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सिनेमा और हिंदी साहित्य - इकबाल रिज़वी | Cinema and Hindi Literature - Iqbal Rizvi

दिस॰ 16, 2013

सिनेमा और हिंदी साहित्य

इकबाल रिज़वी


भारत में फिल्मों ने 100 वर्षों की यात्रा पूरी कर ली है । दरअसल वह अपने दौर का सबसे बड़ा चमत्कार था जब हिलती–डुलती, दौड़ती कूदती तस्वीरें पहली बार पर्दे पर नजर आर्इं । 14 मार्च 1931 को इस चमत्कार में एक सम्मोहन शामिल हो गया और वह सम्मोहन था ध्वनि का । अब पर्दे पर दिखाई देने वाले चित्र बोलने लगे । 1931 में पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ से आज तक सर्वाधिक फिल्में हिंदी भाषा में ही बनाई गर्इं हैं । इस तरह हिंदी भारत ही नहीं भारत के मुख्य सिनेमा की भी भाषा है । विश्व में हिंदी सिनेमा ही भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधित्व करता है । इसी के साथ एक सच यह भी है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों पर सबसे कम सफल फिल्में बन पाई हैं ।

        हांलाकि सिनेमा और साहित्य दो पृथक विधाएं हैं लेकिन दोनों का पारस्परिक संबंध बहुत गहरा है । 
जब कहानी पर आधारित फिल्में बनने की शुरुआत हुई तो इनका आधार साहित्य ही बना । भारत में बनने वाली पहली फीचर फिल्म दादा साहब फाल्के ने बनाई जो भारतेंदु हरिशचंद्र के नाटक ‘हरिशचंद्र’ पर आधारित थी । साहित्यिक कृतियों पर ढेरों फिल्में बनीं लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ आधिकांश का ऐसा हश्र हुआ कि मुंबईया फिल्मकार हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने से गुरेज करते हैं । साल भर में मुश्किल से कोई एक फिल्म ऐसी होती है जो किसी साहित्यिक कृति को आधार मानकर बनाई गई हो ।

        बोलती फिल्मों का शुरुआती दौर पारसी थिएटर की विरासत भर था जहां अति नाटकीयता और गीत संगीत बहुत होता था । धीरे धीरे विषयों के चयन में विविधता आने लगी । फिल्म बनाने वालों ने स्थापित लेखकों और उनकी कृतियों को स्थान देना शुरू किया । हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यकार प्रेमचंद को अजंता मूवीटोन कंपनी ने 1933 में मुंबई आमंत्रित किया । फिल्मों को बोलना शुरू किए अभी महज दो साल ही हुए थे । प्रेमचंद की कहानी पर मोहन भावनानी के निर्देशन में फिल्म ‘मिल मजदूर’ बनी । निर्देशक ने मूल कहानी में कुछ बदलाव किए जो प्रेमचंद को पसंद नहीं आए । फिर अंग्रेजों के सेंसर ने फिल्म में काफी कांट–छांट कर दी । इसके बाद फिल्म का, जो स्वरूप सामने आया उसे देख प्रेमचंद को काफी धक्का लगा । उन्होंने कहा यह प्रेमचंद की हत्या है । प्रेमचंद की यह कहानी फिल्म के निर्देशक और मालिक की कहानी है । इस फिल्म पर मुंबई में प्रतिबंध लग गया और पंजाब में यह ‘गरीब मजदूर’ के नाम से प्रदर्शित हुर्इं

        1934 में प्रेमचंद की ही कृतियों पर ‘नवजीवन’ और ‘सेवासदन’ बनी लेकिन और दोनों फिल्में फ्लॉप हो गई । 1941 में ए.आर.कारदार ने प्रेमचंद की कहानी ‘त्रिया चरित्र’ को आधार बना कर ‘स्वामी’ नाम की फिल्म बनाई जो चली नहीं । यही हाल 1946 में प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ पर इसी नाम से बनी फिल्म का हुआ । इस बीच उपेंद्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा और पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ फिल्मों में हाथ आजमाने पहुंच चुके थे । फिल्मिस्तान में काम करते हुए अश्क और किशोर साहू के साथ लेखन करने वाले अमृतलाल नागर सिनेमा की आवश्यकताओं और सीमाओं को समझ चुके थे । इसलिए वे कुछ समय तक वहां टिके रहे । हांलाकि इस दौरान उन्होंने किसी साहित्यिक कृति को सिनेमा में नहीं बदला बल्कि डायरेक्टर और प्रोड्यूसर की मांग के मुताबिक पटकथा और संवाद लिखते रहे । उग्र अपने विद्रोही और यायवरी मिजाज की वजह से बहुत जल्द मुंबई को अलविदा कह आए । भगवती चरण वर्मा भी साल भर में ही वापस लौट आए ।

        किशोर साहू जब फिल्मों में पहुंचे तो वे कहानियां और नाटक लिख रहे थे । उनके तीन कहानी संग्रह भी छपे । उन्होंने उपेंद्रनाथ अश्क और भगवती चरण वर्मा को लेखन के मौके जरूर दिए लेकिन खुद हिंदी की किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म नहीं बना सके । उन्होंने शेक्सपियर के नाटक ‘हेमलेट’ पर इसी नाम से एक फिल्म जरूर बनाई लेकिन वह फ्लाप रही । इस बीच 1941 में भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर केदार शर्मा ने इसी नाम से फिल्म बनाई और फिल्म सफल भी रही । इसे उस दौर की फिल्मों में अपवादस्वरूप लिया जा सकता है । फिर भी कई कारण ऐसे रहे कि ‘चित्रलेखा’ की सफलता फिल्मकारों को हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित नहीं कर सकी और जिन लोगों ने इक्क–दुक्का कोशिश की उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा ।

        उदाहरण के लिए 1960 में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ पर इसी नाम से फिल्म बनी, आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास पर ‘धर्मपुत्र’ नाम से बीआर चोपड़ा ने फिल्म बनाई, रेणु की ‘कहानी मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ बनी और तीनों फिल्में बुरी तरह फ्लाप रहीं । ‘तीसरी कसम’ को भले ही उसकी श्रेष्ठता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला लेकिन फिल्म फ्लाप होने से भारी कर्ज के बोझ तले दब चुके इसके निर्माता गीतकार शैलेंद्र को दुनिया से कूच करना पड़ा । फिल्मों के लिए कई कहानियां लिख चुके और फिल्में बना चुके कहानीकार राजेंद्र सिंह बेदी की कृति ‘एक चादर मैली सी’ पर भी जब फिल्म बनी तो वह भी फ्लॉप साबित हुई ।

        प्रेमचंद की मृत्यु के काफी समय बाद बाद उनकी तीन कहानियों पर फिल्में बनी लेकिन चर्चित हो सकी सत्यजित राय द्वारा बनाई गई पहली हिंदी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ । तो क्या सत्यजित राय जैसे फिल्मकार ही हिंदी साहित्य को सेलूलाइड पर उतारने में सक्षम थे ? प्रेमचंद जिनकी अधिकांश कहानियां और उपन्यास लोगों को बेहद पसंद आए । न केवल हिदी भाषियों को बल्कि भारत की अन्य भाषाओं और विदेशी भाषा के पाठकों को भी, तो क्या उनके साहित्य में फिल्म बनाने लायक कहानीपन नहीं था । जिस साहित्य को अशिक्षित भी सुन कर मुग्ध हो जाते थे उस पर सफल फिल्म क्यों नहीं बन सकीं ? या फिर ये माना जाए कि हिंदी भाषी फिल्मकारों में ही कोई कमी थी जो विदेशी फिल्मों से कहानियां चुराकर फिल्म बनाना ज्यादा आसान समझते हैं ।

        हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर फिल्म ना बनने का शोर साठ के दशक में सरकारी वर्ग तक भी पहुंचा । फिल्म वित्त निगम ने आगे बढ़कर सरकारी खर्च पर अनेक ख्याति प्राप्त साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्मों का निर्माण कराया । इनमें से अधिकांश फिल्में डिब्बों में बंद हैं । कुछ फिल्में गिने–चुने स्थानों पर रिलीज जरूर हुर्इं लेकिन वे इतनी नीरस और शुष्क थीं कि सीमित बौद्धिक वर्ग के अलावा किसी ने उनकी चर्चा तक नहीं की । इन फिल्मों को बनाने वाले अधिकतर फिल्मकारों ने फिल्म तकनीक का तो ध्यान रखा लेकिन दर्शक उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं थे ।

        दरअसल हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर सफल फिल्म ना बन पाने के कई कारण हैं । साहित्य लेखन अलग विधा है । कहानी या उपन्यास का सृजन एक नितांत व्यक्तिगत कर्म है । जबकि फिल्म लेखन में निर्देशक, अभिनेता–अभिनेत्रियों यहां तक कि कैमरामैन को निर्देशक की दृष्टि पर निर्भर रहना पड़ता है । फिल्म एक लोक विधा है । साहित्य शिक्षितों की विधा है । फिल्म तो रामलीला और लोकनाट्य की तरह आम जनता तक अपनी बात पहुंचाती है उसका उद्देश्य मनोरंजन है चाहे उसके दर्शक अनपढ़ हों या फिर पढ़े लिखे । हिंदी के कई साहित्यकार इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाए । इसके अलावा प्रेमचंद के समय से ही फिल्म निर्माताओं ने लेखक को वह महत्व ही नहीं दिया जिसका वह अधिकारी होता है । सिनेमा में लंबे समय तक लेखक दोयम दर्जे की हैसियत का समझा जाता था । यह स्थिति अधिकांश साहित्यकारों को स्वीकार्य नहीं हुई । यह कहना गलत नहीं होगा कि अनेक सहित्यकारों ने फिल्मी दुनिया में अपने लिए जगह तो चाही लेकिन फिल्मकारों और स्थितियों से तालमेल नहीं बन सका । अपने समय के साहित्यकारों का फिल्मी दुनिया में हाल देखकर उनके समकालीन और बाद की पीढ़ी के साहित्यकारों का फिल्मी दुनिया से मोह भंग हो गया ।

        एक कारण यह भी रहा कि फिल्म बनाने की मुख्य धुरी वह व्यक्ति होता है जो पैसा लगाता है और जो पैसा लगाता है फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र में उसका दखल चलता है । हिंदी का दुर्भाग्य रहा कि फिल्मों में पैसा लगाने वाले सेठ साहित्य से ना के बराबर सरोकार रखने वाले रहे । वहीं हिंदी सिनेमा पर पंजाबी, उर्दू और बांग्लाभाषी फिल्मकार शुरू से ही हावी रहे हैं । एक भी चर्चित फिल्मकार हिंदी भाषी नहीं था । 1931 से 1938 तक हिंदी फिल्में बनाने वाले प्रमुख लोग बाबूराव पेंटर, भालजी पेंढाकर, वी– शांता राम मराठी भाषी थे । पी सी बरुआ, देबकी बोस, नितिन बोस बंगाली थे, चंदूलाल शाह गुजराती तो आर्देशिर ईरानी और वाडिया बंधु पारसी थे, जिनकी प्राथमिकता में हिंदी की साहित्यिक कृतियां लगभग नहीं रहीं । दूसरा पहलू यह भी है कि साहित्यिक कृतियों पर फिल्म लेखन करवाना आसान काम नहीं है इसके लिए पहली शर्त है निर्देशक और प्रोड्यूसर का कृति के मर्म तक पहुंचना और साहित्यकार की मानसिक बुनावट को समझ पाना, और बाजार के दबाव और मनोरंजन के तकाजों के बीच साहित्यकार की सोच के साथ इंसाफ करना । होता यह है कि साहित्यकार की अपनी कल्पना होती है पाठक को वह उस कल्पना से शब्दों के सहारे रू–ब–रू कराता है । एक ही कहानी पाठकों के मन में अलग अलग रूप और प्रभाव के साथ रच बस सकती है जबकि फिल्मकार को कैमरे के माध्यम से कहानी को इस प्रकार प्रस्तुत करना होता है, जिससे अलग अलग प्रदेश, वर्ग और भाषा के दर्शक उससे खुद को जोड़ सकें । सिनेमा में दृश्य और ध्वनि का महत्व शब्दों से अधिक होता है

        सिनेमा से जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि साहित्य लेखन में बाजार की अहम भूमिका नहीं होती जबकि सिनेमा में बाजार का तत्व ना केवल लागू होता है बल्कि हावी भी होता है क्योंकि फिल्म की लागत बहुत होती है । हिंदी के मुकाबले बंगाली फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों को फिल्माने में लेखक की संवेदना, बाजार के तकाजों और फिल्म मेकिंग का जबरदस्त तालमेल बनाया । यहां तक की उन्होंने बांग्ला कृतियों को हिंदी फिल्मों में ढाला तो वे भी सफल फिल्में साबित हुर्इं ।

        शरतचंद्र के उपन्यास पर ‘देवदास’ के नाम से हिंदी में 1925 और 1955 में फिल्में बनीं और दोनों बेहद सफल रहीं । यही हाल ‘परिणिता’ और ‘मंझली दीदी’ का भी रहा । बंकिम चटर्जी की कृतियों पर ‘आनंदमठ’ और ‘दुर्गेश नंदिनी’ जैसी सफल फिल्में बनीं । रवींद्रनाथ ठाकुर की कृति नौका डूबी पर ‘मिलन’ (1946), विमल मित्र के उपन्यास ‘साहब बीबी और गुलाम’ पर इसी नाम से बनी फिल्में बेहद सफल रहीं । यहां केवल कुछ ही फिल्मों का उल्लेख है जबकि इनकी संख्या इससे कहीं अधिक है । यह कहना गलत नहीं होगा कि बांग्ला भाषी फिल्मकारों ने साबित कर दिया कि अगर फिल्मकार, पटकथा और संवाद लेखक साहित्यकार के मानसिक स्तर तक ख़ुद को ले जाने में सफल रहे तो रचना के साथ न्याय किया जा सकता है ।

        सिनेमा में हिंदी साहित्यकारों का असर सातवें दशक में नजर आता है । इसका प्रणेता अगर कमलेश्वर को कहा जाए तो गलत नहीं होगा । उपेंद्रनाथ अश्क और अमृतलाल नागर के बाद कमलेश्वर ही वह महत्वपूर्ण हिंदी साहित्यकार थे जिन्होंने सिनेमा की भाषा और जरूरत को बेहतरीन ढंग से समझा । टेलीविजन से शुरुआत कर उन्होंने सिनेमा में दखल दिया और लंबे समय तक टिके रहे । मुंबई में रहने के दौरान वह ऐसे फिल्मकारों के संपर्क में आए जो साहित्यिक रुचि रखते थे । कमलेश्वर के उपन्यास ‘एक सड़क सत्तावन गलियां’ और ‘डाक बांग्ला’ पर क्रमश: ‘बदनाम बस्ती’(1971) और ‘डाक बांग्ला’ (1974) बनीं लेकिन सफल नहीं हो सकीं । उनकी कहानी पर और भी फिल्में बनीं लेकिन जब गुलजार ने कमलेश्वर की कृति पर ‘आंधी’ और ‘मौसम’ बनाई तो दोनों फिल्में मील का पत्थर साबित हुर्इं । आम दर्शक और बौद्धिक वर्ग दोनों ने इन फिल्मों को सराहा । इसके लिए कमलेश्वर से अधिक प्रशंसा के पात्र गुलजार हैं जिन्होंने मूल कृतियों की संवेदना को गहराई से समझा और दोनों फिल्मों की पटकथा, संवाद और गीत खुद ही लिखे ।

        सातवें दशक में एक ओर हिंदी कथा साहित्य में बदलाव आ रहा था वहीं हिंदी भाषी फिल्मकारों की संख्या भी बढ़ रही थी । बासु चटर्जी बांग्ला भाषी थे लेकिन उन्होंने हिंदी साहित्य का गहरा अध्ययन किया था । राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर उन्होंने फिल्म बनाई जो सफल नहीं हो सकी लेकिन मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच’ पर जब उन्होंने ‘रजनीगंधा’ बनाई तो वह फिल्म लोकप्रिय साबित हुई । हिंदी साहित्य की कृतियों पर उस दौर में कुछ और फिल्में बनीं लेकिन तभी हिंदी फिल्मी दुनिया में एक एंग्रीमैन अमिताभ बच्चन का प्रवेश हुआ और बासु चटर्जी, हृ्षीकेश मुखर्जी, गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल, अरुण कौल, गुलजार जैसे फिल्मकारों के होते हुए भी हिंदी फिल्में भारी हिंसा और घटिया हास्य से लहूलुहान होने लगीं । यह दौर डेढ़ दशक से ज्यादा चला ।

        इस दौर में मनोरंजक विदेशी फिल्मों की हूबहू नकल का शार्टकट खूब चला । इस दौरान कला फिल्मों के नाम पर कुछ साहित्यिक कृतियों पर फिल्में जरूर बनी लेकिन आम दर्शक को ये फिल्में छू भी ना सकीं । नवें दशक के अंत में हिंदी फिल्मों में प्रयोग शुरू हुए लेकिन साहित्यिक कृतियां लगभग नदारद रहीं ।

        हिंदी फिल्मों को मौजूदा परिदृश्य बहुत बदल चुका है हर तरह की फिल्में बन रही हैं विषयों में इतनी विविधता पहले कभी नहीं दिखाई दी । छोटे बजट की फिल्मों का बाजार भी फूल–फल रहा है । साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने की समझ रखने वाले युवा हिंदी भाषी फिल्मकारों की जमात तैयार हो चुकी है लेकिन फिलहाल हिंदी फिल्में पत्रकारिता से फायदा उठा रही हैं । अभी जोर बायोग्राफिकल फिल्में बनाने पर अधिक है शायद अगला नंबर साहित्यिक कृतियों का हो लेकिन जरूरी नहीं वे कृतियां हिंदी साहित्य की हों ।

        (लेखक सुपरिचित सिनेमा समीक्षक हैं)


साभार बहुवचन

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