हैदराबाद , खुफिया तंत्र की नाकामी - जनसत्ता

jansatta editorial, जनसत्ता, सम्पादकीय    हैदराबाद में बीते गुरुवार को हुए धमाकों पर स्वाभाविक ही विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया और संसद के दोनों सदनों में खुफिया तंत्र की नाकामी पर सवाल उठाए। लेकिन चाहे गृहमंत्री का बयान हो या विपक्ष की टिप्पणियां, उनमें समस्या की तह में जाने की दिलचस्पी नजर नहीं आई। जबकि इस चर्चा की सार्थकता इसी बात में हो सकती थी कि आतंकवाद से लड़ने का मजबूत राष्ट्रीय संकल्प प्रतिबिंबित हो और उसके लिए एक समन्वित नजरिया दिखे। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दोनों सदनों में वही दोहराया जो वे पहले मीडिया के सामने कह चुके थे, वह यह कि सरकार को पहले से अंदेशा था कि आतंकवादी घटना हो सकती है और इस बारे में चेतावनी जारी कर दी गई थी। पर जब यह सवाल उठा कि खुफिया सूचना होने के बावजूद हमले को नाकाम क्यों नहीं किया जा सका, तो शिंदे ने स्वीकार किया कि यह एक सामान्य चेतावनी थी। यानी खतरे की निशानदेही करने लायक सूचना सरकार के पास नहीं थी। यह सच है कि इतने बड़े देश में चप्पे-चप्पे पर नजर रखना बहुत मुश्किल है। मगर हैदराबाद के दिलसुखनगर में इससे पहले, 2002 और फिर 2007 में, आतंकवाद की बड़ी घटनाएं हो चुकी थीं। लिहाजा, वहां निगरानी रखने में कसर क्यों रह गई? दूसरा सवाल यह उठता है कि चेतावनी के मद्देनजर राज्य सरकार ने क्या कदम उठाए; हैदराबाद पुलिस पर्याप्त सतर्क क्यों नहीं थी?
   दहशतगर्दी का यह वाकया खुफिया तंत्र की नाकामी है या खतरे की सूचना होने के बावजूद एहतियाती कदम न उठाने का नतीजा है? इस हमले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि केंद्र और राज्यों के समन्वित प्रयासों से ही आतंकवाद पर काबू पाया जा सकता है। पुलिस तंत्र राज्यों के अधीन है, और पुलिस की तत्परता के बगैर कोई भी खुफिया जानकारी मददगार साबित नहीं हो सकती। हैदराबाद में हुए आतंकी हमले पर विरोध जताने के लिए भाजपा ने आंध्र प्रदेश में बंद आयोजित किया और लोकसभा में बहस के दौरान विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि यह जांच होनी चाहिए कि एमआइएम नेता अकबरुद्दीन ओवैसी के कुछ दिन पहले दिए भड़काऊ भाषणों से तो इस त्रासदी का संबंध नहीं था। इस तरह की टिप्पणियों से जो भी सियासी हित सधता हो, पर उनसे आतंकवाद की जटिल चुनौती को समझने में कोई मदद नहीं मिलती। अंदेशे की खुफिया सूचना के बावजूद हमले को रोका नहीं जा सका, इससे केंद्र और राज्यों के बीच रणनीतिक समन्वय का अभाव ही जाहिर होता है।
   चूंकि केंद्र के साथ-साथ आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार है, इसलिए विपक्ष के लिए निशाना साधना आसान है। पर एनसीटीसी यानी राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र का गठन क्यों अधर में लटका हुआ है? जबकि नवंबर 2008 के मुंबई हमले के बाद से ही ऐसे तंत्र की जरूरत शिद््दत से महसूस की जाती रही है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी अपना काम कर रही है। अलबत्ता नेटग्रिड यानी खुफिया सूचनाओं के नेटवर्क का काम सुस्त गति से चल रहा है। पर एनसीटीसी का गठन तो राज्यों के एतराज के कारण ही अब तक नहीं हो पाया है। एनसीटीसी पर विरोध जताने वालों में विपक्ष के अलावा कांग्रेस की भी कई राज्य सरकारें शामिल थीं। उनकी दलील थी कि एनसीटीसी को छापा डालने, गिरफ्तार करने जैसे पुलिस के अधिकार देने से राज्यों के अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण होगा और इस तरह संघीय ढांचे को ठेस पहुंचेगी। उनकी आपत्तियों के मद्देनजर एनसीटीसी के स्वरूप में केंद्र सरकार ने फेरबदल किया। फिर भी, कोई नहीं जानता कि उसका गठन कब होगा। यह बेहद अफसोस की बात है कि संसद में आंतरिक सुरक्षा की खामियों को चिह्नित करने के बजाय परस्पर दोषारोपण की प्रवृत्ति और एक दूसरे को घेरने की फिक्र अधिक नजर आई।

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2 टिप्पणियाँ

  1. विषय विशेष पर बौद्धिक चर्चा चले तो इस लेख का प्रकाशन सार्थक होवे..। दिग्गजों की मध्य फलक की पीछे की जानकारी मिली| ओम जी, कुलदीप जी, अमिताभ जी और सुनीता जी आप सभी का आभार... धन्यवाद! :)

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  2. विषय विशेष पर बौद्धिक चर्चा चले तो इस लेख का प्रकाशन सार्थक होवे..। दिग्गजों की मध्य फलक की पीछे की जानकारी मिली ओम जी, कुलदीप जी, अमिताभ जी और सुनीता जी तथा शब्दांकन संपादक आप सभी का ... धन्यवाद! :)

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