एक हत्यारे का हलफ़नामा - प्रेम भारद्वाज

पूर्वकथनः दिसंबर का मतलब साल का अंत, खत्म हो जाने का महीना। लेकिन इसके पहले ही कुछ ‘अंतों’ ने मुझे अंतहीन यंत्रणा के हवाले कर दिया। मन्ना डे, राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, विजयदान देथा, केपी सक्सेना, हरिकृष्ण देवसरे, ओमप्रकाश वाल्मीकि और इनके बीच मेरी पत्नी लता श्रीवास्तव। इन सबका जाना साहित्य और कला जगत के लिए अपूर्णीय क्षति है। लेकिन इनमें से दो लोगों (राजेंद्र यादव और लता श्रीवास्तव) का जाना मेरे लिए निजी हानि से ज्यादा गहरा आघात है। बाकी सब पर बाकी लोग लिखेंगे, लिख रहे हैं। लेकिन ‘लता’ पर तो ‘प्रेम’ को ही लिखना होगा। उनकी स्मृति के हवन-कुंड में कुछ लाचार, बेबस, बासी शब्दों की आहुति। इससे उठता धुंआ जब आप तक पहुंचेगा, तब इनमें अर्थ भरने की जिम्मेदारी आपकी होगी।
   

        डियर प्रेम
        हैप्पी बर्थडे
        भगवान से दुआ करती हूं, अभी तक जो खुशी आपको नहीं मिली उसे वह पूरा करे और जो थोड़ी-बहुत मिल पाई है, उसके लिए उसका बहुत-बहुत शुक्रिया।

       मैं हर रोज दुआ करती हूं (जो आप नहीं जानते) कि ईश्वर आपको उस मुकाम तक पहुंचाए जहां आपको कोई छू भी न पाए, यह दुआ इतनी जल्दी कबूल हो ताकि मैं उसे महसूस कर सकूं, देख सकूं।
       आपको मैं अब क्या दे सकती हूं, मेरे पास अपनी जान के सिवाए कुछ नहीं है, प्यार तो मरते दम तक (...शायद मरने के बाद भी) रहेगा। बस इतना जान लीजिए कि मैं निःस्वार्थ भाव से आपके लिए कुछ भी कर सकती हूं।

       यह ऐतिहासिक पत्र है। जहां तक याद है इस शताब्दी का मेरे द्वारा आपको लिखा पहला पत्र है। इसे संभालकर रखिएगा। प्रेम! आप इतने व्यस्त रहते हैं कि मुझसे पहले की तरह दोस्त के रूप में बैठकर बातें नहीं कर पाते। मैं इस बात को लेकर दुःखी नहीं हूं पर अब कम से कम दो-तीन घंटे पहले की तरह बातें कर सकते हैं, जो समय सिर्फ और सिर्फ हमारा हो। डर लगता है, कहीं ज्यादा तो नहीं मांग लिया। अगर बुरा लगा हो तो माफी चाहूंगी। प्लीज! नाराज या गुस्सा मत होना।

       बहुत कुछ लिखकर बताना या बोलना चाहती हूं... पर आज नहीं, फिर कभी। लिखने बैठूंगी तो एक किताब बन जाएगी। लिखूंगी एक किताब जल्द ही, बस एक ही। किताब जो आपको ही समर्पित होगी, जल्द कुछ गानों की लिस्ट भी आपको डेडिकेट करनी है, सिर्फ आपके लिए... मेरी गलतियों के लिए क्षमा करेंगे। सदा खुश रहे, मस्त रहे।

       आपकी जिंदगी (यह प्यारा उपनाम 1995 में आपने ही दिया था)

       ...

       उपरोक्त पत्र सत्तर के दशक की टिपिकल रुमानियत से भरी किसी प्रेम कहानी का हिस्सा नहीं है, न लुगदी साहित्य के सरताज रानू, गुलशन नंदा या मनोज के अब लुप्त हो गए उपन्यासों का अंश। न ही पर्दे पर रुलाने वाले किसी फिल्मी मेलोड्रामा का क्लाइमेक्स। इस खत को अपने सनम के लिए लिखे गए अनगिनत खतों में एक भी मान सकते हैं आप। इसे मेरी पत्नी लता श्रीवास्तव ने मेरे पिछले जन्मदिन यानी 25 अगस्त को लिखा था, एक ऐसे दौर में जब खत लिखने का चलन खत्म हो चुका है। अन्य उपहारों के साथ इसे सौंपते हुए उसने मेरे माथे को प्यार से चूमा था, इस हिदायत के साथ कि इसे अभी और इसी वक्त पढ़ो। तब मुझे क्या, शायद उसे भी इसका इल्म नहीं था कि उसका यह खत ‘आखिरी खत’ साबित होगा। 24 अक्टूबर रात 9:50 बजे तक जो ‘है’, दस मिनट बाद वह ‘थी’। इस छोटे से अंतराल ने उसे ‘है’ से ‘थी’ में बदल दिया। अब इन दो शब्दाें की खोह में दुबका मैं अश्वत्थामा, प्रिमिथियस और सिसिफस की अभिशप्तता से भर गया हूं। कैसे?... कुछ इस तरह... इस हलफनामे के साथ।

       मैं प्रेम भारद्वाज पति लता श्रीवास्तव, यह घोषणा करता हूं कि मैं एक व्यक्ति से कब प्रतीक बन गया, मुझे पता ही नहीं चला। झूठ भय की अभिव्यक्ति होती है। मैं अब भयमुक्त होना चाहता हूं। फिलहाल शोकग्रस्त हूं... विपदाग्रस्त भी। शोक में ही हम अपनी सही शक्ल देख पाते हैं... शीशे के आईने में तो अब तक खुद को देखता आया हूं... एक बार शोक के आईने में खुद को देखना चाहता हूं। इस बात से बेपरवाह होकर कि वह कितना अच्छा है या कितना बुरा। अच्छे-बुरे से ज्यादा अहमियत मेरे लिए ‘सच’ को समझने की है। सच ही हो जाने की है।

       ...और सच क्या है?

       ठीक चार महीने बाद एक बार फिर मृत्यु... कलेजे का ‘धक’ से रह जाना... आंखों का समंदर बनना, दुनिया का वीरान... फिर से चिता पर देह... उसकी मुखाग्नि के लिए आगे बढ़ता मैं... फिर चिता की उठती लपटें... लेकिन जो इस बार चिता में जलकर राख में तब्दील हुई वह मेरी मां नहीं, पत्नी है। मुट्ठी भर राख... उसमें फैली अस्थियां, गेंदे के फूल। उनमें छिपी चिंगारियां सच की।

       एक तेजाबी एहसास पल-पल मुझे गला रहा है। आस-पास सांत्वना के रेंगते, घसिटते, लाचारी की वैशाखी पर झूलते शब्द। ईश्वर की यही मर्जी है... इतनी ही उम्र थी... वक्त ही मरहम है... उनकी यादों के सहारे आगे बढ़ें...वे हमेशा आपके साथ हैं... रोने से उनकी आत्मा को तकलीफ मिलेगी... इत्यादि। कुछ लीक से हटकर भी, मसलन, अब समय यह चाह रहा है कि आप अकेले ही रहें। रेंगे, घिसटें, हाथ-पांव छिल जाए, मगर खुद ही आपको आगे बढ़ना है... दया स्थायी भाव नहीं होता। जो भीतर चल रहा है, उसे साक्षी भाव से देखिए, कुछ रिएक्ट मत कीजिए... आंखों से बहते खारेपन को रोकिए मत... उन्हें बहने दीजिए... इन आंसुओं, बेचैनियों... इन सबमें लता है...। कुछ लोगों की जिंदगी प्रयोगशाला बनकर रह जाती है... ईश्वर तरह-तरह के प्रयोग करता है, उन्हीं की वे परीक्षाएं भी लेता है बार-बार। विध्वंस सृजन की बुनियाद है... सृजन ही आपको बचाएगा। ये ढेर सारे शब्द अर्थहीन थे, लेकिन इस अर्थहीनता में कोई अर्थ भी छिपा था।

       मैंने उसके ‘होने’ से ज्यादा ‘नहीं होने को’ प्रेम कर रहा हूं। जीवन की बजाए मृत्यु को... अस्तित्व के बनिस्पत स्मृति को। उसको खोने पर उसके ‘होने’ की अहमियत जानी। पहली बार जाना कि जिंदा रखकर कलेजे के निकाल लिए जाने का दर्द क्या होता है? समझा कि मछली के लिए जल का मतलब क्या होता है? यह भी कि खुद मरना, मरना नहीं होता। वह तो मुक्ति है। किसी अपने को बेहद करीब से मरते देखना और उसके विछोह की पीड़ा से गुजरना ही सही में मरना है।

       इससे पहले कि मैं भावुकता का कुतुबमीनार हो जाऊं। अलग हो जाता हूं, थोड़ी देर के लिए। अब आगे मेरे भीतर के पुरुष की आत्मस्वीकृतियां होंगी और मेरे पत्नी के अंदर रहने वाली स्त्री का प्रकटीकरण। मेरे भीतर का पुरुष मामूली अलगाव के बावजूद एक सामान्य पुरुष का ही प्रतीक है। वह दंभी है, सामंती है, हिंसक है, स्वार्थी है। थोड़ा साहसी, ज्यादा कायर है। संघर्षशील है और आलसी भी। संवेदनशीलता की प्रचुरता के बावजूद कुछ मामलों में बेपरवाह। माथे पर श्रेष्ठता ग्रंथि का टीका लगाए जो लोगों को दिखाई नहीं देता, मगर पत्नी ने देख लिया था। मन्नू भंडारी ने सही कहा है, ‘बस एक लेयर का फर्क होते है, उसे हटाओ तो उसको नीचे हर मर्द फ्रयूडल है।’ खुद को मैं इसका अपवाद नहीं मानता।

       पुरुष ने स्त्री से प्रेम किया। स्त्री ‘प्रेम’ हो गई। स्त्री प्रेम को जीती रही। पुरुष उसके प्रेम को ऊर्जा (रचनात्मकता) में ढालकर आगे बढ़ता रहा। स्त्री चाहती थी कि उसका प्रेम पृथ्वी को नाप ले। सफलता का सूरज बन जाए। पुरुष कभी यह नहीं जान पाया स्त्री की अपनी क्या चाहत है? क्या गंतव्य है? वह उसके भीतर थी, और वह जमाने में। स्त्री-पुरुष के प्रेम की परिणति विवाह में हुई। शादी स्त्री के लिए संघर्ष थी। पुरुष के लिए सुविधा। स्त्री के लिए खुशी का मतलब साथ में चाय पी लेना था। कोई पसंदीदा नाटक या फिल्म देखना भर था। न सपने थे, न ख्वाहिशें और न कोई योजना। मामूली इच्छाओं की चूड़ियां जो कभी खनकती थी, कभी टूट जाती थीं, उनके टुकड़े बिस्तर पर चुभते थे। चूड़ियों के टूटने और उनके टुकड़ों के चुभने का मर्म सिर्फ कोई स्त्री ही समझ सकती है। पुरुष तो चूड़ियों के टूट जाने का सबब बनता है या फिर स्त्री-देह में छलछला आए रक्त की बूंदों को देख गर्व से भर जाता है। हर स्त्री बेशक एक देह होती है। लेकिन गौर से देखो तो देह गौण हो जाती है। वह धुंधली होती है। जो चीज पूर्णिमा के चांद की तरह आसमान में चमकती है, वह उसका दिल है। दिल धड़कता है। धड़कनों में एक संगीत। संगीत में जीवन के तमाम खुशनुमा रंग। एक शब्द में ढलता वह संगीत। पपीहरे की तरह उसकी एक ही रट। एक ही टेक, प्रेम... प्रेम... प्रेम...। वह हर चीज जो जिंदगी को खुशहाली और मजबूती देती है मोहब्बत है।

pakhi hindi magzine distributors पाखी यहाँ उपलब्ध है       स्त्री पुरुष के लिए पगडंडी, सीढ़ी और पुल... होती है जिनसे होकर पुरुष गुजरता, पार होता है। जयी होता है। और फिर भूल जाता है पगडंडी, सीढ़ी, पुल जो उसकी कामयाबी के कारण थे। स्त्री मायने पत्नी ही नहीं- मां, बहन, प्रेमिका और दोस्त भी। उत्सर्ग का दूसरा नाम है स्त्री। औरत जल है, पुरुष उसमें तैरती मछली। पुरुष जहां सबसे पहले तैरता है वह स्त्री का गर्भ होता है जहां पानी भरा रहता है। बेशक नौ महीने बाद पुरुष उस जल से बाहर आ जाता है। मगर रहता है ताउम्र औरत के स्नेह-जल में ही। जब कभी भी वह उससे बाहर आता है, जल बिन मछली की तरह छटपटाने लगता है या मछली से हिंसक मगरमच्छ बन जाता है वह भी मेरे लिए जल थी। अब मैं जल से बाहर हूं, मछली की तरह छटपटाता। प्रत्येक स्त्री दिल की तरह होती है जो हर पुरुष के भीतर हर घड़ी धड़कती रहती है। मगर पुरुष इस बात से अनजान रहता है। उसे उसकी अहमियत का पता भी नहीं होता है। पहली बार उसे फर्क तब पड़ता है जब दिल बीमार हो जाता है। जीवन खतरे के जद में दाखिल होता है। जिंदगी खत्म हो सकती है, इस डर से दिल का ख्याल। अक्सर होने और खत्म हो जाने के बाद भी हम इस बात से अनजान रहते हैं कि हमारे भीतर कोई दिल भी था जो सिर्फ और सिर्फ हमारी सलामती के लिए बिना थके, बिना रुके, बगैर किसी गिले-शिकवे के हर पल धड़कता रहा।

       हम एक साथ दो दुनियाओं में रहते हैं, एक जो भौगोलिक दुनिया है। उस दुनिया के भीतर एक छोटी सी हमारी दुनिया होती है जो वास्तविक दुनिया का कल्पांश भी नहीं होती। हमारी अपनी दुनिया वही छोटी सी होती है जिसके हम बाशिंदे होते हैं। हम एक साथ दोनों दुनिया में बसर करते हैं। ऐसा अक्सर होता है कि हमारी अपनी छोटी दुनिया किसी तूफान में पूरी तरह से उजड़ जाती है, हम वहां से विस्थापित हो जाते हैं। फिर हमारा कभी पुनर्वास नहीं हो पाता। पुनर्वास बस्तियों का होता है, जीवन का नहीं। यहां यह भी जोड़ना चाहूंगा कि कोई किसी का रिप्लेसमेंट नहीं हो सकता, जटिल जीवन का यह सरल फंडा है।

       जानता हूं मृत्यु को जीवन से जीवित नहीं किया जा सकता। यह भी कि मृत्यु से जीवन की मृत्यु भी नहीं होती। उसका (पत्नी का) नहीं रहना उसी तरह चमत्कार है, जैसे कि उसके नहीं रहने पर मेरा रहना। अब मेरा जिंदा रहना अश्वत्थामा, सिसिफस और प्रिमिथियस की सी अभिशप्तता है। ग्रीक मिथक है कि प्रिमिथियस ने ईश्वर के रहस्यों को जानकर मनुष्यों को समक्ष उद्घाटित कर दिया था। उसने मिट्टी से मनुष्यों को रचा और स्वर्ग से उनके लिए आग चुराकर लाया। इस संगीन अपराध की उसे यह सजा सुनाई गई कि वह अनंतकाल तक शिलाओं से बंधा रहेगा और उसके जिगर को गिद्ध नोचते रहेंगे। मुझमें प्रिमिथियस सा नायकत्व तो नहीं, मैंने ऐसा कोई अपराध भी नहीं किया। मगर मुझे ऐसी सजा बार-बार महसूस हो रही है। एक अश्वत्थामा भी है जो मेरे भीतर बेचैनी बनकर मुझे विक्षिप्त किए हुए है। सिसिफस जो पहाड़ बनी जिंदगी में हर सांस के साथ हिमालय चढ़ता है और हर सांस के साथ उतरता है। निरंतर, बार-बार...।

       एक नामालूम सी भट्टी में धधकता मैं यह समझने की बार-बार कोशिश कर रहा हूं कि लता के रहने और सहसा उसके चल जाने का तिलिस्म क्या है? 24 अक्टूबर की रात जो कयामत की रात न होकर भी हमारे और उसके साथ की अंतिम रात थी। रस्म के अनुसार उसके सिरहाने एक दिया जलाया गया जो 12 घंटे बाद उसके अंतिम सफर के साथ ही बुझा दिया गया। मगर वह दीया अब भी मेरे भीतर जल रहा है, इससे पहले भी एक चिराग-ए-मोहब्बत तब रोशन हुआ था जब 5 जून 1995 को वह पहली बार मेरी दोस्त बनी थी। खुद राख में तब्दील हो मुझे वह ‘रात’ कर गई है जिसकी कोई भोर नहीं। रात में दोनों ही चिराग एक साथ रोशन हैं, उसकी मोहब्बत और उसके विछोह का भी।

       मुझे जन्मने और पालन-पोषण में मां ने अपनी हड्डी को गलाया। लेकिन मुझे गढ़ने, इस मोड़ तक पहुंचाने में मेरी पत्नी का खून जला है, साथ ही दिल भी जरूर जला होगा। मैं दोनों की ही अस्थि-राख से पैदा हुआ हूं। मेरा गुनाह है कि मैंने उससे उसका वक्त चुराया है, उन चुराए पलाें में कुछ लिखा, कुछ पढ़ा और अपने लिए एक पहचान अर्जित की, अगर कोई है। वह मेरी आदत में कब शामिल हो गई, कब लहू बन नसों में घुल गई, अस्थि-मज्जा में धंस गई, मुझे पता ही नहीं चल सका। मैं उसे 24 कैरट का सोना बनाना चाहता था और वह जमाना थी। दुनियावी थी। जिसमें थोड़ी बहुत मिलावट जरूरी है जीने के लिए। उसमें मां के गुण, उसकी सी ममता-प्यार ढूंढ़ता रहा और उस कोशिश में उसे भी खो दिया। उससे सिर्फ सच ही बोलने का दुराग्रह करता और वह अक्सर झूठ बोलती थी। इस दलील के साथ, ‘आप नहीं समझोगे, झूठ हम स्त्रियों के लिए एक सुरक्षा कवच है, वर्ना आप पुरुषों की दुनिया हमारा पल भर भी जीना मुहाल कर दे।’

       दुनिया में किसी भी औरत की सामान्य मौत नहीं होती, पुरुष उसकी हत्या करता है। हत्या के सबक और तरीके जुदा होते हैं। मौत और हत्या का फर्क सिर्फ महसूसा ही जा सकता है। सबूतों के अभाव में उसे साबित नहीं किया जा सकता। हर पुरुष हत्यारा है, स्त्री की हत्या कई तरीकों से की जाती है। सबसे पहले तो उसे स्त्री होने का एहसास कराकर, उसके सपनों-भरोसों को तोड़कर, उसकी बांहें मरोड़ने से लेकर बलात्कार तक हत्या ही तो है। और बलात्कार कैसे-कैसे, कब-कब, कहां-कहां होते हैं, यह न स्त्री से छिपा है, न बलात्कारी पुरुष से। जिस तरह सारे पागल पागलखाने में नहीं हैं, उसी तरह सारे बलात्कारी और स्त्रियाें के हत्यारे जेलों में नहीं हैं, न ही उनके विरुद्ध कोई रिपोर्ट है। मगर एक अदालत ऐसी भी है, जहां कोई सबूत नहीं मांगा जाता। वहां सिर्फ सजा सुना दी जाती है और केवल अपराधी को ही मालूम होता है कि वह सजा भुगत रहा है।

       सार्त्र कहते हैं, ‘मृत्यु जीवन को परिभाषित करती है।’ लेकिन सार्त्र की मृत्यु पर उनकी प्रेमिका सिमोन दि बोउवार की विह्वलता से हम सब वाकिफ हैं। हमने यह भी सुना है कि दुनिया को बेहतर बनाने की थ्योरी देने वाले कार्ल मार्क्स भी अपनी पत्नी के निधन पर इस कदर व्याकुल थे कि वह पत्नी के साथ ही दफन हो जाना चाहते थे। बड़ी मुश्किल से लोगों ने उन्हें रोका था। भारतीय मिथक की बात करें तो शिव अपनी पत्नी सती (पार्वती) के शव को लेकर पूरे ब्रह्मांड में भटक रहे थे। मृत्यु की लीला ने बड़ों-बड़ों को विचलित किया है, मेरी क्या औकात है। ‘निराला की साहित्य साधना’ में रामविलास शर्मा ने लिखा है कि जब निराला पत्नी की मृत्यु से शोक संतप्त घर लौट रहे थे तो रास्ते में ही बड़े भाई के शव को देख वे मूर्च्छित हो गिर पड़े थे। 22 साल की उम्र में पत्नी और 35 साल की उम्र में पुत्री सरोज की मौत ने उन्हें हिलाकर रख दिया। सरोज की मौत की खबर सुनते ही निराला ने एक भी आंसू नहीं गिराया, न एक भी शब्द कहा। कुछ देर कमरे में चक्कर लगाते रहे। फिर कुर्ता पहना, घड़ी उठाई और घर से बाहर निकल गए। इस पीड़ा को शब्द देते हुए निराला ने शिवपूजन सहाय को पत्र में लिखा, ‘सरोज की मृत्यु की खबर बिजली के धक्के जैसी लगी।’ इस आघात को झेलते हुए वह बिजली का धक्का आजीवन महसूस करते रहे। पत्नी मनोहरा देवी की मौत के बाद गंगा किनारे रात-रात भर वह श्मशान में घूमा करते जहां मनोहरा देवी की चिता जली थी। दिन में अवधूत टीले पर बैठ गंगा में बहती लाशें देखा करते। जीवन का जो सबसे वीभत्स और भयानक रूप था उसे भरी आंख से देखना वे सीख गए थे। एक दिन कुल्ली भाट ने आकर उनसे कहा, ‘मैं जानता हूं, आप मनोहरा को बहुत चाहते थे। ईश्वर चाह की जगह मार देता है, होश कराने के लिए।’ कुल्ली ने जैसे उन्हें जीने का मंत्र दे गया।

       ऐसा क्यों होता है कि कुछ चीजों पर से मृत्यु ही पर्दा उठाती है? खासकर रिश्तों से। कई बार रिश्तों की राख को मुट्ठी में भर लेने के बाद प्रथम बार यह एहसास होता है कि इस शख्स को हम कितना चाहते थे?

       मृत्यु हमेशा ‘बोध’ ही नहीं देती, विक्षिप्तता तक भी पहुंचाती है। भावावेग की चरम स्थिति के छोर तक उसकी अलग-अलग परिणति। याद कीजिए शेक्सपीयर के पात्र किंग लियर को जो अपनी मृत पुत्री कौर्डीलिया का शव लिए देवता और इंसान दोनों को कोसता है। निराला वाले अंदाज में ‘धन्ये मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित कर न सका... हो इसी कर्म पर वज्रपात?’ नहीं जान पाता हूं कि क्यों माइकल एंजेलो जैसे महान चित्रकार को संघर्षों से जूझते हुए अभिशप्तता झेलनी पड़ी। मारे जाने के डर से एक खंडहर में छिपकर रहना पड़ा। क्यों वह दोनों हाथ ऊपर उठाकर चीखता-चिल्लाता रहा, ‘हे ईश्वर। मैंने कौन सा पाप किया है? तूने मुझे क्यों त्याग दिया? मैं अगर मरा नहीं है तो इस नर्क की यात्र क्यों कर रहा हूं।’

       पत्नी की मृत्यु मेरे लिए विपदाओं की शृंखला में एक और नवीनतम कड़ी है। मौत का मतलब साथ रहना ही नहीं होता। कई बार तो साथ रहते हुए भी बिस्तर पर साथ-साथ सोते हुए भी दोनों में से कोई एक मर चुका होता है और हम लाश हुए संबंधों के साथ पूरी जिंदगी गुजार देते हैं। मुर्दा संबंधों के साथ पूरी जिदंगी। बावजूद इसके ‘लता’ की मौत ‘प्रेम’ के कलेजे का उसके जिस्म से निकाल लिया जाना है। आधा जिबह किए हुए बकरे की तकलीफ से गुजरना है। लोग-बाग मुझे समझा रहे हैं, आपको भी पूरा हक है यह समझाने का कि अब इसे स्वीकार कर लो। लेकिन नहीं, कतई नहीं। लता की मौत को मैं किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं कर सकता, उसके अलगाव को स्वीकारने का मतलब बहुत बड़ा है। उसके बगरै जीना भाषा में ही नहीं, जीना ही नहीं है। कुछ और भी है। हां, इतना जरूर हुआ है कि उसकी मृत्यु ने समय को मेरा शत्रु बना दिया है। जिसे मैं बोलना चाहता हूं... जिसे देखना और सुनना चाहता हूं... जो लिखना चाहता था... मैं वह कुछ भी नहीं कर पा रहा हूं जो करना चाहता हूं। एक दीया था। उसकी एक ज्योति थी। हवा के एक झोंके में वह बुझ गई। उस गुम हो गई ज्योति को ढूंढ़ने की एक पागल कोशिश कर रहा हूं।

       अंत में पुनः यह घोषणा कि उपरोक्त जो भी जानकारियां या सूचनाएं दी गई हैं, मेरे विश्वास में सत्य हैं।
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'पाखी' दिसंबर २०१३ से साभार