रवीन्द्र कालिया - दस्त़खत (अक्टूबर 2013)


जिस गति से वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रगति हो रही है, नयी से नयी तकनीकि का आविष्कार हो रहा है, संचार में अभूतपूर्व क्रान्ति आयी है, उस गति से हमारे समाज की सोच में परिवर्तन लक्षित नहीं हो रहा। देखा जाय तो पिछले कुछ वर्षों से जातिवाद की प्रवृत्ति में इज़ा़फा ही हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति है। जब से जाति के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन होने लगा और मतदान जातिवाद की राजनीति से प्रभावित होने लगा, राजनीतिक दलों ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया। जातिवाद के दुष्परिणाम हमारी सामाजिक संरचना के साथ-साथ हमारे क्रिया-कलापों को भी प्रभावित करने लगे। जातिवाद का विष द़फ्तरों में भी पसरने लगा। विश्वविद्यालय का वातावरण भी इससे अछूता न रह पाया। नियुक्तियाँ तक जातिवाद से प्रभावित होने लगीं।
       अब देखने में आ रहा है कि यह समाज की अन्तरधारा नहीं है। देश में अन्तरजातीय विवाहों का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। ख़बर है कि महाराष्ट्र में अन्तरजातीय विवाहों में चार गुना वृद्धि हुई है। यही नहीं, इन गठबन्धनों में दूल्हा अथवा दुल्हिन दलित हैं। आन्ध्र प्रदेश, केरल और ओडि़शा में गत दो वर्षों में यह संख्या दुगनी हो गयी है। यदि सम्पूर्ण भारत के आँकड़ों पर ग़ौर किया जाय तो स्पष्ट होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर यह आँकड़ा सात हज़ार से बढक़र दस हज़ार तक पहुँच गया है। यह प्रवृत्ति अभी अपने प्रारम्भिक दौर में ही है। याद रहे कि केन्द्र सरकार द्वारा ऐसे दम्पतियों को प्रोत्साहन स्वरूप पचास हज़ार रुपये प्रदान किये जाते हैं। सचमुच भारत एक ऐसे देश के रूप में उभर रहा है, जहाँ विरुद्धों का सामंजस्य देखने को मिल रहा है। एक तऱफ सामाजिक कुरीतियों का कट्टरपन की सीमा तक अनुसरण किया जा रहा है, वर्णव्यवस्था की जकड़बन्दी बढ़ रही है, समाज में पंचायतों के स्तर तक जातिगत दूरियाँ बढ़ रही हैं। कौटुम्बिक हिंसा में इज़ा़फा हो रहा है। आये दिन ऐसी ख़बरें आती हैं कि सगोत्र में विवाहित दम्पतियों को जि़न्दा जला दिया जाता है। वर्ण व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले अपने ही बच्चों को सरेआम फूँक दिया जाता है और पुलिस मूक गवाह बनकर रह जाती है। राजनीतिक दल अधिक-से-अधिक ‘वोट’ बटोरने के चक्कर में कड़ी कार्यवाही करने से कन्नी काट जाते हैं
ऐसा भी एहसास होता है कि हमारा समाज जैसे सामन्ती और आदिम युग की तऱफ लौट रहा है। समय के साथ बदलने की उसमें न ख़्वाहिश है, न इच्छाशक्ति। 
नव जागरण पर बहुत-सी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं और व्यापक चर्चा होती रहती है, मगर इन स्थितियों को देखकर तो आभास होता है कि जैसे हमारे समाज में कभी नवजागरण हुआ ही न हो। आज नवजागरण का न कोई ध्वजवाहक है न आन्दोलन। पंचायतें दिशाहीन हो चुकी हैं। उनमें इतनी अहमन्यता आ गयी है कि वे न क़ानून से डरती हैं न अपनी अन्र्तात्मा की आवाज़ सुनती हैं। हम जैसे जंगल राज में जी रहे हैं। ऐसे समाज के लिए साहित्य, संस्कृति और कला भी बेमानी हो जाती हैं। ऐसी भीषण स्थितियों में यदि कोई युवक युवती धारा के विरुद्ध तैरने का प्रयास करते हैं, तो मौत पर खेलकर ही ऐसा क़दम़ उठा सकते हैं। युवा पीढ़ी ही इस कुहासे को सा़फ कर सकती है और यथासमय कर भी रही है।

       ऊपर दिये गये आँकड़े यही संकेत देते हैं। आँकड़े यह भी बताते हैं कि इस की शुरुआत दक्षिण से हो रही है। आशा की जानी चाहिए कि जैसे भक्ति आन्दोलन दक्षिण से उत्तर की तऱफ आया था, भक्ति का यह नया स्वरूप भी दक्षिण से हरियाणा होते हुए उत्तर तक की यात्रा करेगा— कन्याकुमारी से कश्मीर की यात्रा। इस नवोत्थान का विश्लेषण दलित और स्त्री विमर्श के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए। इसका सीधा सम्बन्ध साक्षरता से जुड़ता है। केरल, महाराष्ट्र और आन्ध्र साक्षरता में अग्रणी प्रदेश है और इन प्रदेशों ने ही जातिगत दुराग्रहों से ऊपर उठने का साहस प्रदर्शित किया है। सामाजिक मूल्यों के उदारीकरण की यह प्रक्रिया देर-सबेर भारत के कोने-कोने तक पहुँचेगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल के बर्बर तत्त्वों को यह भी सोचना होगा कि यदि कन्याभ्रूण हत्याओं का सिलसिला इसी प्रकार जारी रहेगा तो इन प्रदेशों की सन्तानों को विवाह के लिए लड़कियाँ नसीब न होंगी और वे लडक़ी की तलाश में दर-दर की ठोकरें खाएँगे। यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इन प्रदेशों में ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाली लड़कियों को बहला-फुसला और नौकरी दिलाने के नाम पर लाया जा रहा है। उनका यौन शोषण हो रहा है और उनसे बन्धुआ मज़दूर की तरह काम लिया जा रहा है। युवतियों की तस्करी का एक शर्मनाक क्रम देखने को मिल रहा है। इसका अन्त कहाँ होगा, समाजशास्त्रियों के लिए एक नयी चुनौती सामने आ रही है।
सम्पादकीय नया ज्ञानोदय, अक्टूबर 2013
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

3 टिप्पणियाँ

  1. वोट पाने हेतु लोगों को बाँटने की लालसा ने सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया है।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया ..सशक्त और सार्थक आलेख.....
    स्वयं के दक्षिण भारतीय होने पर गर्व महसूस किया.
    सादर
    अनु

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह, खूबसूरत,.भावपूर्ण लाजवाब रचना

    जवाब देंहटाएं

ये पढ़ी हैं आपने?

 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
होली: सतरंगी उत्सव — ओशो | Happy Holi with #Osho
Book Review: मानस का हंस की आलोचना — विशाख राठी
शिवानी की कहानी — नथ | 'पिछली सदी से जारी स्त्री स्वाधीनता की खामोश लड़ाई' - मृणाल पाण्डे
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है — स्नोवा बार्नो की अद्भुत प्रेम कहानी
राजेंद्र यादव: हमारे समय का कबीर - अनंत विजय | Anant Vijay Remembers Rajendra Yadav