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स्वीकारने से क्या सितम सहनीय हो जाता है - प्रेम भारद्वाज

जुल॰ 28, 2013
वैधानिक चेतावनी: भावुकता विकास के लिए हानिकारक और मौजूदा दौर में असभ्यता है। गुजारिश है कि इसे वे नहीं पढ़े जो उदासी, दर्द, स्मृति, परंपरा को पिछड़ेपन का प्रतीक मानते हैं। 

     सिर पर छत नहीं रही, जख्मों से मरहम महरूम हुआ... हड्डियों में धंसे दर्द की खाल नुच गई, लंबे तपते रेगिस्तान का एकमात्र दरख्त सूख गया... कलेजे को केकड़े ने दबोचा... सांसें अब रेहन पर हैं... जिस्म बेजान। आकाश अब उतना खुला नहीं रहा... धरती का ठोसपन गायब है... जैसे युद्ध के दौरान कर्ण से उसका कवच-कुंडल ही छिन गया हो...। लब्बोलुआब यह कि अब मैं पहले जैसा महफूज नहीं...।

     यह लिखते हुए मेरी उंगलियां कांप रही हैं कि 23 मई 2013 की सुबह ने दुनिया में मेरे सबसे बड़े रिश्ते को खत्म कर दिया। लंबी बीमारी के बाद मां ने अपने जिस्म के साथ मेरा भी साथ छोड़ दिया जिसमें उनकी ‘जान’ बसती थी। उस दिन दुनिया में बहुत सी मांएं अपने बेटों से विदा हुई होंगी। लिहाजा यह संपादकीय उनके ही नाम समर्पित है। प्लीज, मुझे इस बात की अनुमति दीजिए कि मैं निजता में थोड़ी देर बह सकूं इस संवेदनहीन समय में। हालांकि मैं मानता हूं कोई भी निजता समाज निरपेक्ष नहीं होती। न कोई सामाजिकता निजताविहीन। आपको इस बात की पूरी आजादी है ऐसा नहीं भी मानें।

     न तो मुझमें भाषा की सामर्थ्य है, न शब्द-संपदा, न मेधा, न ही लेखन-कौशल कि मैं मां के बारे में कुछ लिखने की हिमाकत कर सकूं...। इस मामले में पूरी तरह कबीर की तरह (तुलनाः लेखन नहीं, विषय) खुद को बेबस मानता हूं जो उन्होंने गुरु की महिमा का बखान करने में महसूस की थी। लेकिन मां ने ही सिखाया था कि कभी भी जिंदगी के सारे रास्ते बंद नहीं होते। घुप्प अंधेरे में भी चलो तो रास्ता निकल आता है। यह भी कि बेबसी को वश में करना ही जिंदगी है। अब मां नहीं है। उनकी सीख है। उसी के आसरे आगे बढ़ूंगा।

     मां कोई एक चेहरा नहीं। रिश्तों का एक ऐसा खूबसूरत चांद है जिसमें हम सब अपने हिस्से का रिश्ता देखते और ढूंढ़ते हैं। वह दूर है, मगर करीब है। पिता सूरज की तरह आग का गोला होते हैं। मां शीतल छांव। एक नरम मुलायम एहसास। आदमी के भीतर का भाव पक्ष। वह सरोकार है। जमीन है। बुनियाद है। जमीन में धंसकर अट्टालिका का भार सहन करती है।

     मां जब होती है तब बहुत कम होती है। जब वह नहीं होती तब बहुत ज्यादा होती है। धमनियों में रक्त के साथ हर पल प्रवाहित। हर सांस जैसे उसकी स्मृतियों की आवाजाही का रथ बन जाता है। उसके बिछुड़ते ही हमारी दुनिया वही नहीं रह जाती जो पहले हुआ करती थी। चीजें वहीं होती हैं, बस उनके मायने बदल जाते हैं। उनको देखने-महसूसने में बदलाव आ जाता है। जुंबिश से लबरेज जिस्म के तस्वीरों-स्मृतियों के संदूक में बंद होते ही जीवन का नया अर्थ खुलता है। मेरे सामने उसकी तस्वीर है, लेकिन उससे आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूं। उसकी चीजें हैं। मगर उनको देखते दिल में कील चुभती है। मशहूर अमेरिकी लेखक पॉल ऑस्टर ने अपनी पुस्तक ‘इनवेशन ऑफ सॉलीट्यूड’ में लिखा है, ‘मरे हुए आदमी की चीजों का सामना करने से ज्यादा भयावह कुछ नहीं होता।... जब जीवन खत्म होता है तब चीजें बदल जाती हैं। भले ही उनके रूप में कोई बदलाव न आता हो। वे उन भूतों की तरह होती है जिन्हें छुआ जा सकता है।’ मां के उन कपड़ों का क्या करूं, जो खामोशी से उसका इंतजार कर रहे हैं। वह उन्हें पहनती आई थी। उस खुरपी का क्या करूं जिससे वह गमलों की मिट्टी खोदती थी, नए पौधे रोपती थी। तांबे की वह लुटिया, पीतल की छोटी बाल्टी, बांस की डोकची जो उनके पूजा-पाठ के अनिवार्य तत्व थे। बाथरूम के शेल्फ पर रखा उनका टूथब्रश। वह पर्स, बैग जिसे लेकर वह पिछले कई सालों से सफर करती रही थी। अलमीरा में खास जतन से रखे गए कुछ रुपए। पिता और हम भाई-बहनों की पुरानी चिट्ठियां। तस्वीरें। एक ब्रीफकेश में बहुत संभालकर रखी गई पिता की फौजी वर्दी जिसे पिता ने 31 मार्च 1988 को अंतिम बार पहना था। वे कपड़े जिन्हें अंतिम बार सिलवाया था, ठंडा तेल जो हमारे सिरों पर वह अक्सर लगाती थी और हम नाक-भौ सिकोड़ उस पर झुंझलाते थे। इनके अतिरिक्त और भी बहुत सारी चीजें जो सांप की तरह फन काढे फुंफकार मार रही हैं, हमें डंसने के लिए...। सच तो यह है वे डस भी रही हैं। हम पहली बार उनकी गैर मौजूदगी में उस फ्लैट में थे जिसमें 32 साल से रहते आए थे। शुरूआती आती सालों के बाद साथ रहना कम ही हुआ। फ्लैट वही था मगर उसमें शमशान से ज्यादा भयावह सन्नाटे हमारे दिलों को नींबू की तरह निचोड़ रहे थे।

     नीत्शे के जरथ्रुष्ट की तरह मैं सिर्फ उसे ही पसंद करता हूं जो रक्त से लिखा जाता है क्योंकि रक्त से लिखे हुए में ही आत्मा और सच्चाई तलाश की जा सकती है। मां का रिश्ता रक्त से लिखा गया होता है।

     सृजन पीड़ा से मुक्त करता है। लेकिन खुद सृष्टा का जन्म पीड़ा से ही होता है। मां स्वभावतः रचनाकार होती है। हम उसकी रचनाएं हैं जिसके लिए उसने असहनीय प्रसव वेदना सही। दुनिया का तो नहीं पता मगर भारतीय औरत को मां के गरिमामयी पद पर बिठाकर उससे बहुत कुछ छीना गया। फलसफा यह कि मां तो त्याग का दूसरा नाम है। उसे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, पूरी तरह चूसो-निचोड़ लो उसे। ऋत्विक घटक कहते भी थे, ‘हमारे अस्तित्व के प्रत्येक पहलू में महान कल्पना मां अपने अद्वैत में हमारे साथ रहती है।

     ऐसा क्यों है जो भी ‘मां’ का दर्जा हासिल किए हुए है वह मजबूर है, गंगा है जो प्रदूषित हो सूख रही है। गाय बूचड़खाने के रास्ते में है, दुर्गा केवल कहने को शक्ति की प्रतीक है, ‘भारत माता ग्राम्यवासिनी’ की अवधारणा बदल गई है, पहले वह गुलामी की जंजीरों में जकड़ी थी, अब भ्रष्टाचार के कैंसर ने मरणासन्न है, वेंटिलेटर पर जबरन जीवित है। धरती के भीतर में सीताएं दफन है, उनका असीम दर्द भी। मां सृजनधर्मी है इसलिए उपेक्षित है। क्योंकि समाज में रचनाकारों को गैरजरूरी मान लिया गया है। बेशक मां को महानता का दर्जा मिला है। लेकिन महानताएं ताकतवर हों यह जरूरी नहीं, वे अक्सर विवशताओं, लाचारियों, उपेक्षा की गर्द में ढकी केवल अपने हौसलों की बैसाखी के सहारे आगे बढ़ती हैं और शिखर पर अपने लिए सार्थक जगह बनाती हैं। शिखर पर लहराती महानताओं के परचम का दर्द हर कोई नहीं जानता। शिखर का अपना अकेलापन होता है।

     पिता सत्ता के प्रतीक होते हैं। मांएं हृदय का। ‘कामायनी’ में भी जयशंकर प्रसाद ने श्रद्धा को हृदय का प्रतीक माना है। अजीब विडंबना है दोनों एक घर में रहते हैं। एकाकार होते हैं... लेकिन सचमुच में हो पाते हैं क्या? दरअसल पिता जो अपने आप में एक सत्ता है वह अपने अभीष्ट को पाने के लिए औरत यानी मां यानी संवेदना का इस्तेमाल करता है। और उसके भीतर बीज रोपकर आगे बढ़ जाता है। पुरुष अपने वीर्य का इनवेस्टमेंट करता है... नौ महीने बाद उसकी फसल काटता है संतान के रूप में। फिर उन्हीं पुरुषों में से एक पुरुष वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कविता भी लिखता है... ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो...।’ ‘अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आंचल में दूध आंखों में पानी।’ बेशक स्थितियों में कुछ परिवर्तन आया है। मगर प्रकृति और प्रवृत्ति तो जस की तस है। अक्सर रातों को नींद न आने पर मां मुझे हाल-हाल तक कहानियां सुनाती थीं। उसकी कई कहानियों में एक मां होती थी, एक राजकुमार होता था...। कहानियों की मां यात्रा पर निकलने से पहले राजकुमार को सीख देती थी, ‘बेटा सब जगह जाना, लेकिन दक्खिन गली मत जाना वहां एक जादूगरनी रहती है... वह राजकुमार को तोता बनाकर पिंजड़े में सदा के लिए कैद कर लेती है।’

     जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं मांएं हमसे पीछे छूटती जाती है... हम उसकी सीखों-हिदायतों से दूर होते चले जाते हैं। हमारा बढ़ता सयानापन मां की इमोशनल बातों को मूर्खता मान उसे कंजरवेटिव की श्रेणी में डाल देता हैं। मेरी मां ने 12 साल पहले सीख दी थी कि बेटा, राजधानी दिल्ली सत्ता का प्रतीक होती है। दिल्ली दिल से दूर करती हैं और सत्ता संवेदना से। उन्होंने मुझे दिल्ली आने से रोका नहीं जबकि वह रोकना चाहती थी। मांएं बेटों की तरक्की के लिए रोकती नहीं... दुआएं देती हैं। क्षमा करें, दुआएं भी भावुकता के दायरे में ही आती हैं। मां बेटे के विकास के लिए प्रार्थनाएं करती हैं, मन्नतें मांगती हैं। बेटे की तरक्की पर सबसे ज्यादा खुश वही होती हैं। लेकिन कई बार हम विस्थापन को ही विकास मान लेने के भ्रम में मां से दूर चले आते हैं। हम दिल्ली आकर दिल की कीमत पर ‘दिल्ली’ हो जाने के मिशन में जी-जान से जुट जाते हैं... तब न मां याद रहती है, न उसकी सीख, न जादूगरनी। हमें पता ही नहीं चलता कि कब हमें जादूगरनी ने राजकुमार से तोते में बदलकर पिंजडे में कैद कर लिया... हम तोते हैं, पिजंडे में हैं, कैदी हैं, इन सबका एहसास भी कहीं छूटता चला जाता है। हमारे भीतर एक दिल भी है, हर पल वह धड़कता है, वह हमें जिंदा रखे हुए हैं, हम उसकी चिंता नहीं करते। लेकिन उसी की बदौलत हम हैं, इसका एहसास हमें तब होता है जब हम बीमार होते हैं... लाचार और असहाय... उस घड़ी दिल यानी मां ही सबसे ज्यादा याद आती है। कुछ तो कारण है कि दर्द में आदमी मां को पुकारता है? दिल्ली मे 12 सालों में क्या हासिल किया, मुझे मालूम नहीं। मगर क्या खोया इसका एहसास इन दिनों बहुत गहरा हो रहा है।

     स्कूल के दिनों में एक प्रश्न आता था, रिक्त स्थान भरो...। हम बहुत आसानी से खाली स्थान भर दिया करते थे... कोई माकूल शब्द लिखकर। 23 मई की सुबह ने मेरे जीवन में एक ऐसा खालीपन छोड़ा है जो तमाम कोशिशों के बावजूद भरा नहीं जा रहा। मैं शब्द ढूंढ़ रहा है, रिश्तों में वह भाव खोज रहा हूं, भटक रहा हूं इधर से उधर... मुझे पागल... सैडिस्ट... नेगेटिव... न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है, सीख दी जा रही है, चीजों को स्वीकारो। अरे, स्वीकार तो लिया है भाई। मगर स्वीकारने से क्या सितम सहनीय हो जाता है, दर्द नहीं होता।

     जिस मां ने मुझे जन्म दिया उसकी चिता में खुद ही आग दी है मैंने। मेरे सामने वह धू-धू जलकर खाक हो गई। जुंबिश भरे जिस्म से वह हमेशा के लिए तस्वीरों में कैद हो गई... जब वह चिता पर रखी जा चुकी थी तो न जाने क्या सोचकर मैंने उनके पैरों को अंतिम बार छुआ... उस छुअन को तब तक नहीं भूल सकता जब मैं खुद ही इसी मुद्रा में न लेट जाऊं...। शायद कुछ इसी तरह का एहसास मां को भी हुआ होगा। जब जन्म देने के बाद पहली बार मेरी गर्म-नर्म शिशु देह को छुआ होगा। फर्क है तो सिर्फ प्रारंभ और अंत का। जन्म और मृत्यु... संभावना और समाप्ति का...। मैं अब भी मां को छूना चाहता हूं, उससे बातें करना चाहता हूं... चाहता हूं दर्द से बेहाल मेरे तपते माथे पर मां के हाथ तेल मालिश करते। जिंदगी के सबसे बड़े दुःख और खुशी को पहले-पहल उसे ही कहूं। दुनिया की हर मां-बेटे से रूठती है, बेटा-मां से। यह हमारे दरमियान भी घटित हुआ। एक दिन-दो दिन बमुश्किल सप्ताह भर में मां मान जाती। लेकिन इस बार तो एक महीने से ऊपर हो गया... रुठकर जाने कहां चली गई... मेरी पुकार उस तक पहुंचती नहीं... कितनी बजर हो गयी वह...। कोई गलती हो गई है तो माफ करो मां, अब लौट भी आओ। समझता सब हूं। मगर कुछ भी समझने को जी नहीं करता। समझना नहीं चाहता। इस तरह की ढेरों गूंगी चाहतें मेरे ही दिल में पसरे सन्नाटों से टकराकर वापस लौट जाती हैं, फना हो जाती हैं। वेदना की इस घड़ी में कोई साथ नहीं... नीत्शे ने ठीक ही कहा है, आदमी अंततः अकेला है।

     क्या जिंदगी में कुछ भी अचानक होता है? मुझे लगता है आकस्मिकताओं के मूल में भी कारगर संदर्भ होते हैं। वे हैं और रहेंगे भी। जीवन में विभाजन है, संबंधों की फांक में हम किसी शरणार्थी की तरह पूरी जिंदगी गुजार देते हैं। इस गर्वीलेपन के साथ कि हम कामयाब हैं, सुकून में हैं, सबसे अलग हैं, खुश हैं। एक भ्रम है जो अब जीने का खूबसूरत सलीका बन गया है। मां पर लिखते-लिखते उत्तराखंड में हजारों लोगों की मौत का दुःख मेरे दुःख को छोटा कर गया। अब तक दुःख का पहाड़। इस बार पहाड़ पर दुःख। प्रलय का जैसे ट्रेलर था यह। एक चेतावनी समझो और अब भी चेतो। पहाड़ को मौज-मस्ती की जगह मानने वाले को वहां का मौजूदा दृश्य विचलित कर सकता है। हौलनाक मंजर उनका मूड बिगाड़ सकता है। यहां लाशें हैं, बर्बादी बयां करते मलबे हैं, रोते कलपते लोग हैं, परिजनों को खोने की पीड़ा है। मैंने तो सिर्फ एक मां को खोया है... यहां मेरे जैसे सैकड़ों-हजारों है जिन्होंने बहुत कुछ खो दिया। मेरा दर्द उनके दर्द में घुलने लगा है।

     मिथकीय अवधारणाओं के मुताबिक यह धरती भी तो मां है। उत्तराखंड में जो कुछ हुआ है वह क्या एक आपदा है, या इसे अलग भी है। क्या वह उस मां का आंसू नहीं है जो गहरे क्रोध और दुःख के साथ प्रकट हुआ है। मुझ पर इल्जाम लग सकता है कि मैं भावुकता में बह रहा हूं। पारंपरिक हो रहा हूं, जड़ता की पारिधि में दाखिल हो रहा हूं। लेकिन मां का मतलब भी तो परंपरा और जड़ों से जुड़ना होता है। मां हमारी जड़ें होती हैं जो धरती में धंसी रहती हैं। हम फैलते हैं, ऊंचा उठते हैं... मां वहीं की वहीं रहती है, जमीन में पकती हुई। मैं अब आपको यह बताने की गुस्ताखी नहीं कर सकता कि जड़ों से कटने का किसी पौधे या दरख्त के लिए क्या मतलब होता है? जानता हूं मैंने आपका मूड बिगाड़ दिया... सुबह है तो दिन चौपट हो गया। रात है तो नींद में खलल पड़ गया। एक सलाह है... मेरी मां क्या, पहाड़ पर आई विपत्ति क्या, आप इस बिगड़े मूड को सुधारने के लिए मल्टीप्लेक्स में पॉपकार्न खाते हुए कोई मस्ती वाली फिल्म देख लीजिए... उत्तराखंड में तबाही है तो हिमाचल या कश्मीर में वीकेंड पर जाकर धमाल कीजिए, इच्छा होती है तो रिलीफ फंड में कुछ पैसे उसी तरह से डाल दीजिए, जैसे किसी भिखारी के कटोरे में सिक्के डालते हैं। संवेदना से जुड़ने और भिखारी को दान देने के दंभ में फर्क होता है। आप जैसे बहुत से लोग मेरी तरह शब्दवीर हैं। शब्द को सजाकर फेंकिए। यह हमारी-आपकी फितरत में शामिल हो गया है।

     मुझे समझाया जा सकता है, दुनिया मां की ममता और उसके आंचल से बड़ी होती है। बेशक बड़ी है। मगर मां भी तो दुनिया से बाहर की चीज नहीं है कि हम दुनिया नापने और कामयाबी रूपी विकास के पावर प्रोजेक्ट के लिए मां को बिसार दें... एक गमनाक हालात और आंसुओं के हवाले कर दें उसे। ...आप तमाम मित्रें के संवेदना से भरे शब्दों के प्रति आभार प्रकट करते हुए मैंने मां की मृत्यु को उसी तरह स्वीकार कर लिया है जैसे इस देश में भ्रष्टाचार को, आजादी के रूप में गुलामी को विकास के नाम पर विनाश को, प्रेम के नाम पर देह को। सरकार के नाम पर सत्ता, सियासत के नाम पर लूट और धर्म के नाम पर धंधे को स्वीकार करते हैं हम। खैर, अगर आपको लगता है कि मैंने अभी तक सिर्फ अपनी मां की बात की तो यह मेरी अक्षमता रही होगी जबकि मैं कोशिश तो कर रहा था उस भाव को पकड़ने की जो मां जैसा होता है, जो नाम हम आप सबके लिए सबसे सुरक्षित स्थल है। अंत में यही कि इतने समय तक आपका समय खराब किया... इसके लिए मुझे क्षमा करें।

प्रेम भारद्वाज

साभार सम्पादकीय 'पाखी' जुलाई 2013

टिप्पणियां

  1. जार-जार रो रही हूँ और कामना कर रही हूँ कि मुझे मेरी माँ से पहले बुलाना प्रभु क्योंकि आपकी दुनिया का परम सत्य मृत्यु है ………

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