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हंस – एक अंजुमन जिसमे जाना था बारबार - रवींद्र त्रिपाठी | Ravindra Tripathi on Rajendra Yadav

हंस – एक अंजुमन जिसमे जाना था बारबार 

रवींद्र त्रिपाठी 

राजेंद्र यादव के बारे में कहां से बात शुरू करूं? शुरू से शुरू करूं या अंत से? शुरुआत तो 1982 से हुई थी जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में पढ़ने के दौरान ‘हिंदी साहित्य सभा’ का अध्यक्ष था और उनको एक कार्यक्रम में निमंत्रित करने उनके तब के शक्तिनगर वाले रिहाइश पर गया था। वहां वे पहली मंजिल पर रहते थे। पहली मुलाकात में ही उन्होंने बता दिया था कि मकान मालिक से वे मुकदमा लड़े रहे हैं, लेकिन अदालत दोनों साथसाथ जाते हैं। उसी वक्त लगा कि इस आदमी में एक अनौपचारिक है और पहली मुलाकात में मिलने वाले को दोस्त बना लेता है। यह दोस्ती उनके निधन तक बनी रही। और, आखिरी मुलाकात दक्षिण दिल्ली के ही एक मकान में हुई, जिसमें बांग्ला देश की लेखिका तसलीमा नसरीन भी थीं। इन दोनों मुलाकातों के बीच 31 बरसों की असंख्य मुलाकातें हैं। दरियागंज के ‘हंस’ के दफ़्तर में, उनके घर पर भी; हालांकि घर उन्होंने कई बदले। शक्तिनगर के बाद वे पहले हौजखास गए थे। मन्नू जी को डीडीए का फ़्लैट आवंटित हुआ था। उसके बाद वे मन्नू जी से अलग रहने का फैसला करके मयूर विहार में केदारनाथ सिंह के मकान में बतौर किरायेदार गए, फिर बतौर किरायेदार ही मयूर विहार के ही हिंदुस्तान टाइम्स अपार्टमेंट्स में और आखिर में आकाश दर्शन अपार्टमेंट्स में, जो उनका अपना था। महफिल जमाना राजेंद्र यादव का स्वभाव था और शायद यह भी एक कारण था कि वे हौजखास छोड़कर मयूर विहार गए थे। महफिलें पहले ‘हंस’ के दफ़्तर में सजती थीं, बाद में उनके घर पर।

      राजेंद्र जी ने अपनी जिंदगी की पारी दो हिस्सों में खेली। पहली थी कथाकार वाली, जिसमें मोहन राकेश और कमलेश्वर के साथ उनकी त्रयी हिंदी कहानी जगत पर उभरी और छा गई। ‘नई कहानी’ आंदोलन को लेकर कई विवाद और बहसें हैं। लेकिन यह निर्विवाद है कि ‘नई कहानी’ की कहानी के सबसे ज्यादा दिलचस्प और मजेदार किस्से राकेश-यादव और कमलेश्वर से ही जुड़े हैं।

      ‘हंस’ के प्रकाशन से राजेंद्र यादव की दूसरी पारी शुरू होती है। यह पारी साहित्येतर भी थी और साहित्यिक भी। इस दौर में राजेंद्र यादव ने कहानियां शायद दो-तीन ही लिखीं। ज्यादातर संपादकीय ही लिखा। लेकिन जो लिखा उससे अधिक अहम है ‘हंस’ के माध्यम से जो माहौल बनाया। कई लोग उनके इस दूसरे दौर के लेखन को उतना महत्त्वपूर्ण नहीं मानते जितना उस माहौल को, जिसे राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ के माध्यम से बनाया था। और वह माहौल था हिंदी में ‘महिला-दलित-मुसलिम विमर्श’ का। इसी का नतीजा था कि हिंदी साहित्य की बहसें साहित्य के अहाते से बाहर निकलकर समाज में उन इलाकों में प्रवेश कर गईं जहां नई अकुलाहटें पैदा हो रही थीं। और इस प्रसंग में उनके लेख, विचार, किताबें उस तरह से उल्लेखनीय नहीं हैं जितना ‘हंस’ का एक मंच होना। ऐसा मंच, जिस पर कई तरह के साहित्यिक-वैचारिक दंगल होते रहे। आरक्षण के सिलसिले में, दलितों के सवाल पर, नारी मुक्ति और यौन-आजादी को लेकर, मुसलमानों की हालत को लेकर, इसलाम में औरतों के हक को लेकर।

      यादव जी के संपादन में ‘हंस’ प्रेमचंद की परंपरा वाली पत्रिका थी या नहीं, ये बहस का विषय है, लेकिन वह पिछले सत्ताइस सालों से हिंदी की सर्वाधिक हलचल भरी पत्रिका थी इसमें संदेह नहीं। वैसे सूचनार्थ ये कि ‘हंस’ नाम उन्होंने प्रेमचंद के ‘हंस’ से नहीं लिया था, बल्कि दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कलेज की इसी नाम की पत्रिका से लिया था। कानूनी समझौते के तहत। कुछ लोग इसे राजेंद्र यादव की चालाकी बता सकते हैं कि उन्होंने प्रेमचंद की प्रगतिशील परंपरा को हड़पकर अपने ‘हंस’ को उससे जोड़ लिया। पर क्या ये चालाकी भर थी? अगर थी भी तो? या एक सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक जिम्मेदारी निभाने की सचेत तैयारी भी, जिसकी पृष्ठभूमि ‘नई कहानी’ आंदोलन के अवसान के बाद बन गई थी।

      कइयों का यह आरोप सही है कि पिछले कुछ वर्षों से ‘हंस’ की कहानियों का स्तर पहले जैसा नहीं रह गया था। इसका कारण शायद यह था कि पहले हरिनारायण जैसे उनके सहयोगी वहां से विदा हुए और अपनी पत्रिका ‘कथादेश’ निकाली और फिर लंबे समय तक संपादकीय सहयोगी रहीं अर्चना वर्मा। हालांकि अर्चना जी राजेंद्र जी से जुड़ी रहीं, लेकिन औपचारिक रूप से वे भी ‘कथादेश’ से जुड़ गईं। इन दोनों के वहां से हटने के बाद कहानियों के चयन की प्रक्रिया में पहले जैसी निरंतरता नहीं रही। और फिर राजेंद्र यादव का बिगड़ता स्वास्थ्य भी कारण बना। बावजूद इसके कि ‘हंस’ की कहानियां बाद में सपाट और उबाऊ होने लगीं, एक वैचारिक मंच के रूप में ‘हंस’ की हैसियत कायम रही। एक तरह से भारत की कई पत्र-पत्रिकाओं में तसलीमा नसरीन पर अघोषित प्रतिबंध लगा, पर ‘हंस’ में वे लगातार प्रकाशित होती रहीं। हालांकि तसलीमा ने वहां मौलिक रूप से कम ही लिखा। उनके ज्यादातर लेख उनके ब्लॉग से लिए जाते थे, पर उनको छापने का जोखिम हिंदी में सिर्फ राजेंद्र यादव ही उठा सकते थे। लगातार दो साल उठाया भी। 2011 से लेकर अपने संपादन में निकले आखिरी अंक तक।

      इस तरह के कई जोखिम वे उठाते रहे। कुछ मर्तबा तो जोखिम उठाने वाली भावना सीमा रेखा पार भी कर जाती थी। बहुतों को याद होगा कि कुछ साल पहले राजेंद्र जी ने ‘हंस’ में छाप दिया कि हनुमान जी प्रथम आतंकवादी थे और उनके आतंकवादी होने का सबूत लंका-दहन है। ‘रामचरितमानस’ की कुछ चौपाइयां उद्धृत कर दीं और कहा, ये प्रमाण हैं। बड़ा हो-हल्ला मचा। खैर, यादव जी का मकसद भी था कि हल्ला मचे। विवादित होने की गहरी आकांक्षा उनके भीतर थी। लेकिन साथ ही यह हुआ कि दरियागंज के पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी गई। उसके बाद वहां का थाना प्रभारी यादव जी को फोन कर पूछताछ के लिए बार- बार बुलाने लगा। यादव जी ने कुछ रसूखदार लोगों को फोन पर ये सब बताया भी। लेकिन थाना प्रभारी के फोन आने बंद नहीं हुए। शायद फोन पर पुलिसिया धमकी भी मिली। यादव जी परेशान। मुझे एक दिन बुलाया और कहा-‘यार पत्रकार हो, कुछ करो।’ मैंने फोन पर थाना प्रभारी से बात की। उसने बात की, लेकिन इस बात पर अड़ा हुआ था कि मामला कानूनी है। फिर मैंने वकील अरविंद जैन को फोन किया कि क्या किया जाए। अरविंद जैन एक जमाने में राजेंद्र जी के काफी करीब थे। लेकिन बाद में किसी वजह से दोनों की दूरियां बढ़ गईं। फिर भी वे ‘हंस’ के दफ़्तर में आ गए। राजेंद्र जी दफ़्तर से निकलने ही वाले थे। हम तीनों ने तय किया कि रास्ते में थाने होते हुए चलते हैं। मैंने थाना प्रभारी को फोन किया कि हम लोग आ रहे हैं और हमारे साथ एक वकील भी हैं। हम तीनों थाने पहुंचे। पता नहीं क्या हुआ कि वह इंस्पेक्टर वहां से निकल चुका था। मैंने और अरविंद जैन ने उसे फोन पर काफी सुनाया कि हिंदी के इतने बड़े लेखक और संपादक को आप परेशान कर रहे हैं। थाना प्रभारी बोला-मैं आ रहा हूं। लेकिन हमने कहा कि अब हम निकल रहे हैं और आप (थाना प्रभारी) अपने कर्तव्य नहीं निभा रहे हैं। खैर, उसके बाद उसके फोन आने बंद हो गए।

      अब राजेंद्र यादव नहीं हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि ‘हंस’ का क्या होगा? हबीब तनवीर के बाद आज ‘नया थिएटर’ होते हुए भी नहीं है। क्या ‘हंस’ के साथ भी यही होगा? या इसका उलट?


रवींद्र त्रिपाठी

वरिष्ठ पत्रकार 
संपर्क: tripathi.ravindra@gmail.com
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