अशोक वाजपेयी - कभी-कभार : कहां जा रहा है?

 इन दिनों देश कहां जा रहा है। इसको लेकर बड़ी व्यापक चिंता हो रही लगती है। उन तबकों में भी, जिनमें देश अभी तक किसी तरह के जिक्र के काबिल नहीं माना जाता था।

      इन दिनों बड़ी देश-चिंता व्याप्त है। सभी को हर ओर दुर्दशा ही दुर्दशा दिखाई दे रही है। लगता है कि हमारे
an Indian poet in Hindi, essayist, literary-cultural critic, apart from being a noted cultural and arts administrator, and a former civil servant. He remained the Chairman, Lalit Kala Akademi India's National Academy of Arts, Ministry of Culture, Govt of India विकास में जो तेज गति आई थी वह धीमी पड़ गई है: वह गति कितनी समावेशी थी इसका जिक्र अक्सर नहीं होता। शहरों में नागरिक सुविधाएं कैसे चरमरा रही हैं, इस पर बहुत विलाप होता है, गांववालों की जिंदगी कितनी दूभर है इसका पता भी इन चिंतामगनों को नहीं होता। इस पर सभी  एकमत हैं कि देश गलत दिशा में जा रहा है और उसे सही दिशा में मोड़ने की जरूरत है। यह सही दिशा क्या हो इस पर मतभेद है। विकास की दिशा तो प्राय: सभी मान रहे हैं कि सही है, पर राजनीति उसे पथभ्रष्ट या दूषित-लांछित करने में लगी है। राजनीति से सभी उकताए हुए हैं।

      लेकिन सच यह भी है कि राजनीति ही देश की दिशा बदल सकती है। ऐसा और कोई माध्यम हमारे लोकतंत्र में नहीं बचा, जो यह करने में सफल हो सके। इसलिए बहुतों को लग रहा है कि राजनीतिक अंधाधुंधी और निष्क्रियता से उबारने के लिए कोई राजनेता चाहिए। अब राजनेता अगर इस कदर मसीहाई और उद्धारक भूमिका निभाने आएगा तो अपनी राजनीति भी साथ ही लाएगा। उस राजनीति में कुछ खूंखारी, दमन, हिंसा आदि भी हों तो क्या किया जाए। इतनी कीमत हमें तो चुकानी ही पड़ेगी। भ्रष्टाचार से हिंसा भली: कुछ लोग मारे जाते हैं, तो यह दुखद होगा, पर जगन्नाथ के रथ तले कुछ तो पिस ही जाते हैं।

      कार के नीचे पिल्ला आकर पिस जाए तो कष्ट तो होता है, पर इतना नहीं कि कार रोक दी जाए और ऐसी दुर्घटना पर शोक मनाते हम देर तक बिसूरें। काल की गति अबाध है: उसे रोका-थामा या धीमा नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर कुछ अन्याय पीछे हो गया हो तो उसे भूल कर हमें आगे बढ़ना होगा। अगर विकास की गति तेज हो गई तो उसके धरमधक्के में ऐसी घटनाएं, भले एक वक्त उन्हें जनसंहार आदि कह कर अतिरंजित किया गया हो, भुला दी जाएंगी। समावेशी नहीं है तो न होने दो, अर्थव्यवस्था को पहले गति में तो लाओ। अन्याय, अपवर्जन आदि को बाद में देखा जाएगा।

      राजनीति में शेखचिल्लीपन और उसके प्रति आकर्षण नए नहीं हैं। लेकिन जो तरह-तरह के युवा उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं, वे सभी पढ़े-लिखे और समझदार लोग हैं। अगर, दुर्भाग्य से, उनकी समझ यह बन गई है कि सामाजिक विभाजन की खुल्लमखुल्ला वकालत करने वाला, उस विभाजन को अपने प्रदेश की राजनीति और अर्थनीति का मूलाधार बना कर अमल में लाने वाला, सामाजिक न्याय की परवाह किए बिना विकास के मॉडल को अर्द्धसत्यों के आधार पर पेश करने वाला हमारा उद्धार करेगा। तो ऐसी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। युवा मानसिकता को बड़े परिवर्तन की आकांक्षा जरूर करनी चाहिए और एक बेहतर भारत का बड़ा सपना भी देखना चाहिए। पर उसे साथ ही यह भी जानना चाहिए कि टुच्ची विभाजक राजनीति ऐसी आकांक्षा और सपने कतई पूरी नहीं कर सकते। बहुलता और सामाजिक न्याय के बिना हमारा कोई भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।

जनसत्ता से साभार

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