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अरज और अन्य कवितायेँ - डिम्पल सिंह चौधरी

अग॰ 15, 2013

डिम्पल सिंह चौधरी शब्दांकन Dimple Singh Chaudhary shabdankan
पेशे से पत्रकार युवा कवियत्री डिम्पल सिंह चौधरी का जन्म स्थान हाथरस (यू.पी.) में हुआ है. दिल्ली में रहने वाली डिम्पल वर्तमान में श्री न्यूज़ में कार्यरत हैं. इनकी कवितायेँ व नज्में ‘अमर उजाला’, ‘दैनिक जागरण’. कल्पतरु एक्सप्रेस, स्थानीय पत्रिका ‘दूर तक’, ‘आईना बोलता है’, ‘मेरठ दर्पण’ व ‘जनपथ’ आदि में प्रकाशित होती रही हैं.
आइये शब्दांकन में इनका स्वागत करें

अरज

सुनो...
डिम्पल सिंह चौधरी शब्दांकन Dimple Singh Chaudhary shabdankan लौट आओ ना
बहुत तन्हा हूं
सुना है
खुद से बातें करने वाले
ऐसे तन्हा लोग
अक्सर
पागल हो जाया करते हैं



सपनों की बोली

सूरज की तपन का पहला स्पर्श
डिम्पल सिंह चौधरी शब्दांकन Dimple Singh Chaudhary shabdankan

जब पलकों की कोर पर पड़ा
तो होश की चट्टानों ने
दबा दिया नींद का शहर
और बैठ गई मैं
याद करने
वो गुज़री रात का सपना
सपना...
मगर सपने आते ही कहां हैं अब
उम्मीदों के,
ख़्वाहिशों के,
राजकुमार या राजकुमारियों के,
सुनहरे कल
या
ख़ूबसूरती से लिपटी सुकून की नींदों के...
वर्तमान में लौटी तो
ख़ुद को समझाना पड़ा
कि खाली पेट
ऐसे क़ीमती सपने
कहां आते हैं
बोली लगती है सपनों की
ख़रीदे जाते हैं सुकून और ख़ुशी के सपने
कल रात
सोयी थी खाली पेट मैं
अब समझ आया
कि आख़िर कैसे
सरक जाते हैं मुफ़िलिसी की नींदों से
ग़रीब के सपने...



कैसी होगी वो

सोच की धूप में
डिम्पल सिंह चौधरी शब्दांकन Dimple Singh Chaudhary shabdankan खुद को हर पल जलाती
सच की अग्नि में
लपट-लपट तपती
अपने हाथों पर से
मेरे नाम की मेंहदी मिटाती
हकीकत के बरक से मुझे धो कर
किसी और को सुखाती
वो...
जो कहती है
कि जी नहीं सकेगी मेरे बिना
वो...
जो कहती है खुद को अधूरा मेरे बिना
वो...
जिसकी नब्ज़ में मेरी ज़िंदगी धड़कती है
वो...
जो छिपा कर खुद में मेरी सांसें रखती है
वो...
जो इंतेहा की हद पर खड़ी
तका करती है आज भी मेरी राहें
वो...
जो कहती कुछ नहीं
बस हर दर्द चुपके सहती है...
कैसे कहूं उसे कि सब ठीक हो जाएगा
कैसे समझाऊं कि नया सूरज फिर आएगा
वो
‘जिसे दुनिया अब किसी और की सुहागन कहती है....’



तुम्हारे शहर में शाम नहीं होती...

जहां देखो वहां खुलूस है तेरी जुदाई का
डिम्पल सिंह चौधरी शब्दांकन Dimple Singh Chaudhary shabdankan तुझे देखा और मर गए जीने वाले

दरख्तों पर वही मौसम अब भी मुस्कराते तो हैं
मगर वो घोंसले, वो पंक्षी अब लौट कर नहीं आते
मेरी आंखों में अब भी तेरे ख्वाब हंसते तो हैं
मगर सांसों में जिंदगी की मोहर लगाने नहीं आते
लगता है तुम्हारे शहर में हिज्र की शाम अब नहीं होती
मेरी उजड़ी शामों में अब तुम साथ रोने नहीं आते
ये जो तेरी सांस मेरे सीने में चलती है, जाने कितनी हैं
दिल के नक़्श पर इनके बाकी निशा तुम बताने नहीं आते
तेरे ख़तों से हर रोज़ बीमारी-ए-पागल बयां करता हूं
होंठों से लगाता हूं घूंट-घूंट मगर मर्ज़ नहीं बताते
मेरी चाहत, मेरी निगाहें तुझे ढूंढती है रेजा-रेजा
उन्ही कदमों पर वापस आओ कि अब ये निशां सम्हाले नहीं जाते



आज़ादी का ख़ौफ़...

ज़ज्बात जो ख़ाली थे
डिम्पल सिंह चौधरी शब्दांकन Dimple Singh Chaudhary shabdankan अब क़ैद हैं
मेरी पीड़ा कि गिरह में
सांसों का बंधन
क्यूं मामूली नहीं लगता
कि जब चाहो
होना आज़ाद इनसे
तो तिलमिला जाती हैं
सांसें,
और
त्याग देती है विचार
आज़ादी का...



सांसों का कैनवास...

खाली है तहज़ीब
डिम्पल सिंह चौधरी शब्दांकन Dimple Singh Chaudhary shabdankan जुबानों में बेबसी के छाले
हर कोई निशब्द
सासों में रेंगते लहू से भरा
हर ज़र्रा
सांसों की ही रोड़ियों पर
जीने की ख़्वाहिश चुभती हुई
भींच लेता है आकर वो
मेरी ज़िंदगी के अक्षरों से
सांसों की मात्राएं सभी
और
लेकर चाबुक हालातों के
उन्हीं मात्राओं से करता है आग्रह
फ़िर से बन जाओ वही अक्षर
जिसे फ़िर उसी निर्मता से
भींचू मैं
टटोलूं मैं
तोड़ दूं बंधन
अक्षरों से मात्राओं का
और सिसके ज़िंदगी
अपना आस्तित्व पाने को
मगर तोड़ दूंगा
हर तार मैं
ज़िंदगी के सितार का
और कर दूंगा लहूलुहान सब
होश-ओ-हवास के कैनवास पर
रेंगता लाल लिबाज़
किसी दिलकश रंग के
सच से महरूम
तू और तेरा आसमां...
आज... मेरे हिस्से की ज़मीं भी बिक गई..


संपर्क

डिम्पल सिंह चौधरी

मकान नं० 41/42
ब्लाक - सी
न्यू अशोक नगर
नई दिल्ली 110 096
ईमेल: dimplechaudhary1607@gmail.com



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