म हो गई . प्रकाशकों ने सरकारी खरीद का सहारा लिया . किताबें इतनी महंगी हो गईं कि आम पाठक उनकी ओर देखने से भी बचने लगा . व्यापार का नया तरीका बना कि लाभ के लिए कमीशन देकर महंगी किताबों को सरकारी गोदामों में भरकर कालापानी दे दो . जब कोई चीज दिखेगी ही नहीं तो वह अपने आप एक दिन उत्सुकता के केंद्र से बाहर हो जायेगी . दूसरी वजह दुधमुंहे बच्चों को अंग्रेजी में नहलाने-खिलाने और खेलने से हुई . शुद्ध हिंदी भी न बोल सकने वाले माता-पिता इस बात में गर्व महसूस करने लगे कि उनकी औलाद अंग्रेजी बोलती है . वह हिंदी नहीं बोल पाती . मैं आज भी सोचने में असमर्थ हूँ कि यह किस ओर से गर्व की बात हो सकती है कि समाज यह ख़ुशी-ख़ुशी घोषित करे कि उसके बच्चे उसकी भाषा नहीं जानते हैं ! इसमें बच्चों का दोष सबसे कम है . जब उन्हें भाषा को सीखने-समझने और बोलने से जबरन रोक दिया गया तो उनमें भाषा के प्रति किसी रूचि को तलाशना रेत को मुट्ठी में रोक रखने की नाकाम कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं . एक ऐसी पीढी हमारे सामने खडी हो गई है जिसे हिंदी से न केवल अरुचि हो गई है बल्कि वह यहाँ तक सोचने लगी है कि हिंदी से जब कुछ मिलने वाला नहीं है तो इसे लादे रहने से क्या होगा ? प्रारम्भिक शिक्षा के दौरान भी आज के माता-पिता नहीं चाहते कि उनके बच्चे हिंदी पढ़ें . उन्हें यह अनचाहा बोझ और अन्यायपूर्ण दबाव लगता है . तीसरी वजह पाठ्यक्रम का क्रूर और उदासीन होना है . घटिया , नीरस और उबाऊ पाठ्यक्रम को बनाने में जुटी समितियों और संस्थानों ने मोटी –मोटी नौकरियां हथिया रखी हैं . हर साल करोड़ों रूपये फूंके जाते हैं लेकिन बात बनने की जगह बिगडती ही गई है . विश्व हिंदी सम्मलेन ,हिंदी के नाम पर प्रदेश सरकारों के वाहियात आयोजन औसत दर्जे के चाटुकारों , गोटी सेट करने वाले लोगों और मौकापरस्तों की नाकारा और हर दृष्टि से अक्षम लोगों की भीड़ और उनके लिए भडैती कर सकने वाले भाटों से भरी हुई वह बस्ती है जिसमें एक ढूढो तो हज़ार मिलते हैं . आप सोच सकते हैं कि हज़ार की संख्या में किस तरह के लोग मिलते हैं !

हिंदी का बेडा गर्क करने वालों में रचनाकार भी पीछे नहीं रहे . युग का परिदृश्य बदला लेकिन रचनाकार नहीं बदले . उन्होंने यह सोचना ही छोड़ दिया कि बच्चों के लिए कुछ रोचक और मनोरंजक भी लिखा जाना चाहिए. हिंदी में आज एक भी ऐसा लेखक नहीं है जिसकी रचनाओं की प्रतीक्षा बच्चे करते हों . बच्चे अपना अस्तित्व भी रखते हैं , यह सोच भी रचनाकारों में नहीं है . जड़ों में मट्ठा डालना इसी को कहते हैं जिसे रचनाकारों ने खुद डाला है . यही वह खाद है जिसे पाकर बड़े और युवा हुए बच्चे हिंदी की कोई भी किताब अपने हाथ में लेकर चलते हुए कहीं भी दिखाई नहीं देते . पहले रचनाकारों की किताबें बिकती थीं . लोग खरीदकर पढ़ते थे और आज रचनाकार अपनी किताबें मुफ्त में बांटते दिखाई पड़ते हैं और हालत यह है कि उनकी किताबें लोग घर पहुँचने के पहले रास्ते में ही कहीं भूल जाते हैं !

आप पूछेंगे कि फिर पढता कौन है ? मेरा बिल्कुल साफ़ उत्तर है – लिखनेवाला ही अपनी रचना को बार-बार पढता है . बार-बार कभी इस माध्यम से तो कभी उस माध्यम से अपने परिचितों को बताता है कि लिखकर उसने जो जग जीता है उसके लिए उसे भारत रत्न मिलना ही चाहिए . कहानियों में जादुई यथार्थ रचने वालों ने ऐसा यथार्थ रचा कि उनके आगे छोटे-मोटे बाजीगरों के कारनामें कहीं ज्यादा रोचक लगते हैं . कवियों ने ऐसी कवितायें लिखीं जो वे खुद भी नहीं समझ पाते कि उन्होंने लिखा क्या है ! इस पर तुर्रा यह कि दो-चार चारण बिना कविता पढ़े ‘वाह-वाह’ और ‘क्या खूब’ का शोर दो-चार मिनट मचाकर हमेशा के लिए झेंप जाते हैं . किसी कवि की कोई रचना आज किसी के लिए उद्धरण नहीं बन रही जबकि यह कविता का न तो स्वभाव है और न उसकी नियति . यह कहते हुए मुझे अफ़सोस तो है मगर संकोच नहीं कि हिंदी के साथ खिलवाड़ करने वालों में रचनाकार सबसे आगे खड़े हैं .


घोटालों और घपलों का इतिहास पुराना है ...

मुझे बहुत पीछे जाना पड़ रहा है . २१ मई १९७१ को हिंदुस्तान में एक विचित्र घटना हुई . नागरवाला काण्ड . एक व्यक्ति देश की प्रधानमंत्री की नक़ल करते हुए एक बैंक कर्मचारी को फोन करके ६० लाख रुपयों की मांग करता है . इसे तत्काल जरूरत बताता है . वह अपने मकसद में कामयाब भी होता है लेकिन बैंक कर्मचारी ने जब पैसे देने के बाद पी एम हाउस से पता किया तो मामला फर्जी निकला . पुलिस रिपोर्ट हुई . स्पीडी ट्रायल हुआ और १० दिनों के भीतर फैसला भी . नागरवाला को चार साल की जेल हुई . सजा के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गई . तब मैं १७ वर्ष का था और मेरी होश का यह पहला मामला था जो धोखा- धडी से जुड़ा था . फ्रॉड , बेईमानी , चोरी , डाका , लूट , भ्रष्टाचार , रिश्वत और कमीशनखोरी , भाई-भतीजावाद आदि के लिए अब एक शब्द हो गया है – स्कैम . देश और प्रदेश की सभी सरकारें स्कैम पर बन रही हैं . स्कैम पर बिगड़ रही हैं. इन दिनों बंगाल , बिहार , छतीसगढ़ , राजस्थान , मध्यप्रदेश , हिमांचल , उत्तर प्रदेश , कर्नाटक , आन्ध्र , हरयाना जिस तरह सुर्ख़ियों में हैं उनसे लगता है कि देश को लूटने में कोई भी कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता . अधिकाँश नेताओं की शैक्षिक योग्यता फर्जी है . सही तो यह होगा कि वे शिक्षित ही नहीं हैं . उनके पास बाहुबली होने का प्रशिक्षण है जिसे वे अपनी औलादों को बिना फीस लिए बाँट रहे हैं . दुनिया के कई अन्य देशों में भी भ्रष्टाचार है . बोलबाला भी . लेकिन वहां पकड़े जाने पर सज़ा है . सज़ा भी ऐसी कि अपराधियों के फ़रिश्ते काँप उठें . हमारे देश में मुक़द्दमा है जिसका फैसला दो-दो दशक तक अब नहीं होता . सजायाफ्ता अपराधी जमानत पर बाहर निकलकर रामलीला मैदान से राजभवन तक मार्च कर रहा है . यह इसी देश में संभव है . एक बड़ा सिने स्टार रीयल्टी शोज में छाती फुला – फुलाकर सबको ललकार रहा है और जब उसके मुक़द्दमें में फैसले का दिन आता है तो वह और उसका पूरा खानदान थर-थर काँपता हुआ आसमान की ओर अन्जुरियाँ पसारे आँख बंद किये पता नहीं क्या मांगता दिखाई पड़ता है ! पैसा इतना अधिक है उसके पास कि देश का बड़े से बड़ा वकील अपनी ईमानदारी बेंचकर उसके पक्ष में खड़ा हो जाता है और तारीख आगे बढ़ जाती है . देश यह सब देख रहा है . इसके खिलाफ कब खड़ा होगा ? मैं नहीं बता सकता . मैंने पहले ही कहा था कि एक व्यक्ति एक समय में तीन काल खंड एक साथ जीता है . यह तीसरा काल खंड मुझे बहुत साफ़-साफ़ नहीं दिखता .

कृष्ण बिहारी
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abu dhabi , uae .
Mobile- +971505429756 ,+971554561090 ,
email- krishnatbihari@yahoo.com
16-07-2015
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