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स्टंटबाज़ी / नये मानकों की प्रयोगशाला – अशोक गुप्ता

जुल॰ 29, 2013
Biker killed in police firing in New Delhiहाल के परिदृश्य में एक नया नज़ारा सामने आया है जिसमें अपनी जान पर खेल कर बाइकर्स आधी रात के बाद तेज गति से अपनी बाइक दौडते हुए, खतरनाक करतबों का अभ्यास करते हैं. इसे मैं अभ्यास इसलिये कहता हूँ क्योंकि उस समय इनके साथ न कोई दर्शक होते हैं न कोई निर्णायक. वह जमावड़ा केवल उन प्रत्याशियों का होता है जो खुद को खतरनाक से खतरनाक स्थिति में डाल कर अपनी बाइक अ-पारंपरिक तरीकों से दौडाते हैं. केवल अगले पहिये पर, केवल पिछले पहिये पर, दोनों हाथ छोड़ कर और बाइक की गद्दी पार खड़े हो कर. जैसा कि टीवी की न्यूज़ चैनलों पर दिखाया गया है वह रोअंटे खड़े कर देने वाला नज़ारा बनता है हालांकि यह भी एक प्रश्न है कि इन चैनलों के पास यह रिकार्डिंग कैसे है, जो खबर के साथ ऐसे बुनी हुई है जैसे इन बाइकर्स के करिश्मों का विज्ञापन हो. वैसे भी खबरों के साथ विज्ञापनों की बुनावट का बाजारू सिलसिला अरसे से देखा जा रहा है.

     अभी ‘भव्य भास्कर’ पत्रिका के जुलाई अंक में पृष्ठ 30 पर मेरा एक आलेख है, ‘दारुण स्थिति के विविध पक्ष’ जिसमें मैंने अपनी यह बात सामने रखी है कि हमारे देश में माफिया और आतंक राज को देखते हुए ऐसा बड़ा बाज़ार विकसित हो रहा है जिसमें क्रूर, निर्मम अमानवीय किस्म के ऐसे जां-बाजों की खपत का स्कोप है जो बिना झिझक किसी की भी जान ले सकते हों, और उसी तरह पल भर में अपनी जान दे सकते हों. मैंने अपने आलेख में कहा है कि हमारी राजनैतिक व्यवस्था समेत अनेक प्रति-व्यवस्थाएं ऐसी हैं जो बाहु-बलियों के दम पर ही चल रही हैं, और इस क्रम में बाहुबली की एक विशिष्ट परिभाषा यह उभर कर आयी है कि वह अपनी या दूसरे की जान के प्रति अंतिम हद तक निस्पृह हो. ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि मंदी बेरोज़गारी और गला काट प्रतियोगी माहौल में अनेक युवक इस ‘धंधे’ की ओर आकर्षित हों, जिसमें काम की शर्तें तो बाकायदा फौज जैसी हों लेकिन कमाई उसके मुकाबले अकूत हो. जोखिम को गिनने का समय बहुत पीछे छूट चुका है, जोखिम कहाँ नहीं है ?

     मेरी एक कहानी ‘गिनीपिग’ हंस के संपादक और मेरे मान्य अग्रिणी प्रबुद्ध राजेन्द्र यादव के पास पहुंची है जिसका ज़िक्र उन्होंने मई के अंक के अपने संपादकीय में भी किया है. उसमें मैंने कहा है कि ऐसे बाहुबलियों का बाज़ार बनने की एक सुसंगठित प्रक्रिया है. अब देखें, चालीस पचास हज़ार रुपये की एक बाइक आवश्यक संशोधन के बाद लाख डेढ़ लाख की पड़ती है. संशोधन के मानक और उनके आधार पर बाइक में बदलाव की व्यवस्था क्या बिना किसी स्थापित तंत्र के संभव है...? साथ ही ऐसे क्लब भी काम कर रहे बताये जा रहे हैं जो विभिन्न शहरों में विभिन्न ठिकानों पर इस बाइकर्स को प्रशिक्षित करते हैं और इनके अभ्यास को प्रदर्शन के रूप में ढाल कर प्रतिस्पर्धा का रूप दे देते है. अभी हाल की ही घटना में दिल्ली में एक ठिकाने पार करीब डेढ़ सौ बाइकर्स इकट्ठे हो गये बताए जाते हैं .क्या यह बिना सुनियोजित तंत्र के संभव है ? सवाल ही नहीं उठता.

     अपने प्रति क्रूर और निर्मम होने की ट्रेनिंग इन्हें इनकी बाइक्स देती हैं. मानवीय क्रंदन के प्रति असंवेद्य होने की ट्रेनिंग इन्हें दो-पांच बरस की वह बच्चियां देती हैं जिनके साथ बलात्कार कर के यह जवान खुद को अबोध चीख़ और नवजात रक्तपात को बर्दाश्त करना सीखते हैं. और महा-माफिया इस बहाने परखता है कि यह पौध काम सौंपे जाने के लिये कितनी तैयार है जिस दिन महा-माफिया की नज़र जिस जां-बाज़ पर टिक जाएगी उसका भविष्य तय हो जाएगा. जब तक वह जियेगा तब तक ठाठ से जियेगा. उसके बाद अपने परिजनों को उतना सौंप जाएगा जितना वह उम्र भर क्लास वन हो कर भी शायद दे पाता ( वैसे तौबा तौबा, क्लास वन के भी तो अपने टकसाल हैं भाई ). किसी को यह जान कर हैरत नहीं होनी चाहिये कि इन तमाम गति विधियों और सारे देश में चल रहे ऐसे क्लबों का पूरा पूरा डाटा बेस, मय सारे विजुअल्स के, महा माफिया के किसी हेडक्वाटर में ज़रूर होगा, जहाँ इनकी रोज़-ब-रोज़ की रिपोर्ट पहुँचती होगी और उस आधार पार इन जवानों का संसेक्स उठता गिरता होगा. इस नाते, यह बाइक्स, यह बच्चियां इन जवानों के लिये गिनीपिग हैं और यह जवान, माफिया के कर्णधारों के लिये गिनीपिग हैं. और पूरा देश केवल ऐसी प्रयोगशाला में बदल गया है जिसमें अमानवीयता, क्रूरता और संवेदनहीनता के नये मानक गढे जा रहे हैं.

     मैं फिर कहता हूँ कि यह सब कोई खिलवाड़ नहीं एक सु-संगठित, सुनियोजित प्रति-संसार है, जिसमें उच्च बुद्धिलब्ध के पढ़े लिखे वह डिग्रीधारी शामिल हैं, जिनकी कीमत लोकतांत्रिक परिवेश ने कौड़ी भर भी नहीं आंकी है और उनका सितारा अपराधी वृत्ति के राजनैतिक माहौल में चमक उठा है, भले ही उनकी उम्र के साल दिनों में बदल गये हों, लेकिन दौलत का आंकड़ा मल्टी-फोल्ड हो.

अशोक गुप्ता
305 हिमालय टॉवर.
अहिंसा खंड 2.
इंदिरापुरम.
गाज़ियाबाद 201014
मो० 9871187875
ई० ashok267@gmail.com


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